नित्य जयवन्तो सम्यक् ज्ञान।
ज्ञान ज्ञानमय अनुभव आवे, परम स्वच्छ अम्लान।। टेक।।
ज्ञेय-ज्ञेय में रहें, ज्ञान में पावें नहीं प्रवेश,
अहो ! ज्ञान में नहीं ज्ञेयकृत, होय मलिनता लेश।
नित्य निरंजन निरावरण, ज्यों मेघ पटल बिन भान।। 1।।
सम्यग्दर्शन सहित ज्ञान, सम्यक् चारित्र उपजावे,
सहज ज्ञान में मग्न होय, सो सहज मुक्ति पद पावे।
जयवन्तो जगमाँहि नित्य ही, ज्ञान सु तीर्थ प्रधान।। 2।।
अक्षर शुद्धि अर्थ शुद्धिकर, उभय शुद्धि प्रगटावे,
योग्य काल आगम अभ्यासे, उपधाने सुख पावे।
नाम गुरु का नहीं छिपावे, करे विनय बहुमान।। 3।।
गुरु उपदेश युक्ति-आगम से, तत्त्व स्वरूप पिछाने,
भेदज्ञान कर स्वानुभूति का क्षण-क्षण उद्यम ठाने।
निर्विकल्प आत्म अनुभव ही, निश्चय सम्यग्ज्ञान।। 4।।
मुक्त हुये, हो रहे, होयेंगे, ज्ञान की महिमा जानो,
ज्ञान बिना सब क्रियाकाण्ड, बिन अंक शून्य सम मानो।
जन्म-जरामृत नाश करन को, कर ज्ञानामृत पान।। 5।।
ज्ञान स्वरूप नहीं पहिचाने, भव-भव भटके सोय,
ज्ञान भाव की महा शरण ले, अशरण कहीं न होय।
संशय विभ्रम मोह रहित प्रगटाओ आतमज्ञान।। 6।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह