जयधवला : एक अनुशीलन | Jayadhavala Ek Anushilan

जयधवला : एक अनुशीलन

-प्रो. वीरसागर जैन

1. भूमिका

प्रायः देखा जाता है कि लोग धवला, महाधवला, जयधवला का नाम तो बहुत कहते-सुनते हैं, उसके प्रति अत्यधिक श्रद्धा भाव भी रखते हैं, उनकी महिमा से अभिभूत-से भी रहते हैं; परन्तु फिर भी उनको इन ग्रन्थों का कुछ परिचय मालूम नहीं होता। इनका स्वाध्याय करना तो दूर, लोगों ने इनका दर्शन तक भी नहीं किया होता है। यह स्थिति देखकर बहुत खेद होता है ।

यद्यपि पुराने समय में तो इन ग्रन्थों का दर्शन करना भी वास्तव में अत्यन्त दुर्लभ था, पं. टोडरमलजी जैसे विद्वान् तक उसके लिए तरसते थे, परन्तु अब तो हम सबके महान् भाग्योदय से ये ग्रन्थ हिन्दी, कन्नड़ आदि भाषाओं में अनुवाद के साथ प्रकाशित होकर सहज उपलब्ध हो गये हैं; अतः अब तो हम सबको इनका स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए और यथासंभव दूसरों को भी कराना चाहिए।

किन्तु खेद है कि आज भी अधिकांश लोग, न केवल सामान्य लोग, बड़े-बड़े पण्डित तक भी समाज में ऐसे मिलते हैं, जिन्होंने इन ग्रन्थों का दर्शन तक भी नहीं किया, अध्ययन तो कहाँ से करेंगे, अतः यहाँ इन ग्रन्थों में से एक ग्रन्थ ‘जयधवला’ का परिचयात्मक अनुशीलन लिखने का प्रयास किया जाता है।

धवला, महाधवला, जयधवला का परिचय प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम तो यह ज्ञातव्य है कि तीर्थंकर भगवान् महावीर और अन्य केवली-श्रुतकेवलियों के पश्चात् जब श्रुतज्ञान का ह्रास होने लगा और उसे लिपिबद्ध करने का उपक्रम प्रारम्भ हुआ तो दिगम्बर-जैन-श्रुत-परम्परा में सर्वप्रथम दो शिरोमणि आगम-ग्रन्थ लिखे गये थे-

1. छक्खंडागम (षट्खण्डागम)- इसकी रचना आचार्य धरसेन की प्रेरणा से पुष्पदंत-भूतबलि आचार्यों ने प्राकृत भाषा एवं सूत्र-शैली में की थी। यह ग्रन्थ दृष्टिवाद नामक बारहवें अंग के दूसरे पूर्व ‘आग्रायणी’ पर आधारित था।

2. कसायपाहुड (कषायप्राभृत)- इसकी रचना आचार्य गुणधर स्वामी ने 233 गाथासूत्रों में की थी। यह ग्रन्थ भी दृष्टिवाद नामक बारहवें अंग पर ही आधारित था, किंतु दूसरे पूर्व पर नहीं, पाँचवें पूर्व ‘ज्ञानप्रवाद’ पर आधारित था।

‘षट्खण्डागम’ और ‘कसायपाहुड़’ -इन दोनों ग्रन्थों पर विक्रम की नौवी शताब्दी में आचार्य वीरसेन स्वामी ने अत्यंत विशाल एवं गूढ-गम्भीर टीकाएं लिखी हैं | उनमें से ‘षट्खण्डागम’ की टीका का नाम ‘धवला’ है और ‘कसायपाहुड’ की टीका का नाम ‘जयधवला’ है।

प्रश्न है कि फिर महाधवला क्या है ?

उत्तर- दरअसल, धवला टीका ‘षट्खण्डागम’ के प्रारम्भिक पाँच खण्डों पर ही लिखी गई थी, जबकि उसमें कुल छह खंड हैं । छठे खण्ड पर टीका न लिखने का क्या कारण है - यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता, परन्तु विद्वान् कहते हैं कि वह बहुत सरल है, इसलिए उस पर टीका नहीं लिखी गई | खैर, जो भी हो; बाद में जब धवला और जयधवला नाम बहुत प्रचलित हो गये तो ‘षट्खण्डागम’ के इस छठे खंड को ‘महाधवला’ के नाम से कहा जाने लगा | इस खंड का मूल नाम भी ‘महाबन्ध’ था, अतः उससे कुछ मिल भी गया |

इस प्रकार हम देखते हैं कि धवला ‘षट्खण्डागम’ की टीका का नाम है, जयधवला ‘कसायपाहुड़’ की टीका का नाम है और महाधवला किसी की भी टीका नहीं है, अपितु ‘षट्खण्डागम’ का ही छठा खण्ड मूल है | इनमें से ‘धवला’ 72 हजार श्लोक-प्रमाण है, महाधवला…हजार श्लोक-प्रमाण है और ‘जयधवला’ 60 हजार श्लोक-प्रमाण है। कुल मिलाकर धवल-ग्रन्थों का परिमाण… हजार श्लोक-प्रमाण है ।

प्रस्तुत निबन्ध में हम मात्र ‘जयधवला’ का परिचय प्राप्त करने की कोशिश करेंगे।

‘जयधवला’ के सम्बन्ध में यहाँ एक तथ्य यह विशेषरूप से ज्ञातव्य है कि इस 60 हजार श्लोक-प्रमाण पूरी टीका में से लगभग 20 हजार श्लोक-प्रमाण टीका ही आचार्य वीरसेन स्वामी लिख पाये थे, शेष लगभग 40 हजार श्लोक-प्रमाण टीका उनके स्वर्गवास के बाद उनके शिष्य आचार्य जिनसेन स्वामी ने लिखी है।

2. जयधवला का मूलाधारभूत ग्रन्थ-

‘जयधवला’ का मूलाधारभूत ग्रन्थ ‘कसायपाहुड’ (कषायप्राभृत) है, अतः ‘जयधवला’ से परिचित होने के लिए हमें ‘कसायपाहुड’ से भी परिचित होना अत्यन्त आवश्यक है।

‘कसायपाहुड’ की रचना आचार्य गुणधरस्वामी ने की है | गुणधरस्वामी का समय विक्रम पूर्व प्रथम शताब्दी माना जाता है। वे दृष्टिवाद नामक बारहवें अंग के पाँचवें पूर्व ‘ज्ञानप्रवाद’ के विशेष ज्ञाता थे और उन्होंने अपने उसी ज्ञान के आधार पर ‘कसायपाहुड’ नामक ग्रन्थ की रचना की थी।

‘कसायपाहुड’ का दूसरा नाम ‘पेज्जदोसपाहुड’ (प्रेयदोषप्राभृत) भी है, क्योंकि इसमें सर्व कषायों को राग और द्वेष के दो मूल वर्गों में विभाजित करके समझाया गया है।

‘कसायपाहुड़’ में कुल मिलाकर 233 गाथासूत्र पाये जाते हैं, जो निम्नलिखित 15 अधिकारों में विभाजित हैं-

  1. पेज्जदोसविभक्ति अधिकार
  2. स्थितिविभक्ति अधिकार
  3. अनुभागविभक्ति अधिकार
  4. स्थितिविभक्ति-झीणाझीण-स्थित्यन्तिक अधिकार
  5. बन्धक अधिकार
  6. वेदक अधिकार 7. उपयोग अधिकार
  7. चतुःस्थान अधिकार
  8. व्यंजन अधिकार
  9. दर्शनमोहोपशमनाधिकार
  10. दर्शनमोहोक्षपणाधिकार
  11. देशविरत अधिकार
  12. संयमलब्धि अधिकार
  13. चारित्रमोहोपशमनाधिकार
  14. चारित्रमोहक्षपणाधिकार

प्रत्येक अधिकार ग्रन्थ की विषयवस्तु को उसी प्रकार क्रमिक ढंग से आगे बढ़ाता है, जिसप्रकार अनादिकालीन मिथ्यादृष्टि जीव शनैः-शनैः आगे बढता हुआ मोक्ष-प्राप्ति करता है। इसका विवेचन आगे किया जायेगा।

‘कसायपाहुड़’ की रचना-शैली बड़ी ही सारगर्भित है। उसमें सोलह हजार पद प्रमाण ‘पेज्जदोसपाहुड’ को केवल 233 गाथाओं में समेट लिया गया है- यह आचार्य गुणधर का अनुपम रचना-कौशल है। ‘कसायपाहुड’ की अनेक गाथाएँ तो इतनी गूढ़ है कि यदि आचार्य यतिवृषभ ने उन पर चूर्णिसूत्र न लिखे होते तो उन गाथासूत्रों का अर्थ शायद कोई नहीं समझ पाता। कसायपाहुड एक अत्यधिक लोकप्रिय ग्रन्थ रहा है। उसे साक्षात् तीर्थकर महावीर की वाणी के समान पूज्य एवं प्रामाणिक आगमग्रन्थ माना जाता है और इसीलिए इसके रचना-काल से ही इसका पठन-पाठन अत्यधिक प्रचलित रहा है। यही कारण है कि इसके ऊपर अनेक छोटी-बड़ी वृत्तियाँ, चूर्णिसूत्र और टीकाएँ लिखी गईं । उनमें से कतिपय प्रमुख निम्नलिखित हैं-

  1. यतिवृषभस्वामी कृत चूर्णिसूत्र
  2. उच्चारणाचार्य कृत उच्चारणाचार्यसूत्र
  3. शामकुण्डाचार्य कृत पद्धति (संस्कृत-कन्नड़-मिश्रित)
  4. तुम्बलूराचार्य कृत चूड़ामणि (संस्कृत-कन्नड़-मिश्रित)
  5. बप्पदेव गुरु कृत व्याख्याप्रज्ञप्ति

इनके अतिरिक्त भी अनेक टीकाओं के उल्लेख यत्र-तत्र उपलब्ध होते हैं, किन्तु आज उक्त सबमें से आचार्य यतिवृषभ स्वामी कृत चूर्णिसूत्र को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इतना अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है कि वे मूल ग्रन्थ के अभिन्न अंग बन गये हैं । परवर्ती सभी विद्वानों ने उन्हीं के आधार पर कसायपाहुड के मूल गाथासूत्रों की व्याख्या की है।

आचार्य यतिवृषभ के इन चूर्णिसूत्रों में ‘कसायपाहुड’ के गाथासूत्रों का संक्षिप्त एवं विशद व्याख्यान उपलब्ध होता है जयधवला में स्थान-स्थान पर आचार्य वीरसेन स्वामी ने भी इन चूर्णिसूत्रों के उद्धरणपूर्वक ही विषय-विवेचन किया है। आचार्य यतिवृषभ स्वामी का समय विक्रम की दूसरी-तीसरी शताब्दी माना जाता है। इनका एक अन्य ग्रन्थ ‘तिल्लोयपण्णत्ति’ भी जैन वाङ्मय में अपना अनूठा स्थान रखता है।

3. जयधवला के कर्ता-

कहा जा चुका है कि धवला और जयधवला -इन दोनों के प्रथमकर्ता आचार्य वीरसेन स्वामी हैं; किन्तु इसमें विशेष ज्ञातव्य यह है कि ‘धवला’ के कर्ता तो पूर्णतः आचार्य वीरसेन स्वामी ही है, किन्तु ‘जयधवला’ को वे पूरा नहीं कर सके थे, लगभग 20000 श्लोक-प्रमाण लिखने के बाद ही उनका स्वर्गवास हो गया था, अतः ‘जयधवला’ को उनके सुयोग्य शिष्य आचार्य जिनसेन स्वामी ने पूरा किया था। अतः कहना चाहिए कि जयधवला के कर्ता निम्नलिखित दो आचार्य हैं-

  1. आचार्य वीरसेन स्वामी,
  2. आचार्य जिनसेन स्वामी।

‘जयधवला’ का कुल परिमाण 60,000 श्लोक-प्रमाण है। इसमें से कितनी टीका वीरसेन स्वामी ने लिखी और कितनी जिनसेन स्वामी ने -यह एकदम निश्चित रूप से तो नहीं बताया जा सकता, पर विद्वानों का अनुमान है कि लगभग 20,000 श्लोक-प्रमाण टीका आचार्य वीरसेन स्वामी ने लिखी है और शेष लगभग 40,000 श्लोक-प्रमाण टीका आचार्य वीरसेन स्वामी ने लिखी है।

किन्तु जयधवला की प्रस्तावना में पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री और पं. कैलाशचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री ने यह सम्भावना प्रकट की है कि 26,500 श्लोक-प्रमाण टीका आचार्य वीरसेन स्वामी ने लिखी और शेष टीका आचार्य जिनसेन स्वामी ने लिखी है। यथा-

“इन्द्रनन्दि के कथनानुसार पहले स्कन्ध की टीका श्री वीरसेन स्वामी ने रची थी।…जयधवला की प्रति के आधार से गणना पर विभक्ति-अधिकार पर्यन्त ग्रन्थ का परिणाम लगभग 26500 श्लोक-प्रमाण बैठता है। यहीं तक ग्रन्थ का विवेचन विस्तृत और स्पष्ट भी प्रतीत होता है, उसके आगे उतना विस्तृत वर्णन भी नहीं है, अतः संभवतः पहले स्कन्ध पर्यन्त श्री वीरसेन स्वामी की रचना है। इन्द्रनन्दि ने प्रत्येक स्कन्ध को एक-एक भाग समझकर मोटे रूप से उसका परिमाण 20,000 लिख दिया जान पड़ता है। किन्तु इतना स्पष्ट है कि इन्द्रनन्दि के कथनानुसार एक भाग के रचियता श्री वीरसेन स्वामी थे और शेष दो भाग प्रमाण ग्रन्थ उनके शिष्य जिनसेन ने रचकर समाप्त किया था।”

अब यहाँ ‘जयधवला’ के कर्ता दोनों आचार्यों का संक्षिप्त परिचय लिखा जाता है-

  1. आचार्य वीरसेन स्वामी- आचार्य वीरसेन स्वामी विक्रम की नौवीं शताब्दी में हुए अपने समय के एक अद्भुत विद्वान् आचार्य थे। ‘जयधवला’ की अन्तिम प्रशस्ति के अनुसार वे साक्षात् सर्वज्ञ के समान थे। उनकी प्रज्ञा सर्वार्थगामिनी थी, उन्हें देखकर सर्वज्ञ के सद्भाव-सम्बन्धी शंका तत्काल निर्मूल हो जाती थी-

"श्रीवीरसेन इत्यात्तभट्टारकपृथुप्रथः ।
पारदृश्वाधिविद्यानां साक्षादिव स केवली ।।19।।

यस्य नैसर्गिकीं प्रज्ञां दृष्ट्वा सर्वार्थगामिनीम् ।
जाताः सर्वज्ञस‌द्भावे निरारेका मनीषिणः ॥ -जयधवला-प्रशस्ति

आचार्य वीरसेन स्वामी की भारती सर्व सिद्धान्तों में निर्बाध गति से प्रवर्तन करती थी। वे सम्भवतः सबसे पहले ‘सिद्धान्तचक्रवर्ती’ थे-

“प्रीणितप्राणिसंपत्तिराक्रान्ताशेषगोचरा ।
भारती भारतीवाज्ञा षट्खण्डे यस्य नास्खलत्” ।।20।।

आचार्य वीरसेन स्वामी को दोनों सिद्धान्तों का ज्ञान था | आचार्य गुणधर स्वामी को कषायप्राभृत का ज्ञान था और आचार्य धरसेन स्वामी को कर्मप्राभृत का ज्ञान था, किन्तु आचार्य वीरसेन स्वामी को, उनसे आठ-नौ सौ वर्ष बाद होने पर भी, दोनों सिद्धान्तों का ज्ञान था। यही कारण है कि उन्हें ‘प्रज्ञाप्रमण’ और ‘श्रुतकेवली’ तक कह दिया जाता था। यथा-

“वे दोनों सिद्धान्त-ग्रन्थों के रहस्य के अपूर्व वेत्ता थे तथा प्रथम सिद्धान्त-ग्रन्थ ‘षट्खण्डागम’ के छहों खण्डों में तो उनकी भारती भारती आज्ञा के समान अस्खलित गति थी। सम्भवतः वे प्रथम चक्रवर्ती भरत के समान प्रथम सिद्धान्तचक्रवर्ती थे। उनके बाद से ही सिद्धान्तग्रन्थों के ज्ञाताओं को यह पद दिया जाने लगा था। उनके आगम-विषयक ज्ञान और बुद्धि-चातुरी को देखकर विद्वान् उन्हें श्रुतकेवली और प्रज्ञाश्रमणों में श्रेष्ठ तक कहते थे।"

  • जयधवला-प्रस्तावना, पृष्ठ 70

आचार्य वीरसेन स्वामी की ग्रन्थ-सम्पदा के रूप में आज हमें धवला और जयधवला जैसी अनुपम कृतियाँ प्राप्त होती हैं।

2. आचार्य जिनसेन स्वामी- आचार्य जिनसेनस्वामी आचार्य वीरसेनस्वामी के अन्तेवासी परम शिष्य थे। जैन-साहित्य के इतिहास में ‘जिनसेन’ नाम के अनेक आचार्य हो चुके हैं, अंतः इनको ‘आचार्य जिनसेन द्वितीय’ के नाम से पहचाना जाता है। आचार्य जिनसेन प्रथम इनसे कुछ ही समय पूर्व हुए थे, जिन्होंने ‘हरिवंशपुराण’ नामक ग्रन्थ की रचना की थी। आचार्य जिनसेन द्वितीय के ग्रन्थ निम्नलिखित माने जाते हैं-

  1. पार्श्वभ्युदय- यह मेघदूत की शैली में पार्श्वनाथ का चरित्र है।

  2. आदिपुराण- इसे इनके शिष्य आचार्य गुणभद्र ने पूरा किया था।

  3. जयधवला- इसे इनके गुरु वीरसेन स्वामी ने आरम्भ किया था।

आचार्य जिनसेन द्वितीय, जिन्हें प्रस्तुत निबन्ध में हमने सर्वत्र आचार्य जिनसेनस्वामी कहा है, का परिचय देते हुए ‘जयधवला’ की प्रस्तावना में लिखा गया है कि-

“साक्षात् सर्वज्ञसम, प्रज्ञाश्रमणों में श्रेष्ठ श्री वीरसेन स्वामी के शिष्य श्री जिनसेन भी अपने गुरु के अनुरूप ही विद्वान् थे। मालूम होता है, वे बाल्यकाल से ही गुरुकुल में वास करने लगे थे, इसीलिए उनका कनछेदन भी न हो सका था। वे शरीर से कृश थे, अति सुन्दर भी नहीं थे, फिर भी उनके गुणों पर मोक्षलक्ष्मी और सरस्वती दोनों ही मुग्ध थी। एक ओर वे अखण्ड ब्रह्मचारी और परिपूर्ण संयमी थे तो दूसरी ओर अनुपम विद्वान् थे।"

-प्रस्तावना, पृ.-71

आचार्य जिनसेनस्वामी का उल्लेख श्रवणबेलगोला के शिलालेखों में भी अनेक स्थानों पर पाया जाता है, जिनमें अभिलेख-संख्या 47, 50, 105, 422 विशेष उल्लेखनीय हैं। मेघचन्द्र-प्रशस्ति का अभिलेख 105 इसपकार है-
“सिद्धान्ते जिन-वीरसेनसदृशः शास्त्राब्ज-भा-भास्करः ।
जीयाज्जगत्यां जिनसेनसूरिर्यस्योपदेशोज्ज्वलदर्पणेन।
व्यक्तिकृतं सर्वमिदं विनेयाः पुण्यं पुराणं पुरुषा विदन्ति।
विनय-भरण-पात्रं भव्यलोकैमित्रं विबुधनुतचरित्रं तद्गणेन्द्राग्रपुत्रं ।
विहितभुवनभद्रं वीतमोहोरुनिद्रं विनमत गुणभद्रं तीर्णविद्यासमुद्रं ।।”

जैनशिलालेखसंग्रह, प्रथम भाग, पृष्ठ 62 एवं 199

4. ‘जयधवला’ का नामकरण-

‘जयधवला’ का नाम ‘जयधवला’ क्यों रखा गया है- इस बारे में टीकाकार आचार्य वीरसेनस्वामी ने स्वयं तो कुछ नहीं बताया है, परन्तु आधुनिक विद्वानों ने कुछ अनुमान लगाये हैं। यथा-

  1. यह टीका धवला के बाद किन्तु उसी परम्परा में लिखी गई, अतः उससे भिन्न दिखाने के लिए ‘जय’ शब्द जोड़कर इसे ‘जयधवला’ कहा गया है।
  2. यह टीका वाटग्रामपुर के जिनालय में प्रारम्भ हुई थी, जिसमें चन्द्रप्रभ की धवल प्रतिमा विराजमान है और इस टीका को उनकी जय कामना के साथ बनाया गया है, अतः इसका नाम ‘जयधवला’ रखा गया है।
  3. ये धवला आदि टीकाएँ राजा अमोघवर्ष के शासनकाल में लिखी गई थीं जो ‘धवल’ उपाधि से प्रसिद्ध था, अतः इन टीकाओं का नाम ‘धवला’ आदि रखा गया है।
  4. ‘धवला’ टीका की पूर्णता कार्तिक मास के धवल (शुक्ल) पक्ष में त्रयोदशी को पूर्ण हुई थी, अतः इनका नाम धवला आदि रखा गया है।
  5. इन टीकाओं की उज्जवल ख्याति ने तीनों लोकों को धवलित कर दिया, अतः इनका नाम ‘धवला’ आदि रखा गया है।
  6. इत्यादि ।

किन्तु मुझे उक्त कारण बहुत ठोस प्रतीत नहीं होते हैं | मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि ‘जयधवला’ ‘कसायपाहुड’ की टीका है और ‘धवल’ शब्द का अर्थ एकदम स्वच्छ, निर्मल, उज्जवल, विशद, शुद्ध, विशुद्ध आदि होता है। इस ग्रन्थ के अध्ययन से पाठक कषायों पर पूर्ण जय-विजय प्राप्त करके पूर्ण शुद्ध हो जाये -इसी भावना के साथ इस टीका का नाम ‘जयधवला’ रखा गया होगा।

प्रश्न- कहीं-कहीं ‘जयधवला’ को ‘जयधवल’ शब्द से भी कहा जाता है। सही नाम क्या है- जयधवला या जयधवल ?

उत्तर- धवला, महाधवला और जयधवला को सि‌द्धान्त कहा जाता है और ‘सि‌द्धान्त’ शब्द पुल्लिंग है, अतः धवला आदि को भी पुल्लिंग में प्रयुक्त कर दिया जाता है- धवल, महाधवल, जयधवल इत्यादि; परन्तु इनका मूल नाम धवला, महाधवला, जयधवला ही है। ऐसा ही अभिप्राय ‘जयधवला’ की प्रस्तावना में पं. फूलचन्द्रजी सि‌द्धान्त शास्त्री ने भी प्रकट किया है। यथा-

“सिद्धांत शब्द पुल्लिंग है और धवला, जयधवला नाम स्त्रीलिंग हैं | स्त्रीलिंग शब्द के साथ पुल्लिंग शब्द की संगति ठीक बैठती नहीं | इसलिए धवला और जयधवला को धवल और जयधवल रूप देकर के धवल सिद्धांत और जयधवल सिद्धांत नाम प्रचलित हो गया है।" -प्रस्तावना, पृष्ठ 26

5. ‘जयधवला’ का रचनाकाल एवं स्थान-

‘जयधवला’ की अन्तिम प्रशस्ति में उसका रचनाकाल एवं स्थान इस प्रकार बताया गया है-

“इति श्रीवीरसेनीया टीका सूत्रार्थदर्शिनी ।
वाटग्रामपुरे श्रीमद्गुर्जरार्यानुपालिते ।।6।।
फाल्गुने मासि पूर्वाण्हे दशम्यां शुक्लपक्षके
प्रवर्धमानपूजोरुनन्दीश्वरमहोत्सवे ।।7।।
अमोघवर्षराजेन्द्रराज्यप्राज्यगुणोदया ।
निष्ठिता प्रचयं यायादाकल्पान्तमनल्पिका ।।8।।
एकान्नषष्ठिसमधिकसप्तशताब्देषु शकनरेंद्रस्य ।
समतीतेषु समाप्ता जयधवला प्राभृतव्याख्या ।।11।।”

अर्थ- श्री वीरसेनस्वामी की यह ‘जयधवला’ टीका गुर्जरराय श्री अमोघवर्ष राजेन्द्र द्वारा अनुपालित नगर, वाटग्रामपुर फाल्गुन शुक्ला दशमी को पूर्वाह्न में नन्दीश्वर महोत्सव की शुभ बेला में शक संवत् 759 में पूर्ण हुई।

राजा अमोघवर्ष के बारे में आचार्य गुणभद्रस्वामी ने ‘उत्तपुराण’ की अन्तिम प्रशस्ति में लिखा है कि राजा अमोघवर्ष जिनसेनस्वामी के चरणों में नमस्कार करके अपने आपको पवित्र हुआ मानता था-

"यस्य प्रांशुनखांशुजालविसरदवारन्तराविर्भवत ।
पादाम्भोजरजः पिशंगमुकुटप्रत्यग्ररत्नद्युतिः ।।
संस्मरतास्वममोघवर्षनृपतिः पूतोऽहमद्येत्यलं ।
स श्रीमाञ्जिनसेनपूज्यभगवत्पादो जगन्मंगलम् ।।10 ।।

इससे ज्ञात होता है कि राजा अमोघवर्ष एक जैन राजा था और आचार्य जिनसेन स्वामी का बड़ा भक्त था। अमोघवर्ष की राजधानी मान्यखेट जिसके बारे में वि‌द्वानों का अनुमान है कि वह वर्तमान में महाराष्ट्र राज्य के शोलापुर जिले का मलखेडा ग्राम है। किन्तु प्रश्न उठता है कि ऊपर प्रशस्ति में तो उसे गुजरात में पूर्ण हुई लिखा है। इसका समाधान जयधवला की प्रस्तावना में विस्तृत शोध-खोज के आधार पर यह प्रस्तुत किया गया है कि राजा अमोघवर्ष की राजधानी तो मान्यखेट, मलखेडा, शोलापुर, महाराष्ट्र ही है; किन्तु उन्होंने गुजरात का भी दक्षिण-मध्य भाग जीतकर अपने अधीन कर रखा था। इसलिए प्रशस्ति में उसे उनके द्वारा अनुपालित वाटग्रामपुर में ऐसा लिखा है।

वाटग्रामपुर के सम्बन्ध में भी विद्वानों का अनुमान है कि यह आधुनिक समय का ‘बड़ौदा’ ही है, क्योंकि ‘बड़ौदा’ का प्राचीन नाम ‘वटपद’ पाया जाता है।

6. जयधवला की विषयवस्तु-

‘जयधवला’ में उसके आधारभूत ग्रन्थ ‘कसायपाहुड’ की ही भांति कुल पन्द्रह अधिकार हैं, जिनके नाम ऊपर गिनाये जा चुके हैं। जयधवला में उन्हीं पन्द्रह अधिकारों की विषयवस्तु का विस्तृत व्याख्यान उपलब्ध होता है, जो अति संक्षेप में इसप्रकार है-

  1. पेज्जदोसविभक्ति अधिकार- इस पहले अधिकार में क्रोधादि चार कषायों के दो भाग विवक्षावशात् समझाये गये हैं- प्रेय और द्वेष, और फिर उनका उदय की प्रधानता से वर्णन किया गया है।

  2. स्थितिविभक्ति अधिकार- इस अधिकार में कर्मबन्ध के चार भेदों (प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, प्रदेश) में से प्रथम दो प्रकृति और स्थिति का विस्तृत विवेचन किया गया है। प्रकृति में कर्मों की मूल एवं उत्तर प्रकृतियों का पृथक्-पृथक् कथन है और स्थिति में सभी प्रकृतियों की जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति बताई गई है।

  3. अनुभागविभक्ति अधिकार- कर्मों की फलदान शक्ति को अनुभाग कहते हैं। इस तीसरे अधिकार में कर्मों की इसी फलदान-शक्ति का संजादि विविध अनुयोगद्वारों के द्वारा विस्तृत निरूपण किया गया है।

  4. स्थितिविभक्ति-झीणाझीण-स्थित्यन्तिक अधिकार- इस अधिकार में कर्मों की स्थिति का और उसमें भी उनके उत्कर्ष, अपकर्षण, संक्रमण, उदययोग्य (झीण), उदय-अयोग्य, (अझीण) आदि का भी निरूपण है।

  5. बन्धक अधिकार- बन्ध दो प्रकार का होता है बन्ध और संक्रम। प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, प्रदेश को बन्ध कहते हैं और बँधे हुए कर्मों का यथायोग्य अपने अवान्तर भेदों में बदलने को संक्रम कहते हैं। इस अधिकार में इन्हीं दोनों का विवेचन किया गया है।

  6. वेदन अधिकार- इस अधिकार में कर्म की उदय और उदीरणा -इन दो अवस्थाओं का मुख्य रूप से वर्णन किया गया है।

  7. उपयोग अधिकार- इस अधिकार में क्रोधादि कषायों के उपयोग का स्वरूप विविध प्रकार से समझाया गया हैं। यथा- कषाय का उदय कब होता है, कैसे होता है, कब तक रहता है, एक भव में कितनी बार होता है, कितने भवों तक आगे जाता है, इत्यादि।

  8. चतुःस्थानाधिकार- इस अधिकार का नाम चतुःस्थान इसलिए है क्योंकि इसमें कषायों को शक्ति की अपेक्षा चार-चार स्थानों में विभाजित करके समझाया गया है। यथा- क्रोध चार प्रकार का है- पाषाण-रेखा के समान, पृथ्वी-रेखा के समान, धूलि-रेखा के समान और जलरेखा के समान। मान भी चार प्रकार का है- पाषाणस्तम्भ के समान, अस्थि के समान, काष्ठ के समान, लता के समान। इत्यादि।

  9. व्यंजन अधिकार- इस अधिकार में सभी कषायों के व्यंजन अर्थात् पर्यायवाची शब्दों को बतलाया गया है, ताकि उनका स्वरूप और अधिक स्पष्ट हो सके।

  10. दर्शनमोहोपशमन अधिकार- इस अधिकार में दर्शन मोहनीय कर्म का उपशम कब और कैसे होता है, इसे समझाया गया है और साथ ही उस उपशामक सम्यग्दृष्टि जीव के स्वभाव का चित्रण किया गया है।

  11. दर्शनमोहक्षपणाधिकार- इस अधिकार में दर्शनमोहनीय कर्म का क्षय कब, कौन जीव, कैसे करता है। साथ उस क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव के स्वभाव एवं गति-आगति का भी निरूपण किया गया है।

  12. देशविरत अधिकार- इस अधिकार में देशविरत अर्थात् संयमासंयम लब्धि और उसके धारक जीव के परिणामों का सूक्ष्म विवेचन है।

  13. संयमलब्धि अधिकार-इस अधिकार में संयमलब्धि और उसके धारक जीवों का आठ अनुयोगद्वारों के माध्यम से निरूपण है।

  14. चारित्रमोहोपशमनाधिकार- इस अधिकार में चारित्रमोह का उपशम कब, कैसे और कितने प्रकार से होता है, इत्यादि विषयों का निरूपण है। साथ ही उपशामक जीव के उत्थान-पतन का भी विवेचन है।

  15. चारित्रमोहक्षपणाधिकार- इस अधिकार में चारित्रमोह के क्षय का अर्थात् क्षपक श्रेणी से लेकर वीतराग-सर्वज्ञ बनने तक का और फिर पूर्ण शुद्ध सिद्ध मुक्त अवस्था प्राप्त करने तक का भी विस्तृत निरूपण है।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि उक्त सभी अधिकारों की विषयवस्तु में एक क्रमबद्ध विकास है, वह अनादिकालीन मिथ्यादृष्टि जीव के स्वरूप का विश्लेषण करने के बाद उसे विकास के पथ पर आरूढ करके सिद्धशिला तक पहुँचाकर पूर्ण होती है।

  1. ‘जयधवला’ की भाषाशैली-

‘जयधवला’ की भाषा अधिकांशतः प्राकृत है, किन्तु बीच-बीच में संस्कृत का भी बहुत मिश्रण पाया जाता है। प्राकृत, संस्कृत के इस सम्मिश्रण को अन्तिम प्रशस्ति में मणिप्रवाल-शैली का नाम दिया गया है । यथा-

“प्रायः प्राकृतभारत्या क्वचित् संस्कृतमिश्रया ।
मणिप्रवालन्यायेन प्रोक्तोऽयं ग्रन्थविस्तरः ।।”

इससे ज्ञात होता है कि आचार्य वीरसेन एवं जिनसेन स्वामी का दोनों भाषाओं पर असाधारण अधिकार था और किसी भी एक भाषा का कोई आग्रह नहीं था। वे तो प्रतिपाद्य विषय को ही अधिक से अधिक स्पष्टता एवं सुगमता के साथ प्रस्तुत करना चाहते थे। उनका बल भाषा की अपेक्षा भाव पर अधिक था और इसी के लिए उन्होंने दोनों भाषाओं का सौन्दर्य-विधायक सम्मिश्रण ‘मणिप्रवाल शैली’ में प्रस्तुत किया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वे इसी के कारण गूढ़-गम्भीर विषय को सरल-सुबोध ढंग से प्रतिपादित करने में समर्थ सिद्ध हुए हैं। अन्तिम प्रशस्ति में भी कहा है-

"होइ सुगमं पि दुग्गमणिवुणवक्खाणकारदोसेण ।
जयधवलाकुसलाणं सुगमं वि य दुग्गमा वि अत्थगई ।।

अर्थात् व्याख्याता अनिपुण हो तो सुगम बात भी दुर्गम हो जाती है, किन्तु जयधवला-कुशल को तो दुर्गम अर्थ का भी ज्ञान सुगम हो जाता है।

‘जयधवला’ की विषय-प्रतिपादन-शैली के सम्बन्ध में प्रस्तावनाकार विद्वानों का निम्नलिखित कथन पठनीय है-

“टीकाकार का भाषा पर जितना प्रभुत्व है उससे भी असाधारण प्रभुत्व तो उनका ग्रन्थ में चर्चित विषय पर है। जिस विषय पर वे लेखनी चलाते हैं, उसमें ही कमाल करते हैं। ऐसा मालूम होता है मानो किसी ज्ञान कुबेर के द्वार पर पहुंच गये हैं जो अपने अटूट ज्ञान के भण्डार को लुटाने के लिए तुला बैठा है। वह किसी को निराश नहीं करना चाहता और इसलिए सिद्धान्त की गहन चर्चाओं को शंकाएँ उठा-उठाकर इतना स्पष्ट कर डालना चाहता है कि बुद्धि में दरिद्र से दरिद्र व्यक्ति भी उसके द्वार से कुछ-न-कुछ लेकर ही लौटे। वह शब्दों और विकल्पों के जाल में डालकर अपने पाठक पर अपनी विद्वत्ता की धाक नहीं जमाना चाहता, किन्तु चर्चित विषय को अधिक से अधिक स्पष्ट करके पाठक के मानस पर उसका चित्र खींच देना चाहता हैं। यही उसकी रचना-शैली का सौष्ठव है।” -पृष्ठ 30

‘जयधवला’ की व्याख्यान-शैली की अनेक विशेषताएं हैं जिनमें से एक प्रमुख यह है कि उसमें पूर्वप्रवहमान आगम-परम्परा के अनुकूल ही रहने की बलवती इच्छा है, उससे किंचित् भी इधर-उधर हो जाने का भारी भय दिखाई देता है। यही कारण है कि वे परस्पर विरुद्ध अभिप्राय वाले कथनों की व्याख्या के समय किसी भी कथन को मिथ्या नहीं कहते, बल्कि ‘एत्थ गोदमो पुच्छेयव्वो’ अथवा ‘तं च उवदेसं लहिय वत्तव्वं’ कहकर आगे बढ़ जाते हैं। इससे उनकी आगम-प्रतिबद्धता का पता चलता है, जिस पर हम आधुनिक वक्ताओं और लेखकों को गम्भीरता पूर्वक चिन्तन करना चाहिए।

8. 'जयधवला का प्रकाशन-

‘जयधवला’ का प्रकाशन भा० दि० जैन संघ, चौरासी, मथुरा से सोलह भागों में सन् 1942 से 1988 के बीच हुआ है। इसके सम्पादक पं. फूलचन्द्र शास्त्री और पं. कैलाशचन्द्र शास्त्री है। किन्तु प्रथम भाग के सम्पादकों में एक नाम पं. महेन्द्रकुमार न्यायाचार्य जी का भी छपा हुआ है।

‘जयधवला’ में 15 अधिकार हैं, परन्तु उसका प्रकाशन 16 सोलह भागों में हुआ है, जिसका विवरण इस प्रकार है-

भाग 1 में प्रथम अधिकार है, भाग 2, 3 एवं 4 में द्वितीय अधिकार है, भाग 5 में तृतीय अधिकार है, भाग 6 एवं 7 में चतुर्थ अधिकार है, भाग 8 एवं 9 में पंचम अधिकार है, भाग 10 एवं 11 में षष्ठ अधिकार है, भाग 12 में सप्तम, अष्टम, नवम एवं दशम अधिकार हैं, भाग 13 में एकादशम, द्वादशम, त्रयोदशम एवं चतुर्दशम अधिकार हैं, भाग 14 में चतुर्दशम का शेष अंश एवं पंचदशम अधिकार का प्रारम्भ है, भाग 15 एवं 16 में शेष पंचदशम अधिकार है ।

9. उपसंहार-

‘जयधवला’ के धवल तेज की जय हो। हम सब ‘जयधवला’ का स्वाध्याय कर कषायों पर विजय प्राप्त करें -यही मंगल कामना है।