जानो-जानो-जानो, जाननहार को जानो ॥ टेक ॥
होवेगा तब ही कल्याण, यह ही जिन-उपदेश महान ।
शुद्धातम है ज्ञानमय, सहज सदा कल्याणमय ॥
अपना रूप पिछानो ॥ 1 ॥
रागादि निःशेष हुए हैं, वीतराग सर्वज्ञ हुए हैं।
अनन्त चतुष्टयवन्त, प्रगट सुगुण अनन्त हुए हैं ॥
देव उन्हीं को मानो ॥ 2 ॥
विषयाशा-आरम्भ नहीं, ज्ञान-ध्यान-तप लीन सही।
शुद्धातम को ध्याते, मुक्तिमार्ग दर्शाते ॥
गुरु निर्ग्रन्थ पिछानो ॥3॥
स्याद्वादमय हितकारी, तत्त्व बतावें अविकारी।
पाप क्रिया से शून्य शुद्ध है, समझे से हो प्रतिबुद्ध है ॥
जिनवाणी श्रद्धानो ॥ 4 ॥
इनको सदा हृदय में धरना, भक्ति और भावना करना।
तत्त्व प्रयोजनभूत पिछानो, स्वयं-स्वयं को स्वयं में जानो ॥
सुख अतीन्द्रिय मानो ॥ 5॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’