तर्ज : अशरण जग में चन्द्रनाथ …
जन्म जयंती महावीर की, मंगल जय जयकार करें।
वीर प्रभु के हम अनुयायी, घर-घर मंगलाचार करें ।। टेक ।।
वीतरागता धर्म हमारा, राग-द्वेष को हम छोड़ें।
तत्त्वों की सम्यक् श्रद्धा कर, ज्ञान-ज्ञान में ही जोड़ें।।
परम अहिंसा धर्म हमारा, धारें और प्रसार करें।। 1।।
अन्य न कोई दुःख का कारण, भूल स्वयं को है हैरान।
द्रव्यदृष्टि से निज में देखे, आप स्वयं ही है भगवान।।
स्वाश्रय से ही अब तो प्रभुवर, पापों का परिहार करें ।। 2 ।।
रत्नत्रयमय निश्चय भक्ति मुक्ति का कारण बनती।
गुण चिंतन और तत्त्व भावना, भाव विशुद्धि को करती ।।
हो निशंक निश्चिंत निराकुल, हम सब प्रभु की भक्ति करें ।। 3 ।।
प्रभु जैसी अन्तर्दृष्टि हो प्रभु जैसा पुरुषार्थ हो।
उदासीनता ज्ञानमयी हो, साध्य परम परमार्थ हो।।
रत्नत्रय की नौका बैठें, भवसागर को पार करें।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’