जल छानने की विधि
-प्रो. वीरसागर जैन
महाकवि पण्डित दौलतराम कासलीवाल के अनुसार
"दया दया सब कोउ कहै, मर्म न जानें मूर।
अणछाण्यूं पाणी पीवै, ते हि दया तें दूर।।
दया भली सबही रटै, भेद न पावै कोय।
बरतै अणगाल्यौ उदक, दया कहां तें होय।।
दया बिना करणी वृथा, यह भाषें सब लोक।
न्हावै अणगाले जलहिं, बाँधै अघ के थोक।।¹
ये प्रसिद्ध दोहे पण्डित दौलतराम कासलीवाल के ‘क्रियाकोष’ नामक ग्रन्थ से उद्धृत किये गये हैं। इनमें दया का सम्बन्ध छने पानी से जोड़ते हुए कहा गया है कि सब लोग दया की मीठी-मीठी बातें तो खूब करते हैं, किन्तु दया का मूल रहस्य नहीं जानते। जो लोग अनछना पानी पीते हैं या उसे अन्य किसी काम में लेते हैं अथवा उससे स्नान करते हैं, वे दया से बहुत दूर हैं। उन्हें अनछना पानी पीते हुए दया होगी कहाँ से, वे तो पाप के ढेर बाँधते रहते हैं।
पण्डित दौलतराम कासलीवाल कृत ‘क्रियाकोष’ में इसीप्रकार की अन्य भी बहुत उक्तियाँ आई हैं, साथ ही जल छानने की विधि भी विस्तारपूर्वक समझाई गई है। यहाँ हमें उसी पण्डित दौलतराम कासलीवाल कृत ‘क्रियाकोष’ के अनुसार जल छानने की विधि पर प्रकाश डालना अभीष्ट है।
पण्डित दौलतराम कासलीवाल के अनुसार जल को छानना श्रावक का प्रथम कर्तव्य है; अतः उसे सर्व प्रमाद और झुंझलाहट का त्यागकर प्रसन्न मन से विधिपूर्वक जल छानना चाहिए; बिना-छना जल न पीना चाहिए, न पिलाना चाहिए और न किसी काम में लेना चाहिए। बिना छना पानी पीनेवाले तो धीवर, बागुरों के समान हैं।²
कवि कहता है कि जितना पाप धीवर, बागुर, शिकारी, भील आदि हिंसक लोग पचासों वर्षों में करते हैं, उतना पाप बिनाछना जल काम में लेने वाले एक ही बार में कर लेते हैं, अतः महापाप से डरनवालों को बिनाछना जल कभी भी काम में नहीं लेना चाहिए :-
"बरतें मूरख लोग अगाल्यौ नीर जे। तिनकों केतो पाप सुनौ नर धीर जे।
असी बरस लौं पाप करै धीवर महा। अवर पारधी भील वागुरादिक लहा।।
तेतो पाप लहै जु एक ही बार जे। अणछाण्यूं बरतै हि वारि तनधार जे।
ऐसो जानि कदापि अगाल्यो तोय जी। बरतौ मति ता माहिं महा अघ होय जी।।"³
बिनाछने पानी की एक बूँद में इतने सूक्ष्मातिसूक्ष्म असंख्य जीव होते हैं कि यदि वे भ्रमर के आकार के बन जाएँ तो पूरे जम्बूद्वीप में भी न समा सकें :-
"तामै जीव असंखि उर्दै ह्वै भ्रमर ही। जम्बूद्वीप न मायँ जिनेश्वर यों कही।।"⁴ अतः पानी छानते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि एक बूँद भी बाहर जमीन पर न फैले, अन्यथा असंख्यात जीवों की हिंसा का पाप लगता है:-
"छाणत एक हु बूँद मही परि जो परै। भाषै श्री गुरुदेव जीव अगणित मरैं।।"⁵
करुणहृदय पवित्रात्मा जीव तो एक बूँद भी अनछना जल जमीन पर फैल जाने पर प्रायश्चित्त लेते हैं:-
"बूँद परै तो ले प्रायश्चित्ता। जाके घट मैं दया पवित्ता।।"⁶
इसीप्रकार अन्य भी अनेक सावधानियाँ जल छानते समय रखनी चाहिए।
जल छानने का छन्ना मांडी-रहित नया, स्वच्छ, पूरी साइज (नाप) का, और सफ़ेद ही होना चाहिए; पुराना, गन्दा, छोटा, पतला और रंगीन नहीं। यथा-
"नूतन गाढ़ौ वस्त्र गुड़ी बिनु जो भया। ताकौ गलानो करै चित्त धरिके दया।।
डेड हाथ लंबो जु हाथ चौरौ गहै। ताहि दूपड़तो करै छांणि जल सुख लहै।।
वस्त्र पुरानो अवर रंग कौ नांतिनां। राखै तिनतै ज्ञानवंत की पांति ना।।⁷
जो लोग ओछे छन्ने से पानी छानते हैं, वे अपना अगला जन्म ओछी योनि में ही प्राप्त करते हैं:-
"ओछे कपड़े नीर गालही जे नरा। पावैं ओछी योनि कहैं मुनि श्रुतधरा।।⁸
अतः छन्ना (पानी छानने का वस्त्र) पूरी साइज का ही होना चाहिए, ताकि उसे दूपड़ता करके अच्छी तरह पानी छाना जा सके। सामान्य छन्ना लगभग डेढ हाथ लम्बा और एक हाथ चौड़ा होना चाहिए:-
"डेड़ हाथ लंबो जु हाथ चौरौ गहै।"⁹
बहुत-से लोग धोती, कुर्ता, साड़ी आदि पहने हुए वस्त्रों से पानी छान लेते हैं। यह उचित नहीं है। पानी हमेशा उपर्युक्त प्रकार के छन्ने से ही छानना चाहिए।¹⁰
पानी छानने के बाद छन्ने को बड़ी सावधानीपूर्वक छने हुए पानी से ही साफ़ करना चाहिए, अनछने पानी से कभी नहीं:-
"छाण्यां जलथी धोय नातणो जो धरै।।¹¹
छने पानी से भी छन्ने को रगड़-रगड़ कर नहीं धोना चाहिए, बल्कि उस पर लगी ‘जीवाणी’ का ध्यान रखना चाहिए। जो व्यक्ति जल छानने के बाद ‘जीवाणी’ को पूरी सावधानी रखकर यथास्थान पहुंचाता है, वह धन्य हैः-
"जतन थकी मतिवंत जिवाण्यूं जलविषै। पहुँचावै सो धन्य श्रुतविर्षं यूं लिखें।।
जा निवाण कौ होय नीर ताही महै। पधरावै बुद्धिवान परम गुरु यों कहैं।।¹²
बहुत-से लोग पानी छानकर छन्ने को (चाय आदि की भाँति) चुटकी से दबाकर निचोड़ देते हैं, पर जीवदया के पालन करने वाले को यह भी उचित नहीं हैः-
"गलना चिहुंटी धरि मति दाबौ, जीवदया को जतन धरावौ।।"¹³ इसप्रकार जल को अत्यन्त सावधानीपूर्वक छानकर ही काम में लेना चाहिए । ध्यान रहे, इसप्रकार अच्छी तरह छना हुआ पानी भी दो घड़ी (48 मिनट) बाद अनछना हो जाता है, अतः या तो हमें उसे दो घड़ी पूर्व ही काम में ले लेना चाहिए, अन्यथा उपर्युक्त विधि से पुनः छानना चाहिए:-
"द्वै घटिका बीतै जो जाकों, अणछाण्यां को दोष जु ताकों।¹⁴
हाँ, यदि छने हुए पानी को लोंग आदि डालकर प्रासुक बना लिया जावे तो उसे दो पहर (6 घंटे) तक काम में लिया जा सकता है, उसके बाद उसमें भी त्रसजीवों की उत्पत्ति हो जाती है:-
"तिक्त कसाय भेलि किय फासू, ताहि अचित्त कहे श्रुतभासू।।
पहर दोय बीतै जो भाई, अगणित त्रस जीवा उपजाई।
ड्योढ़ तथा पौणा दो पहरा, आगें मति वरतो बुधि-गहरा।।¹⁵
अतः प्रासुक जल को भी साढ़े चार-पाँच घण्टे तक ही काम में लेना चाहिए | यदि यह छना पानी गर्म करके उकाल लिया जावे तो इसे आठ पहर (8 x 3 = 24 घण्टे) से पूर्व काम में लिया जा सकता है, किन्तु आठवें पहर में यह भी उपयोग के योग्य नहीं रहता, क्योंकि तबतक उसमें भी स्वयमेव त्रसजीवों की उत्पत्ति हो जाती है:-
"तातो भोत उकालि वारि वसु पहर ही। आगे जंगम जीव हु उपजैं सहज ही।।¹⁶
पानी गर्म करने में भी सावधानी रखना आवश्यक है; अन्यथा कुछ अनभिज्ञ लोग इतना सब सही करके भी यहाँ आकर फिर एक बड़ी भारी गलती कर बैठते हैं। वे थोड़े-से पानी को ही खूब गर्म कर लेते हैं, और फिर उसी में ठंडा पानी मिला देते हैं तथा उसे चौबीस घण्टे तक काम में लेकर जिनाज्ञा-पालन कर ली ऐसा समझते हैं। जब कि यह आगमसम्मत नहीं है, क्योंकि गर्म पानी में ठंडा पानी मिलाने से जीवहिंसा का महादोष लगता है:-
"जे नर जिन आज्ञा नहिं जानें, चित मैं आवै सोही ठानें।
भोत उकाल करैं नहिं पानी, कुछ इक उष्ण करैं मनमानी।।
ताहि जु बरतें अष्टहि पहरा, ते व्रत वर्जित अर श्रुतिबहरा।
मरजादा माफिक नहिं सोई, ऐसें बरतौ मति भवि कोई।।¹⁷
भव्य जीवों को चाहिए कि जल छानने की उपर्युक्त सभी क्रियाएँ दिन में ही करें, रात्रि में पानी का छानना और पीना त्याग दें:-
"या विधि पाणी दिवसें पीवौ, निसिकूं जल छांड़ौ भवि जीवौ।।¹⁸
पण्डित दौलतराम कासलीवाल के अनुसार पानी छानकर पीने वालों को पानी के बर्तनों का भी ध्यान रखना चाहिए। इनमें जो बर्तन धातु के हों उन्हें प्रतिदिन माँजना-पूँछना चाहिए और जो बर्तन मिट्टी के हों उन्हें प्रतिदिन सायंकाल खाली करके सुखा देना चाहिए एवं दूसरे दिन प्रातः उनमें विधिपूर्वक छानकर पानी भरना चाहिए। मिट्टी के बर्तनों को थोड़े दिन होते ही बदल देना चाहिए:-
"जल के भाजन धातु के, जो होवें घर मांहि।
पूंछ-मांजि नित धोयवा, यामें संसै नाहिं।।
अर जे बासण गार के, गागर घट मटकादि।
ते हि अल्पदिन राखिवौ, इह आज्ञा जु अनादि।।
राति सुकाया वा घरा, माटी बासण वीर।
तिनमें प्रात हि छाणिबौ, आछी विधि सौं नीर।।¹⁹
सन्दर्भ-
- क्रियाकोष, छन्दसंख्या, द्वितीय 22, 23, 24
- क्रियाकोष, छन्दसंख्या, 2008-2009
- क्रियाकोष, छन्दसंख्या, 1997-1998
- वही, 1999
- वही, 1996
- वही, 2011
- वही, 1995-1996
- वही, 2001
- वही,1995
- वही, 244
- वही, 2000
- वही, 2000-2001
- वही, 247
- वही, 253
- वही, 253-254
- वही, 2004
- वही, 2005-2006
- वही, 256
- वही, 240-241-242