जैनधर्म और इस्लाम | Jainadharm Aur Islam

जैनधर्म और इस्लाम

-डॉ. वीरसागर जैन

(आदिनाथ ऋषभदेव के विशेष संदर्भ में)

जैनधर्म के अनुसार प्रत्येक युग में 24 तीर्थकर होते हैं जो संसार के प्राणियों को संसार-सागर से पार उतरने का मार्ग दिखाते हैं। उन्हें तीर्थकर कहते ही इसलिए हैं कि वे तीर्थ (अर्थात् संसार-सागर से पार उतरने का मार्ग) के कर्ता होते हैं। इस युग के 24 तीर्थंकरों के नाम निम्नलिखित हैं-

  1. ऋषभदेव 9. पुष्पदन्त 17. कुन्थुनाथ
  2. अजितनाथ 10. शीतलनाथ 18. अरनाथ
  3. सम्भवनाथ 11. श्रेयांसनाथ 19. मल्लिनाथ
  4. अभिनन्दननाथ 12. वासुपूज्य 20. मुनिसुव्रतनाथ
  5. सुमतिनाथ 13. विमलनाथ 21. नमिनाथ
  6. पद्मप्रभ 14. अनन्तनाथ 22. नेमिनाथ
  7. सुपार्श्वनाथ 15. धर्मनाथ 23. पार्श्वनाथ
  8. चन्द्रप्रभ 16. शान्तिनाथ 24. महावीर

इनमें से प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को ही इस युग में जैन धर्म का प्रर्वतक माना जाता है । यद्यपि कुछ लोग अज्ञानवश भगवान् महावीर को जैनधर्म का प्रवर्तक कह देते हैं, किन्तु यह गलत है, क्योंकि वे तो 24 वें तीर्थंकर थे और उनसे पहले ऋषभादि 23 तीर्थकर जैनधर्म में हो चुके थे । जैनधर्म के अनुसार ये ऋषभदेव आज से असंख्य वर्ष पूर्व हुए थे और मानवीय सभ्यता-संस्कृति के विकास में इनका आरम्भिक योगदान रहा है, इसीलिए इनको आदिब्रह्मा, प्रजापति आदि नामों से भी जाना जाता है । ऋषभदेव को और भी अनेक नामों से जाना जाता है- वृषभदेव, पुरुदेव, महादेव, शिव, आदिनाथ आदिपुरुष, आदीश्वर, भूतनाथ, पशुपतिनाथ, पशुनाथ, कैलाशपति, विश्वकर्मा इत्यादि ।

धर्म, दर्शन, इतिहास, पुरातत्त्व आदि के प्रकाण्ड विद्वानों का अभिमत है कि इन आदि तीर्थंकर ऋषभ देव का समूची भारतीय संस्कृति में बड़ा ही बुनियादी महत्त्व है । भारतीय संस्कृति के हर विषय या विद्या का मूल उत्स ये आदिनाथ ऋषभदेव ही सिद्ध होते हैं। जैन पुराणों के अनुसार भी इन्हीं आदिनाथ ऋषभदेव ने प्रजा को असि, मसि आदि 6 कर्मों, 64 विद्याओं और 72 कलाओं की शिक्षा दी थी । ऋषभदेव के भरत-बाहुबली आदि 101 पुत्र थे जो सभी विविध विद्याओं में पारंगत थे । भरत तो षट्खण्ड वसुधा के विजेता चक्रवर्ती भी थे और उन्हीं के नाम पर आज तक हमारे देश का नाम ‘भारतवर्ष’ प्रचलित है और हम सभी ‘भारतीय’ कहलाते हैं । आदिनाथ ऋषभदेव के दो पुत्रियाँ भी थीं- ब्राह्मी और सुन्दरी, जो शब्द लिपिविद्या और अंक लिपिविद्या में अत्यन्त कुशल थीं । उनकी पुत्री ब्राह्मी के नाम पर ही संस्कृत-प्राकृत आदि भाषाओं की लिपि को ‘ब्राह्मी लिपि’ नाम से जाना जाता है। अनेक विद्वानों का मानना है कि संसार की अधिकांश लिपियों का उद्भव ‘ब्राह्मी लिपि’ से ही हुआ है।

जो भी हो, इन आदिनाथ ऋषभदेव का मुस्लिम धर्म से भी घनिष्ठ सम्बन्ध है । वहाँ इन आदिनाथ ऋषभदेव को ‘आदम’ या ‘बाबा आदम’ के नाम से जाना जाता है जिसने कि सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों को सन्मार्ग पर चलने का सर्वप्रथम उपदेश दिया था ।

‘आदिनाथ ऋषभदेव’ और ‘बाबा आदम’ की एकता पर प्रकाश डालते के प्रकाण्ड हुए इतिहास-पुरातत्त्व के प्रकांड विद्वान् आचार्य विद्यानन्द मुनि ने भी अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किये हैं-

“इस्लाम मतानुसार सृष्टि के आदि में एक ही मनुष्य जाति थी । मनुष्यों को सन्मार्ग पर चलाने के लिए बाबा आदम ने धर्म का उपदेश दिया । ‘आदम’ आदिनाथ का अपभ्रंश शब्द है। इस्लाम जिस आदिनाथ को ‘आदम’ शब्द से कहता है वह आदम बाबा भगवान् ऋषभनाथ ही हैं, क्योंकि उनका अपर नाम आदिनाथ है। इस्लामी ग्रन्थों में बतलाया गया है- नबी का बेटा रसूल था, जिसको खुदा (परमात्मा) ने ईश्वरीय उपदेश जनता तक पहुँचाने के लिए पैदा किया। इसका भी अभिप्राय यह है- नबी (नाभि) का पुत्र (बेटा) रसूल ऋषभ हुआ जो मनुष्यों में पहला धर्मोपदेशक हुआ । ‘नबी’ शब्द ‘नाभि’ का अपभ्रंश है और ‘रसूल’ शब्द ऋषभ का अपभ्रंश है । ‘आदम’ आदिनाथ का अपभ्रंश है । ‘मैराजुलनबूत’ नामक मुसलमानी पुस्तक में लिखा है कि- बाबा आदम हिन्दुस्तान में पैदा हुए । इसके अनुसार भी बाबा आदम का अभिप्राय भगवान् आदिनाथ ऋषभदेव से सिद्ध होता है ।”
-विश्वधर्म की रूपरेखा, पृष्ठ 19

जैनधर्म के अनुसार ये ऋषभदेव आदिनाथ बाद में नग्न दिगम्बर मुनि दीक्षा धारण कर कठोर तपश्चरण द्वारा वीतराग-सर्वज्ञ ‘जिन’ या ‘जिनेन्द्र’ बन गए थे । मुस्लिम धर्म में इन ‘जिन’ की भी बहुत अधिक स्तुति-प्रशंसा की गई है, जैसा कि रामधारीसिंह ‘दिनकर’ ने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में लिखा है-

“कुरान की कल्पना है कि नीच वासनाओं से उभारने का काम जिन ही कर सकते हैं।”

जैनधर्म में साधुओं को सर्वथा नग्न दिगम्बर होने का विधान है, क्योंकि वहाँ अपरिग्रहवाद पर अत्यधिक बल दिया गया है। स्वयं ऋषभदेव भी मुनिदीक्षा लेकर सर्वथा नग्न दिगम्बर हो गये । उन्होंने न केवल राजसम्पदा का त्याग किया अपितु अपने शरीर के भी समस्त वस्त्राभूषण त्याग दिए थे, एक तन्तुमात्र भी अपने शरीर पर नहीं रखा था। जैनधर्म के साधु आज भी पूर्ण नग्न दिगम्बर अवस्था में ही अपनी सम्पूर्ण धर्म-साधना करते हैं, चाहे शीत-ग्रीष्म-वर्षा आदि की कैसी भी विषम परिस्थिति हो ।

दिगम्बरत्व की यह अवस्था साधना की चरम अवस्था है। इसकी सार्थकता धार्मिक रूप से तो सिद्ध होती ही है, प्राकृतिक और वैज्ञानिक रूप से भी हो जाती है, जैसा कि बाबू कामताप्रसाद ने अपनी पुस्तक ‘दिगम्बरत्व और दिगम्बर मुनि’ में विस्तार से सिद्ध किया है।

प्रतीत होता है कि मुस्लिम धर्म में भी दिगम्बरत्व की इस अवस्था को साधना की सर्वोच्च अवस्था माना गया है तभी तो मुस्लिम धर्म के उच्च कोटि के साधु नग्न रहते थे । यथा-

“काबाच्या मंदिरामुले मक्कान नव्हे तर तो सारा जिल्हाच पवित्र मानला जाई । त्या कालया पाषाणांचे चुंबन घेण्यासाठी प्रतिवर्षी हजारों अरब येत । दिगम्बर होऊन सात प्रदक्षिणा घालीत । दिगम्बर का व्हायचे? जे कपडे अंगावर घालून पापे केली ते कपडे प्रदक्षिणेच्या वेलेस नकोत, हा दिगम्बर जैन धर्माचा परिणाम असावा ।“ -इस्लामी संस्कृति ( साने गुरुजी), पहिला खंड, पृष्ठ 34-35

इसका अभिप्राय है कि प्राचीन काल में मुसलमानों के प्रसिद्ध एवं पवित्र तीर्थ मक्का में अन्दर ही अन्दर के स्थान पर दिगम्बर होकर ही सात प्रदक्षिणा का रिवाज था, क्योंकि वस्त्र पहनकर पाप कर्म किए जाते थे, अतः वे वस्त्र उस पवित्र भूमि की प्रदक्षिणा के योग्य नहीं हैं ।

जिस प्रकार जैनों के साधु ‘दिगम्बर’ कहलाते हैं, उसी प्रकार मुसलमानों के साधु ‘पैगम्बर’ कहलाते हैं । ‘दिगम्बर’ और ‘पैगम्बर’ ये दोनों शब्द समानार्थक प्रतीत होते हैं। ‘दिगम्बर’ का अर्थ होता है- दिशाएँ ही जिसका वस्त्र है अर्थात् पूर्णतः निर्वस्त्र, सर्वथा नग्न । ‘पैगम्बर’ का भी अर्थ होना चाहिए- जिसके पास ‘प’ जितना भी वस्त्र नहीं है अर्थात् पूर्णतः निर्वस्त्र, सर्वथा नग्न ।

जैनदर्शन में इस अपरिग्रहवाद की साधना का प्रारंभ दान से बताया गया है और इसीलिए उसके उपासकों को प्रतिदिन अनिवार्य रूप से हर्षपूर्वक औषध, शास्त्र, अभय, आहार -इन चार प्रकार के दान देने का विधान समझाया गया है। दान न देने वाले श्रावक की तरह-तरह से कठोर शब्दों में निन्दा की गई है। उसके घर को घर नहीं श्मशान बतलाया गया है और उसके जीवन को कौए से भी गया-बीता बताया गया है । (देखो ‘पद्मनन्दी-पंचविंशति’ का दानोपदेशन अधिकार)

जैन धर्म में दान श्रावक का दैनिक आवश्यक कर्म बतलाया गया है। जैनधर्म के अनुसार प्रत्येक श्रावक के दैनिक आवश्यक कर्म निम्नलिखित 6 हैं, जिन्हें ‘षडावश्यक’ कहते हैं- देवपूजा, गुरूपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान । यथा-

“देवपूजा गुरूपास्ति स्वाध्यायः संयमस्तपः ।
दानञ्चेति गृहस्थानां षट्कर्माणि दिने दिने ।।”

कुरान मजीद के अध्ययन से ज्ञात होता है कि जैनधर्म की तरह इस्लाम में भी हर मुसलमान के 5 आवश्यक फर्ज बताए गए हैं- कलमा, नमाज, रोजा, जकात और हज । इनमें से जकात दान का ही एक रूप है । कुरान मजीद में जकात (दान) के सबंध में कुछ आयतें इस प्रकार उपलब्ध होती हैं-

  1. तुमसे पूछते हैं कि क्या खर्च करें? कह दोः जो तुम्हारी जरूरत से अधिक हो । (2/219)
  2. जकात मन के शुद्धीकरण का एक साधन है । (9/103)
  3. जो जकात तुम अल्लाह की खुशी चाहने के लिए देते हो तो ऐसे ही लोग कई गुना पाने वाले हैं। (30/39)
  4. हम तो बस अल्लाह की रजामन्दी के लिए तुम्हें खिलाते हैं । न हम तुमसे कोई बदला चाहते हैं और न धन्यवाद । (76/9)
  5. अल्लाह की राह में खर्च करो और अपने आप को तबाही में न डालो, सत्कर्मी बनो । निःसन्देह अल्लाह ऐसे सत्कर्मी लोगों से प्रेम रखता है। (2/195)
  6. कुरान में रहनुमाई पाने के लिए अल्लाह की राह में माल खर्च करना जरूरी है। (2/4)

इसी प्रकार का अभिप्राय अन्यत्र भी अनेक आयतों में प्रकट किया गया है। कहा गया है कि तुमने यदि प्रसन्नतापूर्वक अपने किसी गरीब भाई कुछ दिया तो मानो मुझको दिया । उसकी ओर से मैं तुम्हें कई गुना अधिक बदला दूंगा । हाँ, शर्त यह है कि उसको देकर तुम कोई एहसान न जताओ, उसका अपमान न करो, उससे धन्यवाद की आशा न रखो, यह भी कोशिश न करो कि तुम्हारे इस दान की लोगों में चर्चा हो और लोग तुम्हारी प्रशंसा करें कि अमुख सज्जन बड़े दानी हैं । जकात मुसलमानों में बलिदान और तयाग का गुण पैदा करता है। स्वार्थ, तंगदिली और धन-लोलुपता के बुरे गुण को दूर करता है। धन की पूजा करने वाला और रुपये पर जान देने वाला लोभी और कंजूस व्यक्ति इस्लाम के किसी काम नहीं । जो व्यक्ति ईश्वर की आज्ञा से अपने गाढ़े पसीने की कमाई बिना किसी निजी स्वार्थ के निछावर कर सकता हो वही इस्लाम के सीधे मार्ग पर चल सकता है।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि इस्लाम में भी दान या अपरिग्रह की भावना का रूप उपलब्ध होता ही है।

इस प्रकार जैन और मुस्लिम -इन दोनों धर्मों का सूक्ष्म अध्ययन करने से प्रतीत होता है कि उनमें काफी समानता भी पाई जाती है जिसका शोधपूर्ण प्रामाणिक अध्ययन होना चाहिए ।

सन्दर्भ-ग्रंथ -

  1. कुरान मजीद, हिन्दी अनुवाद, मक्तबा अल-हसनात, रामपुर, उ.प्र.1968
  2. इस्लाम धर्म, मौलाना सयैद अबुल आला मौदूदी, मर्कजी मक्तबा, इस्लामी पब्लिशर्स, दावत नगर, जामिया नगर, नई दिल्ली-25, 2009
  3. विश्वधर्म की रूपरेखा, आचार्य विद्यानन्द मुनि, युनिक स्टेशनरी डिपो, दरियागंज, दिल्ली, 1966
  4. पद्मनन्दी पंचविंशति, आचार्य पद्मनन्दि, दिगम्बर जैन मुमुक्षु मण्डल, इतवारी, नागपुर
  5. महापुराण, आचार्य जिनसेन, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
  6. दिगम्बरत्व और दिगम्बर मुनि, बाबू कामताप्रसाद जैन, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
  7. इस्लामी संस्कृति, खंड पहला, साने गुरुजी, साधना प्रकाशन, पुणे, महाराष्ट्र 1975.
  8. संस्कृति के चार अध्याय, रामधारीसिंह दिनकर

इस्लाम का सन्देश

ऐन खुदा से मिलने का यही रस्ता है नर ।
दिल किसी का ना दुखा और जी चाहे सो कर ॥

इस्लाम और जैन की तुलना

आदम = आदिनाथ,
नबी = नाभि,
रसूल = ऋषभ,
पैगम्बर = दिगम्बर,
अल्लहा = अर्ह,
शरीअत = शास्त्र,
नमाज़ = नमः,
मस्जिद = मंदिर,
अब्राहिम = अब्राह्मण(श्रमण),
रहीम-करीम = ह्रीं-क्लीं

नबी के बेटा रसूल ने कहा, सभी धर्मों का निहात उन्हीं ने कहा ।