जैनदर्शन में 'संशय' का स्वरूप | Jainadarshan Men Sanshay Ka Svarup

जैनदर्शन में ‘संशय’ का स्वरूप

-प्रो० (डॉ०) वीरसागर जैन

संशय दर्शनशास्त्र का एक प्रमुख विषय है। भारतीय एवं पाश्चात्य- सभी दर्शनों में ‘संशय’ के सम्बन्ध में सूक्ष्म चिन्तन हुआ है। यहाँ ‘संशय’ के सम्बन्ध में जैनदर्शन की अवधारणा को प्रस्तुत करने का संक्षिप्त प्रयास किया जाता है।

संशय के सम्बन्ध में जैनाचार्यों ने सर्वप्रथम तो उन तत्त्वोपप्लववादियों का निराकरण किया है जो संशय की सत्ता ही नहीं मानते, उसका सर्वथा उच्छेद करते हैं। इस प्रकरण का सुन्दर एवं विस्तृत विवेचन आचार्य प्रभाचन्द्र के ‘प्रमेयकमलमार्तण्ड’ नामक सुप्रसिद्ध न्याय-ग्रन्थ में उपलब्ध होता है जिसका सारांश संक्षेप में इसप्रकार है-

"पूर्वपक्ष- संशयादिज्ञान कोई है ही नहीं, फिर आप जैन ‘व्यवसायात्मक’ विशेषण द्वारा किसका खण्डन करेंगे ? आप यह बताइये कि संशय ज्ञान में क्या झलकता है- धर्म या धर्मी ? यदि धर्मी झलकता है तो वह सत्य है या असत्य ? यदि सत्य है तो उस सत्य धर्मी को ग्रहण करने वाले ज्ञान में संशयपना कैसे हुआ ? उसने तो सत्य वस्तु को जाना है, जैसे कि हाथ में रखी हुई वस्तु का ज्ञान सत्य होता है।

यदि उस धर्मी को असत्य मानो तो असत् जानने वाले केशोण्डुक ज्ञान की तरह संशय तो भ्रांतिरूप हुआ ?

यदि दूसरा पक्ष माना जाय कि संशयज्ञान में धर्म झलकता है, तब प्रश्न होता है कि वह धर्म क्या पुरुषत्वरूप है अथवा स्थाणुत्वरूप है अथवा उभयरूप है ? यदि स्थाणुत्वरूप है तो पुनः प्रश्न उठेगा कि सत् है या असत् ? दोनों में पूर्वोक्त दोष आवेंगे। पुरुषत्व धर्म में तथा उभयरूप धर्म में भी वही दोष आते हैं, अर्थात् संशयज्ञान में स्थाणुत्व, पुरुषत्व अथवा उभयरूपत्व झलके, उनमें हम वही बात पूछेंगे कि वह स्थाणुत्वादि सत् है या असत् ? यदि सत् है तो सत् वस्तु बतलाने वाला ज्ञान झूठ कैसे ? और यदि वह स्थाणुत्व धर्म असत् है तो वह ज्ञान भ्रांतिरूप ही रहा ? यदि कहा जाय कि एक धर्म (स्थाणुत्व) सत् है और एक (पुरुषत्व) असत् है, तब वह एक ही ज्ञान भ्रांत तथा अभ्रांत दो रूप हुआ ? यदि कहा जाय कि संशय में संदिग्ध पदार्थ ही झलकता है तो उस पक्ष में भी वह है या नहीं इत्यादि प्रश्न और वही दोष आते हैं इसलिए संशय नाम का कोई ज्ञान नहीं है।

उत्तरपक्ष (जैन)- तत्त्वोपप्लववादी का यह कथन समीचीन नहीं है, क्योंकि संशय तो प्रत्येक प्राणी को चलित प्रतिभास रूप से अपने आप में ही स्पष्ट समझ में आता है। संशय का विषय चाहे धर्म हो चाहे धर्मी, सत् हो चाहे असत्, इतने विकल्पों से संषय का बालाग्र भी खण्डित नहीं कर सकते, क्योंकि इस प्रकार आप प्रत्यक्षसिद्ध वस्तु का भी अभाव करने लगोगे तो सुख-दुःखादि का भी अभाव करना चाहिए ? आश्चर्य की बात है कि आप स्वयं ही इस संशय का विषय धर्म है या धर्मी, सत् है या असत् इसप्रकार के संषयरूपी झूले में झूल रहे हो और फिर भी उसी का निराकरण करते हो, सो अस्वस्थ हो क्या ?

किञ्च- आप उत्पादक कारण का अभाव होने से, संशय को नहीं मानते हो या उसमें असाधारण रूप का अभाव होने से अथवा विषय का अभाव होने से संशय को नहीं मानते हो ? प्रथम पक्ष अयुक्त है, देखो ! संशय का उत्पादक कारण मौजूद है। किस कारण से संशय पैदा होता है सो बताते हैं- प्राप्त किया है स्थाणुत्व और पुरुषत्व के संस्कार को जिसने ऐसा व्यक्ति जब असमान विशेष धर्म जो मस्तक, हस्तादिक हैं तथा वक्र-कोटरत्वादि हैं उनका प्रत्यक्ष तो नहीं कर रहा और समान धर्म जो ऊर्ध्वता आदि हैं उनको देख रहा है तब उस व्यक्ति को अंतरंग में मिथ्यात्व के उदय होने पर संशय ज्ञान पैदा होती है। संशय का असाधारण स्वरूप का अभाव भी नहीं है, देखो ! चलित प्रतिभास होना यही संशय का असाधारण स्वरूप है। विषय का अभाव भी दूर से ही समाप्त होता है स्थाणुत्व-विशिष्ट से अथवा पुरुष-विशिष्ट से जिसका अवधारण नहीं हुआ है ऐसा ऊर्ध्वता-सामान्य ही संशय का विषय माना गया है, और वह मौजूद ही है।"

इस सम्बन्ध में आचार्य प्रभाचन्द्र के अपने मूल शब्द भी द्रष्टव्य हैं जहाँ उन्होंने अत्यन्त दृढ़तापूर्वक कहा है कि संशय सर्वजनसुलभ एवं स्वात्मसंवेद्य है, उसका बाल की नोक बराबर भी खण्डन किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता-

“संशयः सर्वप्राणिनां चलितप्रतिपत्त्यात्मकत्वेन स्वात्मसंवेद्यः । सः धर्मिविषयो वस्तु धर्मविषयो वा तात्त्विकातात्त्विककार्यविषयो वा किमेभिर्विकल्पैरस्य बालाग्रमपि खण्डयितुं शक्यते ? प्रत्यक्षसिद्धस्याप्यर्थस्वरूपस्यापह्नवे सुखदुःखादेरप्यपह्नवः स्यात् ।।''¹

इस प्रकार संशय की सत्ता सिद्ध करने के बाद संशय के स्वरूप का विचार किया गया है।

जैनाचार्यों के अनुसार संशय दो प्रकार का होता है- 1. ज्ञानात्मक, और 2. श्रद्धानात्मक। ज्ञानात्मक संशय को ज्ञान का दोष या मिथ्याज्ञान भी कहते हैं और श्रद्धानात्मक संशय को श्रद्धा का दोष या मिथ्यादर्शन भी कहते हैं।

दर्शन जगत् में मुख्यतया ज्ञानात्मक संशय की ही चर्चा होती है। ऊपर कही गई ‘प्रमेयकमलमार्तण्ड’ की चर्चा भी मुख्यतः ज्ञानात्मक संशय की ही चर्चा है। जैन-न्याय-ग्रन्थों में सर्वप्रथम प्रमाण-विचार करते हुए ‘सम्यग्ज्ञान’ को ही प्रमाण का समीचीन लक्षण माना गया है और कहा गया है कि ‘सम्यग्ज्ञान’ में ‘सम्यक्’ पद का प्रयोग संशय-विपर्यय-अनध्यवसाय रूप मिथ्याज्ञानों की निवृत्ति के लिए किया गया है। यथा- "अत्र सम्यक्पदं संशयविपर्ययानध्यवसायनिरासाय क्रियते अप्रमाणत्वादेतेषां ज्ञानानामिति।''²

इसके बाद वहाँ संशय, विपर्यय एवं अनध्यवसाय- इन तीनों मिथ्याज्ञानों का स्वरूप इस प्रकार स्पष्ट किया गया है- "विरुद्धानेककोटिस्पर्शिज्ञानं संशयः, यथा स्थाणुर्वा पुरुषो वेति। स्थाणुपुरुषसाधारणोर्ध्वतादिधर्मदर्शनात्तद्विशेषस्य वककोटरशिरःपाण्यादेः साधकप्रमाणभावादनेककोट्यवलम्बित्वं ज्ञानस्य। विपरीतैककोटिनिश्चयो विपर्ययः, यथा शुक्तिकायामिदं रजतमिति ज्ञानम्। अत्रापि सादृश्यादि निमित्तवशाच्छुक्तिविपरीते रजते निश्चयः। किमित्यालोचनमात्रमनध्यवसायः, यथा पथि गच्छतस्तृणस्पर्शादिज्ञानम्। इदं हि नानाकोट्यवलम्बनाभावान्न संशयः। विपरीतैककोटिनिश्चयाभावान्न विपर्यय इति पृथगेव। एतानि च स्वविषयप्रमितिजनकत्वाभावादप्रमाणानि ज्ञानानि भवन्ति, सम्यग्ज्ञानानि तु न भवन्तीति सम्यक्पदेन व्युदस्यन्ते।''³

संशय, विपर्यय, अनध्यवसाय को कहीं-कहीं संशय, विभ्रम, मोह शब्दों से भी कहा है। यथा-

"संशय विभ्रम मोह त्याग आपौ लखि लीजै।"⁴

‘मोह’ को भी कहीं-कहीं ‘विमोह’ शब्द से भी कहा गया है। आचार्य विद्यानन्द स्वामी ने विमोह या अनध्यवसाय को ‘अव्युत्पत्ति’ शब्द से भी कहा है।⁵ आचार्य माणिक्यनन्दी को भी ‘अनध्यवसाय’ के लिए अव्युत्पत्ति शब्द इष्ट रहा है। यथा- "संदिग्धविपर्यस्ताव्युत्पन्नानां…"⁶

कहने का तात्पर्य है कि मोह, विमोह, अव्युत्पत्ति और अनध्यवसाय- ये सभी पर्यायवाची हैं।

संशय, विपर्यय, अनध्यवसाय- इन तीनों को जैन ग्रन्थों में ‘समारोप’- शब्द से भी जाना जाता है। जैसाकि ‘परीक्षामुखसूत्र’ के निम्नलिखित सूत्र में कहा गया है- "दृष्टोऽपि समारोपात्तादृक्।"⁷

अर्थात् देखा-जाना हुआ अर्थ भी यदि ‘समारोप’ लग जाए तो पुनः अपूर्वार्थ हो जाता है।

यहाँ ‘समारोप’ शब्द का अर्थ संषय-विपर्यय-अनध्यवसाय है। इसप्रकार संशय, विपर्यय, अनध्यवसाय की चर्चा प्रायः सर्वत्र एक साथ ही उपलब्ध होती है, परन्तु यहाँ हमारा प्रयोजन मात्र ‘संशय’ का ही स्वरूप स्पष्ट करना है, विपर्यय और अनध्यवसाय की चर्चा पृथक् रूप से फिर कभी करेंगे। अथवा उसे प्रमेयकमलमार्तण्ड, प्रमेयरत्नमाला आदि ग्रन्थों से देखना चाहिए।

संशय का एक लक्षण ‘न्यायदीपिका’ ग्रन्थ से ऊपर उद्धृत किया जा चुका है। इसी प्रकार के लक्षण अन्य भी अनेक जैन ग्रन्थों में उपलब्ध होते हैं। जिनमें से कतिपय प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं-

  1. “अनेकार्थानिश्चितापर्युदासात्मकः संशयः।''⁸
  2. "अनवस्थितकोटीनामेकत्र परिकल्पनाम्। शुक्ति वा रजतं किं वेत्येव संशीतिलक्षणम्।'‘⁹
    3."संशयो नामानवधारितार्थज्ञानम्।’‘¹⁰
    4."एकधर्मिकविरुद्धनानाधर्मप्रकारकं ज्ञानं हि संशयः।’'¹¹

ध्यातव्य है कि प्रायः लोग ऐसा कहते हैं कि संशय दो कोटियों को स्पर्श करने वाला होता है, परन्तु यहाँ ‘दो’ या ‘उभय’ पद का प्रयोग नहीं किया गया है, बल्कि ‘अनेक’ पद का प्रयोग किया है। इससे सिद्ध होता है कि संशय में दो ही कोटियों का स्पर्श होना आवष्यक नहीं है, दो का भी हो सकता है और दो से अधिक का भी हो सकता है।

इसी प्रकार कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं कि इन कोटियों में से एक सत्य होती है और एक असत्य। परन्तु यहाँ ऐसा भी कुछ नहीं कहा गया है। इससे ज्ञात होता है कि संशयज्ञान की ये कोटियाँ सब की सब असत्य भी हो सकती हैं। यह आवश्यक नहीं है कि उनमें एक सत्य ही हो। यह बात उदाहरण से भी सहज समझ में आती है। यथा- किसी को संशय होता है कि यह सीप है या चाँदी। यहाँ यह हो सकता है कि वह वस्तु दोनों ही न हो, एल्युमिनियम, पन्नी आदि कुछ और ही चमकीली वस्तु हो। किन्तु यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि संशयज्ञान की सभी कोटियाँ असत्य होते हुए भी सर्वथा असत्य (असत्) नहीं होती, उन-उन अर्थों की लोक में सत्ता अवश्य होती है, सर्वथा असत् वस्तु का संशय नहीं होता। यही कारण है कि जैनाचार्यों ने संशय के द्वारा भी आत्मा के अस्तित्व की सिद्धि की है। यथा-

"सत्यपि संशये तदालम्बनादात्मसिद्धिः। न हि अवस्तुविषयः संषयो भवति।''¹²

इसप्रकार संशयज्ञान मिथ्या होते हुए भी वस्तु की सत्ता को सिद्ध करता है- यह बड़ी अद्भुत बात है।

संशय के सम्बन्ध में एक अन्य भ्रान्ति यह है कि कुछ लोग जिज्ञासा या प्रष्न को भी संशय समझ लेते हैं, परन्तु वास्तव में देखा जाए तो जिज्ञासा संशय नहीं है, जिज्ञासा और संशय में बहुत अन्तर है। जिज्ञासा में जानने की इच्छा है, प्रष्न का उत्तर बताने का निवेदन है, परन्तु संषय में ऐसी कोई बात नहीं है।

दरअसल ज्ञान के अनेक रूप होते हैं- जिज्ञासा, प्रश्न, संशय आदि। हमें इन सब में विद्यमान सूक्ष्म अन्तर को समझना चाहिए।

इसी प्रकार कुछ लोग अवग्रह ज्ञान को भी जो कि मतिज्ञान का एक (प्रथम) भेद है, संशय समझ लेते हैं, परन्तु संशय और अवग्रह ज्ञान में भी बड़ा अन्तर है, अवग्रह ज्ञान संशय ज्ञान नहीं है। जैसा कि आचार्य अभिनव धर्मभूषण यति ने भी स्पष्ट कहा है-

"तत्रेन्द्रियार्थसमवधानसमनन्तरसमुत्थसत्तालोचनान्तरभावी सत्ताऽवान्तरजातिविशिष्टवस्तुग्राहीज्ञानविशेषोऽवग्रहः- यथाऽयं पुरुष इति। नाऽयं संशयः, विषयान्तरव्युदासेन स्वविषयनिश्चयात्मकत्वात् । तद्विपरीतलक्षणो हि संशयः।''¹³

अर्थात् इन्द्रिय और अर्थ के मिलन के तुरन्त बाद होने वाला और सत्तावलोकन के बाद अवान्तर सत्ता को विषय करने वाले ज्ञानविशेष को अवग्रह कहते हैं। जैसे- यह पुरुष है। यह अवग्रह संशय नहीं है, क्योंकि इसमें अन्य विषय नहीं है और अपने विषय का निश्चय है। संशय इससे विपरीत होता है।

  1. "अनेकार्थानिश्चिताऽपर्युदासात्मकः संशयस्तद्विपरीतोऽवग्रहः ।’'¹⁴
  2. "संशयो हि निर्णयविरोधी नत्ववग्रहः ।''¹⁵

अर्थात् अनेक अर्थों में अनिश्चयरूप संशय होता है, जबकि अवग्रह इससे विपरीत होता है। संशय ही निर्णय-विरोधी होता है, न कि अवग्रह।

इसप्रकार संशय के प्रधान भेद ज्ञानात्मक संशय का स्वरूप हुआ। अब संशय के द्वितीय भेद श्रद्धानात्मक संशय का स्वरूप समझने का प्रयत्न किया जाता है।

कहा जा चुका है कि श्रद्धानात्मक संशय श्रद्धा का दोष है जिसे जैन-ग्रन्थों में मिथ्यात्व या मिथ्यादर्शन भी कहा सकता है। जैनदर्शन के अनुसार मिथ्यात्व 5 प्रकार का होता है-

  1. एकान्तमिथ्यादर्शन ।
  2. विपरीतमिथ्यादर्शन ।
  3. संशयमिथ्यादर्शन ।
  4. वैनयिकमिथ्यादर्शन ।
  5. अज्ञानिकमिथ्यादर्शन ।

इन पाँचों का स्वरूप इसप्रकार बताया गया है- "तत्र इदमेव इत्थमेवेति धर्मिधर्मयोरभिनिवेश एकान्तः । पुरुष एवेदं सर्वं इति वा नित्य एव वा अनित्य एवेति। सग्रन्थो निर्ग्रन्थः, केवली कवलाहारी, स्त्री सिद्ध्यतीत्येवमादिः विपर्ययः । सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि किं मोक्षमार्गः स्याद्वा न वेत्यन्तरपक्षापरिग्रहः संशयः । सर्वदेवतानां सर्वसमयानां च समदर्शनं वैनयिकम्। हिताहितपरीक्षाविरहोऽज्ञानिकत्वम् ।''¹⁶

अर्थात् यही है या ऐसा ही है- ऐसा धर्म-धर्मी का ऐकान्तिक श्रद्धान एकान्त मिथ्यादर्शन है। जैसे- यह सब पुरुष ही है अथवा वस्तु नित्य अनित्य ही है। साधु परिग्रही होते हैं, केवली कवलाहारी होते हैं, स्त्री को तद्भव-मुक्ति प्राप्त होती है- यह विपरीत मिथ्यादर्शन है। सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्र की एकता मोक्षमार्ग है या नहीं- ऐसा मानना संशय मिथ्यात्व है। सभी देवों को और सभी धर्मों को समान मानना वैनयिक मिथ्यात्व है। हिताहित का परीक्षण न करना अज्ञान मिथ्यात्व है।

इन पाँच प्रकार के मिथ्यादर्शनों में से संशय नामक मिथ्यादर्शन को ही श्रद्धानात्मक संशय कहते हैं। ज्ञानात्मक संशय को मिथ्याज्ञान कहते हैं और श्रद्धानात्मक संशय को मिथ्यादर्शन कहते हैं।

विचारणीय है कि ज्ञानात्मक संशय (मिथ्याज्ञान) और श्रद्धानात्मक संशय में मूलभूत अन्तर क्या है ?

दरअसल बात यह है कि सामान्यतः किसी भी विषय को जानने में जो संशय होता है उसे ज्ञानात्मक संशय कहते हैं किन्तु जब वही संशय किसी मोक्षमार्ग के प्रयोजनभूत विषय के सम्बन्ध में होता है तो उसे श्रद्धानात्मक संशय कहते हैं, क्योंकि उसमें मात्र ज्ञानावरण कर्म का उदय निमित्त नहीं होता, मोहनीय कर्म का उदय भी निमित्त होता है।

श्रद्धानात्मक संशय की अवधारणा तो जैनाचार्यों की ही विशिष्ट देन है।

पाद-टिप्पणी

  1. प्रमेयकमलमार्तण्ड, सूत्र 1/3
  2. न्यायदीपिका,1/8
  3. न्यायदीपिका,1/9
  4. कविवर दौलतराम, छहढाला 4/6
  5. तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक, अध्याय 1, सूत्र 11, श्लोक 353, 355
  6. आचार्य माणिक्यनन्दि, परीक्षामुखसूत्रम् 1/4
  7. वही
  8. आचार्य अकलंक, तत्त्वार्थवार्तिकम् 1/15/9
  9. मोक्षपंजिका 5
  10. सूर्यप्रज्ञप्ति, मलयगिरिवृत्ति, 2, पृष्ठ 5
  11. सप्तभंगीतरंगिणी, पृष्ठ 6
  12. मल्लिषेणसूरि, स्याद्वादमंजरी,17
  13. न्यायदीपिका 2/11
  14. तत्त्वार्थवार्तिकम् 1/15/9
  15. वही, 1/15/10
  16. आचार्य पूज्यपाद, सर्वार्थसिद्धि 8/1