जैनदर्शन में द्रव्य की अवधारणा | Jainadarshan Men Dravy Ki Avadharana

जैनदर्शन में द्रव्य की अवधारणा

-प्रो. वीरसागर जैन

1. द्रव्य का स्वरूप जानने की आवश्यकता-

जैनदर्शन के अनुसार यह विश्व अनन्तानन्त द्रव्यों का समूह है, अतः इस विश्व को भलीभाँति जानने के लिए द्रव्य का स्वरूप जानना आवश्यक है। द्रव्य-स्वरूप को जाने बिना विश्व/लोक के स्वरूप को समीचीनता नहीं समझा जा सकता, विश्व की उत्पत्ति-विनाशरूप समस्त परिवर्तन-प्रक्रिया एवं कारण-कार्य-व्यवस्था आदि को भी कथमपि नहीं समझा जा सकता। इतना ही नहीं, एक जैनाचार्य ने तो समस्त लौकिक-पारलौकिक विद्याओं का मूलाधार द्रव्य-परिज्ञान को बताया है।¹

आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तिदेव के अनुसार जिनेन्द्रदेव की स्तुति-पूजा का भी मूल कारण एक मात्र यही है कि उन्होंने हमें जीवादि द्रव्यों का समीचीन उपदेश प्रदान किया है, जैसा कि उन्होंने द्रव्यसंग्रह की प्रथम गाथा में स्पष्ट कहा है-

"जीवमजीवं दव्वं जिणवरवसहेण जेण णिद्दिट्ठं।
देविंदविंदवंदं वंदे तं सव्वदा सिरसा।।"²

अर्थ:- जिन्होंने हमको जीव-अजीव द्रव्यों का उपदेश प्रदान किया है, उन देवेन्द्रसमूह द्वारा वंदित जिनेन्द्रदेव को मैं सदा सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ।

सच है, जबतक द्रव्यों का ज्ञान नहीं होगा तबतक जिनेन्द्र को सही रूप में जाना ही नहीं सकता और जब जाना ही नहीं सकता तो उनकी स्तुति-पूजा भी सही रूप में कैसे की जा सकती है ?

आचार्य कुन्दकुन्द ने मोहक्षय का मूल कारण द्रव्य-गुण-पर्याय को जानना बताया है। यथा-

"जो जाणदि अरिहंतं दव्वत्तगुणत्तपज्जयत्तेहिं।
सो जाणदि अप्पाणं मोहो खलु जादि तस्य लयं।।"³

अर्थ:- जो जीव अरिहंत को द्रव्य-गुण-पर्याय से जानता है वह अपनी आत्मा को जान लेता है और उसका मोह क्षय हो जाता है।

तात्पर्य यही है कि द्रव्य-गुण-पर्याय को जानने से आत्मा-परमात्मा का समीचीन ज्ञान हो जाता है और फिर मोह शेष नहीं रहता। अतः द्रव्य-व्यवस्था का समीचीन ज्ञान होना अत्यन्त आवश्यक है। आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है।

2. द्रव्य का लक्षण-

‘द्रव्य’ जैनदर्शन का एक विशेष पारिभाषिक शब्द है जो सामान्य दृष्टि से देखा जाए तो वस्तु या पदार्थ के अर्थ में प्रयुक्त होता है। यही कारण है कि द्रव्य का लक्षण बताते हुए आचार्य उमास्वामी (विक्रम की प्रथम शती) लिखते हैं कि -

"सत् द्रव्यलक्षणम्।"⁴

अर्थात् सत् ही द्रव्य का लक्षण है। जो सत् है वही द्रव्य है।

सत् क्या है- इस सम्बन्ध में भी उनका निम्नलिखित कथन विशेषतः ध्यातव्य है:-

"उत्पाद-व्यय-ध्रौव्ययुक्तं सत्।"⁵

अर्थात् जो उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य से युक्त हो वही सत् है। जैनदर्शन के अनुसार इस विश्व में जितने भी चेतनाचेतन पदार्थ हैं वे सभी उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य से युक्त हैं; अतः द्रव्य हैं। पदार्थ में नवीन अवस्था के आगमन को उत्पाद कहते हैं, पूर्व अवस्था के त्याग को व्यय कहते है और वस्तु के स्वभाव की स्थिरता को ध्रौव्य कहते हैं। यथा- दूध अवस्था का व्यय हुआ, दधि-अवस्था का उत्पाद हुआ और ‘गोरस’ ध्रुव रहा।⁶ इस प्रकार जगत् के समस्त पदार्थ ‘सत्’ हैं, सत् ही द्रव्य का लक्षण है।

‘सत्’ के अतिरिक्त द्रव्य का एक अन्य लक्षण जैनदर्शन में यह भी पाया जाता है कि जो गुण-पर्याय से सहित हो वही द्रव्य है। जैसा कि ‘तत्त्वार्थसूत्र’ के निम्नलिखित सूत्र से स्पष्ट है:-

"गुणपर्ययवद् द्रव्यम्।"⁷

जो द्रव्य के सहभावी अंश हैं उनको गुण कहते हैं और जो क्रमभावी अंश हैं उनको पर्याय कहते हैं। जगत् में कोई भी ऐसा पदार्थ नहीं है जो गुण और पर्यायों से सहित न हो। ज्ञान, दर्शन, सुख आदि जीवद्रव्य के गुण हैं और मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, केवलज्ञान आदि उसकी पर्यायें हैं। इसीप्रकार रूप, रस, स्पर्श आदि पुद्‌गलद्रव्य के गुण हैं और काला, पीला, नीला आदि उसकी पर्यायें हैं।

इसप्रकार हम देखते हैं कि द्रव्य वह है जो सत् हैं और सत् वह है जो उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य से युक्त हो अथवा अनन्त गुण-पर्यायों से सहित हो।

जैन ग्रन्थों में द्रव्य को मुख्यतया तो ‘द्रव्य’ नाम से ही सम्बोधित किया गया है, परन्तु उसके अतिरिक्त अर्थ, पदार्थ, प्रमेय, ज्ञेय आदि शब्दों का प्रयोग भी प्राप्त होता है। ‘अर्यते गम्यते परिच्छिद्यते वा इति अर्थः’ - जो जाना जाता है, वह अर्थ है। इसीप्रकार पदार्थ, प्रमेय, ज्ञेय आदि शब्द भी द्रव्य के स्वरूप को ज्ञान के दृष्टिकोण से स्पष्ट करते हैं। द्रव्य को वस्तु भी कहते हैं- वसन्ति गुणाः यस्मिन् तत् वस्तु - अर्थात् जिसमें अनन्त गुण बसते हैं, रहते हैं, वह द्रव्य है।

3. द्रव्यों की संख्या-

जैनदर्शन के अनुसार इस विश्व में अनन्तानन्त द्रव्य पाये जाते हैं, परंतु उनकी संख्या जाति-अपेक्षा से 6 मानी गई है, जो इसप्रकार है-

  1. जीवद्रव्य 2. पुद्गलद्रव्य 3. धर्मद्रव्य
  2. अधर्मद्रव्य 5. आकाशद्रव्य 6. कालद्रव्य

इन सभी 6 द्रव्यों का सामान्य स्वरूप संक्षेप में निम्नलिखितानुसार है। ध्यातव्य है कि जैनाचार्यों ने इनमें से जीव और पुद्गल द्रव्य का स्वरूप विशेष विस्तारपूर्वक स्पष्ट किया है, क्योंकि वह मोक्षमार्ग में विशेष उपयोगी है।

1. जीवद्रव्यः- जिनमें चेतना अथवा ज्ञान-दर्शनादि पाये जाते हैं, वे जीवद्रव्य हैं। जीवद्रव्य परमार्थ से स्पर्श-रस-गंध-वर्णादि गुणों से रहित अमूर्तिक है। वह यद्यपि संसार-अवस्था में इंद्रिय, बल, आयु एवं श्वोसोच्छ्वास रूप द्रव्यप्राणों से जीता है, परंतु परमार्थ से अपने ज्ञान-दर्शनादि भावप्राणों से ही सदाकाल जीता रहता है।

आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तिदेव ने द्रव्यसंग्रह⁸ में जीव के स्वरूप को भलीभाँति स्पष्ट करने के लिए नवाधिकारों का आश्रय लिया है जो अत्यन्त उपयोगी है। अतिसंक्षेप में वे इसप्रकार हैं-

1. जीवत्व- जो जीता था, जीता है और सदा जीवित रहेगा, वह जीव है।

2. उपयोगमयत्व- जो सदा ज्ञान-दर्शन का व्यापर करता है वह जीव है।

3. अमूर्तिकत्व- जीव वास्तव में स्पर्श, गंध, रस, वर्ण से रहित अमूर्तिक है।

4. कर्तृत्व- जीव अपने भावों/कर्मों का कर्ता स्वयं है।

5. स्वदेहपरिमाणत्व-जीव सर्वव्यापक या बिन्दुमात्र नहीं है, अपितु अपने शरीर-प्रमाण है।

6. भोक्तृत्व- जीव अपने भावों/कर्मों का भोक्ता भी स्वयं है।

7. संसारित्व- जीव संसार में विविध योनियों में जन्म-मरण कर रहा है।

8. सिद्धत्व- राग-द्वेषादि का त्याग कर जीव सिद्ध हो जाता है ।

9. ऊर्ध्वगमनत्व- अग्नि की लौ की भाँति जीव का मूल स्वभाव ऊर्ध्वगमन है।

2. पुद्‌गलद्रव्य- जिनमें स्पर्श, रस, गंध, वर्णादि पाये जाते हैं, वे पुद्गलद्रव्य हैं। पुद्गलद्रव्य मूर्तिक होते हैं। इस जगत् में हमको जो कुछ पंच इन्द्रियों से ज्ञात होता है वह सब पुद्‌गलद्रव्य ही है। पुद्गल के अतिरिक्त शेष पांच द्रव्य तो अमूर्तिक होने से इन्द्रियों द्वारा नहीं जाने जा सकते हैं। शब्द, बन्ध, सूक्ष्म, स्थूल, संस्थान, भेद, अंधकार, छाया, उद्योत, आतप आदि पुद्‌गलद्रव्य की पयायें हैं।⁹ अणु और स्कन्ध के भेद से पुद्‌गलद्रव्य के दो भेद होते हैं । जो एक अविभागी परमाणु द्रव्य हैं उसे अणु कहते हैं और एक से अधिक अणुओं के संयोग/बन्ध को स्कन्ध कहते हैं।

स्कन्ध के पुनः 6 प्रकार बताये गये हैं 10-

1. स्थूलस्थूल- जिनको तोड़कर अलग-अलग किया जा सकता है अथवा जो टूटकर दुबारा मिलते नहीं हैं, वे स्थूलस्थूल हैं।जैसे- काष्ठ, पाषाण आदि।

2. स्थूल- जो टूटकर भी तुरंत फिर से मिल जाते हैं, वे स्थूल हैं।जैसे- दूध, घी, तेल आदि।

3. स्थूलसूक्ष्म- जो दिखते हैं, पर पकड़ में नहीं आते, वे स्थूलसूक्ष्म हैं।जैसे- छाया, प्रकाश आदि।

4. सूक्ष्मस्थूल- जो दिखते नहीं, पर किसी अन्य इन्द्रिय से ग्रहण हो जाते हैं, वे सूक्ष्मस्थूल हैं। जैसे- चार इंद्रियों के विषय- गन्ध, रस, शब्द आदि ।

5. सूक्ष्म- जिनका किसी भी इंद्रिय से ग्रहण नहीं हो सकता, वे सूक्ष्म हैं।जैसे- कर्मवर्गणा।

6. सूक्ष्मसूक्ष्म- जो इससे भी भी सूक्ष्म हों, वे सूक्ष्मसूक्ष्म हैं। जैसे- द्यणुक-त्र्यणुक स्कन्ध |

3. धर्मद्रव्यः- धर्म और अधर्म का अर्थ यहाँ पुण्य-पाप जैसा कुछ नहीं ग्रहण करना चाहिए। जैनदर्शन के अनुसार इस विश्व में जीव, पुद्गल की तरह धर्म और अधर्म नाम के दो द्रव्य भी वस्तु सत्य के रूप में पाये जाते हैं। यद्यपि ये अमूर्तिक हैं, इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष नहीं हो सकते हैं, परंतु ऐसा कहते हैं कि आधुनिक विज्ञान ने भी इनकी सत्ता सिद्ध कर दी है। धर्मद्रव्य वह है जो स्वयं गमन करने वाले जीव-पुद्गलों को गमन करने में सहायक होता है।¹¹ उसीप्रकार जिसप्रकार कि स्वयं गमन करने वाली मछली को गमन करने में जल सहायक होता है अथवा स्वयं गमन करनेवाली रेलगाड़ी को पटरियाँ सहायक होती हैं।

4. अधर्मद्रव्यः- अधर्मद्रव्य वह है जो स्वयं रुकने वाले जीव और पुद्गलों को रुकने में सहकारी होता है। उसीप्रकार जिसप्रकार कि किसी स्वयं रुकनेवाले पथिक को रुकने में वृक्ष को छाया निमित्त हो जाती है।¹²

धर्म और अधर्म द्रव्य के सम्बन्ध में यहाँ यह एक तथ्य निश्चित रूप से समझ लेना चाहिए कि ये दोनों द्रव्य कमशः गमन और स्थिति में निमित्त-मात्र हैं, बलात् कभी भी किसी द्रव्य को गमन और स्थिति नहीं कराते हैं। जैनदर्शन में जहाँ भी किसी भी ग्रन्थ में धर्म और अधर्म द्रव्य का स्वरूप समझाया गया है, वहाँ इस तथ्य को सर्वत्र स्पष्ट किया गया है। प्रमाणस्वरूप ‘द्रव्यसंग्रह’ (दव्वसंगहो) नामक ग्रंथ में समागत धर्म और अधर्मद्रव्य का निरूपण करनेवाली दोनों गाथाओं के "अच्छंता णेव सो णेई"¹³ और "गच्छंता णेव सो धरदि"¹⁴ -इन कथनों पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।

5. आकाशद्रव्यः- जो जीव-पुद्गलादि समस्त द्रव्यों को रहने के लिए स्थान देता है उसे आकाशद्रव्य कहते हैं।¹⁵ आकाशद्रव्य एक है और सम्पूर्ण विश्व में स्वतंत्र व्याप्त है। कहीं किंचिद् भी स्थान ऐसा नहीं है जहाँ आकाशद्रव्य न हो। आकाशद्रव्य यद्यपि एक अखण्ड द्रव्य है, तथापि षडद्रव्यों के अवस्थान-अनवस्थान की अपेक्षा उसे निम्नलिखित दो भेद करके भी समझाया जाता है- 1. लोकाकाश 2. अलोकाकाश। जहाँ उपर्युक्त छहों जाति के द्रव्य दृष्टिगोचर होते हैं वह लोकाकाश कहलाता है और उससे बाहर का अनन्त आकाश, जहाँ मात्र उस आकाश को छोड़कर अन्य कोई द्रव्य नहीं हैं, अलोकाकाश कहलाता है। जिस प्रकार एक गिलास दूध से आधा भरा हुआ हो तो कोई उस एक गिलास को ही हाथ लगाकर ऐसे बोल सकता है कि लगे मानों दो गिलास हैं, एक भरा हुआ और एक खाली, परन्तु वस्तुतः गिलास एक ही है, उसे दूध के अवस्थान-अनवस्थान की अपेक्षा भरा और खाली इन दो भागों में बाँटकर समझाया जाता है।

6. कालद्रव्यः- जो जीव-पुद्‌गलादि सर्व द्रव्यों के परिणमन या परिवर्तन में निमित्त है उसे कालद्रव्य कहते हैं।¹⁶ कालद्रव्य अमूर्तिक है और संख्या अपेक्षा असंख्य हैं। ये सम्पूर्ण लोक में सर्वत्र रत्नों के ढेर की तरह बिछे पड़े हैं। व्यवहार में मिनट, घण्टा, दिन, सप्ताह, पक्ष, मास, वर्ष आदि कालद्रव्य न हो तो जगत् में कहीं कोई परिणमन या परिवर्तन नहीं हो सकता। जगत् के समस्त चेतनाचेतन पदार्थों में दिखाई देने वाला परिवर्तन ही कालद्रव्य को सिद्ध करने के लिए प्रमाण है।

इसप्रकार इस विश्व में जाति-अपेक्षा उक्त 6 प्रकार के द्रव्य पाये जाते हैं; किंतु जैनग्रन्थों में इन 6 जातियों को कहीं-कहीं इन दो ही जातियों में भी कहा गया है-

  1. जीवद्रव्य और 2. अजीवद्रव्य; क्योंकि उक्त 6 जातियों में एक जीवद्रव्य को छोड़कर शेष पाँचों द्रव्य चेतना-रहित होने से अजीव हैं। ‘द्रव्यसंग्रह’ नामक ग्रंथ में आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तिदेव ने ऐसा ही किया है। उन्होंने द्रव्य मूलतः दो ही प्रकार के बताये हैं।¹⁷

इसके अतिरिक्त अन्य अनेक दृष्टियों से भी जैनाचार्यों ने द्रव्यों को दो-दो जातियों में विभाजित किया है, जिनमें से कतिपय प्रमुख इसप्रकार हैं:-

(क) मूर्त और अमूर्तः- एक पुद्गल द्रव्य ही स्पर्श, रस, गंध, वर्णादि से युक्त होने के कारण मूर्त है और अन्य पाँचों (जीव, धर्म, अधर्म, आकाश और काल) द्रव्य स्पर्शादि गुणों से रहित होने के कारण अमूर्त है।¹⁸ (ख) सक्रिय और निष्क्रियः- ‘क्रिया’ का अर्थ यहाँ आवागमनरूप क्रिया समझना चाहिए। यह आवागमनरूप क्रिया मात्र जीव और पुद्गल- इन दो द्रव्यों में ही पाई जाती है, अतः इनको सक्रिय द्रव्य कहते हैं और शेष चार (धर्म, अधर्म, आकाश और काल) द्रव्य आवागमनरूप क्रिया से रहित होने के कारण निष्क्रिय द्रव्य कहलाते हैं।¹⁹

(ग) स्वद्रव्य-परद्रव्य- यह वर्गीकरण विशेषतया अध्यात्म-ग्रन्थों में उपलब्ध होता है, क्योंकि वहाँ स्व-पर-भेदविज्ञान ही प्रमुख प्रयोजन होता है। मात्र एक अपना जीव ही स्वद्रव्य है और शेष सभी जीव और पुद्‌गल-धर्मादि द्रव्य भी परद्रव्य हैं।²⁰

(घ) बहुप्रदेशी और एकप्रदेशीः- उक्त छहों प्रकार के द्रव्यों में से जीव, पुद्‌गल, धर्म अधर्म और आकाश- ये पाँच प्रकार के द्रव्य बहुप्रदेशी हैं, किन्तु कालद्रव्य मात्र एक प्रदेश वाला है, अतः एकप्रदेशी हैं। बहुप्रदेशी द्रव्यों को जैन दर्शन में ‘अस्तिकाय’ कहते हैं; अतः वहाँ जीव, पुद्‌गल धर्म, अधर्म और आकाश- इन पाँच द्रव्यों को पंचास्तिकाय कहा गया है। आचार्य कुन्दकुन्द के सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘पंचास्तिकायसंग्रह’ में इन्हीं पाँचों द्रव्यों का विस्तृत वर्णन पाया जाता है।

इसप्रकार यह स्पष्ट है कि द्रव्यों की संख्या एक अपेक्षा से दो भी बताई जा सकती है, अन्य अपेक्षा से 6 भी बताई जा सकती है और एक तीसरी अपेक्षा से अनन्त भी बताई जा सकती है।

जैनदर्शन के उक्त सम्पूर्ण द्रव्य-विवेचन को संक्षेप में निम्नलिखित सारिणी के द्वारा भी भलीभाँति समझा जा सकता है-

ध्यातव्य है कि जैनदर्शन के अनुसार इस विश्व में मूल द्रव्य जितने हैं उतने ही हैं, न कभी एक नया उत्पन्न होता है और न ही कभी पुराना कोई नष्ट होता है। सभी द्रव्य सनातन हैं, शाश्वत हैं, अनादिकाल से हैं और अनन्तकाल तक रहेंगे।

तथा यह भी सत्य है कि सभी द्रव्य सदा परिणमन करते रहते हैं। कोई एक भी द्रव्य एक समय भी (समय सैकण्ड का भी असंख्यातवां हिस्सा है) बिना परिणमन के रहता नहीं है। परिणमन उसका स्वभाव ही है।

किन्तु यह भी नहीं भूलना चाहिए यह परिणमन प्रत्येक द्रव्य का सदैव अपनी सीमा में ही होता है। कोई भी द्रव्य कभी भी अपने मूल स्वभाव को नहीं छोड़ता। जिस प्रकार बालक शिशु भी निरन्तर परिणमन करता रहता हैं, किन्तु कितना ही परिणमन करे बालक बालक ही रहता है, बालिका नहीं हो जाता और बालिका बालिका ही रहती है, बालक नहीं हो जाती; उसी प्रकार कभी भी कोई भी द्रव्य अन्य द्रव्यरूप नहीं हो जाता है। जीव कभी भी कैसे भी पुद्‌गल नहीं होता। इसीप्रकार अन्य द्रव्यों के विषय में भी समझ लेना चाहिए।²¹

तथा प्रत्येक द्रव्य अपने परिणमन का उपादान कारण स्वयं ही है, अन्य द्रव्य नहीं। अन्य द्रव्य के साथ कर्ता-कर्म मानना मिथ्या है। अन्य द्रव्य के साथ केवल निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध हो सकता है।²²

जैनदर्शन में इन षट्द्रव्यों के संबन्ध में एक और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात स्थान-स्थान पर कही गई है कि ये सभी द्रव्य अनादि-अनन्त हैं, स्वतंत्र हैं और अपने-अपने में परिपूर्ण हैं। कभी भी किसी भी द्रव्य का न तो नये सिरे से उत्पाद होता है और न ही सर्वथा विनाश। इसीप्रकार कोई भी द्रव्य किसी भी अन्य द्रव्य के अधीन नहीं है। कोई भी द्रव्य किसी भी अन्य द्रव्य का कोई कार्य नहीं करता, अन्य द्रव्य के कार्य में रंचमात्र हस्तक्षेप भी नहीं करता। यद्यपि व्यवहार से सभी द्रव्य परस्पर निमित्त होते हैं, पर परमार्थ से कोई किसी का कर्ता-धर्ता-हर्ता नहीं है। सभी द्रव्य सदा अपने ही स्वभाव में रहते हैं | कोई भी एक द्रव्य अन्य द्रव्य में प्रवेश नहीं करता, परद्रव्यरूप परिणमन नहीं करता। इस सम्बंध में जैनदर्शन के शिरोमणि आचार्य कुन्दकुन्द की निम्नलिखित गाथा विशेष रूप से स्मरणीय है-

" अण्णोण्णं पविसंता दिंता ओगासण्णमण्णस्स ।
मेलंता वि य णिच्चं सगसब्भावं ण विजहंति ।।" ²³

अर्थात् ये सभी द्रव्य परस्पर प्रवेश करते हैं, एक दूसरे को जगह देते हैं, बारबार खूब मिलते हैं, परन्तु कभी भी अपने स्वभाव को नहीं छोड़ते हैं।

आचार्य कुन्दकुन्द की भाँति इसी प्रकार के विचार अन्य भी अनेक जैनाचार्यों ने प्रकट किये हैं। जिनमें आचार्य वीरसेन एवं स्वामी कार्तिकय के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।

द्रव्यों के सामान्य-विशेष गुण-

कहा जा चुका है कि जैनदर्शन के अनुसार प्रत्येक द्रव्य अनन्त गुणों का पिण्ड है। उन गुणों में से कुछ सामान्य गुण कहलाते हैं और कुछ विशेष । जो सभी द्रव्यों में अथवा एकाधिक द्रव्यों में पाये जाते हैं वे सामान्य गुण हैं और जो मात्र एक ही विशिष्ट द्रव्य में पाये जाते हैं वे विशेष गुण हैं। सभी द्रव्यों में पाये जाने वाले सामान्य गुण प्रमुखरूप से निम्नलिखित बताये गये हैं-

(1) अस्तित्व- इससे द्रव्य सदा सत् रहता है।

(2) वस्तुत्व- इससे उसमें अर्थक्रिया बनी रहती है।

(3) द्रव्यत्व - इससे द्रव्य में परिणमन सदा होता रहता है।
(4) अगुरुलघुत्व - इससे द्रव्य में गुण कम-अधिक नहीं होते, पररूप भी नहीं होते।
(5) प्रमेयत्व - इससे द्रव्य किसी-न-किसी ज्ञान के द्वारा जाना जाता है।
(6) प्रदेशत्व - इससे उसका आकार अवश्य पाया जाता है।

एकाधिक द्रव्यों में पाये जाने वाले सामान्य गुण इसप्रकार हैं-

(1) जडत्व (अचेतनत्व) - इससे द्रव्य सदा अचेतन (ज्ञानदर्शन-रहित) रहता है।
(2) अमूर्तत्व - इससे द्रव्य सदा अमूर्तिक (स्पर्श, रस, गंधादि से रहित) रहता है।

अब सभी द्रव्यों के विशेष गुण पृथक्-पृथक् दिखाते हैं-

(1) जीवद्रव्य - ज्ञान, दर्शन, चारित्र, सुख, वीर्य आदि।
(2) पुद्गल - स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण आदि।
(3) धर्मद्रव्य - गतिहेतुत्व।
(4) अधर्मद्रव्य - स्थितिहेतुत्व।
(5) आकाशद्रव्य - अवगाहनहेतुत्व।
(6) कालंद्रव्य - परिणमनहेतुत्व।

इसप्रकार यहाँ जैनदर्शन के अनुसार द्रव्य का स्वरूप, लक्षण, भेद-प्रभेद, द्रव्यों के सामान्य-विशेष गुण आदि का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। विशेष जिज्ञासुओं को निम्नलिखित ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। हमने भी यहाँ इन्हीं के आधार से कुछ लिखने का प्रयत्न किया है-

  1. पंचास्तिकायसंग्रह, आचार्य कुन्दकुन्द, टीकाकार- आचार्य अमृतचन्द्र।
  2. प्रवचनसार, आचार्य कुन्दकुन्द, टीकाकार- आचार्य अमृतचन्द्र।
  3. द्रव्यसंग्रह, आचार्य नेमीचन्द्र, टीकाकार- ब्रह्मदेवसूरि।

सन्दर्भ-सूची-

  1. ‘अनेन धीमान् व्यहारमार्गं बुद्ध्वा पुनर्बोधति शुद्धमार्गम्।’ -पद्मप्रभमलधारि, नियमसार-टीका, कलश 52
  2. द्रव्यसंग्रह, गाथा 1
  3. प्रवचनसार, गाथा 80
  4. तत्त्वार्थसूत्र, 5/29
  5. तत्त्वार्थसूत्र, 5/30
  6. आप्तमीमांसा, 72
  7. तत्त्वार्थसूत्र, 5/38
  8. द्रव्यसंग्रह, 1/2
  9. वही, 1/16
  10. नियमसार, गाथा 21-24; महापुराण 24/150-153
  11. द्रव्यसंग्रह, 1/17
  12. वही, 1/18
  13. वही, 1/17
  14. वही, 1/18
  15. वही, 1/19
  16. वही, 1/20
  17. वही, 1/1
  18. परमात्मप्रकाश, 2/29 टीका
  19. वही 2/29 टीका
  20. समयसार, आत्मख्याति टीका, 309
  21. समयसार, आत्मख्याति टीका, 301
  22. समयसार, कर्ता-कर्म-अधिकार
  23. पंचास्तिकायसंग्रह, गाथा 7