जैनदर्शन में चेतना एक, नाम अनेक
-प्रो. वीरसागर जैन
जैनदर्शन के ग्रन्थों में चेतना का स्वरूप अत्यन्त विस्तारपूर्वक समझाया गया है। कह सकते हैं कि जैनागमों का पचास प्रतिशत से अधिक अंश वास्तव में चेतना के ही विवेचन हेतु समर्पित है, उसमें पद-पद पर चेतना के ही विभिन्न रूपों का निरूपण उपलब्ध होता है। यहाँ उसी विषय को कतिपय बिन्दुओं के माध्यम से सरलतापूर्वक लिखने का विनम्र प्रयास किया जाता है।¹
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चेतन (जीव/आत्मा) का परिणमन या व्यापार ही चेतना है, जिसका स्वरूप ज्योति, दर्पण आदि के समान मात्र प्रतिभासात्मक (नित्य-प्रकाशमय) है।
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यह चेतना पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति, कृमि, चींटी, भ्रमर, मनुष्य आदि समस्त शरीरधारियों में शरीर से भिन्न एक स्वतन्त्र सत् के रूप में पाई जाती है। किसी एक की चेतना का अन्य की चेतना से कोई सम्बन्ध नहीं है।
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चेतना को उपयोग, ज्ञान, दर्शन, वेदन, संवेदन, परिच्छेदन आदि अनेक पर्यायवाची नामों से जाना जाता है।
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यह चेतना यद्यपि मूलतः प्रतिभासात्मक (मात्र जानने रूप) होने से एक ही प्रकार की है, परन्तु कभी विषय के आधार पर, कभी कार्य के आधार पर और कभी कार्यपद्धति के आधार पर उस एक ही चेतना को हजारों नामों से कहा जाता है। कभी यह अपने विषय का निर्णय करती है, कभी परीक्षण करती है, कभी तुलना करती है, कभी जानने/भोगने की इच्छा करती है, कभी पुराना याद करती है, कभी भूल जाती है, इत्यादि; अतः इस आधार पर इसके अनेक नाम पड़ जाते हैं। यथा- धारणा, परीक्षा, प्रत्यभिज्ञा, जिज्ञासा, स्मृति, विस्मृति आदि।
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इसी प्रकार यह चेतना कभी शब्दों के माध्यम से जानती है, कभी इन्द्रियों के माध्यम से प्रवर्तती है और कभी बिना ही इन्द्रियों की सहायता के प्रवर्तती है, अतः इस आधार पर भी इसके अनेक नाम पड़ जाते हैं। यथा- आगमज्ञान, इन्द्रियज्ञान, अतीन्द्रियज्ञान आदि। तथा इसमें भी अनेक उपभेद और भी किए जा सकते हैं। जैसे- जब वह स्पर्शनेन्द्रिय के माध्यम से प्रवर्तती है तो उसे ‘छूना’ कहते हैं, रसनेन्द्रिय के माध्यम से प्रवर्तती है तो उसे ‘चखना’ कहते हैं, घ्राणेन्द्रिय के माध्यम से प्रवर्तती है तो उसे ‘सूंघना’ कहते हैं, इत्यादि।
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इसी प्रकार कभी यह चेतना राग-सहित प्रवर्तती है, कभी द्वेष-सहित प्रवर्तती है और कभी राग-द्वेष दोनों से रहित प्रवर्तती है; अतः इस आधार पर भी इसके अनेक नाम हो जाते हैं। यथा- रागात्मक चेतना, द्वेषात्मक चेतना, वीतराग चेतना।
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यह चेतना कभी सम्यक् निर्णयात्मक होती है और कभी निर्णय-रहित या मिथ्या निर्णयात्मक होती है, अतः इस आधार पर भी इसके अनेक नाम/रूप बन जाते हैं। यथा- प्रमाण एवं अप्रमाण या प्रमाणाभास।
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जब प्रमाण होती है तब भी कभी पूरी वस्तु को जानती है और कभी उसके एक अंश को, अतः इस आधार पर भी उसके अनेक नाम हो जाते हैं। यथा- प्रमाण, नय।
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जब अप्रमाण होती है तब भी कभी विरुद्धानेककोटिस्पर्शी होती है, कभी विपरीतैककोटिस्पर्शी होती है और कभी किमित्यालोचनमात्र होती है; अतः इस आधार पर भी इसके अनेक नाम/रूप बन जाते हैं। यथा- संशय, विपर्यय, अनध्यवसाय।
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इस सम्बन्ध में मैंने एक अन्य लेख भी पूर्व में लिखा है- ‘जैनदर्शन में ज्ञानमीमांसा।’ उसे भी इसके साथ पढ़ना उपयोगी है।
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यह चेतना कभी हिंसादि पापभाव संयुक्त होती है, कभी दया-पूजा-व्रतादि रूप पुण्यभाव संयुक्त होती है और कभी पाप-पुण्य के समस्त भावों से रहित रहती है, अतः इस आधार पर भी इसके अनेक नाम / रूप बन जाते हैं। यथा- शुभ चेतना, अशुभ चेतना, शुद्ध चेतना।
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यह चेतना कभी कर्म करने रूप होती है, कभी कर्मफल भोगने रूप होती है और कभी इन दोनों से भिन्न मात्र जानने रूप होती है; अतः इस आधार पर भी इसके कई नाम / रूप बन जाते हैं। यथा- कर्मचेतना, कर्मफलचेतना, ज्ञानचेतना।
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यह चेतना कभी नाना विकल्पों सहित होती है और कभी समस्त विकल्पों से रहित होती है, अतः इस आधार पर भी इसके अनेक नाम हो जाते हैं। यथा- सविकल्प चेतना, निर्विकल्प चेतना।
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यही चेतना जब एकाग्रचिन्तानिरोध रूप होती है तो इसे ही ध्यान कहते हैं।
इसी प्रकार और भी अनेक पक्षों पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया जा सकता है और फिर हम कह सकते हैं कि वास्तव में चेतना एक ही है- मात्र प्रतिभासात्मक, किन्तु उपचार से उस एक ही चेतना के हजारों नाम / रूप गिनाये जाते हैं।
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