जैनाचार्यों की एकरूपता | Jainacharyon Ki Ekarupata

जैनाचार्यों की एकरूपता

-प्रो. वीरसागर जैन

जैनाचार्यों ने विभिन्न भाषाओं, विभिन्न क्षेत्रों और विभिन्न कालखण्डों में अपरम्पार ग्रन्थों की रचना की है; परन्तु उनकी एक बात आश्चर्यचकित करने वाली है- इतनी विभिन्नताओं के बावजूद सर्वत्र एकरूपता । किसी भी आचार्य का, किसी भी भाषा का, किसी भी क्षेत्र का और किसी भी कालखण्ड का कोई भी ग्रन्थ उठाकर देखिए- पढ़िए, सबमें आश्चर्यजनक एकरूपता दिखाई देती है । उदाहरणार्थ सर्वत्र ५ ही अस्तिकाय बताये गये हैं, किसी ने भी कहीं भी ४ या ६ अस्तिकाय नहीं बताये । इसी प्रकार सर्वत्र ५ ही परमेष्ठी, ६ ही द्रव्य, ७ ही तत्त्व, ८ ही कर्म, ९ ही पदार्थ, १२ ही चक्रवर्ती, २४ ही तीर्थकर, ७ ही नरक, १६ ही स्वर्ग आदि कहे गये हैं । कहीं भी, कभी भी, किसी भी आचार्य ने इन संख्याओं में कोई परिवर्तन नहीं किया ।

आप कह सकते हैं कि ये तो शाश्वत तत्त्व हैं, इतने ही होते हैं, अतः इतने ही कहे हैं, इनमें कोई भी आचार्य कैसे कोई फेर-बदल कर सकते थे ।

परन्तु इससे आगे भी हमें यही एकरूपता दिखाई देती है । ५ व्रत, ६ आवश्यक, ८ द्रव्य (पूजा के), १० धर्म, ११ प्रतिमा, १२ भावना, १६ भावनाएँ (तीर्थकरत्व की), १४ गुणस्थान -इनमें भी किसी आचार्य ने कोई फेर-बदल नहीं किया । इससे ज्ञात होता है कि यह भारी एकरूपता साधारण बात नहीं है, अकारण भी नहीं है, इसमें अवश्य कोई बड़ा रहस्य होना चाहिए, जिस पर गम्भीरतापूर्वक चिन्तन अपेक्षित है ।

आजकल जो कोई बन्धु आगम-परम्परा को छोड़कर अपने मन-माने ढंग से चलना चाहते हैं, उन्हें भी सहस्राब्दियों से चली आ रही इस एकरूपता के कारण पर गम्भीरतापूर्वक चिन्तन करना चाहिए; अन्यथा उन्हें घोर अपराध का भागी बनना पड़ सकता है । शास्त्रों में कहा है कि एक आचार्य के कथन का विरोध प्रकारान्तर से समस्त जिनवाणी का विरोध है, एक ज्ञानी का निरादर अनन्त ज्ञानियों का निरादर है । सच भी है, एक अज्ञानी के अनेक मत हो सकते हैं, पर अनन्त ज्ञानियों का मत एक ही होता है । यही कारण है कि एकरूपता की ऐसी मिशाल दुनिया के दूसरे धर्म-दर्शनों में नहीं मिलती ।

जैनाचार्यों की यह एकरूपता हमें परम्पराप्रियता, आगमप्रतिबद्धता और अनुशासन तो सिखाती ही है, साथ में यह भी सिखाती है कि विविध आचार्यों द्वारा, विविध भाषाओं, विविध क्षेत्रों और विविध कालखण्डों में लिखी हुई होने पर भी सम्पूर्ण जिनवाणी का एक ही प्रयोजन है- वीतरागता; क्योंकि वह व्यक्तिवादी नहीं, वस्तुवादी है, वीतरागता वस्तु का स्वरूप है ।