जैन-वाङ्मय के उन्नायक-कविवर! मृतप्राय-काय के उर्जित-प्राण!!
‘केवल-रवि’ जग में प्रकटनेवाले, ‘वज्र-पौरुष’ को शतशः प्रणाम।।1।।
दास्य-भाव के भक्ति-स्वरों में, ‘दीन-अनाथ’ बन विनती करते।
जिनशासन के परम-विरोधी कर्तृवाद-स्वर के थे गूँजा करते।।2।।
ऐसे साहित्यिक विषम-काल में, पौरुष मोह-क्लीबत्व-ग्रस्त हुआ।
जिसकी तीक्ष्ण कलम-कटार ने, मोहारे-शीश भूमिसात् कर दिया।।3।।
जिसके ताप-प्रताप-प्रकाशित, आप अनुपम-ज्योति-पुंज बने थे।
उन्हीं कहान्-गुरुवर-अन्तेवासिन् भास्कर-विनुत चारु-चन्द्र बने थे।।4।।
मोह-निशा में जब सब जगवासी, गाफिल सोये थे घनघोर-नींद में।
तब साहित्य-जगत के ज्योतिपुंज, स्वर्णिम-रश्मि-प्रसार किया तुमने।।5।।
‘केवल-रवि’ से आरम्भ हुई था वह, अनघ-सृजन का अजस्र-सुप्रवाह।
अरु अविरल-धार बहाते तुम जा बैठे ‘कल्पलताओं की मृदु-छाँव’।।6।।
हम सब मिल विनयांजलि लेकर, सविनय-सुस्मरण हैं करते अविराम।
मम हृदय-पटल पर रहो सुशोभित, सदा अरे! ओ! चिन्मय अभिराम।।7।।
- डॉ. सुदीप कुमार जैन