जैन न्याय प्रदीपिका (डॉ. वीरसागर जैन) | Jain Nyay Pradipika

जैन न्याय प्रदीपिका

लेखक: प्रो. वीरसागर जैन
प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ
1st May, 2022, 1000 Copies

अनुक्रमणिका

  1. प्राक्कथन
  2. जैन न्याय का प्राथमिक परिचय
  3. न्यायशास्त्र के अध्ययन की आवश्यकता
  4. न्यायशास्त्र के अध्ययन की दैनिक जीवन में उपयोगिता
  5. जैन न्याय का वैशिष्ट्य
  6. जैन न्याय ग्रन्थों का सूचीकरण
  7. जैनदर्शन में संशय का स्वरूप
  8. जैनदर्शन में ज्ञानमीमांसा
  9. जैनदर्शन में चेतना एक, नाम अनेक
  10. क्या दर्शनोपयोग अग्राह्य है?
  11. क्या धारावाहिक ज्ञान अग्राह्य है
  12. प्रमाण क्या है- ज्ञान या आत्मा?
  13. सभी प्रमाणों से एक वस्तु का ज्ञान
  14. असाधारणवचन लक्षणम्
  15. अन्य दर्शनों के ज्ञान की आवश्यकता
  16. वैशेषिक दर्शन की पदार्थ-व्यवस्था
  17. सूत्र के बत्तीस दोषों का संक्षिप्त विवेचन
  18. आपमीमांसा : एक अनुशीलन
  19. अनेकान्त, स्याद्वाद एवं सप्तभंगी : एक संक्षिप्त विवेचन
  20. स्याद्वाद : विभिन्न विद्वानों की दृष्टि में
  21. सभी शास्त्रों में मिलता है स्याद्वाद
  22. स्याद् पद का महत्त्व
  23. स्याद्वाद : कतिपय प्रश्नोत्तर
  24. अनेकान्तदृष्टि से सामाजिक सौहार्द
  25. आत्मानुभूति में न्यायशास्त्र के ज्ञान की उपयोगिता
  26. सम्यग्ज्ञान में न्यायशास्त्र के प्रयोग
  27. सर्वज्ञसिद्धि
  28. सर्वज्ञसिद्धि : महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
  29. छायावाद : प्रत्येकप्रमाणखण्ड के प्रकाश में
  30. जैनदर्शन की कारण-कार्य-व्यवस्था
  31. चतुरंग वाद
  32. जैनदर्शन में अभाव की अवधारणा
  33. तथावरलोकवार्तिक में हेतु एवं हेत्वाभास
  34. पुष्पकर्णिका की समीक्षा
  35. प्रवचनसार में प्रतिपादित बिंदुदर्शन
  36. जैन न्यायग्रन्थों में उपलब्ध युक्तियाँ
  37. न्यायविद्या की प्रगति कैसे हो?
  38. न्यायशास्त्र के अध्ययन से लाभ
  39. मिथ्यात्व के नाश में न्यायशास्त्र के अध्ययन की उपयोगिता
  40. अज्ञान ही दुःख का मूल कारण है
  41. धर्म, दर्शन और न्याय में अन्तर
  42. आधुनिक युग के प्रमुख जैन नैयायिक
  43. साधन और कारण में अन्तर
  44. प्रमेय का स्वरूप
  45. निषेध-विमर्श
  46. जैन न्याय परिभाषा
  47. प्रकीर्णक
  48. जैन न्याय का संक्षिप्त लक्षणकोश
  49. जैन न्याय का संक्षिप्त शब्दकोश
  50. परिशिष्ट : सिद्धान्तों के भेद आवश्यक

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