जैन न्याय का संक्षिप्त लक्षणकोश | Jain Nyay Ka Sankshipt Lakshanakosh

जैन न्याय का संक्षिप्त लक्षणकोश

-प्रो. वीरसागर जैन

किसी भी विषय को भलीभांति समझने-समझाने का प्रथम सोपान होता है- लक्षणज्ञान | यदि वही नहीं है तो आगे की सारी बात निरर्थक या अनर्थक हो जाती है | अतः यदि हमें अपनी बात को सफल-सार्थक बनाना है तो सर्वप्रथम लक्षण जानना चाहिए | न केवल जानना चाहिए, उसे कंठस्थ भी करना चाहिए, ताकि आगे होने वाले सम्पूर्ण विवेचन को स्पष्ट रूप से समझा जा सके | लक्षणज्ञान की ऐसी ही महती उपयोगिता का विचार कर यहाँ एक जैन न्याय का संक्षिप्त लक्षणकोश प्रस्तुत किया जा रहा है | आशा है, इससे जैन न्याय के विद्यार्थियों को बड़ा लाभ होगा |

इस लक्षणकोश में कुछ अति आवश्यक लक्षणों का ही संग्रह किया जा रहा है, तथा उनमें भी केवल एक-एक प्रसिद्ध लक्षण का ही संग्रह किया जा रहा है, जबकि शास्त्रों में अनेक-अनेक लक्षण भी किंचित् भाषादि-परिवर्तन के साथ उपलब्ध होते हैं, अतः इन्हें तो हमको अवश्य ही कंठस्थ कर लेना चाहिए, इनसे विषय को समझने में बड़ी सुविधा होगी | सभी लक्षण यथावत् संस्कृत भाषा में ही रखे गये हैं, क्योंकि अनुवाद में वह बात नहीं आती है, लक्षणों को मूलतः ही कंठस्थ करना उचित रहता है | तथापि जिन्हें उनका हिन्दी-अनुवाद देखने की अभिलाषा हो, वे ‘न्यायमन्दिर’ में देख लें, वहाँ सब लिखा जा चुका है।

सभी लक्षण वर्णानुक्रम से प्रस्तुत किए जा रहे हैं | यथा-

अकिंचित्कर हेत्वाभास- ‘अप्रयोजको हेतुरकिञ्चित्करः।’ - न्यायदीपिका, 3/63
अवग्रह- ‘इन्द्रियार्थसमवधानसमनन्तरसमुत्थसत्तालोचनानन्तरभावी सत्तावांतरजातिविशिष्टवस्तुग्रही ज्ञानविशेषोऽवग्रहः।’ - न्यायपदीपिका, 2/11
अव्याप्त- ‘लक्ष्यैकदेशवृत्त्यव्याप्तम्।’ - न्यायदीपिका, 1/5
अतिव्याप्त- ‘लक्ष्यालक्ष्यवृत्त्यतिव्याप्तम्।’ - न्यायदीपिका, 1/5
अनध्यवसाय- ‘किमित्यालोचनमात्रमनध्यवसायः।’ - न्यायदीपिका, 1/9
अनुमान- ‘साधनात्साध्यविज्ञानमनुमानम्।’ - परीक्षामुखसूत्रम्, 3/14
अनैकान्तिक- 'पक्षसपक्षविपक्षवृत्तिरनैकान्तिकः। - न्यायदीपिका, 3/62
अवाय-‘विशेषनिर्ज्ञानाद्याथात्म्यावगमनमवायः।’- न्यायदीपिका, 2/11
असम्भव- ‘बाधितलक्ष्यवृत्त्यसम्भवि।’ - न्यायदीपिका, 1/5
असिद्ध-‘असत्सत्तानिश्चयोऽसिद्धः।’ - परीक्षामुखसूत्रम्, 6/22
आत्मभूत-‘यद्वस्तुस्वरूपानुप्रविष्टं तदात्मभूतम्। यथाग्नेरौष्ण्यम्।’ - न्यायदीपिका, 1/4
अनात्मभूत- ‘तद्विपरीतमनात्मभूतम्। यथा दण्डः पुरुषस्य।’ - न्यायदीपिका, 1/4

आगम-‘आप्तवचनादिनिबन्धनमर्थज्ञानमागमः।’ - परीक्षामुखसूत्रम् 3/82

आगमाभास-‘रागद्वेषमोहाक्रान्तपुरुषवचनाज्जातमागमाभासम्।’ - परीक्षामुखसूत्रम्, 6/51

आप्त- ‘यो यत्राविसंवादकः स तत्राप्तः।’ - प्रमेयरत्नमाला, 3/95

ईहा- ‘अवग्रहगृहीतार्थसमुद्भूतसंशयनिरासाय यत्नमीहा।’ - न्यायदीपिका, 2/11

उद्देश- ‘विवेक्तव्यवस्तुनाममात्रकथनमुद्देशः।’ - न्यायदीपिका, 1/3

उपनय- ‘हेतोरुपसंहारः उपनयः।’ - परीक्षामुखसूत्रम्, 3/46

तर्क-‘व्याप्तिज्ञानं तर्कः।’ - न्यायदीपिका, 3/15

तर्काभास- ‘असंबद्धे तज्ज्ञानं तर्काभासम्।’ - परीक्षामुखसूत्रम्, 6/10

धारणा- ‘कालान्तराविस्मरणयोग्यतया तस्यैव ज्ञानं धारणा।’ - न्यायदीपिका, 2/11

नय- ‘प्रमाणपरिगृहीतार्थैकदेशवस्तवध्यवसायो नयः।’ - धवला, 1/1/1/1, पृष्ठ 83

निगमन- ‘प्रतिज्ञायास्तु निगमनम्।’ - परीक्षामुखसूत्रम्, 3/47

नैगम- ‘तत्र संकल्पमात्रग्राहको नैगमो नयः।’ - तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक 1/33

न्याय- ‘नयप्रमाणात्मको न्यायः।’ -प्रमेयरत्नमाला, टिप्पण-2, पृष्ठ 3

परीक्षा- ‘विरुद्धनानायुक्तिप्राबल्यदौर्बल्यावधारणाय प्रवर्तमानो विचारः परीक्षा।’ - न्यायदीपिका, 1/6

परोक्ष- ‘अविशदप्रतिभासं परोक्षम्।’ -न्यायदीपिका, 3/1

पारमार्थिक- ‘सर्वतो विशदं पारमार्थिकप्रत्यक्षम्।’ -न्यायदीपिका, 2/13

प्रतिज्ञा- ‘पक्षस्य वचनं प्रतिज्ञा।’ -न्यायदीपिका, 3/33

प्रत्यभिज्ञान- ‘दर्शनस्मरणकारणकं संकलनं प्रत्यभिज्ञानम्।’ - परीक्षामुखसूत्रम्, 3/5

प्रमाण- ‘सम्यग्ज्ञानं प्रमाणम्।’ - न्यायदीपिका, 1/8

प्रामाण्य- ‘प्रतिभातविषयाव्यभिचारित्वम्।’ - न्यायदीपिका, 1/18

युक्ति- ‘सुणयप्रमाणा जुत्ती।’ - माइल्लधवल, नयचक्र, 261

लक्षण- ‘व्यतिकीर्णवस्तुव्यावृत्तिहेतुर्लक्षणम्।’ - न्यायदीपिका, 1/3

विकलप्रत्यक्ष- ‘तत्र कतिपयविषयं विकलम्।’ - न्यायदीपिका, 2/13

विचार-“प्रत्यक्षानुमानागमैर्यथावस्थितवस्तुव्यवस्थापनहेतुर्विचारः।”-सोमदेवसूरि,नीतिवाक्यामृत15/2

( प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम से यथावस्थित वस्तु का सही ज्ञान करने को विचार कहते हैं।)

विचारज्ञ-“स खलु विचारज्ञो यः प्रत्यक्षेणोपलब्धमपि साधु परीक्ष्यानुतिष्ठति।" -सोमदेवसूरि, नीतिवाक्यामृत 15/6 ( वही पुरुष विचारशील है जो प्रत्यक्ष उपलब्ध वस्तु को भी भलीभाँति परीक्षा करके जानता है।)

विजिगीषु कथा-‘वादिप्रतिवादिनोः स्वमतस्थापनार्थं जयपराजयपर्यन्तं परस्परं प्रवर्तमानो वाग्व्यापारो विजिगीषुकथा।’ - न्यायदीपिका, 3/36

विपर्यय- ‘विपरीतैककोटिनिश्चयो विपर्ययः।’ - न्यायदीपिका, 1/9

विरुद्ध हेत्वाभास- ‘साध्यविपरीतव्याप्तो हेतुर्विरुद्धः।’ - न्यायदीपिका, 3/61

वीतराग कथा- ‘गुरुशिष्याणां विशिष्टविदुषां वा रागद्वेषरहितानां तत्त्वनिर्णयपर्यन्तं परस्परं प्रवर्तमानो वाग्व्यापारो वीतरागकथा।’ - न्यायदीपिका, 3/36

व्याप्ति- ‘साध्यसाधनयोर्गम्यगमकभावप्रयोजको व्यभिचारगन्धासहिष्णुः सम्बन्धविशेषो व्याप्तिः।’ - न्यायदीपिका, 3/15

संशय- ‘विरुद्धानेककोटिस्पर्शिज्ञानं संशयः।’ - न्यायदीपिका, 1/9

सकल प्रत्यक्ष- ‘सर्वद्रव्यपर्यायविषयं सकलम्।’ - न्यायदीपिका, 2/14

सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष- ‘इन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तं देशतो सांव्यवहारिकम्।’ - परीक्षामुखसूत्रम्, 2/5

साध्य- ‘इष्टमबाधितमसिद्धं साध्यम्।’ - परीक्षामुखसूत्रम्, 3/16

स्मृति- ‘संस्कारोद्बोधनिबन्धना तदित्याकारा स्मृतिः।’ - परीक्षामुखसूत्रम्, 3/3

हेतु-‘साध्याविनाभावित्वेन निश्चितो हेतुः।’ - परीक्षामुखसूत्रम्, 3/11

हेत्वाभास- ‘हेतुलक्षणरहिताः हेतुवदवभासमानाः हेत्वाभासाः।’ - न्यायदीपिका, 3/60

जैन न्याय की कतिपय प्रमुख व्युत्पत्तियां -
प्रत्यक्ष- ‘अक्ष्णोति व्याप्नोति जानातीत्यक्ष आत्मा, तन्मात्रापेक्षोत्पत्तिकं प्रत्यक्षमिति।’ - न्यायदीपिका 2/19
प्रमाण- ‘प्रकर्षेण संशयादिव्यवच्छेदेन मीयते परिच्छिद्यते वस्तुतत्त्वं येन तत्प्रमाणम्।’ - प्रमाणमीमांसा, वृत्ति, 1/1/1 - प्रमेयरत्नमाला, सूत्र 1/1, पृष्ठ 14
न्याय- ‘नितरामीयते ज्ञायतेऽर्थोऽनेनेति न्यायः।’ - प्रमेयरत्नमाला, टिप्पण-2, पृष्ठ 3