नाटक : भरत-बाहुबली
नाटक :
भरत-बाहुबली
प्रथम-दृश्य
स्थान-पोदनपुर का निकटवर्ती प्रदेश
( महाराज भरत का दरबार। षट्खण्डाधिपति-महाराज भरत राजसी-वस्त्रों में सुशोभित सिंहासन पर विराजमान हैं। सामने अमात्यगण बैठे हैं।)
भरत-अब इन विजयोत्सवों से मैं थक गया हूँ अमात्य! हृदय विश्राम चाहता है।
बासन्तक-विश्राम! जीवन में विश्राम ही कहाँ है सम्राट्! संघर्ष तो क्षत्रिय का सहोदर है। इसका जन्म ही उसके साथ होता है, फिर अभी तो स्वयं चक्ररत्न भी विश्राम नहीं चाहता। विजय का जो व्रत लेकर हम निकले हैं, उसे तो पूरा करके ही लौटना चाहिए। अभी महाराज बाहुबली भी तो नमस्कार करने नहीं पधारे, इसी से तो चक्ररत्न रुक गया है।
भरत-विजय का व्रत! अरे! वह हिंसा का ही तो दूसरा नाम है, पारस्परिक-कलह से बचने के लिए पिता सभी सहोदरों में राज्य का जो विभाग कर गये थे। आज मैं उससे संतुष्ट न होकर सहोदरों के मुँह का ग्रास भी झपटने के लिए तैयार हूँ। क्या सीमा है इस पाप की? हाँ, अब मैं समझ गया कि विश्व में क्रांति का सूत्रपात क्यों होता है?
मागध-षट्खण्डाधिपति-सम्राट् भरत के विरुद्ध क्रांति करने की सामर्थ्य आज किसमें है महाराज !
भरत-क्रांति की सामर्थ्य ! मेरा हृदय स्वयं मेरे विरुद्ध क्रांति कर रहा है अमात्य ! पिता के द्वारा कोमल-कली की तरह पाले गए प्यारे सहोदर आज मेरी ही राज्य-लिप्सा से संत्रस्त होकर वन चले गये हैं। मेरा यह व्रज-हृदय फटकर अपना अर्जित-पाप उनके चरणों में क्यों नहीं बिखेर देता ?
दक्षिणांक-महाराज ! क्षुब्ध न होइये। आत्म-विद्या में आप पारंगत हैं। अपने अनंत-गुणों के गहरे-सागर में डुबकियाँ लगाते-लगाते आप उस अवस्था में पहुँच गये हैं, जहाँ विश्व की विभूति धूल-सी भासित होने लगी है। किन्तु स्वामिन् ! षट्खण्ड के बिखरे हुए शासन का सूत्र अपने हाथ में लेकर व्यवस्था स्थापित करना भी तो चक्री का ही कर्तव्य होता है। चक्ररत्न का बाहुबली की सीमा में आकर रुक जाना इसी बात का प्रमाण है।
भरत-किन्तु अमात्यवर ! बाहुबली मुझे अर्ककीर्ति से भी अधिक प्रिय है। यदि मेरा संदेश पाकर वह भी अन्य-सहोदरों की भाँति दीक्षा के लिए निकल पड़े, तो क्या मैं छोटी माँ के समक्ष अपना कलंकित-मुँह दिखा सकूँगा ?
दक्षिणांक-महाराज ! आप चिंता न कीजिये। मैं स्वयं इस कार्य को सम्पन्न करने का संकल्प करता हूँ और मुझे विश्वास है कि मैं शीघ्र ही महाराज बाहुबली को यहाँ लाने में समर्थ हो सकूँगा, आप निश्चिन्त रहें।
भरत-दक्षिणांक ! मेरा हृदय साक्षी नहीं देता। बाहुबली को मैं बाल्यकाल से ही जानता हूँ। उसका हठ इस चक्र के हठ से किसी भी प्रकार कम नहीं है।
दक्षिणांक-महाराज! आपके चरणों के प्रसाद से मैं अब तक विषमतम-राजनीतिक-कुचक्रों में पड़कर भी असफल नहीं हुआ हूँ। फिर यह कार्य तो इतना कठिन नहीं है। स्नेह-सिक्त-सहोदरों के हृदय का मिलन। भला बताइये, यह क्या बड़ा काम है?
भरत-किन्तु अमात्य! मुझे अपने इस संदेश में अपने अभिमान एवं भाई के अपमान की गंध आती है।
दक्षिणांक-महाराज! बड़े भाई के संदेश में छोटे भाई के अपमान की गंध! बहुत गहरे उतर गये हैं सम्राट्? ये दो सहोदरों के कोमल-हृदय हैं सम्राट्! जिनका मिलन इतना सरल है, जितना गीली-मिट्टी के टूटे हुए खिलौने को फिर से जोड़ देना। यह नदी के दो किनारे नहीं हैं, जिनका जीवन में कभी सम्मिलन नहीं होता।
भरत-दक्षिणांक! तुम अत्यन्त-प्रवीण हो, तुम्हारे वाक्-चातुर्य की मैं कहाँ तक प्रशंसा करूँ? मुझे तुम पर विश्वास है, जाओ।
(दक्षिणांक नमस्कार करके जाता है)
भरत-अमात्य-वृन्द! आज बहुत समय हो गया है, अब आप विश्राम करें।
(सब चले जाते हैं)
पटाक्षेप
—## द्वितीय-दृश्य
स्थान-पोदनपुर का राजप्रसाद।
(महाराज बाहुबली अपने मंत्रणागृह में एकाकी बैठे किसी विचार में मग्न हैं। प्रासाद के तोरणद्वार पर द्वारपाल खड़ा है, सहसा एक अपरिचित का प्रवेश।)
द्वारपाल-कौन हो तुम ? कहाँ बढ़े जा रहे हो ?
अपरिचित-मैं महाराज बाहुबली का चरण-चंचरीक विश्वासपात्र-चर हूँ।
द्वारपाल-तुम महाराज के चरण-चंचरीक कबसे बने ? महाराज का अति-पुराना, अति-प्रिय और अति-विश्वासपात्र चर तो मैं हूँ, मैंने तो तुम्हें आज ही देखा है। एक अपरिचित को प्रवेश की आज्ञा नहीं मिल सकती। यह महाराज की गुप्त-मंत्रणा का समय है। तुम नहीं जा सकते।
अपरिचित-मुझे महाराज को एक अत्यन्त-महत्त्वपूर्ण-सूचना देनी है, वह सूचना महाराज को अविलम्ब मिलनी चाहिए, अन्यथा भारी-अनिष्ट की सम्भावना है।
द्वारपाल-इन बातों में कुछ नहीं रक्खा। तुम मुझे फुसलाकर भीतर नहीं जा सकते।
अपरिचित-भाई ! सच मानो, मैं महाराज का चर हूँ। मुझे इससमय महाराज से मिलना ही चाहिए, अन्यथा भारी-अनिष्ट होगा, जिसका फल तुम्हें और हमें भी भोगना पड़ेगा। यदि प्रमाण चाहते हो, तो यह लो (अँगूठी देता है)।
द्वारपाल-अच्छा जाओ।
(अपरिचित प्रासाद में प्रवेश कर महाराज-बाहुबली के सन्मुख पहुँचता है।)
चर-महाराज की जय हो। एक अत्यन्त-आवश्यक कार्यवश मुझे यहाँ आना पड़ा है।
बाहुबली-बैठो सुमेरु! कहो, क्या कहना चाहते हो?
चर-आपके ज्येष्ठ-भ्राता महाराज भरत सेना-सहित नगर के बाहर विश्राम कर रहे हैं, आज मैं वेश बदलकर घूमते-घूमते उधर जा निकला, तो महाराज भरत के दो सैनिक गुप्त-चर्चा कर रहे थे कि उनका एक अत्यन्त-विश्वस्त और वाग्विग्ध-अमात्य आपकी सेवा में आ रहा है। वह आपको भरत के पास ले जाने का इसलिए भरसक-प्रयास करेगा कि आप जाकर उन्हें नमस्कार करें; क्योंकि आपके नमस्कार के बिना चक्र-रत्न आगे नहीं बढ़ सकता।
बाहुबली-सुमेरु! मैं तुम्हारी कर्त्तव्य-निष्ठा पर बहुत प्रसन्न हूँ। यह समाचार देकर तुमने राज्य की बड़ी भारी-सेवा की है। तुम्हारी यह सेवा अवश्य पुरस्कृत होगी, जाओ। (प्रस्थान)
(दो चरों का प्रवेश)
दोनों-महाराज की जय हो।
बाहुबली-बोलो, राज्य के क्या समाचार हैं?
प्रथम-चर-महाराज! सम्पूर्ण-राज्य में शांति है। प्रजाजन ही क्या, पक्षी भी अपने कल-कण्ठों से मधुर-कलरव करते हुए गगन में स्वच्छंद-विचरण करते हैं।
द्वितीय-चर-हर ओर आपकी सुचारु शासन-व्यवस्था के ही गीत गाये जाते हैं। राज्य के प्रत्येक-विभाग से प्रजाजन संतुष्ट हैं। सभी पदाधिकारी प्रजा के सुख-दुःख का पूर्ण-ध्यान रखते हैं।
बाहुबली-अन्न-वस्त्र की कोई कमी तो नहीं है ?
प्रथम-चर-नहीं महाराज! अन्न और वस्त्र से प्रजाजन पूर्ण-सन्तुष्ट हैं।
बाहुबली-कहीं कोई हिंसक-विधान देखने में आया ?
द्वितीय-चर-नहीं महाराज! सम्पूर्ण-प्रजा इतनी सात्त्विक तथा धर्मनिष्ठ है कि सर्वत्र तात्त्विक-चर्चा ही सुनने में आती है।
बाहुबली-उत्कोच की कोई शिकायत ?
प्रथम-चर-उत्कोच! यह तो शासन-व्यवस्था का पहला-दोष है। महाराज! जिस राज्य में उत्कोच स्वीकार करनेवाले राक्षस होते हैं, उसका पतन अवश्यम्भावी है।
बाहुबली-तुमने कोई अन्य-वार्ता भी सुनी है ?
द्वितीय-चर-नहीं महाराज! सर्वत्र सुख और शान्ति के संवाद ही सुनाई पड़ते हैं।
बाहुबली-अच्छा, तुम दोनों जा सकते हो। (प्रस्थान)
(द्वारपाल का प्रवेश)
द्वारपाल-महाराज की जय हो, महाराज! भरत के अमात्य एक संदेश लेकर पधारे हैं।
बाहुबली-कौन ? महाराज भरत के अमात्य ? अच्छा आने दो।
(द्वारपाल का प्रस्थान, भरत के अमात्य ‘दक्षिणांक’ का प्रवेश)
दक्षिणांक-महाराज की जय हो! महाराज-भरत का मांगलिक-संदेश लेकर उपस्थित हुआ हूँ।
बाहुबली-आओ दक्षिणांक! बड़े दिनों में आये, क्या कभी तुम्हें हमारी याद भी नहीं आती ? कहो क्या आज्ञा है महाराज भरत की ?
दक्षिणांक-स्वामी! महाराज भरत षड्खण्ड को विजित करके अयोध्या की ओर लौट रहे हैं, मार्ग में सेना सहित पूज्य-पिताजी एवं मातुश्री के दर्शनकर नेत्र तृप्त किये। अब आपसे मिलने के लिए स्नेह की सरिता उमड़ रही है।
बाहुबली-भाई! तुम्हारे स्वामी की हम पर बड़ी अनुकम्पा है।
दक्षिणांक-महाराज! महाराज-भरत अत्यन्त-उदार हैं। सम्पूर्ण-सेना का आग्रह भी वे नहीं टाल सके। हम लोगों ने महाराज से प्रार्थना की कि जब महाराज बाहुबली अयोध्या पधारेंगे, तब हमें आप दोनों भ्राताओं का सम्मिलन देखने का सुयोग कैसे प्राप्त होगा ? राजमहल में आपकी स्नेहासिक्त-वार्ता को हम अभागे क्यों कर सुन सकेंगे ? ‘चक्रवर्ती’ और ‘कामदेव’ का अनूठा-सम्मिलन देखने का सुयोग कैसे प्राप्त होगा ?
बाहुबली-हाँ दक्षिणांक! ठीक कहते हो। कमल-पत्र पर पड़ी हुई पानी की बूँदें मोती की शोभा को धारण कर लेती हैं। सेना महाराज भरत की है, अतः अवश्य ही अनूठे मानवीय-गुणों से अलंकृत होना चाहिए। लेकिन दक्षिणांक! मैं इस समय अत्यधिक-व्यस्त हूँ। कुछ समय-उपरान्त अयोध्या आकर पूज्य-मातुश्री एवं पूज्य-सहोदर के दर्शन करूँगा।
दक्षिणांक-महाराज! सम्पूर्ण-सेना की अभिलाषा वर्षा के अभाव में नवांकुर की भाँति मुरझा जायेगी। आप दोनों भ्राताओं का विनोद हम किंकरों ने अब तक नहीं देखा है। आपकी अस्वीकृति से हम सभी की कोमल-भावनाओं पर वज्रपात होगा।
बाहुबली-ठीक है, किन्तु इस समय अवकाश नहीं मिल सकेगा।
दक्षिणांक-महाराज! सेवकों की इच्छा है, उसका निर्वाह करना स्वामी पर ही निर्भर होता है। अयोध्या पधारने के लिए तो अधिक-अवकाश की आवश्यकता है। महाराज! हमारी अभिलाषा तो थोड़े से अवकाश से ही पूरी हो जायेगी। महाराज-भरत पोदनपुर के निकट ही विश्राम कर रहे हैं।
बाहुबली-हाँ! हाँ! विश्राम-स्थल तो अत्यन्त-निकट है! किन्तु शासन का भार इस समय इतना बढ़ गया है कि जब सम्पूर्ण-नगर निद्रा की गोद में विश्राम करता है, तब मैं रात्रि की विभूति के रक्षक की भाँति उसके अनंत-तारों की गणना करता हूँ।
दक्षिणांक-नहीं स्वामी! मेरी सम्पूर्ण-आशा व विश्वास पर पानी न उड़ेलिये। मैं महाराज-भरत को मुँह नहीं दिखा सकूँगा। अपने बड़े भाई के दर्शन करना भी जीवन के महत्त्वपूर्ण-कार्य का ही एक अंग है।
बाहुबली-दक्षिणांक! तुम अपने कार्य की सिद्धि में अत्यन्त-निपुण हो। राजनीतिज्ञ-भरत का अमात्य राजनीतिज्ञ ही होना चाहिए। तुम अपनी वार्ता में जिस बात को अब तक छिपाते रहे हो, उसके रहस्य का उद्घाटन मेरे समक्ष तुम्हारे आगमन से पूर्व ही हो चुका है। क्या तुम्हें इसका पता है?
दक्षिणांक-महाराज! दो सहोदर, जिन्होंने समानरूप से माता-पिता का स्नेह-सलिल लूटकर अपने मानसरोवर में संग्रहीत किया हो, उनके सम्मिलन में भी कोई रहस्य हो सकता है ? यह बात मेरे लिए ही नहीं संसार के बड़े-बड़े नीतिज्ञों के लिए भी नयी प्रतीत होगी।
बाहुबली-जहाँ तक माता-पिता के दुलार का संबंध है, यह बात उतनी ही पुरानी है, जितनी यह सृष्टि। किन्तु चतुर दक्षिणांक ! जहाँ वैभव के त्याग की बात है, यह बात उतनी ही नयी है, जितनी एक नवदम्पत्ति की अतृप्त-वासना।
दक्षिणांक-महाराज ! आपके अपार, अगाध-बुद्धि-सागर को मेरे सदृश क्षुद्र-जन्तु कैसे तिर सकता है ? किन्तु स्वामी ! हमारी सूखी हुई भावना-लतायें आपके सम्मिलन से लहलहाने लगेंगी, हमारा तृषा-संतप्त हृदय-पक्षी चहकने लगेगा और एक सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि छोटे भाई के द्वारा बड़े भाई की मर्यादा की रक्षा की जो आदर्श-परम्परा चली आ रही है, उसकी रक्षा हो सकेगी।
बाहुबली-छोटे भाई के द्वारा बड़े भाई की मर्यादा की रक्षा ? यह कैसी अनहोनी बात कर रहे हो दक्षिणांक ? फिर इस समय क्या वे हमारे बड़े भाई हैं ? सेना के सामने एक किंकर की भाँति मुझे बुलानेवाले वे मेरे स्वामी हैं या बड़े भाई ? तुम मुझे बच्चों की तरह फुसलाने का प्रयत्न कर रहे हो ?
दक्षिणांक-आप यह क्या कह रहे हैं, महाराज ! चक्रवर्ती की हार्दिक-इच्छा यहाँ रुकने की अधिक भी नहीं थी, किन्तु आपके सदृश कामदेव के दर्शन करने की हमारी उत्कट-अभिलाषा को वे टाल न सके। महाराज ! क्या आप हमें अपनी दया का पात्र नहीं बनायेंगे। क्या यह हमारे पाप की पराकाष्ठा नहीं होगी।
बाहुबली-मेरी दया की भिक्षा लेकर पुण्यवान् बनने का दंभ करनेवाले दक्षिण! पाप की परिभाषा अपने हृदय से पूछो। मेरे स्वतन्त्र-राज्य की सीमा में आकर चक्र सहसा रुक गया है कि मुझे भी अन्य शक्तिहीन-राजाओं की भाँति पराधीन बनाया जाये। इसलिए तो नगर के बाहर भरत ने सेना-सहित पड़ाव डाला है। तुम अपने चातुर्य के बल पर मेरे प्रवंचन का प्रयास कर रहे हो। बोलो, क्या इसकी सत्यता में सन्देह है ?
दक्षिणांक-इसकी सत्यता में सन्देह उपस्थित करने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है, किन्तु चक्ररत्न को भी दो सहोदरों का अनूठा-सम्मिलन देखने की इच्छा हुई है। सम्राट् ने उसे ताड़ना दी, बलपूर्वक आगे बढ़ाने का प्रयास किया, किन्तु सभी अपमानों को वह महालोभी की भाँति पीकर बैठा है।
बाहुबली-दक्षिणांक! मेरा हृदय तुम्हारे कौटिल्य का दर्पण है, इसे भूलकर तुम मेरे समक्ष अपनी प्रतिष्ठा एवं मर्यादा की हानि कर रहे हो। क्या तुमने अपना सारा जीवन राजनीतिक-कुचक्रों में नष्ट कर दिया है ?
दक्षिणांक-यह राजनीतिक-कुचक्र नहीं महाराज। राजनीतिक-कुचक्रों का संबंध मस्तिष्क से होता है, हृदय से नहीं। यह हम लोगों के हृदय की सच्ची-अभिलाषा है, राजनीतिक-कुचाल नहीं। सम्राट् की उदारता से जितना मैं परिचित हूँ, उतना शायद संसार का कोई व्यक्ति नहीं। वे अनेकबार अपना आधा-राज्य आपको अर्पित करने की इच्छा मुझे प्रगट कर चुके हैं।
बाहुबली-पिता के द्वारा जितना राज्य मुझे सहर्ष दिया गया है, मैं उससे सन्तुष्ट हूँ। राज्य का प्रलोभन देकर किसी के स्वाभिमान को खरीद लेने का व्यापार करनेवाले दक्षिणांक! मेरे हृदय को परखने की चेष्टा मत करो, तुम्हारे हृदय की अभिलाषाओं में कितनी सच्चाई है ?-क्या इसका उत्तर स्वयं तुम्हारा हृदय भी दे सकेगा ?
दक्षिणांक-महाराज! सम्राट् भरत के सहोदर को उत्तर देना इस अकिंचन की क्षमता नहीं है। मैं तो चरणों में मस्तक रखकर विनम्र-विनती करता हूँ।
बाहुबली-गुणों के आगे मेरा हृदय स्वयमेव झुक जाता है दक्षिण! किन्तु मुझे बलपूर्वक अपने चरणों में झुकाने का तुम्हारे स्वामी का सपना असत्य-सिद्ध होगा। श्रेष्ठ-माता के सपूत को एक किंकर की भाँति बुलावा देना क्या उसका तिरस्कार नहीं है ?
दक्षिणांक-महाराज! हमारे स्वामी अपने मन्त्रियों को साधारण-व्यक्तियों के पास नहीं भेजा करते, इसमें स्वयं उनकी प्रतिष्ठा की हानि होती है। महाराज! मेरे आगमन के समय सम्राट् के मन्त्रियों ने आपकी सेवा में अनेक प्रकार की बहुमूल्य-भेंटें भेजी हैं।
बाहुबली-तुम्हारे स्वामी तुम्हें साधारण-व्यक्तियों के पास नहीं भेजते, तो वे तुम्हें असाधारण-व्यक्तियों के समीप इसलिए भेजते हैं कि तुम उन पर कुचक्रों का जाल फैलाओ। अनेक भयावह-सन्देश भेजकर छोटे-भाइयों को तो वनवास दे दिया है, किन्तु मेरी शक्ति का विचार करके तुम्हारे सदृश चतुर-अमात्य को मुझे फँसाने के लिए भेजा है। अपनी चाटुकारिता से बाज आओ दक्षिण! मेरी क्रोधाग्नि अधिक प्रज्वलित नहीं करो, बस यहाँ से चले जाओ।
दक्षिणांक-स्वामी! मैं जा रहा हूँ, मुझे क्षमा कीजिये।
(प्रस्थान)
(‘गुणवसंत’ एवं ‘कलकंठ’ का प्रवेश,
वे नमस्कार न कर बैठ जाते हैं।)
बाहुबली-गुणवसंत! भरत के अमात्य-दक्षिणांक से तुम्हारी भेंट हुई है?
गुणवसंत-महाराज! उनकी आँखों से अविरल-अश्रुपात हो रहा है, गला रुँध गया है, अतः उनसे वार्तालाप न हो सका।
बाहुबली-वह चक्रवर्ती-भरत का सन्देश लेकर हमारे समीप आया था कि मैं जाकर नमस्कार करूँ, क्योंकि वे मुझसे बड़े है। क्या नमस्कार उचित है, कलकंठ?
कलकंठ-महाराज! विनय एवं सम्मान के अनुरोध से तो छोटे-भ्राता का बड़े-भाई को नमस्कार सर्वथा उचित है; किन्तु जहाँ तक राजनीति का संबंध है, यह नमस्कार हमें उसके सिद्धान्तों से गिरा देगा।
बाहुबली-मैंने स्वयं अस्वीकार कर दिया है।
गुणवसंत-ठीक है कलकंठ! जाओ और दक्षिणांक को पुनः बुलाकर लाओ। (प्रस्थान)
बाहुबली-(गुणवसंत से) सम्राट् को सन्देश भेज दिया जाये कि वे अपनी सेना-सहित तैयार रहें।
गुणवंसत-राजनीति तो यही है महाराज! यह लोकनीति नहीं कि मनुष्य हर किसी के समक्ष विनय से झुक जाये।
(कलकंठ एवं दक्षिणांक का प्रवेश)
बाहुबली-(दक्षिणांक से) दक्षिण! सुनो, मैं समझ गया हूँ कि तुम्हारे स्वामी हम पर आक्रमण किये बिना न रहेंगे; किन्तु युद्ध यहाँ नहीं होगा; बल्कि युद्ध वहीं होगा, जहाँ तुम्हारी सेना ने पड़ाव डाल रखा है। तुम्हारे स्वामी को षड्खण्ड जीतने का अभिमान है, उसका प्रदर्शन वे इस कामदेव के सामने रखना चाहते हैं, जाकर कह दो कि इसका निर्णय रणक्षेत्र में होगा। वे अपनी सेनायें सुसज्जित रखें।
दक्षिणांक-जो आज्ञा महाराज! (दक्षिणांक का नमस्कार करके प्रस्थान)
पटाक्षेप
तृतीय-दृश्य
(महाराज भरत का दरबार। दो अमात्य सामने बैठे हैं।)
भरत-बासन्तक! बाहुबली की ओर से क्या समाचार हैं ?
बासन्तक-सम्राट्! महाराज बाहुबली के हठ एवं अभिमान से आप और हम सब परिचित हैं, आपके सन्देश की निर्मल-धारा उनके पाषाण-हृदय पर उसी तरह नहीं टिक सकेगी, जैसे तपते-तवे पर जल की बूँदें।
भरत-तो दक्षिणांक अभी नहीं आये ?
मागध-नहीं महाराज! आ ही रहे होंगे।
(द्वारपाल का प्रवेश)
द्वारपाल-महाराज की जय हो। अमात्यवर-दक्षिणांक पधार रहे हैं।
भरत-जाओ, आने दो।
(द्वारपाल का प्रस्थान, दक्षिणांक का प्रवेश। वह अत्यन्त-उदास, नतमस्तक, झुककर नमस्कार करता है।)
भरत-आओ दक्षिणांक! कुशलतापूर्वक लौटे हो न ?
दक्षिणांक-महाराज! मैं आपके समक्ष मुँह दिखाने योग्य नहीं हूँ, आपके चरणों में जो संकल्प लेकर मैं पोदनपुर गया था, वह पूर्ण नहीं हो सका है। धिक्कार है उस सेवक को, जो स्वामी के कार्य की सिद्धि के बिना ही लौट आया है।
भरत-दक्षिण! इसमें क्षोभ की कोई बात नहीं है। कार्य की सिद्धि पर हमारा कोई अधिकार नहीं है, किन्तु उसकी सिद्धि के लिए भरसक-प्रयत्न करना हमारा अधिकार और कर्तव्य है। क्या बाहुबली को अनुकूल बनाने में तुम्हारे प्रयत्न में कोई कमी रही ? दक्षिणांक-सम्राट्! उनको अनुकूल बनाने में मैंने कोई कसर नहीं उठा रखी। स्वामी मैंने अति-विनयपूर्वक राजनीति, धर्मनीति एवं लोकनीति से हर-प्रकार उन्हें यहाँ लाने का प्रयत्न किया। आपमें और उनमें कोई भेद न रखकर भक्ति की पराकाष्ठा कर दी। जिन लोगों ने मेरी वार्ता सुनी, सबके हृदय मोम की भाँति पिघलकर पानी हो गये, किन्तु महाराज बाहुबली के पाषाण-हृदय को समझने में मैं सर्वथा असमर्थ रहा। मेरी सफलता के इतिहास में यह बात कलंक बनकर मेरे हृदय में काँटे की भाँति कसक उत्पन्न करती रहेगी।
भरत-इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है दक्षिण! बाहुबली के हठ एवं अभिमान से मैं अच्छी तरह से परिचित हूँ, आज वह बड़े भाई को नमस्कार करने में अपना अपमान समझने लगा है। एक छोटे-से राज्य का ऐसा अभिमान ? धिक्कार है उसकी बुद्धि की जड़ता को। और भी कोई समाचार है ? दक्षिणांक-महाराज! एक बार गहरी-ताड़ना देकर उन्होंने मुझे लौटा दिया, पश्चात् पुनः कलकंठ को बुलाने के लिए भेजा। मैं पुनः उनकी सेवा में उपस्थित हुआ। बाहुबली कहने लगे कि ‘‘मैं समझ गया हूँ कि तुम्हारे स्वामी हम पर आक्रमण किये बिना न रहेंगे, किन्तु उन्हें यहाँ आने की आवश्यकता नहीं है। मैं स्वयं आकर उनसे मिलूँगा। उन्हें षट्खण्ड जीतने का अभिमान है। उनसे कह देना इसका निर्णय रणक्षेत्र में होगा, अपनी सेनायें सुसज्जित रखें।’’ इतना कहकर उन्होंने अपने मन्त्रियों को आज्ञा दी कि ‘‘भरत का कोई भी व्यक्ति मेरे नगर की सीमा में पैर न रखने पावे।’’
भरत-मैं उसके अभिमान को एक-क्षण में मिट्टी के खिलौने की भाँति टूक-टूक कर दूँगा। वह समझता है कि उसका शरीर मुझसे अधिक ऊँचा है, किन्तु मैं एक ही अँगुली में उसे चक्र की भाँति घुमा दूँगा। किन्तु मुझे विचार आता है दक्षिण! छोटे भाई पर शक्ति का प्रदर्शन धर्मनीति के कहाँ तक अनुकूल है? क्या संसार की दृष्टि में मेरा यह कार्य उचित होगा? सोचता हूँ, यदि भाई के स्थान पर कोई दूसरा होता, तो केवल अपने भृकुटि-विक्षेप से उसे यमलोक पहुँचा देता; किन्तु सहोदर के हृदय को इस तरह से त्रस्त करना कहाँ तक उचित होगा? वह नादान है, तो क्या मैं भी अपने विवेक का परित्याग कर दूँ? अमात्य-वृन्द! आप लोग चिन्ता न कीजिए, मैं किसी भी प्रकार से उसे जीत लूँगा। दक्षिण! उठो और अपना यह पुरस्कार स्वीकार करो।
(पुरस्कार देते हैं)
दक्षिणांक-(खड़ा होकर नमस्कार करता है और कहता है) सम्राट्! मैं इस पुरस्कार के लिए सर्वथा-अयोग्य हूँ, मेरा हृदय साक्षी नहीं देता।
भरत-नहीं दक्षिण ! इसे मेरा आग्रह समझकर स्वीकार करो। कुछ अन्यथा-विचार मत करो और सम्पूर्ण-चिन्ता और विषाद से मुक्त होकर विश्राम करो। (दोनों मन्त्रियों की ओर झुककर) अमात्यवर ! अब हम लोग विश्राम करें। चलिये।
(सबका प्रस्थान)
पटाक्षेप
चतुर्थ-दृश्य
(दो विद्याधर रात्रि को शयन-कक्ष में विश्राम कर रहे हैं। अचानक दोनों की नींद खुल जाती है और अर्द्धरात्रि को दोनों वार्तालाप प्रारम्भ करते हैं।)
प्रथम-भाई ! करवट बदलते-बदलते आधी रात हो गई। आज तो नींद ही नहीं आती।
द्वितीय-भाई ! मेरा भी यही हाल है। सर्वत्र सन्नाटा छाया हुआ है। वृक्ष का एक पत्ता भी नहीं हिलता।
प्रथम-भरत की सारी सेना तरंग-रहित समुद्र की भाँति निद्रादेवी की गोद में विश्राम कर रही है। पक्षी अपने घोंसलों में सोये हुए हैं, केवल हम दोनों रात्रि के प्रहरी की भाँति जाग रहे हैं।
द्वितीय-अरे नहीं ! नहीं ! तुम मेरी बात समझते ही नहीं। तुम तो उसे यों उड़ा देते हो, जैसे एक तिनके को भीषण-आँधी।
प्रथम-अच्छा भाई ! कुछ कहो तो, या यूँ ही भूमिका बाँधते रहोगे।
द्वितीय-अच्छा सुनो ! एक-एक बिन्दु मिलकर बड़ा भारी सागर बनता है, एक-एक तार मिलकर मोटी-रस्सी बन जाती है।
प्रथम-और एक-एक ईंट से मिलकर बड़ा भव्य-भवन खड़ा हो जाता है।
द्वितीय-हाँ ठीक, बिल्कुल ठीक। इसीप्रकार चक्रवर्ती की महिमा बड़ी है। सेना न हो, तो चक्रवर्ती की बात भी न पूछे।
प्रथम-हाँ भाई ! मैं समझ गया कि यह दुनियाँ वास्तव में कितनी पागल है। लड़ती सेना है और कहती है ‘‘राजा लड़ रहा है।’’ जीत सेना की होती है और कहती है “राजा जीता।”
द्वितीय-वाह भाई ! वाह, मैं तो समझता था कि तुम भी गोबर-गणेश ही हो, पर तुम तो बड़े बुद्धिमान् निकले। अब मेरी बात सुनो, हाथी, घोड़ा आदि सेनाओं को संग्रह करके चक्रवर्ती दुनिया के सामने बड़े शक्तिशाली बन बैठे हैं; पर सेना न हो, तो भी हमारी ही तरह साधारण से मनुष्य ही तो हैं। क्या अन्तर है उनमें और हम में ?
प्रथम-कुछ अन्तर नहीं भाई ! पर दुनियाँ तो दोगली होती है, चींटी तो उधर ही जाती है, जिधर गुड़ होता है। तुम और हम भी तो विद्याधर हैं, अपनी शक्ति कौन चक्रवर्ती से कम है।
द्वितीय-बस, ठीक है, बिलकुल ठीक। अब तुम पूरी तरह समझ गये हो। अच्छा तो अब रात्रि बहुत हो गयी, थोड़ी झपकी ले लें।
प्रथम-अरे। झपकी लेने चले, पर यह बात अगर चक्रवर्ती ने सुन ली होगी, तो ?
द्वितीय-अरे नहीं सुना, चक्रवर्ती अपने महल में सो रहे हैं, यहाँ कहाँ अपनी बात सुनने आ गये। जैसे हमारे कान हैं, वैसे उनके कान हैं। तुम तो पाँव पसारकर बेफिक्री से सो जाओ।
(दोनों ओढ़कर सो जाते हैं।)
पटाक्षेप
पंचम दृश्य
( भरत का दरबार। महाराज-भरत राजसिंहासन पर राजसी-वस्त्रों से सुशोभित बैठे हैं, मन्त्री, मित्र, प्रजाजन आदि भी यथास्थान बैठे हैं।)
पहला मंत्री (बासन्तक)-महाराज ! आपने हमें आदेश दिया था कि बाहुबली के संबंध में किसीप्रकार की चिन्ता न करना। सो हम तो चिन्तामुक्त हो गये हैं, किन्तु आप ही बहुत चिन्ताग्रस्त प्रतीत हो रहे हैं।
भरत-अमात्यवर ! मुझे बाहुबली की तनिक भी चिन्ता नहीं है, किन्तु आज रात को निद्रा में कनिष्ठा-अंगुली की नस अकड़ गयी है, अतः अँगुली सीधी ही नहीं होती।
दूसरा मंत्री (मागध)-महाराज ! संसार में अधिकांश-लोगों के शरीर और व्यवहार में वक्रता होती है, किन्तु आपके तो शरीर और व्यवहार में किसी भी प्रकार की वक्रता नहीं है। यह अँगुली का टेढ़ापन हमें आश्चर्य में डाल रहा है।
बासन्तक-महाराज ! हम आपका कष्ट दूर करने के लिए प्राणों की भी चिन्ता नहीं करते। ऐसे स्वामी की सेवा के लिए अपने-अपने प्राणों को न्योछावर कर देना भी जीवन की सफलता है। जरा अँगुली तो बताइये सम्राट्।
(मन्त्री हाथ लगाकर देखता है, अन्य मंत्री, मित्रादि एकत्रित हो जाते हैं और सम्राट् की अँगुली को हाथ लगाकर देखते हैं, सम्राट् अत्यधिक-वेदना की चेष्टा करते हैं। मन्त्री बासन्तक, दूसरे मंत्री मागध को आज्ञा देते हैं; मागध जाता है और अंगवैद्यों व राजवैद्यों को बुलाकर लाता है और सम्राट् की अँगुली पर औषधि का प्रयोग करते हैं, सम्राट् उसी वेदना का अभिनय करते हैं।)
भरत-वैद्यवृन्द! आपकी औषधि कभी किसी रोग पर असफल नहीं होती, किसी चतुर-धनुर्धर की भाँति रोग आपका निशाना बन जाता है; किन्तु मुझे स्वयं आश्चर्य हो रहा कि इस छोटे से रोग पर ये बड़ी-बड़ी औषधियों के प्रयोग भी क्यों असफल हो रहे हैं और मेरे अंगवैद्य! आज तुम्हें भी क्या हो गया है ?
(सभी नतमस्तक हो जाते हैं)
अमात्यवृन्द! अब यों काम न चलेगा, सभी मन्त्रवादी एवं पहलवानों को बुला लाओ।
(बासन्तक मागध को आज्ञा देते हैं)
बासन्तक-मागध! जाओ और सभी मन्त्रवादी और पहलवानों को बुलाकर लाओ।
(मागध जाता है, कुछ समय में मन्त्रवादी और पहलवानों को बुलाकर लाता है।)
भरत-(मन्त्रवादियों से) आप लोगों की प्रबल मन्त्र-शक्तियों की मैंने बड़ी प्रशंसा सुनी है। अब आप मन्त्रों के प्रयोग इस छोटी-अंगुली पर आरम्भ कीजिए। (पहलवानों से) और मेरे शक्तिशाली पहलवानो! तुम्हारे प्रबल मुष्ठि-प्रहार से मदोन्मत्त-हाथियों के मद भी गल जाते हैं, तो इस छोटी-सी अंगुली को सीधा करना तो तुम जैसे शक्तिशाली-लोगों के लिए क्या कठिन काम है ? आओ और अपनी सम्पूर्ण-शक्ति से सीधा करो।
(पहलवान आते हैं और अँगुली पर बल प्रयोग करते हैं, पर अँगुली सीधी नहीं होती तथा सम्राट् वही तीव्र-वेदना का अभिनय करते हैं।)
भरत-मन्त्रिवर। यों काम न चलेगा। तुम एक मोटी लोहे की सांकल तैयार कराओ। मैं अँगुली को उससे बाँध दूँगा और फिर समस्त सेना एवं प्रजाजन बलपूर्वक साँकल को खींचे, फिर देखता हूँ यह छोटी-सी अँगुली कैसे सीधी नहीं होती है ?
(बासन्तक विश्वकर्मा को साँकल लाने का आदेश देता है)
बासन्तक-विश्वकर्मा ! जाओ और साँकल लाओ।
(विश्वकर्मा जाकर साँकल लाते हैं, भरत साँकल से अँगुली बाँध लेते हैं, फिर सारी सेना एवं प्रजाजनों को खींचने का आदेश देते है, पर अँगुली सीधी नहीं होती।)
भरत-नहीं, यह तरीका ठीक नहीं है; एक काम और करें, मैं साँकल को अपनी ओर खींचता हूँ और आप सब अपनी ओर खीचें, तब तो अँगुली अवश्य ही सीधी हो जायेगी। (साँकल को अपनी ओर खींचते हुए) हाँ खींचो। अरे ! तुम सबका बल कहाँ चला गया ? अपनी सम्पूर्ण-शक्ति लगाकर खींचो। (सभी खींचते हैं तथा सबके मुँह से बल-प्रयोग की ध्वनि निकलती है, भरत अँगुली को एकबार स्वाभाविकरूप में अपनी ओर खींचते हैं और सभी लोग मुँह के बल गिर पड़ते हैं, भरत हँस देते हैं।)
बासन्तक-महाराज! यह कोई छोटी-मोटी व्याधि नहीं है। यह हम जैसे शक्तिहीन-लोगों के बस की बात नहीं है, अब आप ही इसे सीधा कीजिए। दूसरों से यह रोग दूर नहीं होता। (भरत साँकल से अंगुली निकालकर सीधी कर लेते हैं। लोग आश्चर्य में डूब जाते हैं, सभी सम्राट् भरत का जयघोष करते हैं।)
बासन्तक-सम्राट्! आपके पराक्रम के आगे आज हम सबका गर्व इसप्रकार चूर हो गया है, जैसे चक्की के दो पाटों के बीच में अनाज पिस जाता है। कृपा करके यह बताइये कि यह लीला करने का अवसर आज क्यों उपस्थित हुआ है?
भरत-मन्त्रीवर। क्या इसका कारण स्पष्ट होना ही चाहिए? इससे क्या लाभ होगा?
बासन्तक-महाराज। सम्पूर्ण सेना एवं प्रजाजनों की उत्कण्ठा बढ़ रही है, कृपा करके उनकी उत्कण्ठा शान्त कीजिए।
(दो विद्याधरों का प्रवेश)
दोनों-चक्रवर्ती सम्राट् भरत की जय हो।
भरत-प्रिय विद्याधरो! आओ, कहो आज यहाँ कैसे आना हुआ?
विद्याधर-सम्राट्! हमारे अपराध क्षमा कीजिये।
भरत-अपराध! तुमने क्या अपराध किया है भाई?
विद्याधर-महाराज! आपके अतुल-पराक्रम का परिज्ञान न होने के कारण हमसे आपकी अवज्ञा हुई। हमें क्षमा कर दीजिये सम्राट्!
भरत-तो कल रात्रि के तीसरे-पहर उत्तर-दिशा की ओर तुम्हीं सारी दुनियाँ को पागल बना रहे थे कि ‘‘शक्ति तो सेना की ही होती है और दुनियाँ कहती है कि राजा बड़ा शक्तिशाली है ।’’ क्या यह तुम्हीं ने कहा था कि ‘‘सेना न हो, तो कोई चक्रवर्ती की बात भी न पूछे ?’’
विद्याधर-हाँ सम्राट् ? हमने घोर-अपराध किया है, हमें क्षमा कर दीजिये।
भरत-तुम्हें ऐसा अविवेकपूर्ण-कार्य नहीं करना चाहिए था । सेना राजा का एक शस्त्र अवश्य होती है, किन्तु उस शस्त्र के संचालन की क्षमता राजा में ही होती है । यदि राजा में पराक्रम न हो, तो थोड़े ही समय में शासन-सूत्र ढीला होकर राज्य में अराजकता फैल जाती है।
विद्याधर-यह बिलकुल-सत्य है महाराज ! सामान्य-राजा ही इतना पराक्रमी होता है, फिर चक्रवर्ती की तो बात ही क्या ? चक्री तो असाधारण-मानव होते हैं । आज आपकी कनिष्ठा-अँगुली के कौतूहल प्रदर्शन की चर्चा सुनकर मनुष्य क्या, देव भी चकित हो रहे हैं।
(प्रतिहारी का प्रवेश)
प्रतिहारी-महाराज की जय हो । राजमाता अँगुली की चर्चा सुनकर अत्यन्त-विह्वल हो रही हैं । शीघ्र पधारकर उन्हें सान्त्वना प्रदान कीजिये।
भरत-ठीक है, जाओ, हम आ रहे हैं । अच्छा, अब मैं मातुश्री के शीघ्र दर्शन करना चाहता हूँ । आप सब अपने-अपने स्थान पर पधारकर विश्राम करें।
(सबका प्रस्थान)
षष्ठम-दृश्य
(भरत, दरबार में मन्त्री एवं मित्रों के साथ बैठे हैं ।)
भरत-बाहुबली को अपने बल का कितना अभिमान हो गया है, माता एवं रानियाँ समझा-समझाकर थक गयीं, किन्तु यह कब मानने चला है ? क्या विवेक भी रूठ गया उससे?
बासन्तक-सम्राट्! अभिमान और विवेक में अग्नि और ईंधन जैसी शत्रुता है। भला जिसका पतन अवश्यम्भावी हो, वह अभिमान के शिखर पर न चढ़ेगा, तो नीचे गिरेगा कैसे ?
(एक चर का प्रवेश)
चर-महाराज की जय हो। महाराज ! बाहुबली युद्ध के लिए पधार आये हैं।
भरत-ठीक है, युद्ध के अस्त्रों के विषय में सुना क्या तुमने?
चर-महाराज! युद्ध कुसुमास्त्रों से नहीं लोहास्त्रों से होगा।
बासन्तक-सम्राट्! युद्ध लोहास्त्रों से होगा, किन्तु चक्रवर्ती और कामदेव का तो युद्ध में बाल भी बाँका नहीं हो सकता, क्योंकि वे चरम-शरीरी हैं। असंख्य-सेना का वृथा-संहार होगा सम्राट्! इस पर विचार होना चाहिए।
भरत-तो तुम्हारी क्या इच्छा है अमात्य!
बासन्तक-महाराज! यदि सेनाओं में लोहास्त्र से युद्ध होगा, तो प्रलयकाल के दृश्य उपस्थित होंगे। युद्ध को धर्म का रूप दे दिया जाए-ऐसी हम सभी की प्रार्थना है।
भरत-ठीक है, लोकादर्श को गिरानेवाले इस सहोदर-युद्ध का फल निरपराध-सैनिकों को क्यों भोगना पड़े, दोनों ही सहोदर उसे क्यों न भोगें ? किन्तु इसका निर्णय मैं नहीं कर सकता, बाहुबली से जाकर पूछो। वे जो भी निर्णय करें, हमें स्वीकार होगा। मागध! प्रजाजन को लेकर बाहुबली के पास जाओ और शीघ्र ही युद्ध के निर्णय से हमें सूचित करो।
(मागध का प्रस्थान)
बासन्तक-महाराज! सम्पूर्ण-सेना एवं प्रजा में युद्ध के समाचार से खलबली मच गयी है। चक्रवर्ती की सेना, जिसने कभी यह नहीं जाना कि पराजय क्या होती है, आज युद्ध के नाम से उसे रोमांच हो गया है।
भरत-अमात्य! सैनिकों का तो युद्ध ही जीवन होता है। इसमें भय की कौन-सी बात है ? फिर चक्रवर्ती की सेना को तो पराजय की कल्पना भी नहीं करनी चाहिए।
बासन्तक-पराजय की कल्पना भी तो मानसिक-पराजय है सम्राट्! किन्तु भाई-भाई का यह युद्ध न्यायोचित नहीं है महाराज! भीषण-रक्तपात होगा ही, किन्तु सबसे बड़ा दुष्परिणाम तो यह होगा कि लोक में भ्रातृ-स्नेह की पावन-परम्परा ही समाप्त हो जायेगी।
(मागध का प्रवेश)
भरत-कहो मागध! सकुशल लौट आये, क्या निर्णय किया बाहुबली ने ?
मागध-स्वामी! महाराज बाहुबली ने धर्मयुद्ध सहर्ष स्वीकार कर लिया है। प्रथम ‘दृष्टि-युद्ध’ होगा, दूसरा ‘जल-युद्ध’ एवं तीसरा ‘मल्ल-युद्ध’ होगा।
(सब चले जाते हैं, केवल भरत रह जाते हैं।)
भरत-(स्वगत) सहोदर के साथ धर्म-युद्ध भी कैसे किया जाये। उसके हाथ-पैर बाँधकर छोटी-माँ के पास क्यों न भेज दूँ? नहीं! नहीं! सेना के सामने अपना अपमान देखकर वह घर में नहीं रहेगा, दीक्षा के लिए निकल जायेगा। अन्य-सहोदरों की भाँति इसको भी खोना पड़ेगा और भ्रातृ-स्नेह से वंचित होकर मेरा यह जीवन क्या भू पर भार नहीं हो जायेगा? ओह! लोग मुझे कुटुम्ब-द्रोही कहेंगे। नहीं! नहीं! यह अधम-कृत्य मुझसे नहीं होगा। हे अन्तरात्मा! इसका उपाय आप ही बताओ। (कुछ ठहरकर जैसी किसी की बात सुन रहा हो) अच्छा। (हँसकर) ऐसी बात है। ठीक है, समझ गया मैं। हे सिद्धान्त! ऐसी विकट-घड़ियों में आप ही मेरे रक्षक रहे हैं।
(मन्त्री मागध का प्रवेश, वह भरत को नमस्कार करता है।)
मागध-महाराज! बाहुबली युद्ध के लिए सन्नद्ध खड़े हैं, आपकी प्रतीक्षा की जा रही है।
भरत-अच्छा! चलो। (उठकर खड़े हो जाते हैं।)
मागध-स्वामी! महाराज बाहुबली एक मल्ल की भाँति युद्ध के लिए लंगोट लगाकर खड़े है और आप इसप्रकार कैसे पधार रहे हैं? महाराज! आपकी शक्ति अतुल्य है, किन्तु युद्ध में तो पूर्ण-सुसज्जित होकर ही जाना चाहिए।
भरत-तुम चिन्ता न करो मागध। मेरी पराजय नहीं होगी। चलो चलें।
(प्रस्थान)
पटाक्षेप
—## सप्तम-दृश्य
( भरत एवं बाहुबली युद्धक्षेत्र के लिए दो पर्वतों की भाँति तैयार खड़े हैं। दोनों के मन्त्री, प्रजा एवं सेना आदि आश्चर्यचकित-नेत्रों से चक्रवर्ती एवं कामदेव को देख रहे हैं। युद्ध की रणभेरी बज रही है, तभी रणभेरी बन्द करने की आज्ञा देते हैं।)
भरत-अमात्यवर ! रणभेरी बन्द कर दी जाये।
(अमात्य सैनिकों को रणभेरी बन्द करने का आदेश देते हैं।)
भरत-(बाहुबली से) प्रिय सहोदर ! आज तुम्हारे और मेरे बीच युद्ध का यह अवसर क्यों उपस्थित हो रहा है, क्या तुमने इस पर विचार किया है ? भाई ! तुमने तो मेरा कोई अपराध नहीं किया, किन्तु बोलो तो क्या मुझसे कोई अपराध हुआ है ? क्या तुमसे कर-वसूल करने के लिए मैंने कभी अपने दूतों को तुम्हारे राज्य में भेजा है ? क्या मेरे मन्त्री या प्रजाजनों ने कभी तुम्हारा तिरस्कार किया है ?
भाई ! मन में ऐसा विचार न करना कि युद्ध से डरकर मधुर-मधुर बातों से तुम्हारे प्रवंचन का प्रयास कर रहा हूँ । युद्ध तो करेंगे ही किन्तु युद्ध से पूर्व सम्भावित-प्रश्नों के समाधान से तुम्हारा और मेरा हृदय इतना स्वच्छ हो जाना चाहिए कि यह युद्ध वास्तव में सदा के लिए धर्मयुद्ध का आदर्श बन जाए।
बाहुबली-युद्ध का अवसर मैंने उपस्थित नहीं किया, वह तो आपने उपस्थित किया है । पिताश्री के द्वारा जो राज्य मुझे दिया गया है, उसके उपभोग का अधिकार मुझे है । आपने उसे हड़पने का प्रयत्न क्यों किया ? यदि नहीं, तो दक्षिणांक जैसे कूटनीतिज्ञ को मेरे पास भेजने में आपका क्या उद्देश्य था ?
भरत-भाई! मैं तुमसे थोड़ा बड़ा हूँ, अतः मैंने तुम्हें अपने पास बुलवाया। यदि तुम मुझसे बड़े होते, तो मैं तुम्हारे पास आता। छोटा-भाई बड़े-भाई के पास जाये तो क्या अनुचित लगता है? भाई! तुम मेरे शत्रु हो या मैं तुम्हारा शत्रु हूँ, इतना क्रोध किसलिए कर रहे हो ?
बाहुबली-अपनी छोटी-अँगुली को टेढ़ा करने का जो नाटक आपने किया था, उससे आपका उद्देश्य मुझे डराने के अतिरिक्त क्या हो सकता है ? मैं युद्ध के लिए कटिबद्ध हूँ, आपके लिए केवल दो ही मार्ग हैं, आगे बढ़कर युद्ध करो या पराजय स्वीकार करो।
भरत-आज दो सहोदरों के युद्ध का तमाशा देखने के लिए यह दुनिया खड़ी है। भगवान् आदिनाथ के पुत्र आज एक दूसरे के प्राणों के ग्राहक बन रहे हैं। क्या हमारा इक्ष्वाकु-कुल हमारे इन कृत्यों से कलंकित न होगा? भाई! क्या लोग यह न कहेंगे कि आज ये कपूत त्रैलोक्य-शिरोमणि भगवान् आदिनाथ के पावन-कुल को कलंकित करने जा रहे हैं, भ्रातृ-स्नेह की पावन-संतति को आज हम भस्मसात् कर रहे हैं-यह अपने कुल के लिए ही नहीं, किन्तु विश्व के प्रति हमारा महान्-अपराध न होगा?
भाई! मुझे इस चक्ररत्न की तनिक भी अभिलाषा नहीं, यह स्वतः युद्धशाला में उत्पन्न हो गया और इसने मुझे सम्पूर्ण-पृथ्वी में भटकाया है। भाई! तनिक मेरी ओर तो देखो, मैं तुम्हारा शत्रु नहीं हूँ। लो, यह सम्पूर्ण-राज्य (सेना की और संकेत कर) तुम सम्भालो। मैं षट्-खण्ड की विजय करके आया हूँ, तुम्हीं इसके स्वामी हो ? (बाहुबली अत्यन्त-लज्जित होकर मुँह सीधा कर लेते हैं व नतमस्तक खड़े हो जाते हैं।)
भरत-(चक्र की ओर मुँह करके) ओ चक्र-पिशाच! अब मुझे तुम्हारी आवश्यकता नहीं है। तुम्हारे स्वामी अब बाहुबली है, इनकी आज्ञा में प्रवर्तन करो। अरे निर्लज्ज ! अपने स्वामी के चरणों में जाकर क्यों नहीं झुकता। ( चक्र को ठोकर मारते हैं।)
(बाहुबली से) भाई ! अब शांत हो जाओ। यदि युद्ध की बात सोचें, तो तीनों ही युद्धों में तुम्हारी विजय है। तुम मुझसे ऊँचे हो, अतः ‘दृष्टि-युद्ध’ में तो मेरी आँखों को ऊपर देखते-देखते थककर हारना ही पड़ेगा। ‘जल-युद्ध’ में भी तुम सरलता से मेरे ऊपर पानी उछालकर मुझे पराजित कर दोगे और मल्ल-युद्ध में भी तो प्रत्यक्ष ही तुम्हारी विजय निश्चित है। अब मुझे क्षमा कर दो भाई ! आज सब लोगों की साक्षी में मैं हारा और तुम्हारी विजय हुई।
बाहुबली-(अत्यन्त-विनय पूर्वक भरत की ओर मुँह करके) मुझे जीवनदान देनेवाले आत्मवेत्ता भ्राता ! मैंने आपके ऊपर काँटे बरसाये, किन्तु आपने मुझ नीच पर फूलों की वर्षा की। ओह ! मैं कितना अधम हूँ। यह मस्तिष्क आपके विशाल हृदय-सागर को नहीं माप सका। पूज्य ! मुझ अधम को क्षमा कर दीजिए।
भरत-भाई ! दुःखी न होओ, तुमने कोई अपराध नहीं किया।
बाहुबली-नहीं ! मेरा हृदय साक्षी नहीं देता। मैंने घोर-अपराध किया। यह पाप तो धोना ही पड़ेगा। मेरी एक इच्छा है, पूज्य। आप उसे स्वीकार कीजिए।
भरत-क्या संकोच हो रहा है भाई। निःसंकोच कहो।
बाहुबली-मुझे दीक्षा-ग्रहण करने की अनुमति प्रदान कीजिए, मैं तपोवन में जाऊँगा।
भरत-यह एक बात छोड़कर और कोई बात हो तो कहो भाई !
क्या मुझे संसार के कोई कष्ट भोगने के लिए अकेले छोड़ जाना चाहते हो। युद्ध में तुम्हारी पराजय नहीं हुई है, जिससे इतने उदासीन हो गये हो। आज तो प्रसन्नता की बातें करो।
बाहुबली-आप महान् हैं, भ्राता! मेरी पराजय का मेरा हृदय साक्षी है। मेरी निष्ठुरता से चक्ररत्न भी मेरे समीप न आ सका। मुझे अपने दुष्कृत्यों का प्रायश्चित कर लेने दीजिए।
भरत-नहीं भाई! मुझे अप्रसन्न करना तुम्हारा कर्त्तव्य नहीं है, मुझे प्रसन्न करके ही जा सकोगे।
बाहुबली-पूज्य-भ्राता! मैं दीक्षा लेकर मोक्ष-मन्दिर में आपकी प्रतीक्षा करूँगा। अब तक आपके संरक्षण में था, अब पिताजी के संरक्षण में कैलाश पर जा रहा हूँ। ओह! यह संसार कितना क्षणभंगुर है। इस क्षणिक-ऐश्वर्य पर मैंने कितना मिथ्या-अभिमान किया। अपने स्वरूप को भूलकर बहुत दूर भटक गया हूँ मैं, मुझे अपना दिव्य-प्रकाश दो भाई, मैं घोर-अन्धकार में ठोकरें खा रहा हूँ। बस, मुझे दीक्षा की अनुमति प्रदान कीजिए। मुझे अब सांसारिक-सुखों की लालसा नहीं रही।
भरत-नहीं, तुम और मैं कुछ समय राज्य-शासन व्यवस्थित करके दीक्षा लेंगे। मैं तुम्हारे भरोसे हूँ, पर तुम मुझे छोड़कर पहिले ही जा रहे हो। अभी कुमार महाबल भी तो राज्य संभालने योग्य नहीं हुआ है।
बाहुबली-भ्राता! कुमार महाबल नहीं, तो कुमार अर्ककीर्ति तो सर्वप्रकार शासन के योग्य है। यह मेरा राज्य उसे संभला दीजिए, मैं अब इस संसार में नहीं रह सकूँगा। भ्राता! मुझे आज्ञा दीजिए।
(बाहुबली भरत के चरणों में मस्तक रख देते हैं, भरत के नेत्रों से धाराप्रवाह अश्रुपात हो रहा है।)
भरत-उठो भाई ! मेरा यह निर्बल-हृदय तुम्हारा वियोग सहन नहीं कर सकेगा; किन्तु कल्याण के पथ पर जा रहे हो भाई । जाओ ।
(बाहुबली अपने पुत्र महाबल कुमार को भरत के चरणों में झुका देते हैं और स्वयं भरत को नमस्कार कर सबसे क्षमा माँगकर दीक्षा के लिए चले जाते हैं।)
भरत-ओह ! अमात्य ! मेरी राज्य-लिप्सा के कारण मेरे सभी सहोदरों ने वनवास ले लिया है । क्या अब साधारण-लोगों की दृष्टि में यह चक्रवर्ती हीन-दृष्टि से नहीं देखा जायेगा ? आज में सहोदर-स्नेह से वंचित होकर राजप्रासादों में क्या करूँगा।
बासन्तक-महाराज ! आज आप मानसिक-वेदना से बहुत थक चुके हैं । सम्पूर्ण सेना एवं प्रजाजन शोकसागर में डूब रहे हैं । यह संसार की विविधता है महाराज ! मनुष्य जैसी सोचता है वैसा नहीं होता । अब चिन्ता का परित्याग करके प्रासाद में पधारिये।
(सबका प्रस्थान)
पटाक्षेप
अष्टम दृश्य
(जंगल में होकर बाहुबली दीक्षा के लिए पधार रहे हैं । वैराग्य में डूबे हैं, पीछे से भरत के दो महाभक्त ‘कुटिलनायक’ एवं ‘शट-नायक’ जाकर उन्हें महा-अपमान भरे शब्द कहते हैं । बाहुबली खड़े-खड़े सुनते हैं।)
कुटिलनायक-हे भाग्यफूटे बाहुबली! सुनो, हमारे स्वामी षट्खण्ड के विजेता भरत को नमस्कार करके तुम सुख से न रह सके। अब भिक्षा के लिए तो भरत के दरबार में ही आना पड़ेगा। सोने के लिए, खाने के लिए, बैठने, उठने और तपश्चर्या के लिए भरत के राज्य के अतिरिक्त दूसरा-स्थान तुम्हें कहाँ है? राज्य में रहकर सुख भोगना तो तुम्हारे भाग्य में नहीं लिखा। अब भटक-भटककर टुकड़े माँग-माँगकर खाने का समय आ गया है। भाई से विद्रोह करने का फल इसी जन्म में चखो।
शटनायक-(व्यंग्य से) पधारो राजन्! पधारो, भीख माँगकर भोजन करो। घास और काँटों से भरे जंगलों में सोओ। अब तुम्हारी दशा बिगड़ने का समय आया है। हमारे स्वामी का तिरस्कार करके कभी सुख से रह नहीं सकते।
बाहुबली-और कहो शटनायक! क्या इतने से ही मेरी परीक्षा कर चुके? और मित्र कुटिलनायक! तुम्हारे यह वचन मेरी वैराग्य की वज्र-दीवार भेदकर मेरे हृदय में प्रविष्ट न ही हो सके। तुम्हारे ये अग्निबाण मेरे वैराग्य-सागर में डूब कर शांत हो गये हैं। और बोलो, क्या कहना चाहते हो?
कुटिलनायक-कुछ नहीं! तुम्हारे मान का मर्दन करना था और वह हो गया। भरत की भूमि में ही अब तुम्हें अपनी सारी चर्या करनी पड़ेगी और कोई स्थान नहीं है संसार में तुम्हारे लिए। जाओ।
पटाक्षेप
—## नवम-दृश्य
(विपिन-तपोवन में बाहुबली तपस्या कर रहे हैं। एक वर्ष हो गया है, पैरों के ऊपर मिट्टी की मोटी तहें जम गयी हैं, जिनमें सर्पों ने बांबियाँ बना ली हैं। सम्पूर्ण-शरीर पर वन-लताएँ छा गयी हैं। फिर भी तपश्चर्या में रत हैं, मानों पत्थर की प्रतिमा खड़ी हो, इससमय भरत सम्बोधन के लिए पधारते हैं।)
भरत-(दूर से ही) भुजबली-योगेश्वराय नमो नमः (पास जाकर चरणों में मस्तक रख देते हैं और पास ही खड़े होकर विनम्र-शब्दों से निवेदन प्रारम्भ करते हैं।) हे योगीराज ! आपके मन में जिस बात का क्षोभ है, वह अभी मैं त्रिलोकदर्शी भगवान् आदीश्वर से जानकर आया हूँ; किन्तु योगीराज ! कैसी छोटी-सी बात में आप अटक गए हैं। इस पृथ्वी को आप मेरी समझ रहे हैं, यह कैसी आश्चर्य की बात है। जिस पृथ्वी को अनेक-राजाओं ने भोग लिया है, जिस पर अभी मेरा शासन है और भविष्य में किसी अन्य का शासन होगा। ऐसी वेश्या-सदृश इस भूमि को आप मेरी समझ रहे हैं। क्या यह बात आप जैसे ज्ञानसागर के लिए योग्य है ? गुरुदेव ! विचार कीजिए, इस बात को गुप्त रखने की क्या आवश्यकता है कि जिससमय मैं षट्खण्ड विजय करके वृषभादि-पर्वत पर निजशासन लिखने गया, तब मेरा शासन लिखने के लिए मुझे पर्वत पर स्थान न मिला। सारा पर्वत पूर्व-चक्रवर्ती राजाओं के शासन-लेखों से भरा हुआ था। तब मुझे एक राजा का शासन-लेख मिटाकर अपना शासन होने पर भी लेख लिखना पड़ा। इस पृथ्वी पर मेरा ऐसा शासन। फिर भी आप इस पृथ्वी को मेरी समझ रहे हैं। इस भूमि की तो बात ही क्या, स्वर्ग के रत्नमयी-विमान और कल्पवृक्षों की विभूतियाँ भी इन्द्रों को नहीं है। इन्हें भी वे छोड़नी ही पड़ती हैं, तो इस पृथ्वी के मनुष्यों की तो बात ही क्या है ? फिर आप इस पृथ्वी को मेरी कैसे कह रहे हैं ? आत्म-शोधक । फिर विचार कीजिए, जब यह शरीर भी अपना नहीं है, तब दूसरे पदार्थों पर तो हमारा अधिकार ही क्या है ? आप इस पृथ्वी को तृण-तुल्य समझकर छोड़ आये, किन्तु मैं नहीं छोड़ सका, इसलिए आप मेरे गुरु हुए और मैं छोटा ही रहा, फिर भूमि मेरी कैसे रही ? आप तो ज्ञानसागर हैं योगीराज । आपके समक्ष मुझ तुच्छ-प्राणी की गिनती ही क्या ?
( भरत 3-4 मिनिट हाथ जोड़कर एक ओर खड़े रहते हैं, बिजली का प्रकाश कुछ धुँधला कर दिया जाता है, उसी समय देव जय-जयकार करने आते हैं । एकदम बिजली की चकाचौंध पैदा करनेवाला प्रकाश होता है । पुष्प-वृष्टि होती है, बाजे बजते हैं, सबको विदित हो जाता है कि भगवान् बाहुबली को केवलज्ञान हो गया है । सब विनयपूर्वक खड़े होकर मधुर-स्वर में भगवान बाहुबली की स्तुति करते हैं । इधर स्तुति समाप्त होती है, उधर पटाक्षेप होता है ।)
इत्यलम्