जैन कवियों की महाभारत-कथा | Jain Kaviyon Ki Mahabharat Katha

जैन कवियों की महाभारत-कथा

-प्रो. वीरसागर जैन

(‘हरिवंशपुराण’ के विशेष सन्दर्भ में)

राम-कथा की भाँति महाभारत-कथा को भी जैन कवियों ने अपने ग्रन्थों का एक प्रमुख विषय बनाया है। सम्पूर्ण जैन-पुराण-साहित्य, जिसे वे ‘प्रथमानुयोग’ कहते हैं, का लगभग चौथाई हिस्सा महाभारत-कथा से ही भरा हुआ है।

जैन आचार्यों और कवियों की लेखनी से प्रसूत महाभारत-कथा का अध्ययन भारतवर्ष की इस विख्यात कथा को समीचीनतया समझने के लिए अनिवार्य है। महाभारत-कथा के प्रसंग जैन-कवियों की रचनाओं में अत्यन्त व्यावहारिक होने से विश्वसनीय बन पड़े हैं।

दरअसल, जैन परम्परा में मान्य २४ तीर्थंकरों में से २१वें तीर्थकर नेमिनाथ श्रीकृष्ण के चचेरे भाई थे, अतः जब भी जैन कवियों ने इन नेमिनाथ का जीवन-चरित्र लिखा, तो उसमें सहज ही महाभारत-कथा का कुछ अंश भी लिखा गया।

जैन पुराणों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुराण ‘महापुराण’ माना जाता है, जिसमें २४ तीर्थकरों का जीवन-चरित्र वर्णित है। उसमें २१वें तीर्थकर नेमिनाथ का जीवन-चरित्र लिखते हुए संक्षेप में महाभारत-कथा का भी वर्णन उपलब्ध होता है। इसके अतिरिक्त बड़े पुराण ‘त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित’ नाम से भी हैं जिनमें त्रिषष्टि अर्थात् ६३ शलाका-पुरुषों का जीवन-चरित्र लिखा गया है। इनमें भी संक्षिप्त महाभारत-कथा पाई जाती है। इसी प्रकार और भी अनेक पुराणों में महाभारत-कथा मिलती है, पर वह जान-बूझकर संक्षिप्त लिखी गई है, जैसा कि आचार्य गुणभद्र ने स्वयं ही कहा है, अतः हमें यहाँ उन ग्रन्थों की गणना नहीं करनी है। हम तो यहाँ मात्र ऐसे ग्रन्थों की ही गणना कर रहे हैं जिनमें स्वतन्त्र महाभारत-कथा कुछ विस्तार से वर्णित है। इससे स्पष्ट है कि महाभारत-कथा लिखे बिना उक्त चारों महापुरुषों का पूर्ण जीवन-चरित्र नहीं लिखा जा सकता था, अतः जैन कवियों ने महाभारत की कथा को भी अपने ग्रन्थों का प्रमुख विषय बनाया है। और इसीलिए उन्होंने विभिन्न भाषाओं और विविध शैलियों में महाभारत की कथा पर शताधिक ग्रन्थों की रचना की है, जिनमें से प्रमुख कृतियाँ कालक्रमानुसार निम्नलिखित हैं-

१. हरिवंशपुराण - इस नाम के अनेक ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं, जिनमें आचार्य जिनसेन (९वीं शती) का ‘हरिवंशपुराण’ ही सर्वाधिक विख्यात है, जिसका विशेष परिचय एवं सार हम आगे प्रस्तुत करेंगे। सभी हरिवंशपुराणों में श्रीकृष्ण एवं कौरव-पाण्डवों की कथा का विस्तृत वर्णन उपलब्ध होता है। एक-एक ‘हरिवंशपुराण’ ब्रह्म जिनदास (१५ वीं शती) और भट्टारक यशःकीर्ति (१६ वीं शती) की भी महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं।

२. पाण्डवपुराण - आचार्य शुभचन्द्र द्वारा वि. सं. १६०८ में रचित यह पुराण महाभारत-कथा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ माना जाता है। इसमें २५ पर्वो में अत्यन्त विस्तारपूर्वक कौरव-पाण्डवों की कथा का प्रामाणिक वर्णन किया गया है जो मूलतः पठनीय है।

३. नेमिनाथपुराण - इसकी रचना ब्रह्म नेमिदत्त (१६वीं शती) ने १६ अधिकारों में की है। इसमें २१ वें तीर्थंकर नेमिनाथ के प्रसंग से महाभारत-कथा का वर्णन हुआ है, पर वह अत्यल्प है।

४. पाण्डवपुराण - भट्टारक यशःकीर्ति (१६ वीं शती) द्वारा रचित इस ग्रन्थ में ३४ सन्धियों में महाभारत-कथा का विस्तृत वर्णन उपलब्ध होता है।

५. पाण्डवपुराण - भट्टारक चन्द्रकीर्ति (१७ वीं शती) द्वारा रचित यह कृति भी जैन कवियों की महाभारत कथा को समझने हेतु विशेष उपादेय मानी जाती है।

६. नेमिनिर्वाणकाव्य - इसकी रचना महाकवि वाग्भट्ट (११ वीं शती) ने १५ सर्गों में की है जिसमें मुख्यतःनेमिनाथ का जीवन-चरित्र वर्णित है।

७. पाण्डवपुराण - यह कवि वादिचन्द्र (१७ वीं शती) का एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है, जिसमें महाभारत कथा वर्णित है।

८. रिट्ठणेमिचरिउ - ११२ सन्धियों में विभाजित और १८००० श्लोक प्रमाण वाला यह ग्रन्थ महाकवि स्वयंभू (१८ वीं शती) की प्रसिद्ध रचना है जिसमें महाभारत-कथा का विस्तृत वर्णन अपभ्रंश भाषा में उपलब्ध होता है। इसे ‘हरिवंशपुराण’ भी कहा जाता है।

९. णेमिणाहचरिउ - महाकवि रइधू (१५ वीं शती) की इस कृति का अपर नाम ‘रिट्ठणेमिचरिउ’ भी है। इसमें १४ सन्धियों के ३०२ कड़बकों में तीर्थकर नेमिनाथ का जीवन चित्रित है।

१०.
णेमिणाहचरिउ - अमरकीर्ति गणि (१३ वीं शती) की इस रचना में २५ सन्धियों में ६८१५ श्लोकों में नेमिनाथ तीर्थकर का जीवन-चरित्र वर्णित है और इस प्रसंग से इसमें संक्षेप में महाभारत-कथा भी उपलब्ध होती है।

११.
णेमिणाहचरिउ - महाकवि दामोदर (१३ वीं शती) की इस खण्डकाव्यात्मक कृति में ५ सन्धियों में तीर्थकर नेमिनाथ की मूल कथा का वर्णन किया गया है, किन्तु इसमें श्रीकृष्ण, पाण्डव और कौरवों का वृत्तान्त लिपिबद्ध है।

१२.
णेमिणाहचरिउ - कवि लक्ष्मणदेव (१५ वीं शती) की इस कृति में ४ सन्धियों के ८३ कड़वको में संक्षेप में तीर्थकर नेमिनाथ और उनके प्रसंग से श्रीकृष्ण एवं यादवों को कथा वर्णित है।

१३.
पाण्डवपुराण - कविवर बुलाकीदास (१७ वी शती) की इस हिन्दी-रचना में भी कौरव-पाण्डवो को कथा का काव्यात्मक शैली में अंकन हुआ है।

१४.
नेमिनाथपुराण - कविवर भागचन्दजी (१९ वीं शती) की यह हिन्दी-रचना भी तीर्थकर नेमिनाथ एवं उनके प्रसंग से कौरव-पाण्डवों की कथा के लिए समर्पित है।

१५.
नेमिनाथपुराण - यह कृति कन्नड़ भाषा में कवियर कर्ण पार्य द्वारा सन् ११४० के आग पास लिखी गई है।

१६.
अर्धनेमिपुराण - यह कृति संस्कृत-मित्रित कन्नड़ भाषा में कवि नेमिचन्द्र द्वारा १३वीं शताब्दी में लिखी गई है।

१७.
रुक्मिणीहरण - यह कृति मराठी भाषा में गुणदास या गुण कीर्ति नामक कवि के द्वारा सम्भवतः १७ वीं शताब्दी में लिखी गई है।

१८. हरिवंशपुराण - यह कृति मराठी भाषा में जिनदास कवि (१७ वीं शती) द्वारा लिखी गई है। जिसे अपूर्ण रह जाने पर कवि पुण्यसागर ने पूर्ण किया था। कुल मिलाकर ५८ अध्यायों में पूर्ण हुआ यह ग्रन्थ ‘जैन महाभारत’ के नाम से ही जाना जाता है।

१९. पाण्डवपुराण - या भी मराठी भाषा को कृति है, जिसे शक स. १७७२ में ठकाप्पा कवि ने लिखा है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि जैन-कवियों ने भी महाभारत कथा को प्रस्तुत करने में अत्यधिक रुचि ली है और उसे विविध भाषाओं में, विविध विधाओं में संक्षेप या विस्तार से प्रस्तुत करने में उन्हें बड़ी सफलता प्राप्त हुई है। उन्होंने अपने कथा-विवेचन में विश्वसनीयता उत्पन्न करने की भी भरसक चेष्टा की है।

महाभारत-कथा विषयक इन कृतियों के अक्षय भण्डार में संस्कृत भाषा की ‘हरिवंशपुराण’ नामक कृति सर्वाधिक लोकप्रिय हुई है, जिसे आचार्य जिनसेन ने ८वीं शताब्दी (सन् ७८३ ई.) में लिखा है। इसमें ६६ सर्ग एवं दस हजार श्लोक है। भाव एवं कला-दोनों से ही दृष्टियों से यह अन्य संस्कृत-साहित्य का उच्च कोटि का महाकाव्य माना जाता है। पं. नेमिचन्द्र शास्त्री ‘ज्योतिषाचार्य’ ने इसे ‘विविध विषयों का ज्ञानकोश’ कहा है (तीर्थकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा, खण्ड ३, पृष्ठ ६)। यहाँ अब इसी ग्रन्थ का संक्षिप्त कथासार लिखा जाता है-

ढाई हजार वर्ष पुरानी बात है। भगवान् महावीर का समवसरण राजगृही में आया। समाचार पाकर सारी प्रजा के साथ राजा श्रेणिक भी धर्मलाभार्थ समवसरण पहुंचे। वहाँ भगवान् महावीर की भक्तापहारी दिव्यध्वनि खिरी। सभी ने मंत्रमुग्ध होकर सुना। इसी समय समवसरण में एक मुनिराज को केवलज्ञान हो गया। राजा श्रेणिक ने गौतम गणधर से उन मुनिराज के विषय में पूछा। गौतम गणधर ने बताया कि वह हरिवंश में उत्पन्न सुविख्यात राजा जितशत्रु है। राजा श्रेणिक ने गौतम गणधर से हरिवंश का सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाने का अनुरोध किया। गौतम गणधर ने इसप्रकार सुनाया-

यह विश्व षड्द्रव्यात्मक है। इसके दो विभाग हैं- लोकाकाश और अलोकाकाश। अलोकाकाश में मात्र आकाश द्रव्य है और लोकाकाश में जीवादि छहों द्रव्य खचाखच भरे हैं। अलोकाकाश अनंत है और लोकाकाश के तीन भाग हैं- ऊर्ध्वलोक, अधोलोक और मध्यलोक। ऊर्ध्वलोक में ज्योतिष लोक और स्वर्गादि आते हैं, अधोलोक में नरक आते हैं और मध्यलोक में असंख्यात द्वीप-समुद्रादि आते हैं। असंख्यात द्वीप-समुद्रों में एक भरतक्षेत्र है। भरतक्षेत्र में जिसप्रकार एक मास में कृष्ण और शुक्ल दो पक्ष होते हैं, उसीप्रकार एक कल्प में उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी दो काल होते हैं। दोनों कालों में छह-छह विभाग होते हैं। अवसर्पिणी के छह विभाग ये हैं- सुखमा-सुखमा, सुखमा, सुखमा-दुखमा, दुखमा-सुखमा, दुखमा, दुखमा-दुखमा। ये ही अपने विपरीत क्रम से उत्सर्पिणी के नाम हैं। उत्सर्पिणी के बाद अवसर्पिणी और अवसर्पिणी के बाद उत्सर्पिणी -ऐसा कालक्रम यहाँ अनादि से चल रहा है और अनन्तकाल तक चलता रहेगा। इसका कोई कर्ता-धर्ता नहीं है। इनमें से इसी अवसर्पिणी के चौथे काल की बात है, जब यहाँ दसवें तीर्थकर भगवान् शीतलनाथ सशरीर विराजमान थे, तब हरिवंश की उत्पत्ति हुई। नौवें तीर्थकर भगवान् पुष्पदंत के समय तक तो यहाँ इक्ष्वाकुवंश ही चलता रहा, किंतु दसवें तीर्थंकर शीतलनाथ के समय हरिवंश की उत्पत्ति हुई। वह इसप्रकार :-

वत्सदेश की कौशांबी नगरी में राजा सुमुख राज्य करता था। एक दिन वह वीरक सेठ की पत्नी वनमाला पर आसक्त हो गया। वनमाला भी राजा सुमुख पर आसक्त हो गई। राजमंत्री और राजदूतों के प्रयासों से वनमाला और सुमुख ने एक रात्रि में मिलकर विविध कामक्रीडाएँ कर ली। प्रातः काल होने पर भी वनमाला सेठ के घर नहीं पहुँची, अमितु राजा सुमुख की पटरानी बन गई। इसप्रकार यद्यपि इन दोनों ने परस्त्री/परपुरुष के सेवन का घोर पाप किया, किन्तु एक बार एक महामुनिराज को नवधाभक्तिपूर्वक आहार दिया और अपने दुष्कृत्य का प्रायश्चित्त कर प्रबल-पुण्य उपार्जित किया। फलस्वरूप, दोनों मरकर विजयार्द्धगिरि पर विद्याधर-दम्पति बने। इधर वह वीरक सेठ वनमाला के वियोग से बहुत दुःखी होकर मुनि बन गया और मरकर पहले स्वर्ग में देव हुआ। वहाँ उसने अपने अवधिज्ञान से पूर्वजन्म की सारी बातें जान ली और अपने अपमान का बदला लेने के लिए वह विजयार्द्धगिरि पर आया। उसने विद्याधर दम्पत्ति की विद्या छीन ली और उन्हें दक्षिण-भरत की चंपापुरी का राज्य दे दिया। चंपापुरी इस समय अपने राजा अर्ककीर्ति के मर जाने से अनाथ थीं। चंपापुरी में इस विद्याधर-दम्पत्ति के एक हरि नाम का पुत्र हुआ। पिता की मृत्यु के बाद चंपापुरी का राजा हरि बना। हरि की सन्तान हरिवंशी कहलाई।

इस हरिवंश में स्वर्गमोक्षगामी अनेक महान् राजा हुये। बीसवें तीर्थकर भगवान् मुनिसुव्रतनाथ भी इसी हरिवश में उत्पन्न हुये थे। आगे चलकर इसी हरिवंश में एक अभिचन्द्र नाम का राजा हुआ। उसने वेदीपुर नाम का एक शहर बसाया। वेदीपुर में एक ब्राह्मण रहता था- क्षीरकदंब। उसके अनेक शिष्य थे, जिनमें तीन प्रमुख थे- राजा अभिचन्द्र का पुत्र वसु, उसका स्वयं का पुत्र पर्वत और एक अन्य ब्राह्मण नारद। कुछ समय बाद क्षीरकदंब ब्राह्मण और राजा अभिचन्द्र ने जिनदीक्षा धारण कर ली। वेदीपुर का राजा वसु बना। वसु स्फटिक-मणि के आसन पर विराजता था। आसन किसी को स्पष्ट नहीं दिखता था। सब लोग यही समझते थे कि राजा वसु धर्म के प्रभाव से अधर विराजते हैं। एक दिन नारद और पर्वत में ‘अज’ शब्द के अर्थ पर विवाद हो गया। वेद में आया था कि ‘अज’ से यज्ञ करना चाहिए। पर्वत ने इस वाक्य में आये हुये ‘अज’ शब्द का अर्थ ‘अजा का पुत्र- पशु’ किया। नारद ने इसे अनुचित सिद्ध किया। समुचित अर्थ के निर्णय के लिए दोनों राजा वसु की सभा में पहुंचे। राजा वसु ने सत्य अर्थ को जानते हुए भी, गुरुपत्नी को दिए वचन के निर्वाह करने के मोह में, भरी सभा में असत्य फैसला सुना दिय। इससे वह सिंहासनसहित धरती में धंस गया और मरकर सातवें नरक पहुँचा। वसु के मरने के बाद उसका बड़ा पुत्र राजा बना, पर वह भी मर गया। उसके बाद उससे छोटा पुत्र राजा बना, पर वह भी मर गया। इसप्रकार क्रम-क्रम से राजा वसु के आठ पुत्र राजा बन-बनकर मर गये। नौवें-दसवें पुत्र सुवसु और वृहध्वज मृत्यु से डरकर क्रमशः नागपुर और मथुरा चले गये। दोनों के वंश अच्छी तरह चलते रहे। नागपुरवासी सुवसु के वंश में निहतशत्रु नाम का महान् शत्रुविजेता राजा हुआ। उसके पुत्र ने राजगृह का राज्य किया। फिर उसके नववाँ प्रतिनारायण जरासन्ध हुआ जो रावण के समान त्रिखण्डी था। जरासन्ध के कालिन्दसेना नाम की पटरानी, कालयवनादि पुत्र और अपराजित आदि भाई थे | मथुरावासी वृहध्वज के वंश में यदु नाम का राजा हुआ, जिसके वंशज यादव कहलाये। इन यादवों के वंश में आगे चलकर शूर और सुवीर नाम के दो पुत्र हुये। मथुरा का राज्य सुवीर ने किया और शूर ने शौरीपुर नाम का पृथक् नगर बसा लिया। शौरीपुर के राजा शूर के अंधकवृष्टि आदि पुत्र हुये और मथुरा के राजा सुवीर के भोजकवृष्टि आदि पुत्र हुये। अन्धकवृष्टि के दस पुत्र हुये-समुद्रविजय, अक्षोभ स्तिमितसागर, हिमवान्, विजय, अचल, धारण, पूरण, अभिचन्द्र और वसुदेव। तथा दो पुत्रियाँ हुई- कुन्ती और माद्री। भोजकवृष्टि के तीन पुत्र हुये - उग्रसेन, महासेन और देवसेन।

एक दिन अंधकवृष्टि ने सुप्रतिष्ठित केवली से अपने और अपने दशों पुत्रों के पूर्वभव सुने और अपने ज्येष्ठ-पुत्र समुद्रविजय को राज्य सौंपकर निम्रन्थ दिगम्बर-जिनदीक्षा धारण कर ली। एक दिन राजा समुद्रविजय से उनके सबसे छोटे भाई वसुदेव एक छोटी-सी बात पर नाराज हो गये और घर छोड़कर चले गये। यात्रा में उन्होंने अपने अद्भुत-पराक्रम और कला-कौशल से अनेक दुष्कृत्यों का निवारण किया, सुकृत्यों का संपादन किया और महासुन्दरी सैकड़ों कन्याएँ प्राप्त की । इसी दौरान एक बार वे घूमते-घूमते अरिष्टपुर पहुंचे। वहाँ राजा रुधिर की पुत्री रोहिणी का स्वयंवर हो रहा था। स्वयंवर में जरासंध जैसे महापराक्रमी राजा और वसुदेव के बड़े भाई समुद्रविजयादि भी आये हुये थे। रोहिणी ने अपनी वरमाला वसुदेव के गले में डाली। इससे उपस्थित सभी राजा बहुत कुपित हुये और वसुदेव से युद्ध करने लगे। वसुदेव ने सबको हरा दिया। समुद्रविजय और वसुदेव में युद्ध प्रारंभ हुआ। वसुदेव तो समुद्रविजय को पहचानते थे, किन्तु समुद्रविजय वसुदेव को नहीं पहचानते थे; अतः समुद्रविजय ने वसुदेव को विविध दिव्यास्त्रों से पराजित करने की पूरी कोशिश की, परन्तु वसुदेव ने उनके समस्त दिव्यास्रों को असफल कर दिया और अंत में अपने नाम की पर्ची अपने बाण में बाँधकर समुद्रविजय के चरणों में पहुँचा दी। समुद्रविजयादि सभी भाई वसुदेव को पाकर गद्गद् हो गये। शौरीपुर पहुँचकर वसुदेव का अद्भुत स्वागत किया गया।

शौरीपुर में वसुदेव ने अनेक प्रबुद्ध राजकुमारों को शस्त्रविद्या सिखाई। एक बार वसुदेव अपने कंसादिक शिष्यों के साथ जरासन्ध को देखने के लिए राजगृह नगरी में गये। वहाँ राजा जरासन्ध ने यह घोषणा कर रखी थी कि जो सिंहपुर के राजा सिंहस्थ को बन्दी बनाकर लायेगा, उसे मैं अपनी पुत्री जीवंयशा और इच्छित देश का राज्य दूँगा। वसुदेव ने अपने कंसादिक शिष्यों सहित सिंहपुर पहुँचकर राजा सिंहरथ को घेर लिया। कंस ने उसे बन्दी बना लिया। इससे वसुदेव ने प्रसन्न होकर कंस से वर मांगने के लिए कहा। कंस ने उस वर को यथेष्ट अवसर पर माँग सकने के लिए वसुदेव के ही भण्डार में रख दिया। जब वसुदेव राजा सिंहरथ को बन्दी बनाकर जरासन्ध के पास ले गये, तो जरासन्ध वसुदेव को अपनी पुत्री देने के लिए तैयार हुआ, पर वसुदेव ने बताया कि इसे बंदी मैंने नहीं, कंस ने बनाया है, अतः पुत्री उसे दी जाय। जरासन्ध ने कंस से उसका कुल पूछा। कंस ने इतना ही बताया कि मेरी माँ कौशाम्बी नगरी की कलाली मंजोदरी है। राजा जरासन्ध को इसमें सन्देह हुआ। उसने मंजोदरी को बुलवाया। मंजोदरी ने बताया कि मुझे तो यह यमुना नदी में बहती हुई इस पिटारी में मिला है, जिसके साथ यह मुद्रिका भी थी, मैं इसकी माँ नहीं हूँ। राजा जरासन्ध ने मुद्रिका पढ़ी- “यह राजा उग्रसेन और रानी पद्मावती का पुत्र है, जो गर्भ में आते ही क्लेशकारी हुआ है और अशुभ नक्षत्र में उत्पन्न हुआ है। इसके कर्म इसकी रक्षा करें।” इसप्रकार जरासन्ध ने कंस को अपना भानजा जानकर अपनी पुत्री जीवंयशा प्रदान कर दी। मुद्रिका पर लिखे कथन से कंस को भी अपनी सत्य जीवनी अभी ही पता चली। उसे अपने पिता उग्रसेन पर बड़ा क्रोध आया। उसने राजा जरासन्ध से मथुरा का राज्य मांगकर अपने पिता उग्रसेन को बन्दीगृह में डाल दिया। मथुरा का राजा बनकर कंस ने विचार किया कि मेरी इस सब समृद्धि का कारण वास्तव में वसुदेव हैं, मुझे उनका प्रत्युपकार करना चाहिए और उसने अपनी बहिन देवकी का विवाह वसुदेव के साथ कर दिया ।…

एक दिन की बात, अतिमुक्तक नामा मुनिराज (जो पहले कंस के भाई थे) आहार के लिए आये। उस समय जीवंयशा ने देवकी के रजस्वलापने के वस्त्र लाकर कंस को दिखाये और बेहूदे ढंग से हँसकर कहा- ‘ये आपकी बहिन के आनन्द के वस्त्र हैं, जरा देखिये तो सही’। यह सुनकर वे मुनिराज अपनी वचनगुप्ति को भूलकर जीवंयशा से बोले- अहो! इस बात पर हँसना बड़ी मूर्खता है, क्योंकि इसी देवकी के गर्भ से एक ऐसा पुत्र उत्पन्न होगा जो तेरे पति और पिता दोनों को मारेगा | यह सुनकर जीवंयशा बहुत रोई। कंस ने अतिशीघ्र वसुदेव के पास जाकर अपना वर माँगा कि देवकी के प्रसव मेरे ही घर में होने चाहिए। वसुदेव को अतिमुक्तक मुनिराज का वृत्तान्त मालूम नहीं था, अतः उन्होंने सहजभाव से कंस की बात स्वीकार कर ली बाद में जब उन्हें इसका पता लगा तो बहुत दुःख हुआ। वे वन में अतिमुक्तक मुनिराज के पास गये और उनसे विस्तारपूर्वक सारी बात साफ-साफ समझकर बहुत प्रसन्न हुये और मथुरा लौटकर निःशंक निवास करने लगे।

यथासमय देवकी ने गर्भ धारण किये। उसके छह पुत्रों को देवों ने सुरक्षित अलका नामा एक सेठानी के घर सुरक्षित पहुँचा दिया। फिर सातवें पुत्र (कृष्ण) का जन्म हुआ। वसुदेव उसे गुप्त रूप से ले जाकर गोकुल में नंद और यशोदा को सौंप आये और उनके जो उसी समय पुत्री हुई थी, उसे लाकर देवकी को सौंप दिया। कंस ने जब इस पुत्री को देखा तो सोचा, यह कन्या मुझे नहीं मार सकती है, हाँ, इसका कोई राजकुमार पति मेरा शत्रु हो सकता है, अतः कंस ने उस कन्या को मारा नहीं, मात्र उसकी नाक चपटी कर दी।

इधर गोकुल में कृष्ण बड़े होते रहे। एक बार किसी निमित्तज्ञानी ने कंस को बताया कि आपका शत्रु किसी नगरी में बड़ा हो रहा है, आप उसे खोजकर मार डालिए। कंस ने अपने पूर्वजन्म में सात देवियाँ सिद्ध की थीं। उसने यह कार्य उन देवियों को सौंपा। परन्तु सातों देवियाँ असफल हो गईं ।

एक बार मथुरा में तीन रत्न उत्पन्न हुये- नागशैय्या, पंचायन शंख और धनुष। इन्हें देखकर फिर एक निमित्तज्ञानी ने कंस को बताया कि जो इस नागशैय्या पर आरोहण करे, धनुष चढ़ावे और शंख बजावे, वही आपका शत्रु है। कंस ने सर्वत्र घोषणा करवा दी कि जो ऐसा करेगा उसे वह अपनी पुत्री अपराजिता प्रदान करेगा। देश-देश के पराक्रमी आये, पर ऐसा कोई न कर सका।

एक बार कंस ने गोकुल के ग्वालों को यह कठिन आज्ञा भेजी कि वे नागद्रह सरोवर में से सहस्त्रदलकमल लेकर आवें। सभी ग्वाले बड़े चिन्तित हुये, क्योंकि उस सरोवर में एक विकराल नागकुमार देव रहता था। कृष्ण इसमें से नागकुमार का दमन कर सहज ही सहस्रदलकमल को लाने में सफल हो गये। इसके बाद अनेक ग्वाले भी ढेरों कमल ले आये और गाँठें बाँधकर कंस के पास भेज दी। यह देखकर कंस बहुत क्रुद्ध हुआ। उसने गोकुल के सभी ग्वालों को मन में दुरभिप्राय रखकर मल्लयुद्ध हेतु बुलाया। वसुदेव ने ये सारे समाचार अपने भाइयों के पास भेज दिये। वे सभी शीघ्र मथुरा आ पहुँचे। सबके समक्ष घमासान मल्ल युद्ध हुआ। चाडूर व मुष्टि जैसे बलवान् मल्ल और कंस लीलामात्र में ही कृष्ण के हाथों मारे गये।

कंस की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी जीवंयशा ने अपने पिता जरासन्ध को नाना प्रकार से यादवों के विरुद्ध भड़काया। जरासन्ध भड़क गया। उसने अपने पराक्रमी पुत्र कालयवन को यादवों को मारने के लिए भेजा, परन्तु वह डरकर भाग गया। इसके बाद जरासन्ध ने अपने भाई अपराजित को भेजा। वह कृष्ण के हाथों मारा गया। इससे जरासन्ध अत्यन्त क्रुद्ध होकर स्वयं ही यादवों से युद्ध करने आया।

यादवों ने अभी युद्ध उचित नहीं समझा, अतः वे मथुरा छोड़कर पश्चिम दिशा की ओर चले गये थे। जरासन्ध को मथुरा जलती हुई मिली। आग के पास एक वृद्धा बैठी रो रही थी, जो वस्तुतः एक देवी थी। जरासन्ध ने उससे आग का और उसके रोने का कारण पूछा। वृद्धारूपिणी देवी बोली- “राजगृह के पराक्रमी, उपकारी और सत्यवादी राजा जरासन्ध के भय से सभी यादव अग्निप्रवेश कर गये हैं और मैं उनकी बहुत पुरानी दासी हूँ, सो रो रही हूँ”। जरासन्ध प्रसन्न होकर लौट गया।

सभी यादव देव-निर्मित द्वारावती में निवास करने लगे। यहाँ बलदेव और वासुदेव का प्रभाव खूब जमा। एक दिन यादवों की सभा में नारदजी आये। वार्तालाप के बाद वे रनिवास में गये। वहाँ सत्यभामा शृंगार में व्यस्त होने से इनका आगमन न जान सकी, अतः प्रणाम न कर सकी। नारदजी नाराज हो गये। उन्होंने उसे दुःखी करने के लिए उससे सुन्दर सौत लाने का निर्णय किया। बहुत खोजने के उपरान्त उन्हें कुन्दनपुर के राजा भीष्म की पुत्री रुक्मिणी पसन्द आई। उन्होंने कृष्ण के समक्ष रुक्मिणी के रूप-सौंदर्य का वर्णन किया। रुक्मिणी भी अपनी बुआ के माध्यम से श्रीकृष्ण को चाहने लगी थी, अतः उसने स्वयं ही, यद्यपि उसकी सगाई चेदि नगर के राजा शिशुपाल से हो गई थी, तथापि श्रीकृष्ण को पत्र लिखकर अपना मनोभाव व्यक्त किया। श्रीकृष्ण ने पत्र में निर्धारित कार्यक्रमानुसार रुक्मिणी का हरण कर लिया। शिशुपाल श्रीकृष्ण से युद्ध करके मारा गया। कृष्ण-रुक्मिणी का गिरनार पर्वत पर विधिपूर्वक विवाह हो गया। रुक्मिणी पटरानी बन गई। सत्यभामा उससे जलने लगी।

एक बार श्रीकृष्ण के पास दुर्योधन का दूत आया। उसने श्रीकृष्ण को निवेदन किया कि आपकी इन दो रानियों में जिसके पहले पुत्र हो, वह राजा दुर्योधन की पुत्री स्वीकार करेगा। सत्यभामा ने इसे प्रतिशोध लेने का अच्छा अवसर समझा। उसने रुक्मिणी के समक्ष शर्त रख दी कि यदि रुक्मिणी के पुत्र पहले हो, तो वह सत्यभामा के केश रौंधकर दुर्योधन की पुत्री ब्याहने जावेगा और यदि सत्यभामा के पुत्र पहले ही गया, तो वह रुक्मिणी के केश रौंधकर दुर्योधन की पुत्री व्याहने जावेगा। दोनों रानियों के पुत्र एक साथ हुये, किन्तु पहले सूचना रुक्मिणी के पुत्र की मिली, इसलिए वही पहला पुत्र माना गया; किन्तु उसे पूर्वजन्म का वैरी एक विद्याधर उठाकर ले गया और एक बड़ी भारी शिला के नीचे दबा कर चला गया। थोड़ी ही देर में एक कालसंवर नाम का अन्य विद्याधर आया। वह उस बालक को अपने घर ले गया।

इधर रुक्मिणी के पुत्रहरण के समाचारों ने कोहराम मचा दिया। नारदजी पुत्र के समाचार जानने के लिए सीमन्धर भगवान् के पास गये। वहाँ से कालसंवर के घर गये। और विस्तृत समाचार लेकर लौटे। रुक्मिणी को बता दिया कि उसे सोलह वर्ष बाद अवश्य उसका पुत्र मिल जावेगा, वह सीमन्धर भगवान् के वचनों पर विश्वास कर धैर्य धारण करे।

समय बीतता रहा। एक बार समुद्रविजयादि दश भाइयों के भानजे पाँचों पाण्डव द्वारावती आये। सभी ने इनका उत्साहपूर्वक स्वागत किया। सोलह वर्ष पूरे होने पर रुक्मिणी का पुत्र (प्रद्युम्न) भी द्वारका लौट आया। इस प्रकार अब द्वारका में साढ़े तीन करोड़ कुमार रहने लगे।

एक बार की बात है। कृष्ण की बहन (यशोदा की पुत्री जो कृष्ण के बदले में लाई गई थी) दर्पण में अपना रूप देख रही थी। यों तो वह अनुपम सुन्दरी थी किन्तु अपनी नाक चपटी देखकर उसे संसार-शरीर-भोगों से वैराग्य हो गया। उसने जिनदीक्षा धारण कर ली। एक बार यह ध्यानस्थ थी कि डाकुओं ने इसे वनदेवी समझकर इससे वरदान माँगा कि आज उन्हें बहुत सारा धन मिलना चाहिए। संयोग से इनकी इच्छा पूरी हो गई। वे लौटकर अपनी ‘वनदेवी’ के पास आये, परंतु वह न मिली। उसे सिंह खा गया था। ‘वनदेवी’ के स्थान पर बिखरा हुआ खून और मात्र तीन अंगुलियाँ मिली। डाकुओं ने वहाँ त्रिशूलधारिणी देवी-प्रतिमा बना दी और उसे भैंसे आदि मारकर खूब खून पिलाया (स्वयं ने पिया) । यह दुनिया उसे आज तक भी देवी/माता आदि के रूप में मानती चली आ रही है। अहो मूढ़ता !

शनैः शनैः श्रीकृष्ण आदि यादवों के पराक्रम की गाथा जरासन्ध तक पहुँच गई। वह सेना लेकर यादवों से लड़ने आ गया और अन्ततः अपने ही चक्र से श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया। श्रीकृष्ण जरासन्ध के शव को देख-देखकर बहुत रोये। उन्हें उसके मरण पर बहुत शोक हुआ। दुर्योधन, द्रोण, दुःशासन, कर्ण आदि ने जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली। युद्धोपरान्त श्रीकृष्ण ने घायलों का उपचार और मृतकों का विधिपूर्वक दाहसंस्कार कराया। द्वारका पहुँचने पर बलभद्र और नारायण का राज्याभिषेक हुआ। राजगृही का राज्य जरासन्ध के पुत्र सिंहदेव को, मथुरा का राज्य उग्रसेन के पुत्र द्वार को, शौरीपुर का राज्य समुद्रविजय के पुत्र रथनेमि को, हस्तिनापुर का राज्य पाण्डवों को और कौशलदेश का राज्य हिरण्यनाभि के भाई रुक्मनाभ को दिया गया। सभी लोग प्रसन्न होकर अपने-अपने स्थान को गये और सभी यादव द्वारका में सुखपूर्वक काल व्यतीत करने लगे।

इसप्रकार अब हस्तिनापुर का राज्य पाण्डव करने लगे। एक बार पाण्डवों की सभा में नारदजी आ गये। पाण्डवों ने उनकी विनय की। फिर वे रनिवास में गये। द्रौपदी उनका आगमन न जान सकी, अतः उसने इन्हें नमस्कार नहीं किया। नारद नाराज हो गये। उन्होंने घातकीखण्ड के भरतक्षेत्र की अमरकंका नगरी के राजा पद्मनाभ को द्रौपदी प्राप्त करने के लिए उकसाया। उसने अपने एक पातालवासी देव की सहायता से द्रौपदी का हरण कर लिया। पाण्डवों ने द्रौपदी को बहुत खोजा, पर न मिली। पश्चात् उन्हें नारदजी ने ही आकर द्रौपदी के समाचार बताये। पाँचों पाण्डव और श्रीकृष्ण अमरकंका जाकर राजा पद्मनाभ की दुर्दशा कर द्रौपदी को ले आये। आते समय समुद्रयात्रा में कौतूहलस्वभावी भीम ने श्रीकृष्ण से एक अनुचित हास्यविनोद किया। श्रीकृष्ण पाण्डवों से विरक्त हो गये। उन्होंने अपनी बहिन सुभद्रा के पौत्र को हस्तिनापुर का राज्य देकर पाण्डवों को वहाँ से निकाल दिया। पाण्डव दक्षिण मथुरा (मदुरा) में पहुँचकर मलयगिरि के तट पर रहने लगे।

ज्ञात हो कि इससे पूर्व राजा समुद्रविजय और रानी शिवमती के श्री नेमिनाथ (बाईसवें तीर्थंकर) का जन्म हो चुका था और देवगण उनके गर्भ-जन्म कल्याणकमना चुके थे। अब वे दूल्हा बनकर भोजवंशियों की बेटी राजमति को ब्याहने जा रहे थे। वहाँ किसी ने मृगादि पशुओं को रोक रखा था। नेमिनाथ ने सारथी से उनके बारे में पूछा । सारथी ने बताया- “हे नाथ! यादव परमजिनधर्मी हैं, वे तो शाकाहारी ही हैं. पर कुछ अन्य भील-राजा भी आपके विवाह में आये हैं, जो मांसाहारी हैं; ये पशु उन्हीं के लिए लाये गये हैं”। करुणानिधान नेमिनाथ का हृदय यह सुनकर रो पड़ा। उन्होंने अत्यन्त मार्मिक उद्बोधन से सभी को समझाया, पशुओं को वन्धनमुक्त कराया और फिर अपने आप को समझाने लगे। विषयभोगों की असारता का विचार करते-करते उन्हें वैराग्य हो गया। इतने में ही लौकान्तिक देव भी आ गये। नेमिनाथ का दीक्षाकल्याणक मनाया गया। उन्होंने गिरनार पर्वत पर जाकर जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली। राजमति बहुत दुःखी हुई, पर बाद में गुरुजनों के उपदेश से उसने धैर्य धारण किया और शांत चित्त से संसार, शरीर, भोगों से विरक्त होकर उसने भी जिनदीक्षा धारण कर ली। एक दिन नेमिनाथ स्वामी को आत्मध्यान के बल से लोकालोकप्रकाशक केवलज्ञान प्रकट हो गया। देवों ने यथाविधि केवलज्ञानकल्याणक मनाया। इन्द्र की आज्ञा से अद्भुत समवसरण की रचना हुई। भगवान् नेमिनाथ ने समवसरण सहित अनेक देशों में विहार कर वस्तुस्वरूप का प्रतिपादन किया, जिसे सुनकर अनेक जीवों ने मोक्षमार्ग की प्राप्ति की।

एक बार बलभद्र ने भगवान् नेमिनाथ से द्वारका की स्थिति, अपने संयम और वासुदेव के मरण के विषय में पूछा। तदनुसार द्वारका बारह वर्ष बाद द्वीपायन के निमित्त से जल गई, जरत्कुमार के बाण से जंगल में वासुदेव की मृत्यु हो गई, बलदेव ने मुनिदीक्षा धारण कर ली। पाँचों पाण्डव और द्रौपदी ने भी कालांतर में जिनदीक्षा धारण कर ली। भगवान् नेमिनाथ सर्व कर्मों का क्षय कर मोक्ष पधारे।

जो इस पुराण को पढ़े या सुने, उसे सर्वसुखों की प्राप्ति होवे।