जैन ग्रन्थों में मंगल : एक संक्षिप्त विवेचन | Jain Granthon Men Mangal Ek Sankshipt Vivechan

जैन ग्रन्थों में मंगल : एक संक्षिप्त विवेचन

-प्रो. वीरसागर जैन

भारतीय शब्दशास्त्र भी बहुत गूढ़-गम्भीर है । यहाँ छोटे-छोटे शब्दों की गागर में बड़े-बड़े अर्थों के महासागर भरे हुए हैं। विद्वज्जन जीवन भर इन शब्दों के पीछे छुपे हुए अर्थ को समझने-समझाने का प्रयत्न करते रहते हैं, परन्तु कभी अघाते नहीं । ‘मंगल’ भी एक ऐसा ही छोटा-सा, परन्तु अत्यन्त सारगर्भित शब्द है | इसके पीछे छुपा हुआ अर्थ अत्यधिक व्यापक भी है और अत्यन्त गूढ़ भी है।

‘मंगल’ शब्द भारतीय संस्कृति का प्राणभूत शब्द है । गहराई से देखा जाये तो सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति की आत्मा इसमें निवास करती है और यही कारण है कि प्राचीन काल से लेकर आज तक निरन्तर इस शब्द का प्रयोग भारतीय जन-जीवन में देखा जाता है। प्राकृत-संस्कृत भाषाओं के प्राचीन ग्रन्थों में तो इस शब्द का प्रयोग मिलता ही है, लेकिन वर्तमान में सभी क्षेत्रों में भारी परिवर्तन हो जाने के बाद भी, इस शब्द का प्रयोग कम नहीं दिखायी देता । यथा- (क) कल हमारे घर का मंगल प्रवेश है, आप अवश्य पधारिये। (ख) दीपावली की आपको बहुत-बहुत मंगल कामनायें। (ग) नये वर्ष की आपको बहुत-बहुत मंगल कामनायें। (घ) बिटिया को मेरी ओर से मंगल आशीर्वाद कहिये। (ङ) इस अवसर पर पूज्य आचार्यश्री का मंगल प्रवचन भी होगा, आप सभी धर्मलाभ लें। (च) आपकी यात्रा मंगलमय हो। (छ) शास्त्र-सभा के प्रारम्भ में मंगलाचरण अवश्य करना चाहिए | इत्यादि ।

यहाँ एक अत्यन्त आश्चर्य की बात यह है कि ‘मंगल’ शब्द के इतने अधिक महत्त्वपूर्ण एवं प्रचलित होने के बाद भी वर्तमान में लोगों को इस विषय की व्यवस्थित पर्याप्त एवं सम्यक् जानकारी नहीं है।

विविध ग्रन्थों में विकीर्ण एतद्विषयक सामग्री की व्यापकता को देखते हुए यदि मैं विश्वविद्यालयों की भाषा में कहूँ तो कहना होगा कि मंगल एक अच्छे-खासे शोध-प्रबन्ध का विषय है। इस पर यदि डी. लिट्. नहीं तो कम से कम पीएच.डी. का शोध-प्रबन्ध तो सुगमता से लिखा ही जा सकता है । वर्तमान में, जब अनेक शोधर्थी छात्र किसी अच्छे शोध-विषय के लिए खोज करते फिरते हैं, तो मैं यह परामर्श देना चाहता हूँ कि कोई शोध-छात्र इस विषय को लेकर पीएच.डी. हेतु शोधकार्य करे । मुझे विश्वास है कि वह इस विषय पर निश्चित ही एक श्रेष्ठ शोध-प्रबन्ध तैयार कर सकेगा ।

प्रस्तुत विषय पर सामग्री वैसे तो सम्पूर्ण भारतीय वाद्मय में ही यत्र-तत्र प्रभूत मात्रा में उपलब्ध होती है, परन्तु विस्तारभय से स्वयं को मात्र जैन वाद्मय तक भी सीमित रखा जा सकता है। जैन वाद्मय में यह सामग्री मुख्यतः आचार्य गुणधर कृत कसायपाहुड, आचार्य यतिवृषभ कृत तिलोयपण्णत्ति, आचार्य वीरसेन कृत धवला (पहली पुस्तक), आचार्य विद्यानन्दि कृत आप्तपरीक्षा, आचार्य जयसेन कृत पञ्चास्तिकाय-टीका तात्पर्यवृति और आचार्यकल्प पण्डित टोडरमलजी कृत मोक्षमार्गप्रकाशक में उपलब्ध होती है । विशेष जिज्ञासु पाठकों को इन ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। यहाँ तो सामान्य पाठकों के लिए, जैन-ग्रन्थों में उपब्ध ‘मंगल’ विषयक सामग्री के आधार पर अत्यन्त संक्षेप में विवेचन प्रस्तुत किया जाता है ।

‘मंगल’ शब्द का अर्थ -

जैन ग्रन्थों में ‘मंगल’ शब्द का अर्थ उसकी व्युत्पत्तिपूर्वक बताया गया है तथा वह व्युत्पत्ति भी दो प्रकार से की गयी है -

१. मं + गल = मंगल
२. मंग + ल = मंगल

प्रथम के अनुसार, ‘मं’ का अर्थ है- मल या पाप और ‘गल’ का अर्थ है- गलना या नष्ट करना अर्थात् जो पापरूपी मल को गलाये या नष्ट करे, वह मंगल है।

द्वितीय के अनुसार, ‘मंग’ का अर्थ है- सुख और ‘ल’ का अर्थ है- लाता है, देता है अर्थात् जो सुख को प्रदान करता है; वह मंगल है।

उक्त दोनों व्युत्पत्तियाँ प्रामाणिक हैं; क्योंकि दो होकर भी वस्तुतः एक ही बात को कहने के दो प्रकार हैं। एक नास्तिपरक है और दूसरा अस्तिपरक, विशेष अन्य कोई अन्तर नहीं है। यही कारण है कि हम इन दोनों को परस्पर पूरक भी कह सकते हैं और ‘मंगलं’ की पूर्ण परिभाषा इसप्रकार भी प्रस्तुत कर सकते हैं कि जो जीव के पापरूपी मल को गलाये - नष्ट करे और सच्चा सुख प्रदान करे, वही मंगल है।

‘मंगल’ की उक्त दोनों व्युत्पत्तियाँ परस्पर पूरक हैं, विरोधी या भिन्न-भिन्न नहीं- इसका एक प्रमाण यह भी है कि इन दोनों व्युत्पत्तियों को पृथक्- पृथक् दो आचार्यों ने नहीं समझाया है; अपितु एक ही आचार्य ने, एक ही ग्रन्थ में, एक ही समय में विवक्षा-भेद से दोनों को स्वीकार किया है और ऐसा प्रायः सभी जैनाचार्यों ने किया है । प्रमाणस्वरूप ‘तिलोयपण्णत्ति’ की निम्नलिखित गाथायें सावधानीपूर्वक पठनीय हैं -

गालयदि विणासयदे घादेदि दहेदि हंति सोधयदे ।
विद्धंसेदि मलाई जम्हा तम्हा या मंगलं भणिदं ।।

अहवा मंगं सोक्खं लादि हु गेण्हेदि मंगलं तम्हा ।
एदेण कज्जसिद्धिं मंगइ गच्छेदि गंथकत्तारो ।। -तिलोयपण्णत्ति, 1/9-15 अर्थ- जो मलों को गलाता है, विनष्ट करता है, घातता है, जलाता है, शुद्ध करता है या विध्वंस करता है; वह ‘मंगल’ कहा गया है अथवा - जो ‘मंग’ अर्थात् सुख को लाता है, ग्रहण करता है; वह ‘मंगल’ है।

इसी प्रकार का भाव अन्यत्र भी अनेक स्थलों पर प्रकट किया गया है।

‘मंगल’ के पयार्यवाची -

‘मंगल’ के अर्थ को और अधिक स्पष्ट करने के लिए जैनाचार्यों ने मंगल के पर्यायवाची शब्द भी गिनाये हैं

। यथा -

पुण्णं पूद पवित्ता पसत्थ सिव भद्द खेम कल्लाणा ।
सुह सोक्खादी सव्वे णिद्दिष्ट्ठा मंगलस्स पज्जाया ।।

अर्थ- पुण्य, पूत, पवित्र, प्रशस्त, शिव, भद्र, क्षेम, कल्याण, शुभ, सौख्य इत्यादि मंगल के पर्यायवाची हैं।

इसी प्रकार ‘धवला’ में भी मंगल के अनेक पर्यायवाची गिनाये गये हैं। साथ ही ‘मंगल’ के उक्त पर्यायवाची बताने का भी महत्त्वपूर्ण कारण बताया गया है । यथा-

“मंगलं पुण्यं पूतं पवित्रं शिवं शुभं कल्याणं भद्र सोख्यमित्येवमादीनि मंगलपर्यायवचनानि। एकार्थप्ररूपणं किमर्थमिति चेत् ? यतो मंगलार्थोऽनेकशब्दाभिधेयस्ततोऽनेकेषु शास्त्रेष्वनेकाभिधानैर्मंगलार्थः प्रयुक्तश्चिरंतनाचार्यैः सोऽव्यामोहेन शिष्यैः सुखेनावगम्यते इत्येकार्थ उच्यते। यद्येकशब्देन न जानाति ततोऽन्येनापि शब्देन ज्ञापयिव्य इति वचनाद्वा” ।

अर्थ- मंगल, पुण्य, पूत, पवित्र, प्रशस्त, शिव, शुभ, कल्याण, भद्र, सौख्य इत्यादि मंगल के पर्यायवचन हैं

।

शंका - इन एकार्थवाचकों का प्ररूपण क्यों किया गया है ?

समाधान- ‘मंगल’ का अर्थ अनेक शब्दों का अभिधेय है; अतः चिरन्तन आचार्यों ने अनेक शास्त्रों में अनेक नामों से ‘मंगल’ का अर्थ बताया गया है, ताकि शिष्यगण भ्रमरहित होकर सुगमता से इसका अर्थ जान सकें तथा शास्त्रों में ऐसी आज्ञा भी प्रसिद्ध है कि यदि एक शब्द से अर्थ ज्ञात न हो तो अन्य शब्द से समझाना चाहिए।

मङ्गल के भेद :-

जैन-ग्रन्थों में यत्र-तत्र ’ मङ्गल ’ के अनेक भेद भी अलग-अलग प्रकार के बताये गये हैं, जिनको ठीक से स्पष्ट करने के लिए बहुत स्थान और समय की आवश्यकता है, जो यहाँ अभी नहीं है; परन्तु संक्षेप में कहा जा सकता है कि मङ्गल के भेद अनेक दृष्टियों से किये जा सकते हैं।1 यथा-

(क) प्रथम दृष्टि से मङ्गल एक ही प्रकार का है। जो पापरूपी मल को नष्ट करे और उत्तम सुख प्रदान करे, वही मङ्गल है ।

(ख) द्वितीय दृष्टि से मङ्गल के दो भेद हैं - ( १ ) मुख्य मङ्गल और ( २ ) अमुख्य मङ्गल ( गौण मङ्गल )। ग्रन्थ के आदि-मध्य-अन्त, में स्पष्टरूप से जो इष्टदेव को नमस्कार किया जाता है, वह मुख्य मङ्गल है और सिद्धार्थ ( पीली सरसों ), पूर्णकलश, वन्दनमाला, छत्र, श्वेतवर्ण, दर्पण, अच्छी जाति का अश्व, बाल कन्या आदि - ये अमुख्य मङ्गल हैं।2 उक्त सभी का अभिप्राय ‘पंचास्तिकाय’ की तात्पर्यवृत्ति टीका में आचार्य जयसेन ने प्राचीन गाथायें उद्धृत करते हुए समझाया है, जो मूलतः पठनीय है।

(ग) तृतीय दृष्टि से भी मंगल के दो भेद हैं - ( १ ) निबद्ध मङ्गल और ( २ ) अनिबद्ध मङ्गल। ग्रन्थ के आदि-मध्य-अन्त में जो स्पष्टतया छन्दोबद्ध मङ्गल किया जाता है, वह निबद्ध मङ्गल है और जो इसप्रकार छन्दोबद्ध करके नहीं लिखा जाता, मात्र मन-वचन-काय से ही कर लिया जाता है, वह अनिबद्ध मङ्गल है। निबद्ध मङ्गल के तीन भेद होते हैं- आदि मङ्गल, मध्य मङ्गल और अन्त मङ्गल। इनका स्वरूप यथानाम है।

(घ) चतुर्थ दृष्टि से भी मङ्गल के दो भेद हैं - ( १ ) अलौकिक मङ्गल और ( २ ) लौकिक मङ्गल। इन्हें क्रमशः निश्चय मङ्गल और व्यवहार मङ्गल भी कह सकते हैं । निज शुद्धात्मा, सम्यग्दर्शनादि और पञ्चपरमेष्ठी अलौकिक या निश्चय मङ्गल हैं और अश्व, गज, दर्पणादि लौकिक या व्यवहार मङ्गल हैं।

(ड) पञ्चम दृष्टि से भी मङ्गल के दो भेद हैं - ( १ ) द्रव्यमङ्गल और ( २ ) भावमङ्गल । बहिरंग शुभ पदार्थ और वाचिक-कायिक प्रणामादि द्रव्यमङ्गल कहलाते हैं और आत्मा के विशुद्धभाव भावमङ्गल हैं।

(च) षष्ठ दृष्टि से मङ्गल तीन प्रकार का है - ( १ ) मानसिक मङ्गल, ( २ ) वाचिक मङ्गल और ( ३ ) कायिक मङ्गल। विशुद्ध मन से इष्टदेव को प्रणामादि करना मानसिक मङ्गल है, वचनों से इष्टदेव को प्रणाम करना वाचिक मङ्गल है और काया के द्वारा शिरोनति आदि रूप से इष्टदेव को प्रणाम करना कायिक मङ्गल है।

(छ) सप्तम दृष्टि से भी मङ्गल तीन प्रकार का है - ( १ ) चेतन मङ्गल, ( २ ) अचेतन मङ्गल और ( ३ ) मित्र मङ्गल। निज शुद्धात्मा और सिद्ध परमात्मा चेतन मगल है; जिनमन्दिर, जिनबिम्ब एवं दर्पणादि अचेतन मङ्गल हैं और अश्व, गज, बालकन्यादि मिश्र मङ्गल हैं।

(ज) अष्टम दृष्टि से भी मङ्गल तीन प्रकार का कहा गया है - (१) सम्यग्दर्शन, (२) सम्यग्ज्ञान और ( ३ ) सम्यक्चारित्र।

(झ) नवम दृष्टि से मङ्गल के चार भेद हैं- ( १ ) अरहन्त मङ्गल, (२) सिद्ध मङ्गल, ( ३ ) साधु मङ्गल (४) केवली-प्रणीत धर्म मङ्गल।

(ञ) दशम दृष्टि से भी मङ्गल के चार भेद हैं - (१) नाम मङ्गल, (२) स्थापना मङ्गल, (३) द्रव्य मङ्गल और (४) भाव मङ्गल। ऋषभदेवादि अरहन्त-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-साधु के नाम, नाम मङ्गल हैं; जिनेन्द्रदेव के कृत्रिम-अकृत्रिम सर्व जिनबिम्ब स्थापना मङ्गल हैं, आचार्य-उपाध्याय-साधु के शरीर द्रव्य मङ्गल हैं और वर्तमान में मङ्गल पर्याय से परिणत शुद्धजीव भाव मङ्गल है।3

(ट) एकादशम दृष्टि से मङ्गल के पाँच भेद कहे गये हैं - (१) ज्ञान मङ्गल, (२) दर्शन मङ्गल, ( ३ ) मनोगुप्ति मङ्गल, (४) वचोगुप्ति मङ्गल और (५) कायगुप्ति मगल।

(ठ) द्वादशम दृष्टि से मङ्गल के छह भेद हैं - (१) नाम मङ्गल, (२) स्थापना मङ्गल, ( ३ ) द्रव्य मङ्गल, (४) क्षेत्र मङ्गल, (५) काल मङ्गल और (६) भाव मङ्गल। इनमें से नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव - इन चार का स्वरूप ऊपर (ञ) में लिखा जा चुका है। क्षेत्र मङ्गल और काल मङ्गल का स्वरूप इसप्रकार है। जिन स्थानों पर ध्यानादि के द्वारा मङ्गल पर्यायों को प्राप्त किया जाता है, वे क्षेत्र मङ्गल हैं । यथा- सम्मेदशिखर क्षेत्र, कैलाशपर्वत क्षेत्र, गिरनारगिरि क्षेत्र, चम्पापुर क्षेत्र, पावापुर क्षेत्र आदि। जिन कालों में जीव को केवलज्ञानादि मङ्गल पर्यायों की प्राप्ति होती है, वे काल मङ्गल हैं। जिस काल में दीक्षा, निर्वाण आदि की प्राप्ति होती है, वह भी काल मङ्गल हैं ।4

(ङ) त्रयोदशम दृष्टि से मङ्गल के अनेकानेक भेद हैं, जो कहे नहीं जा सकते।

मङ्गल का फल -

मङ्गल के अर्थ और भेद की भाँति जैन-ग्रन्थों में फल पर भी महत्त्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध होती है। जैनाचार्यों के अनुसार मङ्गल का फल मूलतः दो प्रकार का है- (१) अभ्युदय रूप और (२) निःश्रेयस रूप। इनको क्रमशः लौकिक फल और अलौकिक फल भी कह सकते हैं। अलौकिक फल का एक नाम पारमार्थिक फल भी है। विविध विघ्नों व कष्टों का निवारण होकर अपार सांसारिक सुख-सम्पत्ति या स्वर्गादि की प्राप्ति होना मङ्गल का अभ्युदय रूप या लौकिक फल है और परमपद मोक्ष एवं मोक्षमार्ग की प्राप्ति होना मङ्गल का निःश्रेयसरूप या अलौकिक या पारमार्थिक फल है। यथा - “मंगलफलं देहिंतो कयअव्भुदयणिस्सेयससुहाइत्तं।” 5

अर्थ- मङ्गल का फल अभ्युदय और निःश्रेयसरूप सुख प्रदान करना है। हिन्दी के जैन-कवियों ने इसे स्थान-स्थान पर इसप्रकार प्रकट किया है -

“धरम करत संसार-सुख, धरम करत निर्वाण ।"

अथवा-

“भुक्ति-मुक्ति दातार, चौबीसों जिनराजवर ।" 6

मङ्गल का प्रयोजन :-

जैन-ग्रन्थों में यत्र-तत्र मङ्गल के प्रयोजनों पर भी विस्तारपूर्वक ऊहापोह उपलब्ध होता है। संक्षेप में, जैनाचार्यों के अनुसार मङ्गल के कुल मिलाकर पाँच प्रमुख प्रयोजन हैं -

१. निर्विघ्न्न शास्त्रसमाप्ति, २. नास्तिकत्व-परिहार, ३. पुण्यावाप्ति, ४. शिष्टाचार-परिपालन और ५. कृतज्ञता-ज्ञापन ।

इनमें से प्रथम प्रयोजन निर्विघ्न्न शास्त्रसमाप्ति को लेकर जैन-ग्रन्थों में सर्वाधिक ऊहापोह उपलब्ध होता है ; क्योंकि मङ्गल के साथ निर्विघ्न्न शास्त्र समाप्ति का व्यभिचार है। कहीं मङ्गल न करने पर भी निर्विघ्न्न ग्रन्थ-समाप्ति देखी जाती है और कहीं मङ्गल करने पर भी विघ्न्न आ जाते हैं, निर्विघ्न्न ग्रन्थ-समाप्ति नहीं हो पाती।

जैनाचार्यों ने इस अत्यन्त महत्त्वपूर्ण शंका का अनेक तरह से समाधान देने का अतीव सुन्दर प्रयत्न किया है, जो मूलतः पठनीय है; परन्तु मैं समझता हूँ कि इसका एक सुन्दर समाधान यह भी हो सकता है कि निर्विघ्न्न शास्त्र-समाप्ति मङ्गल का फल नहीं है, मङ्गल का प्रयोजन है। फल और प्रयोजन में बड़ा अन्तर होता है और उक्त शंका इस फल और प्रयोजन के मूलभूत अन्तर को ध्यान में रखने के कारण उत्पन्न हुई है। फल की प्राप्ति अनिवार्य हो सकती है, पर प्रयोजन हमारी हार्दिक अभिलाषा है।

मङ्गल के अधिकार -

जैन-ग्रन्थों में स्थान-स्थान पर मङ्गल के छह अधिकारों का भी विस्तारपूर्वक कथन किया गया है, जिसका मूल उद्देश्य मङ्गल-विषयक सम्पूर्ण प्रतिपादन को सुव्यवस्थित करना प्रतीत होता है। मङ्गल के वे छह अधिकार निम्नलिखित हैं -

१. मङ्गल - इसमें ’ मङ्गल ’ का लक्षण या अर्थ समझाया जाता है।

२. मङ्गलकर्ता - जो मङ्गल करता है, मङ्गलकर्ता कहलाता है। जैसे - ‘समयपाहुड़’ में मङ्गलकर्ता परमपूज्य आचार्य श्री कुन्दकुन्द हैं।

३. मङ्गल करने योग्यः - भव्य जीव मङ्गल करने योग्य हैं।

४. मङ्गल का उपाय - रत्नत्रय की साधक सामग्री मङ्गल का उपाय है। - इस अधिकार में दो, तीन, चार आदि अनेक प्रकार से मङ्गल के भेद बताये जाते हैं।

६. मंगल का फल - इस अधिकार में मङ्गल के अभ्युदय और निःश्रेयसरूप फल का निरूपण किया जाता है।

एक अन्य महत्त्वपूर्ण बिन्दु -

मङ्गल-विषयक व्याख्यान करते हुए जैनाचार्यों ने शास्त्रादि शुभकार्यों के प्रारम्भ में मङ्गल करना अनिवार्य बताया है। इसी प्रसंग में पञ्चास्तिकाय को तात्पर्यवृत्ति टीका में आचार्य जयसेन ने एक अतीव सुन्दर शंका-समाधान उपस्थित किया है, जो यहाँ प्रस्तुत है -

"शास्त्रं मङ्गलममङ्गलं वा ? मङ्गलं चेत्तदा मङ्गलस्य मङ्गलं कि प्रयोजनं, यद्यमङ्गलं तर्हि तेन शास्त्रेण किं प्रयोजनम् ? आचार्याः परिहारमाहुः- भक्त्यर्थं मङ्गलस्यापि मङ्गलं क्रियते। तथा चोक्तम्- प्रदीपेनार्चयेदर्कमुदकेन महोदधिम्। वागीश्वरीं तथा वाग्भिर्मङ्गलेनैव मङ्गलम्।।

शंका- शास्त्र मङ्गल है या अमङ्गल ? यदि मङ्गल है तो मङ्गल का भी मङ्गल करने का क्या प्रयोजन है ? और यदि अमङ्गल है तो ऐसे शास्त्र से क्या प्रयोजन है?

समाधान- भक्ति के लिए मङ्गल का भी मङ्गल किया जाता है। कहा भी है कि जिसप्रकार दीपक से सूर्य की, जल से सागर की और वाणी से वागीश्वरी की पूजा की जाती है; उसीप्रकार मङ्गल से मङ्गल का भी मङ्गल किया जाना चाहिए।"

इसप्रकार यह अत्यन्त स्पष्ट है कि ’ मङ्गल’ एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण, व्यापक एवं गूढ़ - गम्भीर विषय है और जैन-ग्रन्थों में इस विषय पर अत्यन्त विस्तार एवं सूक्ष्मता के साथ प्रकाश डाला गया है। मुझे आशा है कि मेरे इस संक्षिप्त निबन्ध से प्रेरणा प्राप्त कर लोग इस विषय की सर्वांग एवं समीचीन जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करेंगे और कोई प्रतिभाशाली शोध-छात्र भी किसी विश्वविद्यालय में इस विषय पर शोधकार्य हेतु उत्साहित होगा।

सन्दर्भ-

  1. “कतिविधं मङ्गलम् ? मङ्गलसामान्यात्तदेकविधं, मुख्यामुख्यभेदतो द्विविधं, सम्यग्दर्शनज्ञान- चारित्रभेदात् त्रिविधं मङ्गल, धर्मसिद्धसाध्वर्हद्भेदाच्चतुर्विधं, ज्ञानदर्शनत्रिगुप्तिभेदात् पञ्चविधं, ‘णमो जिणाणं’ इत्यादिनानेकविधं वा ।" (धवला पुस्तक १, खण्ड १, सूत्र १)

अर्थ- मङ्गल कितने प्रकार का है ? सामान्य अपेक्षा से मङ्गल एक प्रकार का है; मुख्य - अमुख्य की अपेक्षा से दो प्रकार है; सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र की अपेक्षा से तीन प्रकार का है; धर्म, सिद्ध, साधु और अरहन्त की अपेक्षा से मङ्गल चार प्रकार का है; ज्ञान, दर्शन और त्रिगुप्ति के भेद से मङ्गल पाँच प्रकार का है अथवा ‘णमो जिणाणं’ इत्यादिरूप से मङ्गल अनेकप्रकार का भी है।

  1. “तत्र मुख्यमङ्गलं कथ्यते - आदौ मध्येऽवसाने च मङ्गलं भाषितं बुधैः। तज्जिनेन्द्रगुणस्तोत्रं तदविघ्न्नप्रसिद्धये ।। अमुख्यमङ्गलं कथ्यते- सिद्धत्थ पुण्णकुंभो वंदणमालाय पुंडुरं छत्तं। सेदो वण्णो आदस्य णाय कण्णा य जत्तस्सो ।।" (आचार्य जयसेन, पंचास्तिकायटीका, गाथा१)

  2. अरहाणं सिद्धाणं आइरिय उवज्झियाइसाहूणं। णामाई णाममंगलमुद्दिष्टुं बीदराएहिं ।।१९।।
    ठवणामंगलभेदं अकट्टिमाकट्टिमाणि जिणबिंबा। सूरि उवज्झयसाहूदेहाणि दव्वमंगलयं ।।२०।।
    मंगलपज्जाएहि उवलक्खियजीवदव्वमेत्तं च। भावं मंगलभेदं पढियं सत्थादिमज्झयंतेसु ।।२७।। (
    तिलोयपण्णत्ति, अधिकार १, गाथा १९,२०,२७ )

अर्थ - जिन कालों में जीव को केवलज्ञानादि मङ्गल पर्यायों की प्राप्ति होती है, वे कालमङ्गल हैं। जिस काल में दीक्षा, निर्वाण आदि की प्राप्ति होती है, वह भी कालमङ्गल है। एक अपेक्षा से लोकप्रमाण आत्मा के प्रदेशों से लोकपूरण समुद्धात द्वारा पूरित सभी लोकों के प्रदेश भी क्षेत्रमङ्गल हैं।

  1. गुणपरिणदासणं परिणिक्कमणं केवलस्स णाणस्स । उप्पत्ती इयपहुदी बहुभेयं खेत्तमंगलयं ।॥२१॥
    एदस्स उदाहरणं पावाणगरुज्जयंतचंपादी । आहुट्ठहत्थपहुदी पणुवीसव्भहियपणसयधणूणि ।।२२।। देव
    अवट्ठिदकेवलणाणावट्ठद्धगयणदेसो वा । सेढिधणमेत्तअप्पप्पदेसगयलोयपूरणा-पुण्णा ।।२३॥ विस्साणं
    लोयाणं होदि पदेसा वि मंगलं खेत्तं । जस्सिं काले केवलणाणादिमंगलं परिणमति ॥२४॥ परिणिक्कमणं
    केवलणाणुभवणिव्वुदिपवेसादी । पावमलगालणादो पण्णत्तं कालमंगलं एदं ।। २५॥ एवं अणेयभेयं हवेदि
    तं कालमंगलं पवरं । जिणमहिमासंबंध णंदीसुरदीवपहुदीओ ।।२६॥
    (- तिलोयपण्णत्ति, अधिकार 1)

  2. धवला पुस्तक १, खण्ड १. भाग १

  3. कविवर द्यानतराय कृत चौबीसी पूजा

(जोड़ना है-मंगल के नाम पर दुनिया में बहुत अन्धविश्वास चलता है-टोनेटोटके आदि, किन्तु यह विशुद्ध विज्ञान है/न्याय दीपिका प्रस्तावना/भूपालचतुर्विन्शतिका,19 /अमांगलिक पुरुष की कथा /अमंगल भी मंगल है -नीतिवक्यामृत ७/२६)