जैनधर्म में हवन | Jain Dhrm me hawan

जैन धर्म में हवन : एक स्पष्टीकरण

जैनधर्म अहिंसाप्रधानधर्म है; अतः इसमें पाप से बचने और पुण्योपार्जन
के जितने भी साधन पूजा-विधानादि है, उनमें अहिंसात्मक पद्धति को प्रधान
मानकर ही विधि-विधान हैं। यदि इसमें भी अन्य मत के समान पूजा-विधान
आदि की पद्धति होती, तब तो हमें यह पता ही नहीं चलता कि जैनधर्म और
अन्य धर्म में भेद भी है।
यह तो सर्वगत है कि जैनधर्म में पद-पद पर जिस कार्य में हिंसा कम और
पुण्य अधिक हो, वही कार्य सराहनीय कहा गया है। यहाँ प्रत्येक क्रिया
विवेकपूर्ण ही होती है। यदि हमने सावधानी न बरती और मात्र परम्परावश
क्रिया के करने के पक्षपाती रहे तो निश्चित है कि हमें पुण्य के बदले पाप ही
बँधने वाला है।
भगवान वासुपूज्य की स्तुति करते हुए आचार्य समन्तभद्र ने
‘बृहत्स्वयंभूस्तोत्र’ में लिखा है:- ‘सावद्यलेशो बहुपुण्यराशौ’। अर्थात्
बृहत्स्वयंभूस्तोत्र का वह सम्पूर्ण श्लोक इस प्रकार है :-

पूज्य जिनं त्वार्चयतो जनस्य सावद्यलेशो बहुपुण्यराशौ ।
दोषायनालं कणिका विषस्य न दूषिका शीतशिवाम्बुराशौ ।।

सराग परिणति अथवा आरम्भजनित थोड़ा-सा पाप का लेश, बहुत पुण्य
की राशि में दोष के लिए समर्थ नहीं है। जिस प्रकार विष की अल्पमात्रा शीतल
एवं आल्हादकारी जल से युक्त समुद्र में दोष उत्पन्न करने वाली नहीं हैं।
—आचार्य समन्तभद्र बृहत्स्वयंभूस्तोत्र, छन्द ३२।
जिसमें आरम्भ थोड़ा और पुण्य बहुत प्राप्त हो, वह कार्य ही करना योग्य
है।
लेकिन आज जैनधर्म का मूल अहिंसा को जानने-मानने वाले और अपने
को जैनधर्म का कट्टर श्रद्धानी बताने वाले भी रूढ़िवश भट्टारक परम्परा से
प्राप्त विकृतियों को ही पीटते चले जा रहे हैं और विधान, वेदीप्रतिष्ठा,
पंचकल्याणकों में शांति-विसर्जन में अन्य धर्मों के समान मेवा, घी, शक्कर
आदि पदार्थों से बनी धूप, जिसमें शीघ्र ही त्रसजीवों की उत्पत्ति हो जाती है; को
अग्नियुक्त कुण्ड में आहुति देकर हवन (यज्ञ) कराते जा रहे हैं।

प्रथम तो अग्नि स्वयं एकेन्द्रिय जीव है तथा उसमें डाली गई धूप और
समिधा में भी त्रस जीव पाये जाते हैं-यह साक्षात् हिंसा प्रतिरूपक उदाहरण है।

अतः जो हिंसा के कारण यज्ञादि (हवनादि) को धर्म का कारण मान रहे हैं
और विधान आदि कराने वाले यजमान को भी धूप व अग्नि से हवन कराने को
बाध्य करते हैं, उन्हें देखकर बड़ा खेद होता है।
यज्ञ (हवन) आदि के सम्बन्ध में आचार्यकल्प पंडित टोडरमलजी ने भी
मोक्षमार्गप्रकाशक में लिखा है :-
'अग्नि आदि का महा आरम्भ करते हैं, वहाँ जीवघात होता है, सो उन्हीं
के शास्त्रों में वा लोक में हिंसा का निषेध है, परन्तु ऐसे निर्दय हैं कि कुछ गिनते
नहीं।'¹
यद्यपि यह बात पंडित टोडरमलजी ने ‘विविधमत समीक्षा’ नामक पांचवें
अधिकार के ‘यज्ञ में पशुहिंसा का प्रतिषेध’-इस प्रकरण में लिखी है, परन्तु
विचार करें कि जब हम अग्नि का महा आरम्भ कर जीवघात करते हैं तो क्या
हमें मात्र जैन होने से ही उस अग्नि के महा आरम्भ में हिंसा नहीं होगी और उस
अग्नि में जीवघात नहीं होगा?
कई बार ऐसा देखने में आया है कि प्रतिष्ठाचार्य महोदय ने तो धूप लिखा
दी और श्रावक बाजार से बनी हुई धूप ले आये; जबकि उस धूप में लट, तिरुला
आदि दो-इन्द्रिय जीव भी पाये जाते हैं; लेकिन फिर भी उस धूप की अग्नि में
आहुति देते जाते हैं।
साथ ही मेवा, शक्कर आदि खाद्य पदार्थों से बनी सुगन्धित धूप को अग्नि
में खेते जाते हैं; जिससे मंदिर में चारों ओर धुआँ भर जाता है, यहाँ तक कि हवन
में बैठने वालों की आंखों से आँसू बहने लगते हैं। जब मनुष्यों की यह दशा होती
है; तब मक्खी, मच्छर आदि छोटे-छोटे जीवों की क्या दशा होती होगी-यह
हमारे प्रतिष्ठाचार्यों की बुद्धि में क्यों नहीं आता?

  • मोक्षमार्गप्रकाशक : पांचवां अधिकार, पृष्ठ ११२

अरे, इस सुगन्धित धूप का धुआँ भर जाने से मक्खी, मच्छर ही नहीं;
राजा वज्रजंघ और रानी श्रीमती तक का मरण हो गया था। राजा वज्रजंघ के
मरण के सन्दर्भ में पुराणों में जो उल्लेख मिलते हैं वे इस प्रकार हैं :-
“एक दिन राजा वज्रजंघ अपनी पत्नी रानी श्रीमती के साथ अपने शय्या
गृह की कोमल शय्या पर शयन कर रहे थे। सेवक लोग प्रतिदिन की भाँति
धूपघड़ों में धूप डालकर शय्यागृह से बाहर निकल गये थे, लेकिन आज वे लोग
झरोखों के द्वार खोलना भूल गये थे; इसलिए धूपघड़ों का धुआँ उसी गृह में
रुककर भर गया था। उस धुएँ से वे पति-पत्नी (राजा वज्रजंघ और रानी
श्रीमती) मूर्छित हो गये उनके श्वास रुक गये, और उसी रात्रि में वे दोनों ही
सदा के लिए इस लोक से विदा हो गये।”
हम जिस धूप को अग्नि में डालकर धर्म मानते हैं, महापुराण के रचयिता
आचार्य जिनसेन ने तो उस धूप को भोग का कारण कहा है :-

भोगांगेनापि धूपेन तयोरासीत्परासता ।
धिगिमान् भोगि भोगाभान् भोगान् प्राणापहारिणः ।।

देखहु भोग का कारण जो धूप, ताकरि राजा-रानी (राजा वज्रजंघ व रानी
श्रीमती) दोऊ मृतक अवस्था कूं प्राप्त भये; सो धिक्कार होऊ इन
भोगनिकूँ।"¹
समझ में नहीं आता कि मेवा, खोपरा, शक्कर, घी आदि को अग्नि में
डालने से कौनसा धर्म होगा? यदि अग्नि में भस्म करने के बजाय वह घी,
खोपरा, शक्कर, मेवा आदि किसी गरीब को दें तो पुण्य हो सकता है; परन्तु ये
गरीबों को तो नहीं देंगे और मानकषाय के वश अग्नि में डालते हैं। इस व्यर्थ के
अपव्यय के बारे में जो लोग जैनों की निन्दा करते हैं, वे यह ठीक ही कहते हैं कि
‘लोगों को घी खाने को नहीं मिल रहा और ये जैन लोग उसे अग्नि में डालते हैं।’
इसी सन्दर्भ में वयोवृद्ध प्रसिद्ध विद्वान पं० कैलाशचंद जी शास्त्री,
सिद्धांताचार्य बनारस ने लिखा है :-
"अग्नि में आहुति देकर देवताओं को तृप्त करने की वैदिक विधि इसके
मूल में है। वैदिक धर्म में अग्नि को देवताओं को मुख कहा है, किन्तु जैन धर्म में
अग्नि न स्वयं कोई देवता है और न देवताओं का मुख है। वह तो भस्म कर देने
वाली जड़ वस्तु है। अतः उसमें आहुति देकर किसी को तप्त करने का कोई प्रश्न
ही नहीं है। पूजन तो अग्नि में क्षेपण बिना भी सम्भव है।"²

  • आदिपुराण : पर्व ९, छन्द ३०
  • जैन निबन्ध रत्नावली : भाग १, पृष्ठ २५ (प्राक्कथन)

इसी प्रकार इस धूप से हवन की अनेक त्रुटियाँ बताते हुए श्री
मिलापचंदजी कटारिया ने भी साफ-साफ लिखा है :-
"हवन, यह जैनधर्म की मूल संस्कृति नहीं है। जैनधर्म की मूल चीज
है-अन्तरंग में रागद्वेषादि कषायों की विजय और बाह्य में जीवदया का
पालन; ये दोनों ही हवन में घटित नहीं होते हैं। हवन से अग्निकायिक जीवों की
विराधना होती हैं। दूर-दूर तक फैलने वाले अग्नि के गरम-गरम धुएँ से
वायुकाय आदि जीवों का विघात एवं मक्खी-मच्छर आदि उड़ने वाले
छोटे-छोटे त्रस जीवों को बाधा आदि तो प्रत्यक्ष ही दिखती है। साथ ही उसके
काले धुएँ से मन्दिर की सफेद दीवारों पर सुन्दर चित्रों, छत्र-चमरों और
बहुमूल्य चन्दोवों की भी खासी मिट्टी-पलीद हुये बिना नहीं रहती है। इससे
कभी-कभी आग लगने की सम्भावना भी रहती है।
इस प्रकार हवन से सिवाय हानि के कोई लाभ नहीं दीखता है। अहिंसामय
जैनधर्म में यह निरर्थक सावद्य क्रिया कैसे पनप रही है? आज के जमाने में घृत,
मेवा, मिष्ठान्न, फलादि पदार्थ वैसे ही मँहगाई की पराकाष्ठा तक पहुँचकर
जनसाधारण के लिए अत्यन्त दुर्लभ हो गये हैं। उनको अग्नि में जलाकर धर्म
मानना-इससे बढ़कर अज्ञानता अन्य क्या हो सकती है?
सिद्धचक्र विधानों में हजारों रुपयों की सामग्री जलाकर खाक की जाती
है। अगर ये ही रुपये दीन-अनाथों के काम में लगायें जायें तो कितना पुण्य
हो। यह भी तो सोचना चाहिये कि अग्नि में घृतादि जलाने के साथ धर्म का
सम्बन्ध कैसे है? अविचारपूर्ण क्रियाओं का कोई फल मिलने वाला नहीं है। धर्म
का असली तत्त्व छिपा जा रहा है और थोथे क्रियाकाण्डों का जोर बढ़ता जा रहा
है। विवेकी विद्वान् मन में सब कुछ जानते हुए भी अल्पज्ञ लोगों की रुख के
विरुद्ध कदम उठाने का साहस नहीं कर रहे, -यह बड़े ही परिताप का विषय
है।"¹
पद्मपुराण में कहा :-
“प्रथम तो यज्ञ की कल्पना ही निरर्थक है। दूसरे यदि कल्पना करनी ही है
तो विद्वानों को हिंसा द्वारा यज्ञ की कल्पना नहीं करना चाहिए, उन्हें धर्मयज्ञ ही
करना चाहिए। वह इस तरह कि आत्मा यजमान है, शरीर वेदी है, संतोष
साकल्य है, त्याग होम है, मस्तक के केश कुशा हैं, प्राणियों की रक्षा दक्षिणा है,
शुक्लध्यान द्वारा सिद्धपद की प्राप्ति फल है, सत्य बोलना स्तम्भ है, तप अग्नि
है, चञ्चल मन पशु है और इन्द्रियाँ समिधायें हैं-यही धर्मयज्ञ कहलाता है।”

  • जैन निबन्ध रत्नावली : भाग १, पृष्ठ ८८

इसी सम्बन्ध में जैन निबंध रत्नावली, भाग १ में संकलित “जैन धर्म
और हवन” नामक निबंध, जिसमें लेखक ने आचार्यों के प्रमाण और तर्कों से यह
सिद्ध कर दिया है कि अग्नि से हवन करना जैनधर्म की मूल संस्कृति नहीं है।
अतः जो भी भाई अग्नि से हवन कराते हैं अथवा करते हैं, उन सभी से निवेदन है
कि एक बार उस निबन्ध को अवश्य पढ़ें, जिससे यह हिंसात्मक प्रवृत्ति बन्द हो
तथा पुष्पों से शांतिविसर्जन की पद्धति को ही सभी अपनायें-यही भावना है।