जैन धर्म के सिद्धांत | Jain dharm ke siddhant

सत्य अहिंसा धर्म हमारा,
नवकार हमारी शान है।
महावीर स्वामी प्रभु हमारे,
जिन धर्म हमारी पहचान है।।

अहिंसा की जहाँ बात बरसे, क्षमा जिनके प्राण।
भेद ज्ञान वैराग्य से, निर्मल होता ज्ञान।
हो जब आत्मानुभूति तो,आत्म बने महान्।
जैन धर्म के यह सिद्धांत हैं, मुक्ति के विधान।।

तन मन वचन से, समता भाव लाना है।
हृदय की अनंत शक्तियों को, आज जगाना है।
राग द्वेष को त्याग कर, वैराग्य प्रगटाना है।
अनेकांत और स्यादवाद को, जीवन में लाना है।।

घर-घर में आत्म शुद्धि का संदेश पहुंचाना है।
जैन धर्म के सिद्धांतों को, जीवन में अपनाना है।
आत्म स्वरूप को जानकर, अज्ञान मिटाना है।
जिनवाणी का सार यही, मोक्ष को पाना है।।

क्रिया से कर्म होता है, परिणामों से बंध।
हो यदि उपयोग आत्मानुभूति, तो होगा सही धर्म।
सत स्वरूप की विस्मृति, तो पतन कराती है।
हो निज स्वरूप की रति, तो मोक्ष ले जाती है।।

मंगल मय निज आत्मा, मंगल मय ज्ञान स्वरूप।
कर्ता बुद्धि मिट जाए तो, प्रगटे सिद्ध स्वरूप।
भेद ज्ञान का हो दर्पण, वैराग्य हो भरपूर।
जिनवाणी का आश्रय लेकर,पाओं मोक्ष स्वरूप।।

:writing_hand: शोभित जैन, सिलवानी
AJ

रचनाकार: शोभित जैन (Shobhit Jain), सिलवानी
YouTube: https://www.youtube.com/watch?v=U_nSkDGtyPw&list=PLXcBKWNnm5zU&index=6