जैनदर्शन समीक्षा, भाग 7
पूज्य बाबूजी ‘युगल’ जी, कोटा
जैनदर्शन समीक्षा - भाग ७
ये समयसार परमागम का कर्ता-कर्म अधिकार है। इसकी अंतिम गाथा १४४, वो हमारी चर्चा का विषय है। चर्चा ही करते हैं हम लोग, (इसको) उपदेश नहीं समझना चाहिए। उपदेश का अधिकार तो एक मात्र तीर्थंकर परमात्मा को होता है। अथवा उनका अनुशीलन करनेवाले जो नग्न दिगंबर संत, जिन्हें एकमात्र आत्मा ही प्रिय है, और वे संत निरंतर उसी में विहार करते हैं - सचमुच वो विहार का ऐसा स्थल है, चैतन्य तत्त्व, जिसे आत्मा कहते हैं कि उसमें निरंतर ही विहार करते हुए भगवान सिद्ध को कभी थकावट नहीं लगती। इसी तरह निर्ग्रन्थ मुनिराजों का एक ही कर्म (है) - शुद्धोपयोग जिसे कहते हैं। शुद्धोपयोग माने निरंतर उस आत्म-वाटिका में विहार करनेवाला ज्ञान और उससे उत्पन्न होनेवाले आनंद का प्रति समय रसास्वादन - उसका नाम नग्न दिगंबर मुनि दशा (है)।
मुनिराजों को इस लोकोत्तर अनुभूति से, लोकोत्तर भोजन से, लोकोत्तर रसास्वादन से, कभी अवकाश ही नहीं मिलता, तो फिर वे और क्या करें? सचमुच कुछ करते ही नहीं हैं। मुनिराज शुद्ध चैतन्य-वाटिका में विहार के अतिरिक्त और कुछ करते ही नहीं हैं। कि करते हुए तो बहुत देखे जाते हैं? कितने काम करते हैं? आहारादि भी करते हैं, विहारादि भी करते हैं। कहते हैं ये वे करते हुए देखे जाते हैं लेकिन करते नहीं हैं। उनके अंतःकरण को देखो, उनका अंतःकरण इन सब क्रियाओं से टूटा हुआ है। क्योंकि उनको उस चैतन्य में पहुँचने की उतावल प्रतिसमय रहती है।
प्लेटफार्म पर खड़े रहनेवाले आदमी से पूछो कि तुम प्लेटफार्म पर खड़े हो? तो वो कहता है मैं खड़ा नहीं हूँ, मुझे तो निरंतर ट्रेन की आतुरता है। अपनी यात्रा की आतुरता है। उसी तरह इन संतों को - संत मात्र की बात है, दिगंबर संत हो। और तो जगत में कोई संत है ही नहीं। हम कितने भाग्यशाली हैं कि हमें - यह जो महापवित्र साध्य है, मुक्ति, सिद्ध दशा, परम सौख्य और परम आनंद की दशा - उस तक पहुँचने के लिए और उसका निर्देशन देनेवाले जो मिले हैं, वे भी जगत के सर्वश्रेष्ठ तीन तत्त्व हैं, सर्वश्रेष्ठ। भगवान अरहंत, निर्ग्रंथ दिगंबर संत, नित्य चैतन्य विहारी और उनकी यह वाणी, जिनवाणी, आगम, परमागम, शब्दब्रह्म - किसी (भी) नाम से कहें और ये सब अनादि-अनंत होते हैं।
सबसे पहले भावलिंगी संत कौन से हुए? - ऐसा होता नहीं, होगा भी नहीं ऐसा। क्यों नहीं होता है? इसलिए नहीं होता है कि सबसे पहले अगर हम किन्हीं भावलिंगी संत को - भावलिंगी माने चैतन्य विहारी, और द्रव्यलिंगी माने देहविहारी, मिट्टीविहारी, मिट्टी में विहार करने वाले। और भावलिंगी माने? वर्तमान में निषेध नहीं है। क्योंकि वे वर्तमान में थोड़ी (नया) होते हैं! तो वर्तमान से पूछो, वर्तमान काल से पूछो कि तू भावलिंगी संत क्यों नहीं होने देता है? तो उसका उत्तर यह है - मुझे तो कोई एतराज़ नहीं है। आत्मा उस चैतन्य में प्रचुर विहार करने का पुरुषार्थ करे और भावलिंग को प्राप्त करे। काल को जरा भी कोई तकलीफ और आपत्ति नहीं है।
ये कुन्दकुन्द आदि जितने संत हुए शताब्दियों की परंपरा में - कुन्दकुन्द तो सर्वप्रथम कहे जाते हैं क्योंकि उन्होंने सबसे पहले ये द्वादशांग की कलम चलाई। उसके बाद तो बहुत हुए, हजारों, लाखों संत (हुए), सभी हमारे वंद्य हैं। ये तीन हमें मिले तो वो भी ऐसे मिले कि जगत के सर्वोत्कृष्ट (मिले हैं)। हम कितने भाग्यशाली हैं, लेकिन कितने अभागे हैं कि इनका जीवन में जरा भी उपयोग नहीं कर पाए। जरा भी उपयोग नहीं कर पाए।
आज गाथा पढ़ते हैं, जिनवाणी पढ़ते हैं और उसका अर्थ इसमें लिखा होता है, लेकिन समझने में हमारी बुद्धि गायब है। बोले ये तो शब्द ही हमने नहीं सुने। तो जिन्होंने जिनवाणी के शब्द नहीं सुने, वे जिनवाणी को माँ समझते हैं? कि जिनवाणी के शब्द माने ये तो साक्षात् सुधा है, ये तो अमृत है साक्षात्। और इस अमृत का पान हम नहीं करते क्योंकि सदा से विष पीते आए हैं। मोह का विष, ममत्व का विष चढ़ा है सदा से, इसलिए जिनवाणी पसंद नहीं आती और इसमें दूसरों के आश्रित रहते हैं। सुन लेते हैं, सुना देते हैं। सुनानेवाले हैं तो सही न! तो सुन लेते हैं। कि तुम बहुत चतुर हो, सुन ही नहीं लेते हो। पर उसको सुनते हो जिसकी तुम्हें गरज नहीं है। और सुनने के बाद जो करना होता है वह गरज का काम होता है। तो व्यक्ति केवल सुनकर नहीं रह जाता पर उसमें प्रवृत्ति करता है। जिनवाणी को सुनकर यदि हमारी प्रवृत्ति उसके विषयभूत चैतन्य तत्त्व में नहीं हुई तो शायद हमसे बड़ा पापी, पाखंडी, अधर्मी जगत में दूसरा नहीं है। चिंतामणि को पाकर जिससे कौए उड़ाए उससे अभागा कौन होगा? ये हमने कौए उड़ाए हैं इन तीन महारत्नों को पाकर। तीन रत्न नहीं कहे? तीन रतन जगमाहिं।
लेकिन बंद है आज, जिनवाणी ही बंद है। कौन खोले? और सुने भी (तो कहे कि) बात कठिन है, समझ में नहीं आती है। तो जिनवाणी यह कहती है कि तू दुष्ट है तू, तेरा अभिप्राय दुष्ट है। तुझे तेरा नाम समझ में नहीं आता, मैं जो बताती हूँ? मैं तो तुझे तेरा नाम ही तो बताती हूँ? तूने एक नाम और एक स्वरूप होने पर भी ये जो अनेकरूप धारण किए हैं, नकली, इन नकली नामों से तू अपने आप को पुकारता आया और मानता आया। मेरा कहना केवल यह है कि अपना नकली नाम बताना बंद कर दे। इसकी सजा जेल होती है, नकली नाम की। ये बात समझ में नहीं आती?
नकली नाम कौन बताता है? झूठा नाम कौन बताता है कोर्ट में? और फिर क्या वो मुक्त हो जाता है? हमने क्या किया है? हमसे कोई पूछे कौन हो? दिखता नहीं है क्या? - सबसे पहले तो ये कहेंगे। मनुष्य हूँ और कौन हूँ? कि सच बोलो, सच। मनुष्य हो? कि सदा बने रहोगे मनुष्य? मनुष्यत्व का तो अंत हो जाता है, क्या उसके साथ आत्मा का भी अंत हो जायेगा? चैतन्य तत्त्व का भी अंत हो जायेगा? तो तुम मनुष्य नहीं हो, आज से इस बात को स्वीकार करो। ये कहती है जिनवाणी तो। (और बोलते है कि) अभी तो बहुत कठिन है। ये तो बहुत कठिन है। और ये जो बहुरूपिये जैसे वेश हैं - एक बहुरूपिया भी इतना समझदार होता है कि अपने बहुरूपों में विश्वास ना करके अपनी एकरूपता में विश्वास करता है। और वो जो बहुरूप है, जाकर उसका उद्घाटन कर देता है। अंत में उद्घाटन कर देता है। और जो उस बहुरूप के चक्र में आ जाए तो वो चला जाता है। लेकिन वो भी अपनी एकरूपता पर विश्वास करता है। वो मानता है कि ये वेश है, कल उतर जाएगा।
इस तरह जो-जो उतर जानेवाली चीजें हैं, वे-वे आत्मा नहीं हैं। जो-जो समाप्त हो जानेवाली चीजें हैं, वे-वे आत्मा नहीं। देह (वो) आत्मा नहीं है। देह के साथ जो संयोग है वे आत्मा नहीं हैं। उसके साथ में चलनेवाले हमारे मोह-राग-द्वेष, वे भी आत्मा नहीं हैं। मोह-राग-द्वेष तो झूठ बोलने को कहते हैं। झूठ बोलना आत्मा है? झूठ बोलना आत्मा का स्वभाव है? यहाँ तो आत्मा का स्वभाव ज्ञान कहते हैं। तो ज्ञान झूठ बोलता है? ये सूरज झूठ बोलता है? यह (तो) हर वस्तु को ज्यों का त्यों दिखा देता है। रात्रि के अंधकार में सारी वस्तुओं की एकरूपता न्यारी-न्यारी होने पर भी, जहाँ एकरूपता दिखाई देती है, आँखें अंधी हो जाती हैं सूझते हुए भी। उसी तरह अज्ञान के अंधकार में जो अंध हैं हम लोग, उनको हमसे भिन्न जितने भी भाव, जितने भी तत्त्व, जितना भी जगत है, वो सब हमारा दिखाई देता है। जिनवाणी कहती है, इस पाप को आज ही बंद करो। ये महापाप है ये। अपने से भिन्न किसी भी तत्त्व पर, किसी भी वस्तु पर कब्जा करने की भावना, कब्जा घोषित करना, कब्जा करने का प्रयत्न करना, इससे बड़ा अपराध जगत में दूसरा नहीं है। इसी की सजा है नर्क और निगोद।
इस चैतन्य में विहार कैसे होता है? आत्मा प्रिय लगना चाहिए सबसे बड़ी बात है। और लगता है, मिथ्यादर्शन में भी प्रिय तो आत्मा ही लगता है। सुनने की है बात। लेकिन जिसे आत्मा माना गया है वो प्रिय लगता है। वहाँ भी दो भेद तो बराबर चलते हैं, एक मैं (अर्थात्) मेरा और सब पराये। ये दो भेद तो मिथ्यादर्शन में भी चलते हैं। लेकिन वो भेद झूठे हैं क्योंकि वहाँ जिनमें भेद नहीं करना चाहिए और जो सबके सब पराये हैं, उनमें भेद करके वो मिथ्यादृष्टि, अज्ञानी, पापी - वो दो भेद करके कुछ को अपना मान लेता है और कुछ को पराया मान लेता है। और वे उसके रहते नहीं हैं। जिनको वो अपना मान लेता है, वे रहते नहीं है। मान लेता है खाली, बना नहीं लेता। तो ऐसे मानने से क्या फायदा कि जहाँ बने नहीं एक भी?
देह का एक परमाणु भी आज तक बड़ी सुरक्षायें देने पर और प्रयत्न करने पर भी हमारा नहीं बन पाया। और अंतिम समय में हमने लाखों मिन्नतें की हों। लाखों मिन्नत इस शरीर की की हों लेकिन ये एक क्षण के लिए भी ठहर नहीं पाया। बोला - मेरा समय हो गया है यात्रा का। यह तो केवल धर्मशाला में मैंने विराम लिया था। तुम भूल गए कि मेरे साथ ममत्व कर बैठे। मैं भी तुम्हारे जैसा ही इस कुदरत का यात्री हूँ और मेरी यात्रा अनंत है। ये पुद्गल को सुना कभी किसी ने? शरीर से निकलते हुए ये जो मौन स्वर हैं ये किसी ने सुने आज तक? शरीर बोलता नहीं हर किसी को मरते समय? कि तू क्यों मेरे से … मेरे से चाहता क्या है? तू जो चाहता है उसका एक अंश भी, उसका एक कण भी मेरे पास नहीं है। बोल क्या कहना है तेरा? वो आत्मा को बोलता है। तू सुख चाहता है न? तो मेरे पास तो सुख का नाम-निशान ही नहीं है। मेरे पास तो हड्डी और माँस तो है, तू क्या करेगा इसका? ये संदेश प्रतिसमय शरीर दे रहा है पर आत्मा बहरा हो गया है, ज्ञानमय होने पर भी। उसको जगाती है जिनवाणी। इसलिए प्रसन्नचित्त होना चाहिए।
सबसे पहले तो ये कि तीन रत्न जिसको मिल गए वो अब संसार में रहेगा? संसार में रह गया उसका बाकी? जिसको देव, शास्त्र, गुरु जैसे तीन रत्न, तीन चिंतामणि जिसे मिले, उसका संसार अब शेष नहीं रहा। और यदि उसे यह शंका है (कि) क्या मालूम क्या होगा, पता नहीं? तो तेरे को तेरा पता नहीं है? कि तेरे परिणाम कैसे चलते हैं इसका तुझे स्वयं पता नहीं है? पता है, इसीलिए तुझे शंका होती है कि तू इस माँ की वाणी का विश्वास नहीं करता। तू अनंत तीर्थंकरों का अनादर करता है और उनकी पूजा करता है, इससे बड़ा नाटक कौनसा होगा? नाटक नहीं (बल्कि) धोखा और छल। उधर पूजा करता है (और इधर) एक बात मानता नहीं है। वो कहते हैं तू शुद्ध चैतन्य है। ये कहता है कि - नहीं! ये तो ये कैसे हो सकता है? मैं तो अभी वर्तमान में तो मनुष्य हूँ। (तो) वस्तु का भी कोई वर्तमान, भूत और भविष्य होता है? वस्तु - भाई! जड़ भी कभी पैदा नहीं हुआ तो चेतन कभी पैदा हुआ है? अनादि-अनंत तत्त्व है तू, ये सुनकर तुझे उछल पड़ना चाहिए; कि जिसकी अनादिता और अनंतता में कोई संशय नहीं है, उसको जगत में मारनेवाला और उसके रास्ते में आनेवाला कोई पैदा हुआ है? इतना हुआ है कि मैंने स्वयं उस अपनी प्रतिष्ठा का अनादर किया है। इज्जत गवाई है मैंने अपनी अपने हाथों (से)। चैतन्य अनंत शक्तियों का, संपत्तियों का निधान होने पर भी, हमने उसको दरिद्री माना और पुद्गल के हाथों उसका विक्रय किया, बेचा उसको।
जिनवाणी से बड़ी कोई चीज हो सकती है? जिसका पढ़ना ही बंद है - ऐसा युग आया है - और कहते हैं (कि अभी) पंचम काल है। तो पंचम काल है तो क्या-क्या छूटा पंचम काल में? पंचम काल में जो बड़े हमारे पूर्वज थे उनका तो पहनावा और खानपान शुद्ध था, अच्छा था। और आज कोट-पेंट कैसे चल गए पंचम काल में? और कैसे परिवर्तन हो गए और तरह-तरह के? काल का कोई दोष नहीं हुआ करता है क्योंकि काल तो पर तत्त्व है, अलग चीज है वो। काल एक अलग पदार्थ है कि जो हमारे किसी काम में बाधा नहीं देता। जिनवाणी में भी कहने के लिए काल की ओर से बहुत बातें मिलती हैं। सच्चाई यह है कि काल ने आज तक हमको कोई बाधा नहीं दी (है)।
विदेह में क्या सभी मोक्ष जाते हैं? हम विदेह जाने की सोचते हैं न? अपन भी विदेह चलें एक बार तो, वहाँ भगवान हैं। अरे! पर भगवान तो हैं पर तेरा पात्र कितना (बड़ा) है? वो भगवान रखेंगे भी सही तो तेरा पात्र तो जरा सा है, श्रुतज्ञान का। इसलिए यहाँ जो मिलनेवाला है, वही (विदेह में) भगवान से मिलनेवाला है। यहाँ अगर नहीं मिलेगा तो भगवान से भी नहीं मिलेगा। ये समवसरण ही है, हम समवसरण में बैठे हैं। मैं कोई नहीं तीर्थंकर हूँ। पर तीर्थंकर जो बात कहते हैं वो बात अपन करते हैं। मन की (बात) बिल्कुल नहीं करते। कसम है मन की बात (नहीं) करना, कल्पना की बात (नहीं) करना। ये तो अनादि-अनंत सत्य है ये, परम सत्य है।
सत्य कभी नया नहीं होता, सत्य के वक्ता कभी नये नहीं होते। जो नया होता है वो असत्य ही होता है। जो नये-नये दर्शन खड़े हुए, उनका क्या हुआ? होते हैं और अंत हो जाता है। लेकिन वस्तु व्यवस्था पर जो केंद्रित है, उस दर्शन का, उस धर्म का कभी अंत नहीं होता। क्योंकि वो तो सीधा ये बोलता है कि आम कैसा है? कि आम से क्या पूछता है? इससे पूछ लो। चख के देख लो, इसमें क्या है? किससे पूछना, भगवान से पूछोगे (आम) कैसा होता है? चख लो न कैसा होता है? हम तो चखकर कहते हैं कि आम मीठा होता है। उसी तरह ज्ञान - वो वस्तु को पूरा छान कर, देखकर बोलता है और कहता है कि जगत का अणु-अणु न्यारा-न्यारा (है)। एक-एक अणु परमेश्वर है।
परम ईश्वर कौन होता है? परम ईश्वर वो कि जिसके ऊपर कोई नहीं है, जिसकी सत्ता को किसी ने बनाया नहीं है, जिसकी सत्ता का कभी कोई अंत नहीं कर सकेगा। (वो) परमेश्वर नहीं है? जड़ भी परमेश्वर है। इसी तरह मैं चेतन भी परमेश्वर हूँ क्योंकि मुझे किसी ने बनाया नहीं है। किसके आश्रित रहूँ? जब मुझे किसी ने नहीं बनाया और मेरी सत्ता अत्यंत निरावलम्बी है, तो फिर मैं किसके आश्रित मोक्ष प्राप्त करूँगा? मुक्ति स्वयं मेरे अधीन है। अरे! मैं मुक्त हूँ, यही तो मुक्ति है। और क्या मुक्ति है?
मुक्ति क्या होती है? सदा से विद्यमान जो चैतन्य तत्त्व है, वो न्यारा का न्यारा नहीं है? सबके बीच रहने पर भी है तो वो अलग, न्यारा ही है। सब्जी में जो नमक है वो न्यारा नहीं है? बिल्कुल मिला हुआ दिखाई देने पर भी उसका भिन्न स्वाद बहुत आराम से लिया जा सकता है। इसी तरह चैतन्य सारे विश्व के बीच में - मैं अत्यंत न्यारा तत्त्व हूँ। न्यारा हूँ, ये मेरा गौरव है, ये मेरी गरिमा है। जब मैं वजनीय तत्त्व हूँ कि मैं आज तक न्यारा रह सका और मेरी सत्ता ज्यों की त्यों है। उसमें आज तक कोई आँच नहीं आई।
इसका निश्चय केवल अनंत परमात्मा की वाणी जिसे जिनवाणी-परमागम कहते हैं, केवल उसी से होता है; अन्यत्र नहीं होता। इसमें कितना आराम मिल गया? पर आज के जो मनचले लोग हैं, बुद्धि के दुश्मन, वे इसकी परिभाषा क्या करते हैं? बोले जैनी द्वेषी होते हैं, द्वेषी। इनको दूसरे की बात नहीं सुहाती है। कि तुमसे बड़ा द्वेषी है जगत में कोई? तुमको सबकी बात सुहाती है? तुमने किसी को १००० रूपया दिया है और वो ये कहता है कि मैं तो १०० ले गया था, तुम उससे प्रेम करते हो या द्वेष करते हो? क्योंकि वो झूठ बोलता है। तो जो झूठ बोलनेवाले विचार और दर्शन हैं, उनसे प्रेम करें हम? और अपने सत्य को मिला दें उसमें? हमारा तो साक्षात् आँखों से देखा सत्य है। केवलज्ञान की आँख से देखा हुआ (सत्य है)। ये कल्पित नहीं है। जो कल्पना से खड़े होते हैं वे असत्य ही होते हैं। जो वस्तु को देखकर बात करता है वो सत्य ही होता है। उसमें असत्य होता ही नहीं है। तो जो मुक्ति की गारंटी देनेवाले हैं, कोई (भी) लोग हों, ये द्वेष है क्या?
एक व्यक्ति झूठ बोलता है, तो हम ये कहते हैं वो झूठ बोलता है, यह हम सत्य कहते हैं या द्वेष करते हैं? वो झूठ बोलता है - ये हमारा वचन सत्य है या झूठ है? सत्य है। और द्वेष है? ये बाजार में ठग आ गया है ये हमने सबको कहा ये हमने द्वेष किया उसके प्रति? यही ये बात कहता है दर्शन। जितना कुछ जगत है ये, उसमें तेरा एक चप्पा भी नहीं है क्योंकि तुझे आवश्यकता नहीं है। तू इतना संपूर्ण तत्त्व है और सम्राट है विश्व का क्योंकि तेरे पास ज्ञान और आनंद जैसी चीज़ें हैं, जो जगत के पास नहीं (हैं)। uncommon (असाधारण) है तू। कि uncommon है। Uncommon नहीं चाहिए? uncommon सूट चाहिए, uncommon साड़ी चाहिए foreign की। कि ये uncommon नहीं है? असाधारण तत्त्व है वो। पारमार्थिक तत्त्व कहा है आचार्यों ने इसको, आत्मा को। हम सभी जितने बैठे हैं, पारमार्थिक तत्त्व हैं - लोकोत्तर। जगत में एक भी ऐसा पदार्थ नहीं है। इससे अपनी महिमा नहीं आना चाहिए? और तो महिमा करे - शरीर इतना सुंदर, सूट ऐसा और नोटों के बंडल - इसकी तो महिमा करे जिनमें आग लग जानेवाली है; एक क्षण में जो राख हो जानेवाले हैं। लेकिन आज तक चैतन्य की राख नहीं हुई। लाखों शमशान जल गए (मगर) चैतन्य की राख नहीं हुई।
आत्मा मर गया होता तो ये शास्त्र लिखे जाते? किसके लिए लिखे? अनंत तीर्थंकरों की वाणी, वो केवल आत्मा के लिए होती है। जड़ के लिए नहीं होती। क्योंकि उसको समझाएगा कौन? लेकिन उस वाणी में ये कहा जाता है कि तू शुद्ध चैतन्य तत्त्व है। ये जड़ नहीं है तू। जो तू अपने आप को मान बैठा है, इनके साथ होने के कारण तू अपने आप को यही मान बैठा है, ये एकदम असत्य है, झूठ है। इसलिए इसे बंद कर दो। इसको बंद करने में क्या समय लगेगा?
कोई कहता है कि मैं झूठ बोलना छोड़ना चाहता हूँ। तो दूसरा कहता है - सत्यवादी - ये छोड़ दो, अभी छोड़ दो। कि नहीं! नहीं! सोचता हूँ, धीरे-धीरे छोडूँगा। अरे! धीरे-धीरे क्यों छोड़ता है? धीरे-धीरे कैसे छोड़ेगा असत्य को? धीरे-धीरे माने आज कितना छोड़ेगा? कि आज ५० प्रतिशत छोडूँगा। तो छूटा कुछ? थोड़ा छूटा? माने झूठ और सत्य ये भी कुछ आधे और पाव होते हैं? २५ और ५० प्रतिशत होते हैं? अरे! सत्य १०० प्रतिशत (cent percent) और असत्य भी १०० प्रतिशत।
ये दर्शन १०० प्रतिशत सत्य है ये, इसमें रंच (मात्र भी) अविश्वास करने की बात नहीं है। यह कहकर आचार्य हमको एक बहुत बड़ी राहत देते हैं, बहुत बड़ा आराम देते हैं कि - अब तुमको सुख और शांति के लिए, और उस आत्मा के स्वरूप को जानने के लिए अन्यत्र नहीं घूमना पड़ेगा। हमारा कितना परिश्रम और कितना परिभ्रमण समाप्त हो गया है? बोले असली चीज मिलती है तो वो केवल इस प्रतिष्ठान पर, इस दुकान पर मिलती है। तो फिर कौन बुद्धिमान है जो भटकेगा?
इसी तरह हम भटकेंगे? कि साहब! कहते हैं। आत्मा की बात तो सब करते हैं। सब करते हैं, ये अद्वैत, वेदांत भी करता है। बिल्कुल जैनदर्शन जैसी बात करता है वो। बिल्कुल जैनदर्शन जैसी। अरे! पर जैनदर्शन जैसी बात जैनदर्शन नहीं है क्योंकि उसमें संपूर्णता होनी चाहिए। केवल एक बात लेकर अगर किसी ने कह दी है तो वो तो बिल्कुल असत्य है, सत्य का अंश नहीं है। सत्य कभी भी आँशिक नहीं होता है। क्योंकि पदार्थ सत् है और उसका जो संपूर्ण विवेचन है, उसका जो संपूर्ण ज्ञान है, वो सत्य है। ये सत्य की परिभाषा है और क्या है?
उसकी चर्चा गाथा करती है और ये विधि बताती है। हमारे सारे प्रश्नों का उत्तर इस गाथा में है। हमने ये तो समझ लिया। जगत का स्वरूप समझा, आत्मा का स्वरूप समझा, अब क्या करें? ये एक प्रश्न (कि) अब क्या करें? कि अब तुम ये करो। गाथा का विषय, आत्मा की परमानंदमय अनुभूति करना हो, तो ये विधि है उसकी। क्योंकि जगत के पास तुम्हारे लिए कुछ नहीं है। तुम स्वयं जगत के उत्कृष्ट तत्त्व हो। इसलिए जगत से सारी आशायें और सारी अभिलाषायें छोड़ दो। वो तुम्हें कुछ देनेवाला नहीं और तुम्हें (उनकी) आवश्यकता नहीं। तुम स्वयं इतने भरचक हो, आत्मा इतना भरचक है, संपत्ति से, गुण के निधानों से कि उसमें एक चप्पा खाली नहीं है - कहाँ रखोगे? कैसे समायेगा उसमें? अनंत गुण नहीं कहे आत्मा में? अनंत। एक परमाणु में भी अनंत गुण। परमाणु! जो (कि) दूरबीन से भी नहीं दिखाई देता (है) और आत्मा तो उससे भी महान है। वो गुण माने उसकी संपत्ति, उसका धन, उसके रत्न - रत्नों का पिटारा है आत्मा।
ये एक बार विश्वास में (तो) आए - हमें तो आत्मा की एलर्जी हो गई है। आत्मा आते ही कहते हैं ये फिर आत्मा आ गया। अरे! आत्मा नहीं आ गया, तू परमेश्वर आ गया, तेरे गीत गाए जा रहे हैं ये। भगवान तीर्थंकर हमारे गीत गाते हैं। बोलो! इससे बड़ी क्या बात होगी? भगवान तीर्थंकर की वाणी, इसमें किसके गीत आते हैं? हमारे नहीं आते (हैं)? हमारे आते हैं। अनंत तीर्थंकर जिसका यशोगान करें, ऐसा पारमार्थिक उत्कृष्ट तत्त्व मैं हूँ, इसका नाम सम्यग्दर्शन है।
होना चाहिए … कि उसमें जो महापाप हैं, वे समाप्त हो जायें। भाई! जिन पाप परिणामों के होने पर ये तत्त्वज्ञान, आत्मा की सुंदर चर्चा सुनी ही नहीं जा सकती, अच्छी नहीं लगती, तो वे पाप परिणाम तो निश्चितरूप में छोड़ने ही लायक होते हैं। भाई! कंठ ही बंद हो गया हो तो भोजन कैसे उतरेगा? इसलिए उसको खुलने लायक तो करो। ये जो पाप परिणाम हैं, तीव्र पाप (के), निरंतर उसी-उसी का जगत ही जगत का विचार, आत्मा का तो कभी विचार आवे ही नहीं। यह भी विचार नहीं आवे कि मैं इतना उत्कृष्ट तत्त्व, इतना पवित्र तत्त्व होने पर भी, सचमुच मैंने अपने भावों में कैसे-कैसे कुकर्म किये हैं? और जगत का एक अणु भी मेरा ना होने पर भी मैंने इस जगत पर अपने अधिकार घोषित किए, इससे बड़ा पाप और कौन हो सकता है? कौन बर्दाश्त कर सकता है इस बात को? कौनसा राष्ट्र बर्दाश्त करेगा कि उसकी एक इंच भूमि को कोई ले ले? पाकिस्तान बर्दाश्त करेगा कि हिंदुस्तान बर्दाश्त करेगा? और यदि ये हो जाएगा तो? हो जाएगा तो दो आदमी लड़ लेंगे कहते हैं। दो आदमी नहीं लड़ लेंगे? महायुद्ध होगा एक इंच भूमि के लिए।
और इस अपराधी आत्मा ने, शुद्ध होने पर भी, शुद्ध माने कोई मिलावट नहीं (है) इसमें। लेकिन अपनी कल्पनाओं से, अपने आसपास इकट्ठे हुए पदार्थों को अपना घोषित किया। जैसे वो बावला व्यक्ति नदी के किनारे खड़ा होकर राजा की सेना आती है तो कहता है कि ये सब मेरा है। और आज्ञा देता है - चलो आओ, इधर आओ, यहाँ खड़े रहो। और वो राजा जाने लगता तो (कहता है कि) कहाँ जा रहा है? पागल है। आत्मा भी उन्मत्त हुआ है। तो दिन और रात क्या होता है? तो क्या छोड़ दें? छोड़ दें तो ये वाणी भी पापमय है। क्योंकि छूटा हुआ था उसे क्या छोड़ेगा? तूने किया ही कब था वो? तूने एक नया पैसा कमाया ही कब था जो अब छोड़ रहा है? कि दुकान छोड़ दूँ? अरे भई! दुकान हुई कब थी तेरी? तू दुकानमय कब हुआ था जो अब छोड़ रहा है? हुआ ही नहीं था। वो तो छूटी ही हुई थी। छूटी हुई होने पर भी महा अपराध करके तूने उसके साथ अपनत्व किया। बस! यही निगोद है, जिसको निगोद कहते हैं। सजा मालूम है क्या होती है उसकी? करोड़ों वर्षों की आयु हो उसमें भी मौत का डर लगे। और वहाँ एक श्वास में १८ बार जन्म और १८ बार मरण। ये किसका फल है? केवल इसका फल कि जो चीज हमारी नहीं है उस पर हमने अपने अधिकार घोषित किए, लेकिन चीज हमारी कभी नहीं बनी। तो नहीं बनी तो फिर अपराध क्या हुआ? कि ये जो तेरी मनशा खराब है, जो दंड है, वो हमेशा मनशा का लगता है। काम का नहीं लगता। अभिप्राय (intention) खराब है। उस intention को ठीक करने के लिए आचार्य हमें विधि बताते हैं।
अपनी १४४वीं गाथा है और कर्ता-कर्म अधिकार है। कर्ता-कर्म की चर्चा तो इतने से में समझ लेना कि जो हमारा चैतन्य (है), सत्ता है हमारी आत्मा जिसे कहते हैं, जीव भी कहते हैं, जीवास्तिकाय कहते हैं, चैतन्य तत्त्व कहते हैं कई नामों से पुकारा जाता है। उसके अतिरिक्त एक अणुमात्र के प्रति अपना अधिकार घोषित करना, उसकी क्रिया को करनेवाला अपने आप को मानना, उसको ग्रहण करने वाला (मानना), उसे छोड़नेवाला अपने आप को मानना - ये अपराध है। तो इसमें सारे कर्ता-कर्म का अंत हो जाता है। यहाँ तो आचार्य यहाँ तक आए थे - ये जो अपनी अंतिम गाथा है, इसके पहले आचार्य …
आत्मा का अनुभव करने से पूर्व क्या होता है? और यदि कोई उस प्रक्रिया में अटक जाता है तो वो भी अपराध है। वो भी आत्मा तक नहीं पहुँचता (है)। ये प्रक्रिया पहले आचार्य ने दी। तो सारे जगत को न्यारा जाना। अपने भीतर उत्पन्न होनेवाले मोहादिक - मोह माने मिथ्यादर्शन। मिथ्यादर्शन माने जो हमारा नहीं है उसे हम अपना माने, इसका नाम मिथ्यादर्शन। आत्मा हमारा है, उसको अपना ना माने। आत्मा परमशुद्ध तत्त्व है क्योंकि उसमें किसी की मिलावट नहीं है। उसको अशुद्ध माने दुःखी माने, इसका नाम मिथ्यादर्शन।
हम कहते है न, दुःख नहीं है क्या? दुःखी नहीं हैं क्या हम वर्तमान में? दुःख नहीं है, दुःख (तो) कल्पना से उत्पन्न होता है। सुख वास्तविक है। सुख आत्मा का स्वरूप है। मिश्री को यदि नमक में डाल दिया जाए तो खारी-खारी लगती है। (तो) मिश्री खारी है? इसी तरह आत्मा परमशुद्ध तत्त्व है क्योंकि उसमें किसी की मिलावट नहीं है। लेकिन हम उस मिश्री की तरह आत्मा को अन्य पदार्थों को साथ लेकर अनुभव करते हैं, तो आत्मा की खारी अनुभूति (वह) मिथ्यादर्शन होगी। वो तो होगा ही होगा और क्या होगा? इसका नाम मिथ्यादर्शन है। और मिथ्यादर्शन क्या होता है? एक मिनट में जिसकी धज्जियाँ उड़ जायें, ये ज्ञान हो जाए तो एक मिनट में जिसको बिखेर दे, समाप्त कर दे सदा के लिए - ऐसी ताकत ज्ञान में है। और उस शक्तिवाला आत्मतत्त्व है। इतना साहस भीतर आना चाहिए कि ऐसा निरापद, ऐसा अव्याबाध तत्त्व हूँ कि जिसकी सत्ता तो आज तक कोई समाप्त कर नहीं पाया। नरक में टुकड़े-टुकड़े हुए तो मेरे नहीं हुए, शरीर के हुए। टुकड़े करने की कोशिश तो की गई लेकिन मेरे टुकड़े नहीं हुए, आत्मा के। क्योंकि आत्मा के टुकड़े हो जाते तो (वो) खत्म हो जाता। फिर मोक्ष जाने की बात कौन करता? कोई अवकाश ही नहीं रहता।
तो इससे पूर्व जो बात कही, तो ये सारी बातें तो छूट ही गईं कि मैं मोही, रागी, द्वेषी हूँ, अथवा मैं पाप-पुण्य का कर्ता हूँ, पाप और पुण्यभाव मेरे हैं, इत्यादि-इत्यादि। ये सब मिथ्यात्व के अंश है। ये बात तो गई। लेकिन मेरा आत्मा शुद्ध है, आनंद का केंद्र है, अनंत शक्तियों का निधान है, ऐसा आत्मा के अनुभव के पहले चलनेवाला विचार और उस विचार में अटक जाना, संतुष्टि (satisfaction) हो जाए कि मैं तो आत्मा का ही विचार कर रहा हूँ। ये आत्मा का विचार करते-करते आत्मानुभूति हो जाएगी, अपराध है ये। कैसा बेलिहाज दर्शन है ये!
शुद्धात्मा का विचार! तो शुद्धात्मा के विचार को आचार्य ‘पक्ष’ कहते हैं। वो भी निश्चयनय का पक्ष; कि तू पक्ष में पड़ गया है। विचार से क्या होनेवाला है? विचार से तो जगत के काम भी नहीं होते। जब तक विचार रहता है तब तक काम नहीं होता। जब कार्य परिणति होती है तो विचार नहीं रहता। तो आत्मा साक्षात् विद्यमान तत्त्व है, इसमें भरे हुए अमृत को पी क्यों नहीं लेता है? विचार क्या करता है? तब ये कहता है कि विचार आए बिना तो रहता नहीं है क्योंकि जिस आत्मा का अनुभव करना है, उस आत्मा का विचार तो आएगा ही आएगा। तब आचार्य कहते हैं कि आएगा तो सही लेकिन उसमें मुग्ध मत हो जाना। तो विचार की जो श्रंखला है, विचार का जो सिलसिला है, वो समाप्त होकर अनुभूति प्रगट हो जाएगी और वास्तविक (जो) आनंद (है) उसका रसास्वादन होगा। कि जो आत्मा में भरा है… आत्मा में आनंद भरा है, ये बात निश्चय करके सभा में से उठना। आनंद से लथपथ है आत्मा का सारा प्रदेश-प्रदेश।
जिनको आत्मा की सत्ता ही स्वीकार नहीं है उनके लिए जिनवाणी नहीं है। वो तो नास्तिक है। उसको क्या कहा जाए? कि कहाँ है आत्मा? कहाँ है जरा बताओ? ये आँखों से सब दिखते हैं, आत्मा तो नहीं दिखता। पर जो आँखों के बिना दिखता है, उसे आँखों से क्यों देखना (है)? ये तो आँखों के बिना दिखता है आत्मा। वो आँख, कान, नाक से नहीं दिखता है। ये आँख, कान, नाक, इनमें आत्मा को देखने की सामर्थ्य - ये नहीं (है बात)। ये तो बिल्कुल जड़ ही हैं। ये कोई देखने-वेखने का धंधा नहीं करते हैं - ये तो पुद्गल है, इसमें ज्ञान कहाँ है? लेकिन इनके नाम से ही पुकारा जानेवाला ज्ञान, हमारे भीतर का, जिसे मतिज्ञान कहते हैं, उसमें भी आत्मा के अनुभव की ताकत नहीं है। स्थूल है वो। आत्मा सूक्ष्म तत्त्व है। इसलिए उसका अनुभव करने के लिए ज्ञान को भीतर सूक्ष्म बनाना होता है।
तो गाथा अपन पढ़ते हैं। समय तो हो गया भैया। ४५ मिनट दिये थे न? गाथा पढ़ लेते हैं। ये १४४ गाथा है। देखिए!
सम्मद्दंसणणाणं एसो लहदि त्ति णवरि ववदेसं।
सव्वणयपक्खरहिदो भणिदो जो सो समयसारो॥१४४॥
जो सर्व नयपक्षों से रहित कहा गया ये गाथा का अर्थ है ये। टीका तो और भी खुदाई करेगी। वो तो पाताल का शोधन करेगी टीका तो। लेकिन ये तो गाथा का ही अर्थ है। ये जो सिलसिला चला आया है, वर्णन का, उसके संबंध में आचार्य कहते हैं कि - अब तक आत्मा का अनुभव करने के लिए उस आत्मसन्मुख, आत्मार्थी, मुमुक्षु - मुमुक्षु बदनाम हो गया न आज? अरे! मुमुक्षु तो हर ज्ञानी, हर व्यक्ति, हर जीव जो मुक्ति चाहता है उसको मुमुक्षु कहते हैं। सिद्ध कौन नहीं बनना चाहता है? कि सब बनना चाहते हैं। तो मुमुक्षु कहने से घबराते क्यों हो? ‘मोक्तुं इच्छति’। जो मुक्त होना चाहता है, उसको मुमुक्षु कहते हैं। इसमें आचार्य के शब्द आये हैं। ऐसा नहीं घड़ लिया हो सोनगढ़ ने, मुमुक्षु। इसमें शब्द हैं कि जो मुक्त होना चाहता है।
ये सिद्धचक्र विधान का साध्य क्या है? सिद्ध दशा नहीं है? मुमुक्षुता से अगर घृणा करते हो, एलर्जी है, तो उठा दो विधान को। उसकी कहाँ जरूरत है? अरे! सिद्धों के सुख से जो घृणा करता है, मुमुक्षुता से घृणा करता है न? जो उसको नहीं चाहता है, तो वो तो निरंतर संसार में रुलना ही चाहता है। अटवियों में भटकना चाहता है। वो तो नर्क और निगोद में ही रहना चाहता है। ये तो पक्की है बात।
आत्मा पसंद आना चाहिए, अपनी सत्ता पसंद आनी चाहिए। हर अज्ञानी को, हर मिथ्यादृष्टि को, जिसे वह अपना मानता है, वही पसंद होता है। उसी में गहरा ममत्व होता है। और अन्य में? जिसको पराया मानता है (उसमें)? पराया मानता है तो उसके प्रति इतना राग ही नहीं होता। हवाई जहाज में एक्सीडेंट हुआ और उसमें अपना बच्चा भी था। अब सुनते ही तिलमिला गए। उसमें सवा सौ आदमी थे और केवल एक बचा है। तो हम तो रोने लगे। सारे घर में रोना-पीटना मच गया। ठीक है। तो इसके बाद समाचार आया कि आपका बच्चा सुरक्षित है। अब वो दुःख कहाँ गया? और वो जो १२४ मरे हैं उनका क्या हुआ? उनके लिए हमारे १२४ आँसू भी टपके?
तो मिथ्यादर्शन की बात करते हैं अपन, मिथ्यादर्शन। मिथ्यादर्शन में भी जिसे हम अपना मानते हैं, उसके प्रति हमारी इतनी प्रियता, उसके प्रति हमारा इतना स्नेह, गहरा… गहरी प्रीति होती है। तो सम्यग्दर्शन में जहाँ चैतन्य मिल जाए तो उसके भाग्य का क्या ठिकाना है? ये तो चर्चा मिथ्यादर्शन की है। सारा बाजार जल जाए और हमारी दुकान बच जाए, तो देखो फिर, उसके कलेजे का फोटो खींचो। बहुत बुरा हुआ जी, अच्छा नहीं है। आग लग गई सब। अरे! पर देखें तेरे कलेजे का फोटो तो ले लें एक बार (कि) उसमें कितना घाव हुआ है, दर्द कितना है? क्योंकि तेरी (दुकान तो) बच गई न! ये मिथ्यादर्शन की चर्चा है ये तो।
सम्यग्दर्शन में तो जो वास्तव में मैं हूँ और मेरा है। मैं ही मेरा हूँ, और जगत में मेरा हुआ भी कौन है? होता भी नहीं है और मैंने तो प्रैक्टिकल देखा है ये। ये जितने हैं सारे के सारे, इनमें कौन रह जानेवाला है? और इन सब में मेरा ममत्व फैला है। तो कौन रह जानेवाला है? कोई रहनेवाला नहीं है, लेकिन मैं तो रह जानेवाला हूँ। नर्क में भी रहूँगा, निगोद में भी रहूँगा। निगोद में १८ बार जन्म और मरण कहा गया लेकिन मैं मरा नहीं। बताओ! कैसी विचित्र है बात? आत्मा नहीं मरा, १८ बार जन्म और मरण होकर भी। वो जन्म और मरण कहने की बात (है)। कहने की माने, नहीं हुआ सो (ऐसा) नहीं। वो भी एक घटना घटी, लेकिन फिर भी आत्मा तो सुरक्षित रहा। नहीं रहता तो हम सब आए कहाँ से, सारे के सारे? जितने भी सिद्ध हुए, वो भी वहीं से आए सारे के सारे। तो सबके रहने का एक ठिकाना (है) खास। और सब वहाँ से, हम सब वहीं से आए हैं। तो बचकर कैसे आ गए जब १८ बार मरे और जन्मे तो? कि आत्मा मरता ही नहीं है, उसका स्वरूप ही यह है। क्योंकि अनादि-अनंत किसे कहते हैं? जिसका कभी जन्म नहीं हुआ और जिसको कभी मौत आती ही नहीं है।
तो जिसने आत्मा का यह स्वरूप जाना कि ना मेरा जन्म होता है और ना मैं मरता हूँ और ना कोई मेरे भीतर प्रविष्ट हो सकता है - जगत का पदार्थ (हो) भयंकर से भयंकर। अणुबम हो भले ही, प्रलय हो भले ही, लेकिन वह मेरे भीतर प्रविष्ट नहीं होती। कितना निर्भय और निश्चिंत हो गया वो? एक वरदान की तरह से। ऐसा स्वरूप केवल जिनवाणी बताती है। और ये आत्मा की सत्ता का निश्चय करने के लिए इतना काफी नहीं है। कि ये जो जान रहा है ये कौन है? ये मैं जानता हूँ या नहीं जानता हूँ? कि जानता तो हूँ। तो जानता है वही तो आत्मा होता है। अरे! अरे! आँख बंद करके यदि किसी ने मिश्री खाई है और फिर वो पूछता है कि ये मिश्री क्या होती है? अरे! तुझे ये जो मीठा-मीठा लग रहा है यही तो मिश्री है। और क्या होती है मिश्री? तो आत्मा तो आँख बंद करके भी उसका स्वाद होता है, लिया जाता है। और ये जो ज्ञान है, जानना है, कि जो और जड़ पदार्थों में नहीं पाया जाता - पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल - ये जड़ हैं, अचेतन हैं। इनमें ज्ञान भी नहीं (और) आनंद भी नहीं। इनमें नहीं पाया जाता लेकिन केवल मेरे में पाया जाता है।
तो ये जो प्रति समय जानना-जानना चलता है यही तो मैं हूँ, यही तो आत्मा है। आत्मा की सत्ता सिद्ध करने के लिए कितनी युक्तियाँ चाहिए? कोई बहुत बड़ा लॉजिक, विधान चाहिए? ये हूँ तो सही मैं क्योंकि अन्य पदार्थों में… ये लाउड स्पीकर जानता नहीं है, ये इंद्रियाँ नहीं जानती हैं। पाँच इंद्रियाँ जो कही जाती हैं और दुनिया में जो भेद किए जाते हैं, ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रिय इत्यादि, नहीं है वो बात। ये प्रतिसमय जानना स्वयं मेरे अनुभव में आता है कि मैं जानता हूँ। बस वही आत्मा। हो गया आत्मा का निश्चय। और यह निश्चय जिनवाणी के अतिरिक्त और कोई नहीं कराता। निष्पक्ष भाव से बिल्कुल! क्योंकि सारे दर्शन नये हैं (वे) कल्पना से खड़े हुए हैं। और ये सर्वज्ञ और वीतराग का दर्शन है। ये कहना द्वेष नहीं पर परमसत्य है। ये जीव को सन्मार्ग पर लाकर मुक्ति भेजने का विधान है ये। हित की बात नहीं कही जाए? हित की बात।
एक प्रोफेसर कहेगा कि जो विद्यार्थी हैं वे सब गलत टीचर के पास पड़े हैं। और सब गलत ही गलत है। तो जो सही प्रोफेसर है, वो ये नहीं बोलेगा कि तुमको अब तक सब गलत पढ़ाया गया है। तो वो झूठ बोला? वो उनका द्वेषी है? तो जिनवाणी द्वेषी है? अरे! (जिनवाणी तो) जीव का हित चाहती है, परम हित चाहती है। क्यों व्यर्थ कष्ट पाता है सुख का निधान होकर? दुःख क्यों पाए जीव? कष्ट का नाम-निशान जिसके भीतर नहीं है। कष्ट (तो) कल्पना से खड़ा होता है। और जो सुख है वो तो उसका स्वरूप ही है, उसके साथ घुलामिला है। लेकिन विस्मरण हो गया है इसलिए अनुभव में नहीं आता।
कोई भी वस्तु घर में हो, तो उसका पता नहीं है तो खायेंगे कैसे? और बनेगी कैसे? इसलिए अनंत शक्तियों का निधान जो आत्मतत्त्व है, संपत्तिशाली, उसके अनुभव की ये गाथा है। कैसे अनुभव हो उसका? ऐसी मन में एक आतुरता पैदा होना चाहिए। जब सर्वोत्कृष्ट तत्त्व और वो भी मैं हूँ और उसी का विस्मरण, भुलावा, मुझे सदा से रहा और ये जिनवाणी माँ बार-बार उसकी याद दिलाती है, प्रेरणा देती है, एक बार तो उसका अनुभव कर। एक बार उसका स्वाद आ जाएगा तो कभी जीवन में विस्मरण नहीं होगा। दूसरे में चित्त नहीं लगेगा। सारे जगत से प्रीति टूट जाएगी और केवल एकमात्र उस चैतन्य में ही प्रीतिवंत हो जाएगा। ये माँ के स्वर हैं असली। जगानेवाली माँ! थपकी दे देकर सुलानेवाली नहीं। ये थपकी है ये। समयसार की गाथायें ये आत्मा को जगानेवाली थपकियाँ हैं। मधुर-मधुर थपकियाँ, संगीत है ये। समयसार आत्म-संगीत!
तो जो सर्व नयपक्षों से रहित कहा गया माने जो जिसको अपने संबंध में, अपनी शुद्धता के संबंध में, अपने निधानों के संबंध में होनेवाले विचार, वो आत्मा के अनुभव के पहले आते तो हैं। लेकिन जो बुद्धिवंत होता है, प्रबुद्ध होता है वो उन विचारों में संतुष्ट नहीं होता। वो उस विचार कक्षा को भी छोड़ने लायक मानता है। उसको आतुरता ये रहती है कि ये विचार क्यों लंबे होते हैं? काम क्यों नहीं होता है? मुझे तो अनुभव करना है क्योंकि मैं तो आनंद का प्यासा हूँ। और ये विचार उस आनंद में बाधा हैं। जब तक विचार करता हूँ तब तक आनंद मिलता नहीं है। उसको कहते हैं नयपक्ष, उस विचारकोटि को, चिंतन की कोटि को।
वह समयसार है; वो समयसार है माने? वो जो अनुभूति है वही समयसार है। जिसमें सर्व नयों के विचार अर्थात् आत्मा संबंधी सर्व प्रकार के विचारों का, विकल्पों का अंत हो गया है, वो समयसार है। इस समयसार को ही केवल सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान ऐसी संज्ञा मिलती है। ये जो अनुभूति हुई उसी का नाम सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान है। टीका …