जैनदर्शन समीक्षा (बाबू युगल जी) | Jain Darshan Sameeksha (Babu Yugal Ji)

जैनदर्शन समीक्षा

पूज्य बाबू युगल जी के प्रवचन, भाग 1 से 8

पोस्ट:
जैनदर्शन समीक्षा, भाग 1
जैनदर्शन समीक्षा, भाग 2
जैनदर्शन समीक्षा, भाग 3
जैनदर्शन समीक्षा, भाग 4
जैनदर्शन समीक्षा, भाग 5
जैनदर्शन समीक्षा, भाग 6
जैनदर्शन समीक्षा, भाग 7
जैनदर्शन समीक्षा, भाग 8

खोज: जैनदर्शन समीक्षा, Jain Darshan Sameeksha, Jain Darshan Samiksha, जैन दर्शन समीक्षा, Babu Yugal Ji, Jugal Kishor Yugal, बाबू युगल जी, युगलजी, जुगलकिशोर युगल

जैनदर्शन समीक्षा, भाग 1

पूज्य बाबूजी ‘युगल’ जी, कोटा
जैनदर्शन समीक्षा - भाग १

हमारे चिंतन ने एक नई करवट ली है यह हमारे सौभाग्य का विषय है। सचमुच तो जितना हमारा जीवन बीता है, इसमें इस चिंतन का ही संपूर्ण महत्व है। शेष जितना कुछ हमने सोचा हो कुछ करने के नाम पर, वह सब तो व्यर्थ गया। अगर वह व्यर्थ नहीं हुआ हो तो हमें उसे व्यर्थ कर देना चाहिए क्योंकि जब तक हमारी स्लेट (slate) उससे बिल्कुल साफ नहीं होगी तब तक उस पर ये नया चिंतन अंकित नहीं होगा। इसलिए समझना चाहिए कि हमने अपने जीवन में पहले चाहे कितनी ही मेहनत की हो, लेकिन वह मेहनत हमारे लिए नहीं थी। हमने हमारे लिए मानी थी लेकिन हमारा उससे नुकसान ही नुकसान हुआ है। इसलिए आज का ये चिंतन, यदि हम इसे आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध होकर एकत्रित हुए हैं और आप लोग यहाँ पधारे हैं, तो ये निश्चित ही हमको कोई विलक्षण उपलब्धि देगा ऐसा मेरा विश्वास है।

यह चिंतन हमारे जीवन के लिए नया है क्योंकि हमने इस दिशा में और इस संबंध में कभी सोचा नहीं है कि जीवन का उत्कर्ष और उसके अनेक तरह-तरह के धरातल हमने बनाए हैं, लेकिन वे सब पतन के कारण रहे। यदि आज हम इस दिशा में इस प्रकार से सोच पायें तो निश्चित ही हमारा जो गंतव्य है वह मंगलमय होगा। और उसकी जो उपलब्धि है वो सर्व महान होगी।

‘नये वर्ष का नया उपक्रम’ - मैं ऐसा सोचता हूँ कि हम लोग सत्य की शोध के लिए प्रतिबद्ध हुए (हैं)। उसका अर्थ यह है कि अब तक हमने सत्य को पहचाना नहीं था और इसीलिए हमें तरह-तरह से और अनवधि काल से, अपरिमित काल से भटकना पड़ा। लेकिन हमारी समस्या ज्यों की त्यों खड़ी रही और यदि इस दुर्लभ जीवन को, दुर्लभ अवस्था को पाकर भी हम उसकी शोध नहीं कर पाये, अपना सही मार्ग, सत्य मार्ग तलाश नहीं कर पाये तो जीवन को बहुत बड़ा खतरा है।

बीते हुए जीवन में हमें जो तरह-तरह की उपलब्धियाँ हुईं (हैं), उनको अपने साथ जोड़कर हमने अपने आप को अधिक माना। उनके अनायास चले जाने पर हमने अपने आप को काफी हीन माना और (ये) चिंतन की यह जो विधि है यह हमको डुबो देने की विधि है। इसलिए सचमुच ये जो उलझा हुआ सा जीवन है और उस उलझे हुए जीवन में हमें आज इस विश्व में, इसे ठीक करने के लिए, सुंदर बनाने के लिए, जो तरह-तरह के विचार मिलते हैं… एक तरह के तो वे विचार नहीं होते। परस्पर विरुद्ध और भिन्न-भिन्न प्रकार के विपरीत प्रकार के विचार अपने इस जीवन के साध्य को ढूँढ लेने के लिए, पा लेने के लिए हमें मिलते रहे हैं। लेकिन यह एक बहुत बड़ी समस्या है कि उन तरह-तरह के विचारों में से - जिनको हम अनेक प्रकार के दर्शन भी कह सकते हैं - उनमें से किसी एक ऐसे विचार की सजग होकर, सावधान होकर, अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से तलाश कर पाना और फिर अपने परम सौख्य को प्राप्त कर लेना यह हमारे जीवन का एक बहुत बड़ा दायित्व है, यदि हम चले आए कष्टों का अंत करना चाहें (तो)।

भारतवर्ष में ईश्वर, जीव और जगत के नाम पर अनेक विचारधारायें पनपीं और उन्होंने इस संबंध में अपने तरह-तरह के विचार बनाकर एक दर्शन खड़ा किया। इस तरह अनेक दर्शनों का जन्म हमारे देश में हुआ। हमारे देश में जितने दर्शन हैं, कुल मिलाकर सारी दुनिया में उतने दर्शन नहीं हैं… भारतवर्ष में इतने दर्शन हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जीव के परम सौख्य और शांति के लिए सोचनेवाले भारतवर्ष में सर्वाधिक महर्षि और विद्वान हुए।

पाश्चात्य (western) देशों में तो अधिकांश केवल भौतिक जीवन किस तरह सुखमय हो सकता है - इसकी प्रधानता रही (है) और आज भी हम देखते हैं कि वे दर्शन अथवा वे देश इसी राह पर चलते हैं और उनकी भी शिकायत यह है कि हम आराम में नहीं (हैं), सुखी नहीं (हैं)। किसी को अगर जीवन का मूल्य लगता है तो वे भारतवर्ष की ओर देखने लगते हैं। क्योंकि उनको वहाँ यह बात मिल ही नहीं पाती कि जीवन की रचना सदा के लिए सुंदर कैसे हो सकती है। इसका अर्थ यह है कि भारतवर्ष एक विशिष्ट देश (है) इस वर्तमान विश्व का, अथवा भरतक्षेत्र का रहा है और यहाँ चिंतनशील पुरुष, चिंतनशील व्यक्तित्व बहुलता से हुए हैं। और उनका मूल विषय जैसा अभी हमने चर्चा की - ईश्वर, जीव और जगत इन पर सोचना रहा।

कहना चाहिए कि ईश्वर, जीव और जगत पर पैदा हुए जो विचार हैं और जो विश्वास हैं, इसी का नाम दर्शन है। यह एक अलग बात है कि उस चिंतन में हम इन तीनों बातों का सही निश्चय कर पाये हैं अथवा नहीं कर पाये हैं, ये बिल्कुल भिन्न बात है। भिन्न ही नहीं बल्कि बहुत स्पष्ट है कि भारतवर्ष के जितने भी दर्शन हुए इन बातों पर विचार करनेवाले, उसमें मूल चीज तो वही रही है कि जीव का कल्याण कैसे हो? उसे सुख कैसे मिले? सब (दर्शनों) का मुख्य (मूल) तो यही रहा है, केवल एक दर्शन को छोड़कर। चार्वाक (दर्शन) को छोड़कर। उसने भी चर्चा तो सुख की ही की है लेकिन उसका चिंतन इतना गहरा नहीं है। अन्य दर्शनों ने तो इस पर सोचा है। लेकिन हमारी बुद्धि वहाँ भ्रमित हो जाती है और चक्कर खाने लगती हैं, जब हम देखते हैं कि इन तीन विषयों पर - ईश्वर, जीव और जगत पर - उन दर्शनों ने, दर्शनकारों ने, उन दर्शन के प्रवर्तक जो महर्षि हुए, उन्होंने जो सोचा है, उन सबकी विचारधारायें भिन्न-भिन्न और विपरीत हैं। एक दर्शन जो कहता है दूसरा दर्शन उससे बिल्कुल दूसरी बात कहता है। और साथ ही यह भी कहता है कि ये झूठा है। तो वो उसको झूठा कहता है (और) इस तरह सारे ही दर्शनों में परस्पर भिन्न विचारधाराओं के कारण ये दार्शनिक लड़ाईयाँ होती रहीं।

आज तो ज़माना बदल गया है। ये दर्शन का ज़माना ना रहकर आज तो युग एकदम भौतिक हो गया है और उसकी जो दौड़ है वो अर्थ के पीछे (है)। सारे जगत की दौड़ वो अर्थ को एकमात्र अपना ध्येय बनाकर, उसी पर यह अपना सारा परिश्रम व्यय करती है। कोई जानता भी नहीं है कि भारतवर्ष में कितने दर्शन हुए और उनके विचार किस-किस प्रकार के थे? ये आज कोई सुनने को तैयार नहीं (है), सोचने को तैयार नहीं (है), जानने को तैयार नहीं (है); (कहते हैं) कि हमको इससे क्या करना है? क्योंकि इससे रोटी थोड़ी (ना) मिल जाती है। और रोटी का सवाल अथवा रोटी के प्रश्न का हल किसी दर्शन ने नहीं किया। इसने तो जीव के दुःख की समस्या का समाधान तो दिया है लेकिन ये ऐसे हल दर्शनों में नहीं मिलते (हैं)। पर सबसे बड़ी समस्या हमारे सामने यह है कि उन सारे विचारों में से और सारे दर्शनों में से हम सत्य को कैसे निकालें? क्योंकि जब वे परस्पर भिन्न-भिन्न और विपरीत हैं और वे स्वयं भी परस्पर एक दूसरे को झूठा कहते हैं, एक दूसरे को दार्शनिक गालियाँ भी देते हैं। (वे) बुरा नहीं मानते हैं लेकिन, जैसे (कि) लोक में गाली-गलौच होता है, उस तरह दर्शनों में भी दार्शनिक गालियाँ दी जाती हैं। लेकिन वहाँ बुरा नहीं माना जाता है, (बल्कि) उत्तर दिया जाता है।

तो सबने उत्तर दिए हैं। लेकिन हमारे लिए जो सबसे बड़ा प्रश्न है वो यह है कि इनमें से सत्य कौन है? क्योंकि सभी तो सत्य नहीं हो सकते। सारे ही न्यारी-न्यारी बात (और) भिन्न-भिन्न प्रकार की बात मुक्ति के संबंध में कहते हैं। मोक्ष सब ले जाते हैं; स्वरूप उसका भले ही जो कुछ भी माना गया हो, लेकिन सब ये कहते हैं कि मुक्ति का सही मार्ग हमारे पास है। तो इसमें हमारा उत्तरदायित्व और अधिक बढ़ जाता है कि सब तो मोक्ष ले जा नहीं सकते क्योंकि मोक्ष के इतने रास्ते तो हो नहीं सकते हैं।

जो सुख है उसका तो स्वरूप एक ही प्रकार का है। तो उसके रास्ते न्यार-न्यारे नहीं हो सकते। ये बात हमारे सोचने की (है) कि इन अनेक दर्शनों में जो मुख्य दर्शन अपने देश के - नैयायिक, वैशेषिक, सांख्य, योग, पातांजलि, मीमांसा - ये खास दर्शन कहे गए (हैं)। जैनदर्शन, बौद्धदर्शन, उनको भी दर्शन माना तो गया है लेकिन वे छहों ही दर्शन इन दोनों दर्शनों को नास्तिक कहते हैं और अपने आप को आस्तिक मानते हैं। क्योंकि उनके आस्तिक्य की जो परिभाषा है वो (उनकी) अपनी है, स्वयं की है। और वो यह है कि जो ईश्वर को मानता है - एक ईश्वर को - वो आस्तिक है। जो एक ईश्वर की सत्ता स्वीकार नहीं करता वो नास्तिक है। जैन और बौद्ध - ये एक ईश्वर की सत्ता स्वीकार नहीं करते (हैं) इसलिए इन दोनों को उन दर्शनों ने नास्तिक दर्शन कहा। लेकिन आस्तिक्य और नास्तिक्य की परिभाषा पर इस तरह किसी दर्शन को घटाना यह विवेकपूर्ण नहीं है। द्वेषपूर्ण तो हो सकता है, द्वेषपरक तो हो सकता है।

जैसे एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को गलत कहता है तो वो व्यक्ति भी उसको गलत कह सकता है। और कहता ही है कि तुम हो गलत। इसी तरह उन दर्शनों ने जैनदर्शन और बौद्धदर्शन को नास्तिक कहा, तो जैनदर्शन और बौद्धदर्शन उनको भी नास्तिक कह सकते हैं। क्योंकि आस्तिक्य की परिभाषा ये तुम्हारी बनाई हुई है, वास्तविक नहीं (है)।

आस्तिक तो हम उसको कहते हैं कि जो अस्ति पर विश्वास करे। और तुम तो केवल एक ईश्वर पर विश्वास करनेवाले को आस्तिक कहते हो कि जिस ईश्वर की सिद्धि भी नहीं होती, तो जिस ईश्वर का पता भी नहीं है और जिस ईश्वर की अनुभूति आज तक कोई कर भी नहीं पाया। कहता भी नहीं है कि - हाँ! मुझे ईश्वर की अनुभूति हुई (है)। इतना माना जाता है कि वो ईश्वर जगत में सबसे बड़ा है और उस पर समर्पित होने से वो मिल जाता है। वो अपने पास बुला लेता है - इतना माना जाता है। लेकिन ये कोई नहीं कहता कि मुझे ईश्वर की अनुभूति हुई। बल्कि ये कहते हैं कि वो जो ईश्वर है, वो मन-वाणी से अगोचर है। जो मन और वाणी से अगोचर हो तो उसकी अनुभूति कैसे हो सकती है? तो वाणी जिसके स्वरूप को नहीं कह सकती, तो ज्ञान उसके स्वरूप का अनुभव कैसे कर सकता है? तो इस तरह जो अनुभवगोचर ही ना हो, तो उस पर हमारी श्रद्धा, उस पर हमारा ज्ञान और उसके प्रति हमारा आचरण ये गतिमान हो भी कैसे सकता है?

तो हमारे लिए सबसे बड़ा जो कष्ट है, वो यह है कि अनेक विचारधाराओं में से हम सही मार्ग कैसे तलाश करें? यह एक दर्शनों का सघन वन है, घना जंगल है कि जिसमें से निकलना … जंगल में से तो शायद निकला जा सके लेकिन यदि कोई अत्यंत कुशल और प्रवीण बुद्धिवाला ना हो तो दर्शनों के जंगल में से निकला नहीं जा सकता। और अंत में वो निराश होकर स्वयं नास्तिक हो जाएगा कि कुछ नहीं है। ये सब बकते हैं, बकवास करते हैं। लेकिन हमारी ऐसी स्थिति ना हो(गी) यदि हमने आज यह एक मंगलमय उपक्रम प्रारंभ किया। क्योंकि हम तो कटिबद्ध होकर और इस जीवन का जो वास्तविक जो ध्येय और लक्ष्य है, उसकी तलाश करें।

सत्य के विपरीत भले ही दर्शनों ने बोला हो लेकिन सत्य का अभाव कभी नहीं हुआ है। और जो सत्य है वो सनातन होता है। लेकिन सत्य की तलाश वह केवल अपने मन की कल्पनाओं से नहीं की जा सकती है। जहाँ मन की कल्पनाओं से सत्य की शोध और सत्य की तलाश की गई (है) - माने जीव के सुखी होने की गारंटी दी गई - तो वहाँ एक दर्शन तो बन गया। लेकिन साथ ही उसने जो वादा किया था, वचन दिया था (सुख प्राप्त करवाने का) उससे वो भटक गया। वह जीव को मुक्ति नहीं दे (सकता है)। इसका कारण ये कि यदि सत्य सनातन है तो फिर उसका आलम्बन लेकर ही हम जीव को मुक्ति के लिए आश्वस्त कर सकते हैं और वही दर्शन सच्चा हो सकता है।

इसलिए मैं जैनदर्शन की बात अभी आपको नहीं कर रहा हूँ। हम आगे करेंगे लेकिन अभी इसलिए नहीं कर रहा हूँ कि यदि प्रारंभ में ही उसकी चर्चा कर दी जाए तो फिर अंधविश्वास से (हम) यह मानने को तैयार हो जायेंगे कि जैनदर्शन ही सच्चा है। हमारा प्रयत्न यह हो कि ये जितने भी विचार हैं, इन विचारों में से हम स्वयं सोचकर किसी ऐसे विचार की तलाश करें, ऐसे विश्वास की तलाश करें कि जो वास्तविक हो, हमारी बुद्धि, तीक्ष्ण बुद्धि … इसके लिए बुद्धि तीक्ष्ण और सूक्ष्म चाहिए। इसके लिए व्यावसायिक बुद्धि नहीं चाहिए। जिस बुद्धि से हम व्यवसाय करते हैं उस बुद्धि से हमें दर्शन की उपलब्धि, सत्य की उपलब्धि नहीं हो सकती है क्योंकि वो स्थूल होती है। इसलिए सूक्ष्म और तीक्ष्ण बुद्धि से हम उस सच्चाई को शोध कर और उसको निश्चित करें कि वास्तव में ये जितनी कुछ बातें दर्शनों के द्वारा मुक्ति की गारंटी के रूप में कही जा रही हैं, ये सब (के सब) सच्चे नहीं हो सकते। सारे ही सत्य नहीं हैं। इनमें केवल एक ही सत्य हो सकता है।

हमारा प्रश्न यह हो सकता है कि सारे ही झूठे हों तो? कि यदि सारे ही झूठे हों तो इसका अर्थ यह हुआ कि हम यह तो कहते हैं कि जगत में सत्य विद्यमान है और वो सनातन होता है और यदि आज तक किसी ने उसे उपलब्ध नहीं किया तो फिर वो सत्य है ही नहीं। क्योंकि यदि सत्य और सत् स्वरूप यदि कोई चीज है तो फिर वह उपलब्ध भी होना चाहिए। उपलब्ध नहीं हुई इसका अर्थ यह है कि वो है ही नहीं। कोई नहीं कर पाया वह एक अलग बात है लेकिन वह अवश्य प्राप्त होनी चाहिए यह हमारा आग्रह (ही नहीं) है, अनुरोध है (और) बल्कि युक्ति से संगत चीज़ है ये कि है यदि मार्ग तो वो अवश्य मिलना चाहिए।

(दर्शन) सनातन है तो फिर उस पर चलनेवाले भी सनातन हुए। मार्ग सनातन है ये हमने कैसे कहा? जान कर ही तो कहा है कि ये सनातन है अर्थात् उसमें लोग जाते रहे हैं। और जिनको उसका पता नहीं था, उसे बतानेवाले भी विद्यमान रहे हैं। ये कुदरत की एक इतनी सुंदर व्यवस्था सत्य की शोध में रही है कि जिसकी कोई मिसाल और उपमा नहीं है। इसलिए जब हम ये दर्शनों के झमेले की बात सुनते हैं तो हमारा मस्तिष्क चकराता है। क्षुब्ध होता है। लेकिन जब हम उन दर्शनों में से इस पहलू पर चर्चा करते कि सनातन सत्य तो रहा है, तो निरंतर उसके यात्री भी रहे हैं। और जिनको उसका पता नहीं था - सदा से पता (तो) होता नहीं है। तो जिनको पता नहीं था तो उस मार्ग को बतानेवाले भी विद्यमान रहे हैं और इस तरह सत्य का जो मार्ग है और उस पर चलनेवाले जो यात्री हैं, वे भी सनातन रहे हैं। माने ऐसा कभी नहीं हुआ कि वो मार्ग कभी (भी) खाली रहा हो। तो हमें इन सारे दर्शनों में से यह तलाश करना है कि वो मार्ग कौनसा है, वो विचार और विश्वास कौनसा है कि जो हमें सत्य का सही दर्शन करा सके और फिर हम स्वयं अपने पौरुष से, अपनी बुद्धि से, उस मार्ग का अनुशीलन कर सकें।

दर्शनों का जो जन्म हुआ है, अनेक दर्शनों का, वह बात बहुत कठिन नहीं है। क्योंकि बुद्धि की तीक्ष्णता तो अनेक विषयों में होती है। वो तो तिर्यंचों तक में, जानवरों तक में हम देखते हैं कि उनमें किसी विषय की जितनी तीक्ष्ण बुद्धि होती है उतनी मनुष्यों में भी नहीं होती है। पक्षी जो अपना घोसला बनाते हैं वो आदमी नहीं बना सकते। तो उनमें भी कुछ बुद्धि की तीक्ष्णता होती है। इसलिए सूक्ष्म और तीक्ष्ण बुद्धि ये तो मनुष्यों के पास रही है। और उसमें उस सनातन सत्य का सहारा ना लेकर अपनी बुद्धि से जो चिंतन किया और वो जहाँ तक पहुँच पाया कि बस इससे आगे कुछ नहीं है, यह मनुष्य के साध्य का अंतिम है। यदि वो इतना कर लेता है तो उसे साध्य अर्थात् मुक्ति अवश्य मिलेगी। वहाँ जाकर उसका चिंतन समाप्त हो जाता है और वह एक दर्शन बन जाता है। जितने भी दर्शन बने हैं, वे सनातन सत्य का सहारा ना लेकर उनके ज्ञान और उनकी बुद्धि ने इसके लिए जो सोचा (है) और जितना वे सोच पाये (हैं), जहाँ तक वे सोच पाये (हैं) और उससे आगे उनकी बुद्धि को कोई मार्ग नहीं रहा बल्कि उन्होंने वहाँ उसकी पूर्णता कर दी कि बस! इससे आगे कुछ नहीं, यदि इतना कर लेता है जीव तो अवश्य-अवश्य मुक्त हो जाएगा - वो एक दर्शन बन गया।

इतने दर्शनों में … दर्शन तो और भी हैं। आज इस आधुनिक युग में नए-नए दर्शन भी खड़े हुए। पहले तो थे ही सही लेकिन आज बिल्कुल नए खड़े हुए। रजनीश का भी अपना एक दर्शन था जो किसी से नहीं मिलता था। नाम जरूर लेते थे वे कभी महावीर का, कभी बुद्ध का लेकिन वो मिलता किसी से नहीं था; वो उनका अपना था। और इसीलिए वो रजनीश-दर्शन कहलाया भी सही लेकिन उसका ढेर हो गया फिर। इसी तरह और-और (दर्शन हैं)। दर्शन माने हमारे विचारों ने जो थोड़ा बहुत अनुसंधान किया और फिर उससे आगे हम रुक गए माने सोच ही नहीं पाये कि इससे आगे भी कुछ हो सकता है - बस! उन्होंने उसे दर्शन नाम दे दिया।

चार्वाक ने इस संबंध में सोचने का प्रयत्न ही नहीं किया। उसने तो सीधा कह दिया कि दर्शन में कुछ ज्यादा विचार की आवश्यकता ही नहीं है। ये जो वर्तमान हमारा रूप है, ये जो अवस्था है, बस! ये खाने-पीने और सुखी रहने के लिए है। इसके समाप्त हो जाने के बाद, विलीन हो जाने के बाद, ये जो शरीर है, वो पंच भूतों में मिल जाता है। पंचभूतों से बना था, उन्हीं में मिल जाता है। बस! समाप्त हो जाता है। तो किसका आना और किसका जाना? वो तो ये कहकर चुप हो गए। तो उसने तो जीव को भोग की खुली छूट दी है कि खाओ-पियो और जैसे अंग्रेजी की कहावत है “Eat, Drink and Be Merry”। यही बात चार्वाक में कही है कि “जब तक जीयो, सुख से जियो। खूब ऋण करके घी पियो क्योंकि ये देह समाप्त होने के बाद किसका आना और किसका जाना?” लेकिन इससे तो हमारी चिंतनधारा एक समय में ही झुठला सकती है कि आखिर जिस सुख की तुम गारंटी दे रहे हो, वो है कहाँ? कि जब तक जीयो सुख से जीयो। माने कैसे जीये? प्रश्न तो यह है कि हम तो सुख से जीना चाहते हैं लेकिन ये दुःख के पर्वत आ पड़ते हैं इसका तुम्हारे पास क्या समाधान है? कैसे जीयेंगे? तो उसने तो कहा कि कोई कष्ट पावे, कोई कुछ भी हो लेकिन तुम तो आराम से रहो। क्योंकि इसके बाद कुछ नहीं है। तो वो तो यहाँ खत्म हो गया, वो दर्शन। इसलिए उसमें सुख के लिए भ्रष्ट मार्ग सोचे गए और वो भौतिकतायें अति को भी पहुँची।

आज भी है, सब है। ये अत्यंत भौतिक माने जिनको ना ईश्वर का पता है (और) ना जीव का पता (है), कुछ पता नहीं है। सीधा पता ये कि कुछ ये पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश मिले और जीव पैदा हो गया। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश बिछड़े और जीव खत्म हो गया। तो क्या है ये? ये जो मिला है इसको आराम से क्यों नहीं खाते हो? पर हमारा भी प्रश्न है कि खाना तो आराम से चाहते हैं पर कैसे खायें? उसमें तकलीफें तो बहुत आ जाती है। इसलिए वो तो दर्शन कोई कहने के लिए (ही) उसे दर्शनों की पंक्ति में ले आया गया, लेकिन उसके पास चिंतन तो नहीं है। अन्य दर्शनों ने अवश्य चिंतन किया है (और) वे आगे बढ़े हैं, लेकिन वहाँ भी एकरूपता नहीं है। इसलिए हम किसी को सीधा स्वीकार कर सकें ये संभव नहीं है। और कोई कर भी लेता है।

इन दर्शनों से आदमी के लिए एक बड़ा दुःख भी पैदा हुआ। और वो ये कि ये सब अनेक प्रकार की बात कहते हैं (तो) इनमें से सत्य किसको मानूँ? कहते सब सत्य (हैं) … ये दुकानें सारी सत्य की हैं कि सब जगह असली मिलता है। ये सब लिखा है। लेकिन ये सब बात विपरीत कहते हैं। जो (बात) एक कहता है, दूसरा उसको काट देता है और उसे झूठा कहता है। तो मैं इनको झूठा मानूँ या सच्चा मानूँ? क्या करूँ? ये हमारे लिए, हमारी बुद्धि को कष्ट भी पैदा हुआ और इसमें हमारी बुद्धि का दायित्व, उत्तरदायित्व और बढ़ गया। तब इन सारे दर्शनों का जवाब जैनदर्शन ने दिया।

हमने जैनदर्शन की बात प्रारंभ इसलिए नहीं की क्योंकि हम जितने भी यहाँ हैं (वे) प्रायः सभी जैन-कुल में पैदा हुए हैं। और जो कुल का धर्म होता है वो मोक्ष नहीं ले जाता। इसलिए हम अपने आप को उस कुल में पैदा होकर जैन मान लें तो हम मोक्ष नहीं जायेंगे, हमारी मुक्ति नहीं होगी। तो सबसे पहले ये मीमांसा करके, यह देखकर कि ये जो बाजार है दर्शनों का, इसमें दुकानें बहुत हैं। और सबमें (स्वयं के) असली (होने) के बोर्ड लगे हैं। लेकिन मैं देखता हूँ कि असली कहीं मिलता ही नहीं है। लेकिन असली होना (तो) जरूर चाहिए। कोई सही दुकान अवश्य होना चाहिए - ये हमारी बुद्धि थोड़ा सोचे। और बाजार में जब हम कोई ऐसी अनमोल चीज लेने जाते हैं, तो बतानेवाले भी अवश्य मिलते हैं और हम सही चीज ले आते हैं।

इन दर्शनों के मार्केट में से हमारा कर्तव्य भी यही है कि भले सुनें हम सबकी लेकिन किसी अनुभवी व्यक्ति का कि जिसने सत्य का अनुभव किया हो, उसका सहारा लेकर सत्य वस्तु को, सत्य चीज को (हम) प्राप्त करें - यह कोई असंभव बात नहीं है। हमारे लोक जीवन में भी ये बात असंभव नहीं रही। क्योंकि हम ये कहते हैं कि हम तो जो चीज खरीदने जा रहे हैं, हमें उसका लक्षण, उसके स्वरूप का पता नहीं है। कैसे लायेंगे खरीद कर? लेकिन (फिर भी) हम असली चीज ले आते हैं क्योंकि उसके जाननेवाले हमें मिलते हैं।

इस तरह हमारी बुद्धि पर ही ये ज्यादा निर्भर करता है (कि) इतनी प्रचुर विचारधाराओं में से हम एक ऐसी सही विचारधारा को सुनें और अपनी बुद्धि से हम यह निश्चय करें कि निश्चितरूप में यही सत्य है और यही हमें शाश्वत मुक्ति दे सकती है। तो वास्तव में हमारा ये जो आज का नया उपक्रम है वो सार्थक हो सकता है। हम सांप्रदायिक बनकर… जैन … जैन वो कोई संप्रदाय नहीं है क्योंकि उसमें संप्रदाय का क्या सवाल है? वो तो वस्तु-व्यवस्था पर आधारित है। इसलिए उसमें कहाँ संप्रदाय है? लेकिन हम यदि कुल में जन्म लेकर और केवल इसी को सच्चा मानकर यदि हम इस पर चल पड़ते हैं तो इसका जो प्राण है, जैनदर्शन का, उसको हम पा नहीं सकेंगे। और अपना जो इष्ट है उससे हम वंचित रह जायेंगे।

इसलिए दूसरे दर्शनों से मैंने इस बात को प्रारंभ किया और अब हमारी एक जिम्मेदारी हो जाती है कि हम तलाश करें कि कौनसा विश्वास हमको मोक्ष ले जा सकता है, मुक्ति दे सकता है। तो आयेंगे तो हम यहीं कि सचमुच इन सारे विश्वासों में से केवल एक ये जैन विश्वास ही हमें ऐसा लगता है कि जो बिल्कुल निरपेक्ष है। जो जैसा है वैसा कह देता है। जगत में जैसा है, वस्तु जैसी है वैसा कहता है। इसमें कहाँ झगड़ा है? और सत्य का स्वरूप भी और क्या हो सकता है कि जैसा है वैसा बताये, जैसा है वैसा जाने (और) जैसा है वैसा माने - इसका नाम सत्य है।

तो जैसा है माने जगत कैसा है? उसको जाने और माने और फिर उसमें से जो अपना इष्ट है उसका चुनाव कर ले तो वो जीव अपने जीवन में सफल हो सकता है। और अपने सर्वोत्कृष्ट साध्य को प्राप्त कर सकता है।

तो आज तो हम इतने इस विवेचन के बाद अपने मस्तिष्क पर एक थोड़ा भार लेकर जायें कि हमारा उत्तरदायित्व है कि हम सत्य का चुनाव करें। और वो चुनाव करने के लिए अपनी बुद्धि को तीखा करें, तीक्ष्ण करें। और उसके आगे फिर जैनदर्शन की बात हम सुनें। तब तो निश्चितरूप में वो हमारी अपनी बन सकेगी अन्यथा वो भगवान की बनकर रह जाएगी। भगवान की भगवान के पास रहेगी। हमारे पास वो यदि आएगी तो हमारी जो सजग बुद्धि है। उसके द्वारा ही उसे हम अपना बना सकेंगे। और तब निश्चितरूप में अपने जीवन की रचना, सुंदरतम रचना जिसे हम सिद्ध दशा कहते हैं, उसे प्राप्त कर सकेंगे। बस! आज की अपनी बात यहीं समाप्त करते हैं।

… इसके संबंध में मैं इसके स्थायित्व के लिए अपनी ओर से तो आपको कोई विश्वास नहीं दे सकता, लेकिन आपसे विश्वास अवश्य चाहता हूँ। हम लोग जो आए हैं, उनको आज की बात कुछ थोड़ी अच्छी लगी हो और आगे भी इससे और अच्छी बातें परस्पर मिलकर हम कर सकेंगे, तो हम लोग बराबर जिम्मेदारी पूर्वक आयेंगे और कुछ नोट्स (notes) इसके लेंगे। क्योंकि सेमिनार (seminar) टाइप आपने इसको रखा है कि पहले कुछ विवेचन हो और इसके बाद उस पर प्रश्नोत्तर हों। तो यह एक बड़ा हमारा उत्तरदायित्व का कार्यक्रम है। ऐसा नहीं है कि जैसा हम प्रवचनों में करते हैं, कि बरसो से सुनते आए लेकिन एक लाइन हमने लिखी नहीं। एक भी कोई महत्त्वपूर्ण लाइन हम याद रखने का प्रयत्न करते नहीं। तो इससे तो फिर इस कार्यक्रम का हमारे लिए कोई उपयोग होगा नहीं। यदि इतना आप कर सकें कि जो बात आवे, मुख्य-प्रमुख बात आवे, अपने हित की ही सारी बात होगी तो उसे हम नोट करें। उस पर हम स्वयं प्रश्न बनावें और उनका उत्तर प्रथम तो हम अपने से ही पावें। अपने से नहीं मिलता है तो हम मिल-जुलकर इसका समाधान अवश्य-अवश्य करें क्योंकि प्रश्नों में जब तक उलझन रहेगी तब तक मस्तिष्क क्षुब्ध रहेगा। समाधान पाकर ही मस्तिष्क शांत होगा, प्रसन्न होगा।

तो ये रूप यदि इस कार्यक्रम का हो, तब तो हम इसे आगे चलायें यदि आप तैयार हों तो, व्यवसाय से छुट्टी लेकर। और यहाँ जो कुछ भी हम बात करते हैं उसको केवल, उसकी कुछ लाइनें लिख लेने मात्र से हम मुक्त हो गए, वो मैं नहीं चाहता हूँ। लेकिन यहाँ जो बात आवे उस पर आप दिनभर-रातभर सोचने के लिए तैयार हों। यदि इतनी बड़ी जिम्मेदारी हम ले सकें तब तो इसे चलाइये, क्योंकि यह वस्तु ऐसी है। और यदि ये अभिनय रखना हो तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है। आज का अभिनय हो गया। अब आगे व्यवस्था बनती है तो ठीक है। … ये आप लोग स्वयं देख लीजिए।

दूसरा यह है कि जैसे आज हम आए हैं और कल आधे रह जायें अथवा उससे कुछ थोड़े और घटकर रह जायें अथवा ज्यादा आ जायें तो भी झगड़ा है। तो ये एक सुनिश्चित बात हो तो ये बात चल सके।

जैनदर्शन समीक्षा, भाग 2

फिर भी उनके ज्ञान में इतनी सूक्ष्मता होती है कि वो ये जान लेते हैं कि हमारा जो प्रोफेसर है वह कुशल है, निष्णात है। और जब पूछा जाता है (कि) कैसे हैं तुम्हारे अध्यापक? कि बहुत अच्छे है। और कोई यह कहता है कि वो तो जानते ही नहीं, वो तो बहुत गलतिया करते हैं, ऐसा वो कह देता है। इसलिए हम जो चर्चा यहाँ करने लगे हैं, उसमें हमारी एक जवाबदारी होती है कि मुक्ति माने सर्व दुःखों से छूटना, सर्व कष्टों का अंत। यह हमारे अंतःकरण का स्वर हो कि अब तो सचमुच बहुत हैरान हो चुके हैं और अब बर्दाश्त नहीं होगा, सहा नहीं जाता है अब। ऐसी भीतर से भूख उठती हो। केवल प्रतिकूलताओं में नहीं लेकिन अनुकूलता में उठती हो। केवल नरक में नहीं लेकिन स्वर्ग में उठती हो - तो पात्र है वह अन्यथा अभी तक वो यदि इसमें भेद करता है तो वो पूरा का पूरा अपात्र है।

एक बार प्यासे को थोड़े समय के लिए पानी मिल गया और उसके बाद वर्षों की छुट्टी हो गई। तो स्वर्ग के जो आकर्षण है वे थोड़े समय के लिए मिल गए और इसके बाद छुट्टी हो गई। ये कैसा सुख है? सुख में जीने वाला और सुख से बना हुआ आत्मा, वह सुख से वंचित कब तक रह सकता है? आत्मा सुख का बना हुआ है, आत्मा ज्ञान का बना हुआ है, सदा से ही। नया ज्ञान और नया सुख उसमें आना ही नहीं है। नये ज्ञान और नये सुख की उत्पत्ति होना ही नहीं है। पर हम कहते तो हैं कि आत्मा में ज्ञान उत्पन्न होता है, आत्मा में सुख उत्पन्न होता है, उसका अर्थ केवल इतना होता है कि आत्मा यह जान लेता है कि मेरे भीतर सुख है। इसका नाम सुख का उत्पन्न होना (है)। सुख लाया नहीं जाता (है)। सुख है। सुख का परिमाण आत्मा में अनंत है। सुख का परिमाण आत्मा में इतना है कि जो कभी अतीत और व्यतीत नहीं होता यह उसका लक्षण है।

जबकि जगत के सुख का लक्षण यह है कि वह अतीत हो जाता है, व्यतीत हो जाता है। और जो सुख में ही जीने वाला है जल-जंतु की तरह, वो उससे वंचित कैसे रह सकता है? इसलिए सुख की उत्पत्ति का अर्थ यह है (कि) एक बार आत्मा ये स्वीकार करे कि मैं सुख का ही बना हुआ हूँ। सुख स्वरूप ही मैं हूँ। क्योंकि कष्ट की जितनी कहानी है, यदि उसको संक्षेप में कहा जाए तो वह केवल इतनी है - आत्मा ने सुख का अनंत परिमाण अपने भीतर होने पर भी और आत्मा की काया स्वयं सुख की बनी होने पर भी उसने अपने भीतर सुख का नितांत अभाव माना है, इसलिए उसे किसी दूसरे के पास जाना पड़ा है क्योंकि सुख तो उसे चाहिए। इसलिए वो जाता है।

प्यासे को पानी चाहिए, भले ही वो रेगिस्तान की मृगतृष्णा में जाए अथवा वह किसी भरे हुए सरोवर के पास जाए। यह बात दूसरी है कि उसकी प्यास बुझेगी अथवा नहीं बुझेगी लेकिन वह जरूर जाएगा क्योंकि उसे पानी चाहिए। इसी तरह आत्मा सुख का भूखा है और उसने यह जाना नहीं है कि वह मिलता कहाँ है? किस जगह है? इसलिए वह (सुख) अत्यंत निकट होने पर भी वह उसे तलाश करने को निकल पड़ा है और यही दुःखी होने की एक मात्र कहानी (है)। क्योंकि वह चूक गया उसको। जिस समय जलाशय आया उस समय जानवर ने आंख बंद कर ली और वह पास ऑन (pass on) हो गया, वहाँ से निकल गया, इसके बाद फिर रेगिस्तान का चक्कर आया और जलाशय आया और उसने आंख बंद की। और ये कहानी चलती ही रही।

इसलिए हमारे जीवन के लिए यह आवश्यक हुआ - हम एक बड़ी महत्वपूर्ण चर्चा कर रहे है। यह बात मान कर चलना चाहिए। क्योंकि यदि जीवन में यह निर्णय नहीं होता है तो जीवन पूरा का पूरा बर्बाद है और अब तक की जितनी बर्बादी है उसका एकमात्र कारण यह है कि हम मुक्ति का रास्ता चाहते तो रहे लेकिन हम यह तलाश नहीं कर पाये और यह निर्णय नहीं कर पाये कि उसका बताने वाला कौन होगा और कौन होना चाहिए।

हमने थोड़ी चर्चा की थी कि जिसको यह प्रतिभास होने लगा हो कि दुःख क्या है और दुःख के कारण क्या है? वह जीव भीतर से सुख चाहता है और तब वह सुख का मार्ग बताने वाले की अपेक्षा का अनुभव करता है, आवश्यकता का अनुभव करता है। जिसको थकावट लगी हो, जगत के सर्व समागम में जिसको थकावट लगी हो। भीतर से जिसका कलेजा कांपता हो। कांपना कोई अच्छी बात नहीं है लेकिन यह कंपन कंपन का अंत करने के लिए होती है। जगत से भय हो लेकिन भागने के लिए नहीं पर भय का अंत करने के लिए (हो)। इसलिए जिसको भय लगा है कि आखिर यह जीवन कहाँ तक बर्बाद होता रहेगा और इन कष्टों को कहाँ तक सहता रहूँगा? ऑपरेशन हो ही जाना चाहिए ऐसा जो महसूस करता है तो उसको यह बात देखनी ही पड़ेगी और बड़ी चतुराई से यह बात देखनी पड़ेगी। भले ही पूछताछ करके उसको पता करना पड़े कि मेरा ऑपरेशन कहाँ सफल होगा और कौन उसको सही ढंग से संपादित करेगा। यह बात मालूम करना ही पड़ेगा क्योंकि जगत में डॉक्टर बहुत है।

इसी तरह यहाँ सुख की घोषणा करने वाले, सुख के स्टॉक (stock) जिनके पास कहे जाते हैं और फुटपाथ पर जिनकी दुकाने है और वे कहते हैं, बुलाते है, आमंत्रित करते हैं, कि तुम एक बार आओ तो और देखो तो। लेकिन यहाँ हमको सजग होना पड़ेगा क्योंकि जगत में वंचक बहुत होते है। इस प्रकार की दुकानें बहुत है इसलिए वहाँ हमें कुशल होना पड़ेगा, चतुर होना पड़ेगा और यह जांच कर ही लेना पड़ेगा कि हमको मुक्ति की बात कहाँ मिलने वाली है। तब हम ये भीतर से अनुभव करने लगते हैं कि यह एक बड़ी जटिल समस्या लगती है। क्योंकि मुक्ति की दुकाने जगत में इतनी है कि जितनी दूसरे माल की दुकाने नहीं है। तो हम कैसे निर्णय करेंगे? लेकिन यह बात बहुत सरल है।

एक बीमार इस बात का निर्णय कर लेता है कि सही चिकित्सक कौन है। कैसे करता होगा वह निर्णय? कि जो चिकित्सा लेते लेते बहुत थक गया है, बहुत औषधिया जिसने ली है, लेकिन जिसको आराम नहीं हुआ है वो जब किसी डॉक्टर के पास जाता है, थका हुआ, और वह उसको पर्चा लिखता है और वह बीमार पर्चा देखता है, तो वहाँ पर दो प्रकार की बात उसको मिलती है। या तो वो यह कहेगा (कि) ये दवाइया तो मैं ले चुका हूँ। आपके पास कोई और हो तो बताइए। या फिर वो यह कहेगा कि हाँ यह इलाज मुझे कुछ सही लगता है। क्योंकि यह निदान आज तक किसी ने नहीं किया। मैं सैकड़ों डॉक्टरों के पास गया हूँ और मैंने उनका इलाज भी करवाया है। तो वो इसका निर्णय कर लेता है और स्वस्थ हो जाता है।

तो हम अपनी अनुभूतियों से इस बात का निर्णय करेंगे कि जो ये कहते हैं, जगत के विविध मंतव्य, जगत के विश्वास और जगत के जो अनेक प्रकार के मत मतान्तर है, वे इस बात को कहेंगे (कि) यही मार्ग सच्चा है, यह रास्ता सच्चा है। तब हम कहेंगे, यह दवाई मैं बहुत बार ले चुका हूँ लेकिन मेरा प्रश्न आज ज्यो का त्यों खड़ा हुआ है। इतना तक कहा अंत में कोई क्या कहेगा? यही कहेगा कि जितने जगत के पदार्थ और संपत्तियां है, नश्वर है, यह देह भी नश्वर है इसलिए इसके साथ प्रेम मत करो और तुम इसको सुखा दो। तुम्हारी मुक्ति हो जाएगी। तो ये सूख जाएगा और तुम्हारी मुक्ति हो जाएगी। तो जो कहने वाला है वो एकदम थोड़ा सचेत तो होगा, सुनने वाला सचेत तो होगा, कि एक के सूखने से मेरी मुक्ति कैसे हो जाएगी?

जैसे बीमारी मेरे भीतर है तो मैं ऊपर से अगर शरीर की सफाई कर लूँ तो वह कैसे मिट जाएगी? अथवा जैसे कोई यह कहे कि अरे होगी ना तुम्हारे पेट में बीमारी क्या फर्क पड़ने वाला है? तुम तो अच्छे से नहाओ, धोओ और अच्छा खाओ, पियो और अच्छे कपड़े पहनो सब ठीक हो जाएगा। बात समझ में आने वाली नहीं। इसी तरह बस अंतिम बात यह मिल जाएगी कि आत्मा के लिए इंद्रिया बहुत दुःखद है, इन्होंने आत्मा को बहुत कसा है, कोसा है, बहुत तकलीफ दी है इसलिए इनका दमन करो। ये सब हो जाएगा।

लेकिन अंत में प्रश्न तो वही रहेगा (कि) सुख लगता तो नहीं है लेकिन। माने जितना जितना इनको सुखाने के प्रति मैं प्रयत्नशील होता हूँ तो उतना उतना ही कष्ट का अनुभव तो होता है। लेकिन इस बीच में कहीं भी सुख की श्वास तो आती ही नहीं है। और क्या कष्टों में से सुख का जन्म होता है? क्या सुख उसे कहते हैं कि जिसका जन्म कष्ट में से हो? इसका अर्थ यह है कि कष्टों में और दुःखों में सुख का निवास रहता है? यह हमारे मंतव्य है। हम जो बैठे हुए जिनवाणी सुन रहे हैं, उनके मंतव्य है कि बिना दुःख पाए तो सुख कैसे आ सकता है? तब तो खूब बीमार हो जाओ और इलाज मत कराओ, तभी तो सुख आएगा ना? वरना कैसे आएगा?

तो प्रत्यक्ष रूप में और अनुभूतियों में यह बात कतई झूठी लगती है। इसलिए हम अपने ज्ञान को तीखा करके यह निर्णय करते हैं, यह निर्णय लेते हैं कि जो मुझे बात कह रहा है वह सचमुच कोई अपूर्व बात है और यह मैंने सुनी नहीं है। एक यह कहता है कि खाओ, पियो ना खूब! क्यों व्यर्थ गहरे पानी में जाते हो? तुमको मालूम है कि बाद में क्या होने वाला है? अरे शरीर के भस्म हो जाने के बाद आत्मा किसको कहते हैं? इसके बाद तो कोई आत्मा बचता ही नहीं है। ऐसा भी एक मंतव्य है जगत में। तो दूसरे मंतव्य है तो सही, इस तरह के, कि जो आत्मा को किसी रूप में स्वीकार करते हैं लेकिन फिर भी वे आत्मा के सही स्वरूप को यदि नहीं जानते, वे आत्मा के कष्ट को और आत्मा के दर्द को यदि नहीं जानते, उसके कारणों को यदि नहीं जानते तो वो चिकित्सा का विधान कैसे बताएंगे? बता नहीं सकते (है) वो।

इसलिए जहां समयसार की प्रारंभ की गाथाओं में यह बात आई ना? कि जब आत्मा से ये कहा गया, एक अपरिचित अज्ञानी को, कि तू तो आत्म तत्त्व है, ज्ञान और सुख का निधान तू है। ऐसा जब उसने सुना तो वो एकदम टकटकी लगाकर देखने लगा। क्यों देखने लगा? इसलिए कि कोई ऐसा कहने वाला मिला नहीं, जिसने आज तक यह बात कही हो, उसका समागम हुआ नहीं, इसलिए सचमुच यह कोई परम हितैषी होना चाहिए। कि जिसको मेरे से कोई अपेक्षा नहीं है, मेरे से कुछ चाहता नहीं है और अनायास जैसे आसमान से उतर कर मेरे को बोलता है (कि) ये क्या करता है? तू तो ज्ञान और आनंद का निधि चैतन्य तत्त्व है। इसने यह नहीं कहा कि तुझे ज्ञान और आनंद इस तरह मिलेगा। कि जहाँ किसी दूसरे का अवलंबन हो और सहारा लेना पड़े यह नहीं कहा उसने। क्योंकि अवलंबन से तो मैं पहले से थका हुआ हूँ। सहारा लेते लेते तो मैं पहले ही परेशान हो चुका हूँ। और अब भी यदि कोई सहारे की बात कहता है, मेरे साथ चलो मैं तुमको सुख दूंगा, मेरी शरण में आओ तो तुमको सुख मिलेगा। तो यह विचार कर इस बात को, कि कहता तो कुछ अच्छी सी बात है। लेकिन यह क्या विचित्र बात है कि जगत का सारा सुख इसके पास इकट्ठा हो गया है और यह कहता है मेरे पास आओ? समझ में आने वाली नहीं है बात।

और आज तो जो लोकतंत्र है, वो लोक में ही इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि हमारे पास झोली फैलाकर आओ अथवा तुम हमारी सर्विस में रहो तो आराम मिलेगा। कि नहीं नहीं ये कोई बात नहीं है। क्योंकि तुम भी मनुष्य हो और हम भी मनुष्य है। इसलिए मनुष्य के पास जो होना चाहिए वो सारा का सारा तुम्हारे पास क्यों इकट्ठा हो जाए? इस तरह इतनी बुद्धि है ना आदमी में? मजदूर और पूंजी के जो झगड़े हैं तो मजदूर कितना पढ़ा लिखा होता है और कौनसे कॉलेज में पढ़ता है? लेकिन वो इस बात को जानता है रोटी तो मिलना चाहिए। ये क्या तरीका है कि हम किसी के सामने झोली फैलाये? नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता है। हम नहीं फैलाएंगे। इसके लिए कोई पढ़ाई करनी पड़ती है? कि नहीं नहीं पढ़ाई नहीं करनी पड़ती है क्योंकि ये तो जीव की वृत्ति है, इसका अधिकार है। इसलिए फिर होता है आंदोलन।

इसी तरह जो ये कहता है कि आओ ना मेरे साथ और तुमको आराम मिलेगा, सुख मिलेगा। कहते है ऐसा कैसे हो सकता है? यह साम्राज्यशाही और यह राज्यशाही ये तो दुनिया में ही समाप्त हो गई, ये धर्म में कहाँ तक चलती रहेगी? और हमें इस जरा सी बात पर जैन दर्शन के प्रति नमरीभूत हो जाना चाहिए कि इस दर्शन ने ये कहा कि जगत में सुख किसी एक के पास इकट्ठा नहीं है और सुख का नियामक कोई एक नहीं है कि जो सबको सुख का वितरण करे। ये दर्शन, ये धर्म सदा से इस बात को बोलता रहा, ये सुनते ही हमारा चित्त जैन धर्म के चरणों में नम जाना चाहिए, हमारा माथा। कैसा विचक्षण है ये धर्म कि जो लोक जीवन में जो सुख के तरीके अनुभव किए जाते हैं और यह तो सदा से ही इस बात को कहता रहा है कि रोटी कपड़ा और मकान तो प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है उसको मिलना चाहिए। इसी तरह मुक्ति वो प्रत्येक आत्मा का अधिकार है और वो उसके पास होना चाहिए। उसके पास होना चाहिए माने उसके भीतर से आना चाहिए। बाहर के वायुमंडल में से नहीं आना चाहिए। क्योंकि इस परतंत्रता से तो वह आत्मा पहले ही थका है।

जब कहा जाए कि सुख बहुत पुण्य के विधानों में मिलता है तब उसका प्रश्न होगा कि पुण्य किसको कहते है? तब कहा जाएगा कि भगवान के पास जाओ, किसी जीव की रक्षा करो। तब ये कहता है इससे तो थककर ही आया हूँ। दूसरे के पास जाते जाते तो थका हूँ ना? वहीं से तो आया हूँ। और कोई पाप की बात कहता है तब भी इसका यही उत्तर होता है कि मैं तो इन बातो से थक चुका हूँ कोई नई बात हो तो बताओ। और इसका अर्थ यह हुआ कि जो आत्मा पराधीनता से थक चुका है अर्थात राग से थक चुका है, द्वेष से थक चुका है, उसको वीतराग की वाणी पसंद आती है। और तब वह ये निर्णय लेता है कि सचमुच मुक्ति को दिखाने वाला वीतरागी ही हो सकता है, सर्वज्ञ ही हो सकता है दूसरा नहीं हो सकता।

हम पहले से ही सर्वज्ञ और वीतराग की दुहाई देने लगे और यह घमंड करने लगें कि हमारे भगवान सर्वज्ञ और वीतराग है, ऐसा अभिमान हमारे भीतर प्रवर्तित तो होता है। लेकिन दूसरी ओर वीतरागता हमको भीतर से पसंद ही नहीं है तो कैसा घमंड है हमारा? यह तो गौरव हमको हो एक बार - हमारे देव वीतरागी है और सर्वज्ञ है। हमको विरासत में मिल गए हैं इसलिए नहीं है लेकिन सचमुच जो मुक्ति का देवता है वो सर्वज्ञ और वीतरागी होना चाहिए क्योंकि राग से सारा जगत दुःखी है। एक बात। और जो जगत को संपूर्ण रूप से जानता है अथवा जिसने जाना है वही सही बात कह सकता है दूसरा तो नहीं कह सकता है। जो पूरी बात जानता ही नहीं हो तो वो कैसे कहेगा? इसलिए वहाँ तो असत्य की संभावना है और असत्य रहता है। तो सर्वज्ञ हो और साथ में वीतराग हो अर्थात जिसको संपूर्ण विश्व का ज्ञान तो हो लेकिन संपूर्ण विश्व में से किसी का ध्यान ना हो, पक्ष ना हो, जिसका मन किसी में अटका ना हो। क्योंकि ज्ञान में यही देखा गया है कि मन कहीं अटकना नहीं चाहिए, वृत्ति किसी में अटकना नहीं चाहिए, ज्ञान में यही तो देखा गया है, विश्व की व्यवस्था में।

ऐसी सर्वज्ञता और वीतरागता जहाँ हो वहीं मुक्ति का सच्चा प्रतिपादन हो सकता है - यह निर्णय एक बार हमको करना पड़ेगा। और हम करें। भीतर से हम यह कहते हैं कि हम तो सर्वज्ञ और वीतराग के उपासक है लेकिन यदि यह प्रश्न हमारे सामने आवे कि देव वीतराग ही क्यों हो? वो होते ही है साहब। तो ऐसा है ये कि हमारे तो शास्त्रों में यही लिखा है, सभी शास्त्रों में। कि वो तो वीतराग होते हैं और सर्वज्ञ ही होते है। अब हम ज्यादा गहरे पानी में तो नहीं जाते। तो होते हैं, क्यों होते हैं? क्यों होने चाहिए? यह वीतरागता और सर्वज्ञता केवल वीतराग देव का धर्म तो नहीं है ना? यह तो प्रत्येक आत्मा का धर्म है। माने जो व्याधि है, तो उस व्याधि की जो औषधि है उसका सेवन प्रत्येक को करना है ना? जिसने बताया है वही पी ले ऐसा तो नहीं होगा। तो सर्वज्ञ और वीतराग वो मुक्ति को बताते तो है लेकिन क्या औषधि भी वही पी लेंगे? पिएंगे तो हम।

इसलिए वो हमारा दायित्व है कि हम यह निर्णय करें, कि ये सामने वाला पुरुष, यह पहले आत्मा है, सर्वज्ञ और वीतराग बाद में है। और सर्वज्ञता, वीतरागता वो इसके भीतर से आई है, बाहर के वायुमंडल में कहीं सर्वज्ञता, वीतरागता नहीं है। और इसके कष्टों का अंत सर्वज्ञता और वीतरागता से हुआ है और यही मुझे कहता है ये, कि एकमात्र सर्वज्ञता और वीतरागता यही सुख का मार्ग है, दूसरा नहीं है। तो यह बात मेरे भीतर से पैदा होना चाहिए। यदि इसका स्वरूप नहीं समझते हैं तो आएगी कहाँ से बात? आ नहीं सकती है। इसलिए तीखे ज्ञान से हमारा ये निर्णय हो कि सर्वज्ञ और वीतराग हमारे देव है, ये बहुत बड़े गर्व की बात है। ये किसी से रिश्वत लेते नहीं, प्रसन्न होते नहीं, तो किसी से नाराज भी नहीं होते। ऐसा क्यों नहीं होता है? क्योंकि ऐसी गुंजाइश ही नहीं है जगत में कि किसी से प्रसन्न हुआ जाए अथवा किसी से नाराज हो ये जगत में ऐसी कोई परिस्थिति नहीं है।

तो हम उन सर्वज्ञ और वीतराग के उपासक है और वही मुक्ति दर्शक है और उनको स्वीकार करने वाले, सर्वज्ञता और वीतरागता का अर्थ समझने वाले और जिन्होंने उसका अनुभव अपने भीतर किया है, उन सर्वज्ञ और वीतरागियों के अनुयायी जो ज्ञानी है, केवल वही मुक्ति का रास्ता बताने के अधिकारी है। दूसरे नहीं बता सकते है। इसलिए इस निर्णय में हमारा एक बहुत बड़ा उत्तरदायित्व तो पूरा हो ही जाता है। लेकिन बहुत बड़ा भार और बहुत बड़ा कष्ट हमारा समाप्त हो जाता है और वो ये कि जब कहने वाले बहुत है तो फिर केवल सर्वज्ञ और वीतराग ही कैसे सच्चे हो सकते है? कि जो सर्वज्ञ और वीतराग है वो ये तो बताया जाए कि वो झूठ बोलेगा कैसे? कैसे कहेगा? दो विशेषतायें साथ में हो तो वहाँ पर असत्य की संभावना ही नहीं है। लेकिन दोनों न्यारे-न्यारे हो तो वहा भी असत्य रह जाएगा। सब कुछ जानता हो लेकिन जिसे राग हो अर्थात किसी का पक्ष हो तो भी फैसला सही नहीं होगा और भले ही किसी का पक्ष ना हो लेकिन जो जानता ही नहीं हो बात को तो वहाँ भी फैसला गलत होगा। होगा ही नहीं।

इसलिए एक न्यायाधीश में हम इन दो तत्त्वों की अपेक्षा रखते हैं। एक जो सही मामला है, सच्चा, तो वो तो ये अपेक्षा लेकर जाता है कि वो न्यायाधीश सही फैसला देंगे और उनको देना चाहिए। क्योंकि एक तो वो कानून का विशेषज्ञ है, दूसरा ये कि उसको दोनों के प्रति समता है। कोई भी उसके लिए छोटा और बड़ा नहीं है। सच्चे और झूठे ये दो है तो सही, लेकिन उसको जो सच्चा है वो बड़ा नहीं है और जो झूठा है वो बुरा नहीं है। वो तो केवल ये बता देने वाला है कि सत्य क्या है और झूठ क्या है। इसी तरह सर्वज्ञ और वीतराग ही केवल मुक्ति का दिग्दर्शक हो सकता है, दूसरा नहीं हो सकता ये हमारे जीवन का पहला दायित्व है, पहली जवाबदारी है। अगर यह नहीं होता है तो हम आगे नहीं बढ़ सकेंगे। क्योंकि हमारा मन विराम नहीं पाता है और यह कहता है कि अभी तो कहने वाली बहुत है और हमें तलाश करना है। सोचना है हमको। लेकिन इसमें अनंत जीवन का अंत हो जाए पर इस बात का निर्णय नहीं हो सकेगा। इसलिए हमारे संतों ने यह कहा, बड़ा करुणामय वचन कहा, जल्दी निर्णय करो क्योंकि समय नहीं है। क्योंकि इसके बाद मृत्यु है, और ऐसी मृत्यु है कि अवसर फिर मिलने वाला नहीं है। जल्दी निर्णय करो। डॉक्टर भी यही कहता है (कि) जल्दी निर्णय करो, ऑपरेशन कराना है कि नहीं कराना? ये कहता है मैं सोचता हूँ साहब क्योंकि डॉक्टर बहुत है।

हमारा मन इतना गंदा हो गया है, धर्म के मामले में, कि हम जैन होकर इसके विश्वासी ही नहीं है। इसका विश्वास हमारे भीतर पैदा ही नहीं होता है और हम दूसरे प्रकार की चर्चायें करते है। समन्वय की चर्चायें करते हैं। यहाँ तक कि उसको बुद्धि की सफाई कही जाए अथवा कोई भयंकर खराबी कही जाए कि हमको जैन नाम में भी बदबू आती है। बहुत लोग कहने लगे हैं ना आज? बहुत लोग माने बहुत पढ़े लिखे, जिनको ज्यादा समझदार कहा जाता है, वो ये कहते हैं क्या ये जैन जैन जैन धर्म की बात करते हो? ये आप धर्म के साथ जैन को क्यों लगाते हो? इसमें तो बदबू आती है। सांप्रदायिकता है, पक्ष है, इसलिए ये जैन नाम नहीं लगाना चाहिए। तब हमें तो सबसे पहले कुछ ऐसी बात एकदम पैदा होती है कि जिन लोगों को जैन नाम पसंद नहीं है, जो अपने आप को जैन नाम से प्रसिद्ध नहीं कर सकते, तो जैनत्व उनके भीतर आएगा कहाँ से?

भले ही जैन यह कोई पक्ष ना हो लेकिन निष्पक्षता भी एक पक्ष तो बन ही जाता है। क्योंकि जैसे जगत में झूठ बोलने वाले लोग बहुत है और सच बोलने वाले भी हैं, कम है, तब जो झूठ बोलने वाले हैं कि वो यह कहते हैं यह जो लोग है ना कुछ, ये सब झूठे हैं। ये कुछ लोग। तो भले ही वह अपना कोई वर्ग नहीं बनाते, बस उनका वर्ग तो केवल यही है कि वो सत्य बोलते हैं और वो अपना कोई वर्ग नहीं बनाते, वो ऐसा वर्गीकरण नहीं करते कि हमारे भीतर कोई शामिल ही नहीं हो सकता, ऐसा नहीं करते हैं ना? लेकिन जिसको शामिल होना हो, भले ही हो, और हम स्वयं ही शामिल नहीं, हम तो सब न्यारे न्यारे है सच बोलने वाले। हमारा कोई वर्ग नहीं है, प्रत्येक व्यक्ति वर्ग है पूरा का पूरा, ऐसा वो कहते हैं। लेकिन फिर भी दुनिया में तो वर्ग की दृष्टि से देखे ही जाते है। इस तरह जैन दर्शन - वो तो केवल वस्तु व्यवस्था का ही प्रतिपादन करता है। वो सबसे पहले यह कहता है, सर्वज्ञ और वीतराग परमात्मा यह बात कहते हैं, कि सीधा हमारी वाणी से बात को मत मानो लेकिन हमारी वाणी में जो बात सुनते हो उसे पहले वस्तु से पूछो कि वो वस्तु ऐसी है या नहीं? वाणी में जो बात आती है वह बात उस चीज में मिलती है या नहीं? अगर चीज में मिलती है तो चीज को मानना वाणी को मत मानना। और इसी को वाणी को मानना कहते है। वाणी नहीं मानी जाती है, वाणी में तो केवल वस्तु का प्रतिपादन होता है, वाणी में वस्तु नहीं होती है। वस्तु को प्राप्त करने के लिए कोई वाणी का परिग्रह करे तो वस्तु नहीं मिलती है।

किसी ने कोई धन का निधान बताया है तो बताने वाले की वाणी में नहीं है, निधान, पर वाणी को सुनकर वहाँ जाना जहां धन गड़ा है। इसी तरह इससे निष्पक्ष देवता और कौन सा मिलेगा जो स्वयं ये कहता है कि मेरी वाणी में नहीं कुछ धरा है। लेकिन इस बात को सुनकर तलाश करना और यदि तुझे मिले तो फिर विश्वास करना। ये उनकी एक गरिमा है, सर्वज्ञ और वीतराग परमात्मा की। इसलिए हम तो उस जैन नाम में ही एक दुर्गंध तलाश करते हैं कि जैन धर्म की बात मत करो, ये जैन नाम मत लगाओ, ये दिगंबर नाम मत लगाओ। कि क्यों ना लगायें? तब हम ये कहते हैं कि आपका नाम? मेरा नाम तो राजेंद्र कुमार है तो सांप्रदायिकता है। क्योंकि नाम में तुमको बदबू आती है कि नहीं? तो ये सांप्रदायिकता नहीं है तुम्हारा नाम क्यों है ये? कि नाम हटाओ अपना। फिर एक परिवार भी एक संप्रदाय है।

माने हमको जब नाम पसंद नहीं है, नाम से तो हमारे मंतव्य और हमारे विश्वास पहचाने जाते हैं। नाम में थोड़ी कोई बात होती है। उससे तो पहचाने जाते है। हम किसी व्यक्ति का नाम नहीं रखते हैं तो पहचान सकेंगे क्या? नहीं पहचान सकेंगे। इसलिए ये प्रवाह जो चला है यह बड़ा गंदा प्रवाह है। दिगंबर शब्द, यदि हमको दिगंबर मंतव्य पर विश्वास है तो हमको लगाना ही चाहिए वरना कैसे पता चलेगा? संभव नहीं है ना पता चलाना? प्रत्येक ही बात। इतनी बात यहाँ तक आती है कि ये किसी संस्था के साथ दिगंबर शब्द हो तो लोग कहते हैं ये सांप्रदायिकता सी लगती है। इसको ये हटा दो आप ये दिगंबर शब्द। तो दिगंबर शब्द हटाएंगे तो जैन भी हटाने की बात कहोगे। हम कहते हैं मनुष्य कहेंगे तो भी यह प्रश्न तो होगा ना, तो फिर ये जानवर भी तो है कि नहीं? तो नहीं ये सांप्रदायिकता छोड़ो क्योंकि जानवरों का भी एक वर्ग तो है। तो ये नहीं है ना? इससे हमारे विश्वासों का पता चलता है, हमारे मन्तवयों का पता चलता है इसलिए वह बात कहना ही चाहिए और उसमें नफरत की कोई बात नहीं है।

तो ये चर्चा कि हम सब एक है अथवा एक हो जाए यह भी अत्यंत गंदी चर्चा है इसलिए क्योंकि ये संभव ही नहीं है। हम इस बात का शोर मचाए, इसके हम नारे लगायें, पर उन नारों में से कोई बात होना तो चाहिए। नारे लगाते जा रहे हैं और होता तो नहीं है कुछ। उसका रूप, समन्वय का और समझौते का रूप तो यह हो कि एक दूसरे पर विसर्जन करे अर्थात अपने विश्वासों को छोड़े तब ना समन्वय हो, अन्यथा कहाँ से होगा? और यह बात पैदा क्यों होती है? माने शक्कर को धूल में मिलाने की बात पैदा क्यों होती है? ये शक्कर अगर न्यारी रहती है तो एक सांप्रदायिकता है, इसको धूल में क्यों नहीं मिलाते हो? धूल में मिलने से इसका स्वरूप क्या रह जाएगा और मिलाने से लाभ क्या हो जाएगा? शक्कर को अपनी जगह रहने दो, मिट्टी को अपनी जगह रहने दो और अपनी जगह रहकर यह लड़े तब कहना। इनमें लड़ाई हो तो बोलना। लेकिन अपनी जगह रहने में लड़ाई नहीं है, लड़ाई वहाँ है जब शक्कर ये कहे, धूल को, कि तू यहाँ क्यों पड़ी है? तू मेरे साथ समझौता कर और मिट्टी यह कहे कि तू मेरे साथ समझौता कर। भीतर यहाँ नहीं रहने देंगे, वरना यहाँ नहीं रहने देंगे। तब होती है बात।

हमारे चित्त में जो एक जबरदस्त शंका है वो यह है कि जब हम ये अलगाव की बात करते है, न्यारेपन की बात करते हैं, कहते है, झगड़ा हो जाएगा इसमें। तो इस झगड़े की आशंका हमको होती है। लेकिन हमारा विचार स्थूल है। झगड़ा वहाँ होता है कि जहां हम अपने विचारों को किसी दूसरे पर थोपते है। भले ही सत्य हो लेकिन सत्य थोपा नहीं जाता है। सत्य का, सत्यवादी को, सत्य दृष्टा को, सत्य का इतना आग्रह नहीं होता कि दूसरा आदमी इस सत्य को स्वीकार कर ही ले, ऐसा साग्रह है, वो किसी को सत्य का स्वीकार नहीं करा सकता। इतनी बात वो जरूर कहता है कि सत्य यही है और जो कल्याण है, जो सुख है, वो केवल इसी रास्ते से मिलने वाला है क्योंकि यह मेरा अनुभूत योग है। मैंने अनुभव किया है। यह बात तो वो कहता है। लेकिन किसी को बलात मनवाने के लिए प्रयास उसका नहीं होगा। झगड़ा तब होगा जब हम बल प्रयोग करेंगे।

आज झगड़े क्यों है? विविध मत मतान्तर है, अनेक जातियाँ है, अनेक वर्ग है, झगड़े की कोई संभावना ही नहीं है। लेकिन जब जैन यह चाहे, दिगंबर यह चाहे, कि सब दिगंबर हो जाए तो झगड़ा होगा। क्योंकि अपने विश्वासों का विसर्जन कौन करे? कोई करने को तैयार नहीं है। होगा नहीं। इसलिए सत्य किसी दूसरे को स्वीकार कराने के लिए नहीं होता लेकिन सत्य तो स्वयं आत्मसात करने के लिए होता है। सत्य अपने भीतर पैदा किया जाता है, वह किसी को देने के लिए अथवा किसी से लेने के लिए नहीं होता।

इसलिए जो लोग अपने चित्त में ये आशंका समझते हैं जैसे आज पारिवारिक व्यवस्था है, ये भिन्न भिन्न परिवार की व्यवस्था सुंदर है या सारे परिवार एक हो जाए तो यह व्यवस्था सुंदर है? सारे परिवार एक हो जाए तो कोई व्यवस्था हो सकेगी? कोई व्यवस्था हो सकेगी? हम इस कल्पना तक पहुँचे कि जगत के सारे परिवार अगर एक हो जाए तो एक आदमी का बुखार भी नहीं मिटेगा। क्योंकि जब उस की परिचर्या का अवसर आएगा तब एक आदमी को हम यह कहेंगे कि भाई जरा लाना, मेरे लिए दवाई लाना। तो साहब इतनी दुनिया पड़ी है, मैं ही हूँ क्या केवल? अरे सारी दुनिया के परिवार है तो मेरे को ही क्यों बोलते हो? ये दुनिया जो पड़ी है ना सारी, उनको बोलो तुम। मेरे को अभी समय नहीं है। लेकिन एक पारिवारिक व्यवस्था में तो आत्मीयता होती है और वहाँ ये सारी बातें बड़ी सुंदरता से संपन्न होती है।

इसी तरह जितने भी मंतव्य है, विश्वास है, उनको हम जहाँ का तहा रहने दें। ये मिलाने की जो चेष्टा है इसमें झगड़ा है। हमें तो लगता ऐसा है कि न्यारे-न्यारे हैं तो झगड़ा है। लेकिन मिलाने की चेष्टा में झगड़ा है। कि एक परिवार जो जबरदस्ती दूसरे परिवार को अपने में मिलाए कि अपन तो एक ही है साहब, अपन तो पासपास ही है। नहीं ये बनेगा नहीं। आप ये छल कपट जरा किसी और को करना, ये हमारे संभव नहीं है ये बात। आप अपने हो और हम अपने है। सबकी न्यारी न्यारी है व्यवस्था बिल्कुल।

इसी तरह जितने भी विश्वास है, मान्यताएं है, वे मंतव्य अपने अपने रहे। झूठ और सत्य का प्रश्न बाद का है। लेकिन सब अपने विश्वासों को लेकर रहे और कोई ईसाई को मुसलमान ना बनाए और मुसलमान ईसाई ना बने। ऐसा ना करे, तभी शांति है। इसलिए हमारे चित्त में जो ये बात पैदा होती है (ये) बनेगा नहीं क्योंकि यह बात संभव ही नहीं है। अपने जो विचार है उनका विसर्जन करने को तैयार कौन है? सबसे पहली बात तो ये है।

हम तो जैन जैन के एकीकरण की बात करते हैं। पर हमको ये प्रश्न भीतर पैदा क्यों होता है कि एकीकरण नहीं होगा तो साहब झगड़ा होगा? अरे बड़े विचित्र आदमी हो? झगड़ा होगा या शांति रहेगी? क्योंकि एक को दूसरे से कोई मतलब ही नहीं है। हर व्यक्ति अपने अपने विचारों में और अपने अपने विश्वासों में निमग्न है और वह दूसरे के मंतव्यों को लेता नहीं तो दूसरे को इस प्रकार का आग्रह करता नहीं। इसमें शांति है या बल प्रयोग में शांति है? दूसरे को अपने में मिलाने में शांति है? है ही नहीं। यह बुद्धि का बहुत बड़ा व्यभिचार है जिसे हमें मान ही लेना चाहिए। कौन करेगा? आज हम जैन जैन के एकीकरण की बात करते हैं। तो करे ना? क्या है बात इसमें? लेकिन सबसे पहला प्रश्न तो यह है कि हम न्यारे कहाँ है? जिन बातों में हम न्यारे हैं उनमें न्यारे है। जिन बातों में हम एक है उनमें हम एक है। लेकिन हम लड़ने की गुंजाइश कहाँ है?

इस संपूर्ण रूप से वर्गीकरण ही समाप्त हो तब ना हम अपने इस ध्येय पर पहुँच सकते हैं। और क्या कदाचित ये संभव होगा? आज तो हमारे प्रयत्न जो इस एकीकरण के हैं उसमें यह होता जा रहा है कि उतने ही मत मतान्तर ज्यादा खड़े होते जा रहे है। नये नये धर्म हम नहीं सुनते है? कि जो भगवान महावीर के जमाने में थे क्या? नहीं थे। लेकिन आज तो अनेक प्रकार के मार्ग खड़े हो रहे है। वाह वाह वाह ही एक धर्म चला है। नया है बिल्कुल और गारंटी देता है शांति की। वो ये कहता है कि हमारी ये भविष्यवाणी है कि 15 वर्ष में इस दुनिया से सर्व कष्टों का अंत हो जाएगा, सारे मत मतान्तरों का लोप हो जाएगा, समाप्त हो जाएंगे और ये सारा जगत एक परिवार हो जाएगा, हमारी ये घोषणा है। ये वाहवाह धर्म कहता है। और ये हो जाएगा? माने कुछ उसकी थोड़ी लाइट तो दिखे कि हाँ होने लगा है थोड़ा थोड़ा। लेकिन बढ़ते जा रहे हैं।

तो जितना हम प्रयत्न करते हैं उतने ही बढ़ेंगे बल्कि इसमें तो छल लगेगा, इसमें तो ठगी लगेगी कि आखिर ये क्यों कहता है ऐसे बात? तो नहीं हो हमारे प्रयत्न कि दिगंबर श्वेताम्बर एक हो जाए। चलो हो जाएंगे। कर लो एक। तो कैसे करेंगे? कि या तो हमारे मुनि कपड़े पहने या उनके मुनि उतारे। बस यही है। और तो कोई तरीका नहीं हो सकता है। फिर कहे साब नहीं दोनों ऐसे ही रहे। तो फिर झगड़ा कहाँ है? दोनों ऐसे ही रहे पर लड़ाई की बात कहाँ पैदा हुई? लड़ने का कहाँ है? न्यारे न्यारेपन में लड़ाई नहीं है।

तो जब हम ये दिगम्बरत्व की बात, ये सम्यकदर्शन-ज्ञान-चारित्र की बात करते हैं तो क्योंकि इसमें हम दूसरों को अलग मानते हैं इसलिए द्वेष पैदा होता है। दूसरों को अलग मानते हैं तो द्वेष पैदा होता है या वीतराग भाव पैदा होता है, समत्व पैदा होता है? दूसरों को जब अलग मानते हैं उसका अर्थ यह है कि हमको इनसे कोई अपेक्षा नहीं है। इनको हमसे कोई अपेक्षा नहीं तो हमको भी इनसे कोई अपेक्षा नहीं इसका नाम अलग मानना है। पास में हम अगर दो पड़ोसी है और हम अलग मानते हैं तो उसका अर्थ यही होता है कि उसकी संपत्ति उसकी है और हमारी संपत्ति हमारी है।

अब हम अपने मन के आग्रह को साकार करने का प्रयत्न करें और एक दिन ये प्रस्ताव रखे कि साहब अपन दोनों एक है। तो एक तो है गरीब और दूसरा (अमीर)। तो यह गरीब का प्रस्ताव इस प्रकार का होगा अपन एक हो जाए कि आपके मन में बात आई क्यों? आप अमीर हो जाओ, मुझे गरीब करने की चेष्टा क्यों करते हो? क्योंकि अमीर बनने की गुंजाइश जगत में है और इस प्रकार के पुरुषार्थ जगत में होते है। इसलिए आप अमीर बनो मुझे तो गरीब मत बनाओ। और इतनी दरिद्रता क्यों है?

तो इसी तरह - यहाँ भी थोड़ा भी कोई एक इंच समन्वय का अवकाश हो जैन दर्शन इस बात से इंकार करता है। जो अलगाव और जो भिन्नत्व है, उसमें पूर्ण शांति है क्योंकि वहाँ अपने में रहकर अपना काम करने की पूरी गुंजाइश है और जहाँ किसी में मिलने और मिलाने की बात है तो वहाँ पर जीवन का व्यवसाय केवल यही होगा कि मैं किसी में मिलू और किसी को अपने में मिलाऊ। वहाँ स्वावलंबन भी नहीं है तो वहाँ स्वाधीनता भी नहीं है।

जैन दर्शन का जो श्रद्धा-ज्ञान-चरित्र है वो इस ठोस आधार शिला पर खड़ा है। तो वो किसी को मनवाता नहीं है यह बात ज़बरदस्ती। बलात नहीं है। भगवान की दिव्यध्वनि किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं होती है। किसी के लिए नहीं होती है लेकिन वो तो बरसती है और जो उस बात को सही मानता है वो उसको स्वीकार करे। इसी तरह हम ये निश्चय करें, सबसे पहले तो, कि मुक्ति का बताने वाला सही व्यक्ति कौन हो सकता है? हम उसको देव संज्ञा देते हैं लेकिन सचमुच तो वो मनुष्यत्व की ही एक उन्नत पर्याय है। जैसे एक तो विद्यार्थी और एक प्रोफेसर। विद्यार्थी माने अल्पज्ञ और प्रोफेसर माने वो विशेषज्ञ। इसी तरह देव माने कोई ऐसा अजब कोई पदार्थ नहीं। देव माने वह मनुष्य कि जो वीतरागी बन चुका है और सर्वज्ञ बन चुका है उसकी संज्ञा देव है।

उसके स्थान पर हम जो कहे जाने वाले देव हैं वहाँ तक पहुंच जाते हैं और तब भी हम भटक जाते हैं क्योंकि हमारे यहाँ तो जो देवत्व है वो मनुष्य की ही पर्याय है, आत्मा की ही पर्याय है और कोई दूसरा देवत्व यहाँ पर नहीं है। वो सर्वज्ञ और वीतराग परमात्मा वो गर्व की बात है सचमुच। वो माथा ऊंचा करने की बात है, हमको तो लज्जा आती है इस बात पर, शर्म आती है, भीतर से मन करता है कि ये तो कुछ अच्छी नहीं लगती है कि हम दूसरों को नहीं मानते हैं। पर दूसरे हैं बस यही उनको मानना है। यही मानना है ना? या हम सबके मंतव्यों को स्वीकार करें इसको मानना कहते है? अपने मंतव्य को धूलधानी करें इसको मानना कहते हैं क्या?

माने आलू को तब माने जब आलू खाए, इसको मानना कहे? तो साहब और सब्जिया तो खाते हैं। फिर आलू को नहीं खाते तो आलू के प्रति तो द्वेष हो गया, दुश्मनी हो गई? माने चप्पल को नहीं खाये तो दुश्मनी हो गई ना उसके प्रति? माने इसको कहते है क्या द्वेष? वो उसके स्थान पर है और वो हमारी वस्तु नहीं, हमारे योग्य ही नहीं है, हम उसके स्वरूप को नष्ट नहीं करना चाहते। उसका स्वरूप उसके साथ रहे और हमको उसकी कोई अपेक्षा नहीं है इसका नाम सचमुच समत्व और वीतराग भाव है।

इसलिए एकीकरण की बात हमारे यहाँ मूल रूप में, विश्व व्यवस्था में ही नहीं है। तो वहाँ पर कोई समुदाय में भी इस प्रकार का एकीकरण संभव नहीं है, उसकी कोई विधि भी नहीं, उसका कोई विधान भी नहीं और यह बात आज तक साकार कभी हुई नहीं है। ढाई हजार वर्ष का इतिहास हम देख लें लेकिन क्या यह बात संभव हुई है? लेकिन मंतव्य तो बढ़ते जा रहे हैं, फिरके बढ़ते जा रहे हैं और हम इधर एकीकरण की बात करते जा रहे हैं। क्यों है यह बात? क्योंकि हमारे पास उसका कोई विधान नहीं है। हम कोई तरीका बताते ही नहीं है। और वो होगा भी नहीं।

इसलिए जैन दर्शन तो यह कहता है कि हम किसी से अपेक्षा नहीं करते, निरपेक्ष है बात। हमको किसी से कोई प्रयोजन ही नहीं है बस ये हमारा धर्म है। हम किसी को अपने में मिलाए या हम किसी में मिले, बस यहीं से झगड़े का प्रारंभ होता है। धर्म के मामले में भी हम इतने निरपेक्ष हैं कि हम सबको जैन धर्म मनवाना नहीं चाहते। जो मानता है तो उसका स्वागत है। उसको सच्चा लगता है तो वो माने लेकिन हम किसी पर जबरदस्ती थोपना नहीं चाहते हैं। अपने मंतव्यों को थोपने की बात और एक करने की बात झगड़े भरी है इसलिए हम यदि इस आग्रह को विराम देते हैं तो फिर सच्चे धर्म की वार्ता और चर्चा शुरू होती है।

जैनदर्शन समीक्षा, भाग 3

पूज्य बाबूजी ‘युगल’ जी, कोटा
जैनदर्शन समीक्षा - भाग ३

यदि आप लोग ऐसा अनुभव करते हों कि हमको तो अब कोई जरूरत ही नहीं रही और एकदम गाथा प्रारंभ कर दी जाये, तो मेरा तो कुछ बिगड़नेवाला नहीं है। लेकिन कहनेवाले में इतनी बात होना चाहिए, वक्ता में कि - श्रोताओं की माँग को इतना महत्व ना दे जितना (कि) श्रोताओं की आवश्यकताओं को। सभा में से माँग तो ना मालूम क्या-क्या आ सकती है। लेकिन उसके पहले श्रोताओं को, और वक्ता को भी… हमको आप अलग मत समझना। क्या आवश्यकता है कि जिस गंभीर बात तक हम पहुँचना चाहते हैं, उसके बिना, माने उसके पहले का काम पूरा किए बिना हम पहुँच नहीं सकेंगे। इसलिए मेरा आपसे एक अनुरोध तो यह भी है कि इस चर्चा को जीवन का एक महत्त्वपूर्ण प्रकरण, एक महत्त्वपूर्ण अध्याय, मानकर हम सुनें। जैसा गाथा में आनेवाला है कि मुक्ति का अभिलाषी जीव सबसे पहले क्या करे? ठीक उसी तरह मुक्ति का अभिलाषी जीव उसके पहले क्या करे - यह बात कम महत्व की नहीं है। और आपका धैर्य ज्यादा ही टूट रहा हो, तो मैं यह आपके सामने कह भी देता हूँ कि आज इस प्रकरण को अपन जैसे-तैसे समाप्त कर लेंगे।

अब प्रकरण अपना यह चलता है कि हमने जो बहुत सी बातें की, वे केवल जैनियों के कर्तव्य हों - ऐसा नहीं था। लेकिन ऐसा माना जाता है, ऐसा समझना चाहिए कि - इतनी बातें जो हमने कीं, वो तो जैनेतर लोगों में भी पाई जाती हैं जिसको लोग नैतिकता के नाम से कहते हैं। सच्चाई और ईमानदारी के नाम से जिसको कहा जाता है वह तो उनमें भी पाई जाती हैं। लेकिन सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के लिए जो एक महत्त्वपूर्ण बात है, वह यह है कि मुक्ति का मार्ग बतानेवाले की पहचान सबसे पहले हो। यदि वह नहीं हो पाती है तो हमने जितनी शुद्धि की है, वो सब वापस गंदी हो जायेगी। आज नहीं तो कल हो जायेगी। हो ही जायेगी और उसकी कोई उपयोगिता (भी) नहीं होगी।

जैनधर्म भगवान सर्वज्ञ वीतराग को देव स्वीकार करता है, सिद्ध परमात्मा को भी देव कहता है। हमारे भीतर इतनी बुद्धि हो कि सर्वज्ञ और वीतराग वो हमारे देव अर्थात् मुक्ति का मार्ग बतानेवाले होते हैं, तो (वे) क्यों होते हैं? और दूसरे क्यों नहीं बता सकते? क्यों नहीं बता पायेंगे? यदि इतनी बुद्धि हमारे भीतर है तो बहुत सारा काम हो जायेगा। हमने कल इस बात पर विचार किया था कि सर्वज्ञ और वीतराग के अतिरिक्त जगत की संपूर्ण व्यवस्था को, भूत, वर्तमान और भविष्य की व्यवस्था को, कोई जान नहीं सकता। और उस व्यवस्था को जानने का अर्थ ही यह है कि किसी भी अन्य वस्तु के प्रति राग ही ना रहे। उसे जानने का परिणाम है ये। क्योंकि विश्व की व्यवस्था ही ऐसी है कि वहाँ राग के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। कोई करता है तो वो कर लेता है, लेकिन ऐसा अवकाश विश्व में कहीं भी नहीं है कि आत्मा को राग करना पड़े और राग से उसका काम चले। ये जैनदर्शन की बौद्धिक बारीकियाँ हैं। यहाँ कोई order (ऑर्डर) नहीं, यहाँ कोई हुक्म नहीं। भगवान हुक्म देते ही नहीं, order (ऑर्डर) करते ही नहीं। वे तो रास्ता बताते हैं।

चौराहे पर खड़ा हुआ जो पुलिसमैन है, वह संकेत करता है। और जो उसके संकेत का उल्लंघन करता है उसका accident (एक्सीडेंट) होता है। यही स्थिति सारे ज्ञानियों की है कि वे संकेत करते हैं। हाथ पकड़कर मुक्ति के मार्ग पर नहीं लगाया जा सकता और लगाना (भी) नहीं चाहिए। हाथ पकड़ कर अगर मुक्ति के मार्ग में लगाया जायेगा तो वो मार्ग मुक्ति का है ही नहीं, क्योंकि वहाँ तो बंधन साथ हो गया है। और वो पुलिसमैन हाथ पकड़-पकड़कर (अगर) ले जायेगा तो किस-किस को ले जायेगा? और तब तक कितने accident हो जायेंगे? इसलिए केवल उसके संकेत को समझ लेने जितनी बात है। और उसकी ओर देखना भी accident है। जितना उसके संकेत की अवज्ञा करना accident है, उतना उसको देखते रहना भी accident है। बहुत जल्दी (और) अत्यंत शीघ्र, उसके संकेत को समझकर अपने लक्ष्य के सन्मुख हो जाना, बस इतना काम है।

इसी तरह कुछ अपेक्षायें लेकर हम वीतराग परमात्मा की ओर देखते रहें, निर्ग्रन्थ गुरुओं से कुछ आशायें करते रहें - अच्छी नहीं ये बात है। ये सब संकेत करने आते हैं। निर्ग्रन्थ गुरु कहाँ हमारे साथ-साथ घूमते फिरेंगे? और वो संभव भी नहीं है। वो कहते हैं तुझे सचमुच अगर अपना काम बनाना है तो मेरे संकेत को तू एक ही क्षण में समझ जाना। तब मुझे यह पता चलेगा कि तुझे अपने लक्ष्य के प्रति प्रीति है। अगर तू उसके सुनने की धारावाहिकता को पसंद करता है तो इसका अर्थ यह है कि तुझे लक्ष्य से प्रेम नहीं (है)। इसलिए संकेत में समझ जाना और मोक्ष का मार्ग इतना ही है।

इसको कदाचित् थोड़ी पराधीनता कह दिया जाये, तो कह दें। लेकिन इससे सर्व पराधीनता का अंत होनेवाला है। क्योंकि वे ये देखते हैं (कि) सुननेवाले की प्यास कितनी है। प्यास लगी है और एक व्यक्ति मिल गया है, जलाशय को बताने वाला। और वो ये कहता है कि वो है तालाब। वो सामने है तालाब। तब फिर कौनसी बात बाकी रह गई? और फिर भी हम जाते नहीं है (और) उसकी (व्यक्ति की) ओर (ही) देखते हैं। और हम (ये) कहते हैं कि आप मेरे साथ चलो। तो वो कहता (है कि लगता है) तुमको प्यास नहीं है। तुम चले जाओ। (तुम) निकम्मे मालूम पड़ते हो (क्योंकि) प्यास नहीं है तुम्हें। क्या है इसमें बात? जाता क्यों नहीं है? मेरे को क्यों साथ ले जाता है? मेरे पास बहुत काम है लेकिन बीच में एक प्रकरण ये आ गया था तेरे को तालाब बताने का, तो मैंने बता दिया है। मेरे पास इससे अधिक समय नहीं है। सभी ज्ञानी यही कहते हैं कि पीछे पड़ने की बात यहाँ पर नहीं है। अंतर से यदि हूँक जागी है, प्यास जागी है, तो यहाँ सांकेतिक होती है भाषा। यहाँ विस्तार नहीं हुआ करता। डॉक्टर के पास जाये तो सांकेतिक भाषा होती है। अगर मगज खाने लग जाये तो डॉक्टर कहेगा (कि) तुम जाओ। मेरे पास इतना समय नहीं है। तुमको समझ जाना चाहिए बस। ऐसा ही मोक्षमार्ग है ये।

इसलिए सबसे पहले कर्तव्य की हम चर्चा करते हैं। इससे यह बात समझ ही लेना चाहिए कि और बाकी जितने हैं, वे सब अकर्तव्य हैं। मुक्ति के मार्ग में अगर पहला कर्तव्य है तो वो यह है कि मुक्ति का रास्ता बतानेवाला कौन हो सकता है और हम उसका निश्चय कर लें। इससे बहुत बड़ी बात होगी। और राग-द्वेष की तो चर्चा ही समाप्त हो जाती है… कि हम किसी को नहीं मानते हैं, तो उसके प्रति द्वेष होगा (अथवा) वो नाराज होगा। मोक्षमार्ग में ये लोकेशना और लोकरंजन ये ज़हर है। यहाँ यशोपलब्धि के लिए और किसी को प्रसन्न करने के लिए अगर कोई बात कही जाती है, शास्त्र की गद्दी पर बैठकर भी, तो अच्छा होता कि हम फुटपाथ पर रहते और अंजन और मंजन की बात करते। यहाँ तो वह बात चलनेवाली नहीं है।

इसलिए हमारा कर्तव्य और हमने चर्चा की थी कि इसमें नाराजी का कोई सवाल नहीं है। पराठे और चप्पल में कोई लड़ाई नहीं है। लड़ाई (तो) हम करवाना चाहते हैं। हम पराठा खाते हैं और पास में चप्पल है लेकिन खाते नहीं है। उनमें कोई झगड़ा नहीं है। यह (तो) हमारे मन में आता है कि ये नाराज ना हो जाये। पर क्यों आता है ऐसा? वो तो दोनों ही न्यारे-न्यारे हैं और उनका समन्वय कभी होनेवाला नहीं है।

इसी तरह यहाँ तो बात सत्य और असत्य की है। सीधी दो टूक बात है। सत्य और असत्य में कभी भी समझौता और समन्वय नहीं होगा। सत्य उसे कहते हैं (कि) जिसमें असत्य ना हो। असत्य उसे कहते हैं (कि) जिसमें बिल्कुल सत्य ना हो। यह हमारे मन की खराबी और खुराफात है कि हम ये कहते हैं कि थोड़ा सत्य तो यहाँ मिलता है (और थोड़ा) कुछ और जगह भी मिल जाता है। यह बात कतई झूठ है, कतई। क्योंकि सत्य अखंड है और वो एक जगह रहता है। कभी ऐसा आदमी नहीं देखा होगा कि जिसका सिर तो उसके पास हो और पैर उसके गधे के पास हों। माने आदमी का संपूर्ण स्वरूप आदमी में ही मिलना चाहिए, तभी तो हम उसको आदमी कहेंगे। सर्वांग होता है वो।

इसी तरह सत्य सर्वांग होता है और वो एक जगह रहता है। कहाँ रहता है? तीन लोक में कहाँ रहता है? कि जहाँ वस्तु है वहाँ रहता है। वस्तु स्वयं सत् है और सत्य है। वस्तु सत् है और वस्तु का दर्शन सत्य है। इसमें क्या है बात? कहाँ सत्य को टटोलना? वस्तु को देखें (तो) सारे विवाद समाप्त हो जाते हैं। सारी बात… बहुत बातें हैं। कहनेवाले मिलते हैं तरह-तरह से…मोक्ष के संबंध में, मोक्षमार्ग के संबंध में। लेकिन हम तो ये देख लें कि सूर्य के उदय के संबंध में यदि कई मंतव्य हमको मिलते हैं तो हम देख लें कि वो किधर उगता है? (फिर तो) समाप्त हो जाती है बात। इसी तरह जैनदर्शन जिस अनेकांत की चर्चा करता है उसको हम देख लें कि प्रति समय वो बात हर वस्तु में और स्वयं हमारे भीतर, वह अनेकांत वर्तता है या नहीं वर्तता है। ये हम क्यों नहीं देख लेते?

इस समय एक राग की वृत्ति हमारे भीतर चलती है और दूसरे समय में द्वेष की वृत्ति आती है। लेकिन राग की वृत्ति समाप्त होने पर हम मर जाते हैं? मरते तो नहीं हैं। लेकिन हम द्वेष तक चले जाते हैं, द्वेष में पहुँच जाते हैं। राग का व्यय हुआ, द्वेष का उत्पाद हुआ और हम राग में भी हैं और द्वेष में भी हैं। तो जैनदर्शन कहता है (कि) वस्तु नित्यानित्यात्मक है। इसमें क्या झगड़ा है? क्या है इसमें बात? इसको अगर हम नहीं स्वीकार करते हैं (तो) लोक व्यवस्था ही बिगड़ जायेगी। क्योंकि जैसे आज एक व्यक्ति किसी को पैसा देता है और एक साल के बाद माँगता है। तो (वह) कहता है कि मैंने तेरे से लिया ही नहीं। तू कैसे माँगता है मेरे से? कि लिया तो था एक साल पहले। और एक साल के बाद तू कैसे रह सकता है? तू तो मर गया है। मर चुका है, वो है ही नहीं। किससे पैसा माँगता है? मानते हैं ये बात? मान ली जायेगी क्या? नहीं मानी जायेगी। क्योंकि हम स्वयं नित्यानित्यात्मकता स्वीकार करते हैं और है वो। तो ये अनेकांत की व्यवस्था हमारे भीतर घटती है और स्याद्वाद भी चलता है।

जिस समय पैसा वसूल करने का प्रकरण आया कि हमारा वजन नित्य पर है। लेकिन क्या (ये) अनित्यता नहीं है? एक वर्ष में ये आदमी उतना का उतना ही है? पहले तो १०० किलो का था और आज ५० किलो का रह गया। तो कहते हैं कि १०० किलोवाले ने दिया था पैसा। अब ५० किलोवाले (से) कैसे माँग सकता है? कि नहीं, तू वही है। सब समाप्त होती है बात। पुलिस पकड़ नहीं सकती चोर को। वो कहता है किसने चोरी की (है) बताओ? कहाँ है चोर वर्तमान में? ये नित्यानित्यात्मकतायें प्रत्येक ही वस्तु में हैं और यही जैनदर्शन कहता है। इसीलिए इसको वस्तु-दर्शन कहते हैं। सर्वज्ञ-वीतराग परमात्मा की घोषणा समवशरण में यही होती है। वे वस्तु की व्यवस्था बताते हैं और आत्मा के भीतर उस व्यवस्था के अदर्शन से, उसको ना जानने से और उसका विश्वास ना करने से जो विकृतियाँ पैदा होती हैं कि जिनके कारण आत्मा दुःखी होता है, उनका अंत होता है। ये सीधी बात है। ये सीधी चर्चा है। वीतरागी संतो का भी यही है।

हमारे मुनि नग्न दिगंबर होते हैं। हाँ! होते हैं। यह बात हम सभी मानते हैं। पर क्यों होते हैं? क्या बात है? ये हमको मालूम नहीं है, पर होते तो वो नग्न दिगंबर ही हैं। कदाचित् कपड़ा हो तो? कि तो साहब किसी जमाने में हो जाये। अब अपन क्या जाने इस बात को? ये नहीं है बात। पहचाना ही नहीं है हमने दिगंबर संतों को। मुनि नग्न दिगंबरी होते हैं ये भगवान अरहंत का हुक्म नहीं है। लेकिन जो नग्न दिगंबर संत बनता है, तो भीतर उसकी योग्यता, उसके परिणामों की योग्यता ही ऐसी होती है कि वो नग्न दिगंबर ही होता है। जिसको ठंड नहीं लगती उसको कपड़ा नहीं चाहिए। जिसको भूख नहीं लगती उसको भोजन नहीं चाहिए। जिसके भीतर शर्म नाम का विकार नहीं है उसको भी वस्त्र नहीं चाहिए। नग्न दिगंबर संत यह नहीं बताते कि - देखो! तुम सब कपड़े पहनते हो इसलिए विकारी हो। (और) हम (तो) शरीर जैसा है वैसा बताते हैं - ऐसा नहीं बताते हैं। लेकिन होता यह है, स्वयमेव ही ऐसा होता कि जहाँ राग इतना कम हो जाता है कि ठंड तो रहती है वायुमंडल में, ठंड का ज्ञान भी मुनियों को होता है। लेकिन ठंड लगती नहीं है, ठंड का ध्यान नहीं होता है। गर्मी वायुमंडल में होती है, इसका ज्ञान भी कदाचित् हो। लेकिन ऐसा नहीं होगा कि आज तो बड़ी गर्मी है, ये मुनि को नहीं होगा। आज बहुत ठंड है ये मुनि को नहीं होगा। कि क्यों नहीं होगा? वो आदमी नहीं हैं क्या? कि आदमी तो हैं। पर आदमी सब एक से ही होते हैं क्या? सब एक से ही हैं आदमी? माने विद्यार्थी और प्रोफेसर एक ही होते हैं क्या सब? जो विद्यार्थी की योग्यता है वही प्रोफेसर की होती है? तो जो हमारी गृहस्थियों की योग्यता है क्या वही मुनियों की हो? तो फिर क्या अंतर रह जायेगा? फर्क क्या रहेगा? इसलिए उनके परिणाम की भाव-भूमि ही इतनी ऊँची होती है। क्योंकि सर्दी, गर्मी, भूख की जो अधिकता है कि जिसमें भूख बर्दाश्त ही ना हो, ऐसी वृत्ति गृहस्थों को होती है। मुनियों को नहीं होती। क्योंकि मुनियों का, ज्ञानियों का, सारा का सारा काम उस राग को ही कम करने का होता है। क्योंकि वो राग ही कष्ट है और वही कष्ट का कारण है। इसलिए जहाँ वो कम हो जाता है वहाँ (पर) ज्ञान कम नहीं हो जाता। लेकिन राग कम होता है इसलिए वहाँ पर वेदन नहीं होता। इस तरह।

हमको अधिक कष्ट महसूस होता है तो इसलिए नहीं होता कि हम मलेरिया की सारी बातें जानते हैं। डॉक्टर को मलेरिया आए तो उसको ज्यादा कष्ट हो क्योंकि वो सब जानता है। अथवा जो नहीं जानता हो तो उसको दुःख कम हो ऐसा भी नहीं है। ज्ञान उसका कारण नहीं है लेकिन राग उसका कारण होता है। और मुनि उस भूमिका को पार कर जाते हैं। अगर पार ना करें तो फिर फर्क क्या होगा? इसलिए जहाँ चित्त में से ये वृत्तियाँ ही समाप्त हो गई हैं और वीतरागता की सामर्थ्य जहाँ पर पैदा हो गई है, वहाँ पर शरीर पर वस्त्र रहते नहीं हैं।

जैसे हम किसी भी अभक्ष्य का त्याग करते हैं तो मुँह से करते हैं क्या? या भीतर परिणाम से करते हैं? भाव से करते हैं, भाव से। जिस समय हम किसी अभक्ष्य को छोड़ते हों, भगवान के सामने खड़े होकर, तो उस समय वो अभक्ष्य हमारे मुँह में होता है? तो फिर कैसे छोड़ते हैं हम? कि हम भीतर से छोड़ते हैं। क्योंकि जिस समय हम खड़े हैं उस समय भी उसकी वासना हमारे भीतर है। (यद्यपि) वो वस्तु तो हमारे भीतर नहीं है उस समय। पर उसकी वासना हमारे भीतर है, उसका विकल्प हमारे भीतर है और हम उसका त्याग करते हैं। तब फिर क्या होता है? आत्मा का काम क्या केवल इतना ही है? कि आत्मा का काम तो इतना ही है। इससे अधिक आत्मा का काम नहीं है। तो फिर खावे तो? कि ये बात कहाँ से आई? खावे तो माने आत्मा को फिर खाने का परिणाम हुआ न? तो फिर छोड़ा कहाँ उसने? कि खाने में कोई एतराज नहीं है क्या? आपत्ति नहीं है क्या? तो खाने का भाव ही पैदा नहीं होता है न! तो खाने का भाव पैदा नहीं होता, तो उस वस्तु का संयोग भी होता नहीं।

ऐसा लोक में हम नहीं देखते हैं? खाने का भाव जब छूट गया है, तो जिस वस्तु को सेवन करने का भाव छूटा है, उस वस्तु का संपर्क भी नहीं होता। उस वस्तु का सेवन भी वहाँ पर नहीं देखा जाता है। एक व्यक्ति उपवास करता है और चार प्रकार के आहार का त्याग कर देता है। तो कहते हैं ये तो मैंने भावों से तो छोड़ दिया लेकिन पुद्गल तो मानता ही नहीं है। तो मैं क्या करूँ? कि तू पापी है बिल्कुल, पाखंडी है। चार आदमियों ने तेरे हाथ पैर पकड़कर कोई ग्रास तेरे मुँह में रखा है? कि नहीं! ऐसा तो नहीं हुआ है। तो जिसने मन से आहार का त्याग कर दिया है, उसके हाथ-पैर आहार की ओर जायेंगे नहीं। उसके मुँह में ग्रास आएगा नहीं। ये नियम है, नियम है ये। इसका अपवाद कहीं भी नहीं है। अपवाद केवल वो है (कि) चार आदमी पकड़कर ग्रास रख देते हैं तो उपवास भंग नहीं होता। उपवास ही है वो तो। भले पेट में ग्रास उतर जाये (मगर) उसका उपवास भंग नहीं होगा। और वो पुद्गल की, जड़ की, क्रिया कहकर अगर सेवन कर लेता है, तो जो सेवन का भाव भीतर पैदा हुआ, उपवास तो भंग हो गया, जो प्रतिज्ञा उसने की थी (उसका)। ये (हैं) जैनदर्शन की बारीकियाँ!

इसलिए नग्न दिगंबर संत की सामर्थ ही ऐसी हो कि उनको इस प्रकार का भाव पैदा ही नहीं होता। क्योंकि राग कम हो चुका होता है इसलिए वे दिगंबर ही होते है। और बहुत सी बातें है। बहुत लंबा तो सुनना भी नहीं चाहते हैं हम, इसलिए जल्दी ही पूरा कर देना चाहिए। ऐसे वीतराग संतों को ही हमारा सचमुच प्रणाम हो और उन्हीं की पूजा हो। पूजा के लायक वे भगवान तीर्थंकर अरहंत (हैं) … तीर्थंकर नहीं पर सारे अरहंत, सारे अरिहंत परमात्मा, अनंत चतुष्टयवाले वीतरागी और सिद्ध परमात्मा। इधर ये वीतरागी संत और उनकी ये वाणी बस! यही हमारे लिए पूज्य होती है। और हमारे लिए कोई पूज्य नहीं है तो सम्मान का भी प्रश्न नहीं है।

बातें बहुत विवाद की हैं। क्योंकि आज का जो ज़माना (है वो) अपने आप को धर्म-निरपेक्ष कहता है कि हम धर्म की झंझटों में नहीं पड़ते। तो भले ही धर्म की झंझट में मत पड़ो लेकिन धर्म के अभाव में होनेवाली दुर्दशा के लिए तो सबको तैयार रहना ही चाहिए। भले ही मत पड़ो।

जैसे कोई चिकित्सा कराए और वो ये कहे कि मैं तो इस झंझट में नहीं पड़ता हूँ, परहेज वगैरह की। आपके पास सीधी-साधी कोई बात हो डॉक्टर साहब, तो आप बता दो। परहेज की दवाई मेरे से सधती नहीं (है)। तो डॉक्टर का तो यही कहना होता है कि तो फिर तुम मृत्यु को सिरहाने लेकर सोया करो। इसका और कोई दूसरा उपाय नहीं है। उन धर्म की झंझटों में नहीं पड़ने वालों की ही दशा आपके सामने अगर कही जाये, तो वो सारे देवी-देवताओं को पूजने के लिए तैयार रहते हैं (मात्र) एक लड़के की बीमारी के लिए। और वे कहते हैं (कि) हम धर्म की झंझट में नहीं पड़ते। उनका मस्तिष्क, वे अपने मस्तिष्क पर गर्व करते हैं। पढ़े-लिखे होते हैं न! इसलिए मस्तिष्क पर गर्व करते हैं। लेकिन उनको अगर कहा जाये (कि) एक देवता ऐसा प्रगट हुआ है, वहाँ जाओ। तो पत्नी को साथ लेकर चले जायें - चलो भाई! चलो! इलाज तो करवाना है न! चलो। और अगर वहाँ उस देवता को मदिरा भी पिलानी पड़े, तो पिलायेंगे। ये बुद्धि के दुश्मन जो कहलाने लायक हैं, उनकी चर्चा है। आज के जमाने की, बुद्धि वालों की चर्चा है (ये)। नहीं कहते हैं लोग और नहीं करते ये सारी की सारी बात?

ज्योतिषियों के चक्कर में निरंतर रहते हैं और ज्योतिषी जो बताते हैं, करेंगे वो। रविवार का व्रत किया करो, तो कर लो। करूँगा। और वो शनि का नगीना पहना करो। और ये किया करो। पीपल में पानी डाला करो, कुत्ते को रोटी दिया करो। ये सब करने को तैयार है और अपने को धर्म-निरपेक्ष कहता है। शर्म नहीं आती है इसको कहते हुए। सब करता है। सारी तैयारी है इसकी करने की। धर्म निरपेक्षता है ये? लेकिन धर्म की सच्चाई को और धर्म के प्राण को कि जो स्वयं इसका प्राण-वायु है, इसका oxygen है धर्म, उसको तलाश करने का इसका मन नहीं (है)। क्योंकि जीवन भोगमय है न! भोग ही जीवन बन गया है, इसलिए बात होती नहीं है। और हम भी जाते थे।

बहुत हैं, बहुत बातें जो (कि) जैन-धर्म में ही चली हैं और जैन-धर्म के नाम पर चली हैं। हमारे यहाँ करते हैं। जिसको गृहीत मिथ्यात्व कहते हैं, उसकी चर्चा आज हम कर रहे हैं। लेकिन हमें कैसे-कैसे, किन-किन को पूजने से ये गृहीत मिथ्यात्व होता है, वो चर्चा नहीं करना है। यहाँ तो सिर्फ वीतराग परमात्मा, निर्ग्रन्थ गुरु और ये उनका साहित्य, उनकी जिनवाणी और उनकी वाणी, केवल उसकी श्रद्धा और उसके ज्ञान से संपूर्ण गृहीत मिथ्यादर्शन का अंत हो जाता है। परिभ्रमण हमको नहीं करना है, लेकिन हमारा मस्तिष्क साफ होने लायक है। ये विषय ज्ञान का है और उसके साथ में भक्ति भी है। नहीं करते (हैं) हम लोग?

आज जो नए-नए मंतव्य प्रगट हुए हैं, उनके पीछे जैनी बुरी तरह लगे हैं और कहते हैं (कि) हम धर्म-निरपेक्ष हैं। बहुत लोग सभा में बैठे होंगे कि जो रजनीश पर मुग्ध हैं। और आज क्या स्थिति है रजनीश की? लेकिन हमारे मस्तक खराब हैं न, क्योंकि हमारे पास कसौटी ही नहीं है। इस तरह हमारा जो मस्तिष्क है वो तो इनका फुटबॉल बना ही रहेगा। आज किसने लात मारी है तो कल कोई दूसरा लात मारेगा। लेकिन हम ठिकाने नहीं लग पायेंगे। लेकिन यहाँ इस परमात्मा के पास आकर मन इतना शांत हो जाता है, शांत हो जाता है। ज्ञान इतना शांत हो जाता है, गंभीर हो जाता है कि उसको जगत के जितने हैं, जितने कुछ कहे जानेवाले हों, उनको सुनने का मन ही समाप्त हो जाता है।

चर्चा चलती हो। एक वक्ता आज तो ऐसे आए हैं…वक्ता, वेदांत के आए हैं, कोई और आए हैं। आए हैं। और कहा जाये किसी ऐसे परीक्षक को, जो अरहंत परमात्मा को अच्छी तरह से जान-मान चुका है, वीतरागी संतो को जान-मान चुका है, उसको अगर ये बात कही जाये (तो) उसका जवाब यह होगा कि मैं (तो) सबको बहुत सुन चुका हूँ। वो क्या कहेंगे वह बात मैं यहीं जानता हूँ। इसलिए वहाँ मैं क्या सुनूँ? अरे! जिसके यहाँ सर्वज्ञता और वीतरागता ही नहीं है, वहाँ क्या कहा जायेगा? क्या कहेगा वो?

आज नहीं हुए हैं क्या आँखों के ऑपरेशन? और उसमें आँखें चली गई हैं लोगों की। ऐसे होते हैं ये सुनानेवाले और इनके सुनने वालों की आँखें अंधी हो जाती हैं, बिल्कुल। इसलिए यह कर्म-कर्तव्य बहुत जरूरी है, सबसे पहला (है) और इसीलिए (ये) प्रकरण हमने लिया है कि हम ये सबको सुनने की और सबके पास जाने की लिपसायें छोड़ दें।

क्योंकि फिर वो रहस्य उद्‌घाटन तो होता ही है। आज नहीं तो कल वो रहस्य उद्‌घाटन होगा कि कितना माल था उसके पास? क्योंकि सच्चाई नहीं है न! केवल वंचन और प्रवंचन है।

जो रजनीश भोग से मुक्ति कहता है, साफ है ये तो बात। संभोग से समाधि की ओर जो कहते हैं…रजनीश के वचन हैं कि अब वो जमाना गया जब जंगलों में मुक्ति मिला करती थी। अब तो यहाँ घर में मुक्ति दिलाता हूँ मैं। हाँ! कपड़े छोड़े होंगे पहले, छूटते होंगे पहले। लेकिन आज कपड़े छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। और जिनकी पुस्तक यह है कि महावीर मेरी दृष्टि में। लेकिन महावीर की दृष्टि में मैं - यह उसको मालूम नहीं है (उस) व्यक्ति को। महावीर की दृष्टि में मेरी क्या स्थिति है इसका पता नहीं है। लेकिन मेरी दृष्टि में महावीर! हम महावीर को तौलने चले हैं। जिनको महावीर के मानस का पता नहीं है वो तौलते हैं महावीर को। महावीर को हम अपनी बुद्धि से आँकें? तब क्या महावीर दिखाई देंगे? महावीर का जो चित्र है वो हमको तब दिखाई देगा? यहाँ महावीर को साक्षात् देखें तब महावीर दिखाई देंगे - ऐसी बातें हैं।

कहते हैं भोग छोड़ने से नहीं छूटता है। ये जो विरक्ति की बात कही जाती है ये छलना है - ऐसा कहते हैं। क्योंकि ये जबरदस्ती नियमन किया जाता है, जबरदस्ती दमन किया जाता है इंद्रियों का। और इंद्रियों का दमन करने से इंद्रियाँ तृप्त नहीं होतीं। इसलिए भोगों को खूब भोगा जाये तो भोग छूट जाता है। करके देख लीजिए न उपाय। ये तो प्रैक्टिकल है बात कि खूब भोग भोगिए और फिर छूट जाता है क्या (वो) बोलिए। ऐसी विचित्रतायें मिलती हैं जहाँ, लेकिन हमको भाग्य से जो चीज मिली है, जिनवाणी…आज अरहंत परमात्मा हमारे पास नहीं (हैं)। दुर्भाग्य है ये हमारा। निश्चित ही हमारा पुण्य बहुत कम रह गया है। वीतराग संत भी यत्र-तत्र, यदा-कदा दिखाई देते हैं। उनकी टोलियाँ नहीं दिखाई देतीं, वीतरागी संतो की। और जिनवाणी भी जो बच गई है, वो बच गई है। लेकिन किसी भी क्षेत्र और काल में ज्ञानियों का अभाव नहीं होता, यह बात हमको सदा, हमेशा ही याद रखने लायक है।

मोक्षमार्ग का अभाव ना कभी हुआ है और कभी होनेवाला नहीं है। तैयारी हमारी होनी चाहिए (ता)कि ज्ञानी किसी भी जगह और पद-पद पर हमको मिल जायेंगे। बल्कि ज्ञानी तो हमको पानी पिलाने आ जाएँगे, लेकिन हमारी तैयारी होनी चाहिए। हम ये कहें कि पानी बरसेगा तब चलायेंगे हल, तब करेंगे झाड़ियों को साफ। कि नहीं! नहीं! होगा नहीं वो काम। सारी खेती बर्बाद हो जायेगी। ये तैयारी हमारी पहले से हो। हमारे भीतर सचमुच, हमारे मन में सचमुच यदि मुक्ति की पिपासा है, जागी है, तो वहाँ तक होनेवाला सारा काम तो पहले हो ही जाना चाहिए। और जहाँ हमारा चित्त इतना तैयार है वहाँ ज्ञानी ना मिलें - ऐसी घटना आज तक घटी नहीं और अनंतकाल में घटनेवाली नहीं है। क्योंकि ज्ञानी फिर जगत में होते ही क्यों है? ऐसे व्यक्ति को ज्ञानी नहीं मिलेंगे तो फिर किसको मिलेंगे? उसी को मिलते हैं। इसलिए चित्त में से ये संदेह छोड़ दीजिए कि हमें ज्ञानी नहीं दिखाई देते।

ज्ञानी पद-पद पर विद्यमान हैं लेकिन तैयारी हमारी नहीं है। और अनंत ज्ञानी हमारे हाथ से निकल चुके हैं। क्या उपयोग हुआ है पहले? हम तैयार हों इस बात के लिए, तो मिलते हैं ज्ञानी बराबर।

जैसे नगर में एक तो मिल (mill) के कपड़े की दुकान होती है। तो आदमी जो सही खरीदनेवाला है, जिसकी बुद्धि सजग है, वो इधर-उधर फुटपाथों पर जाता नहीं है। यद्यपि फुटपाथों पर आवाज ज्यादा आती हैं। और मिल की जो दुकान है वहाँ आवाज नहीं आती है। वहाँ किसी को बुलाया नहीं जाता है। फुटपाथों पर तो बुलाया जाता है लेकिन ये जानता है कि सारा का सारा माल नकली है। तो वहाँ पहुँच जाता है। लेकिन कोई यूँ कहता है साहब! जो स्वीकृत (approved) दुकान होती है, वहाँ तो भाव ऊँचें होते हैं। और हमारे पास इतना पैसा ना हो तो? तो ऐसी कटपीस की दुकानें भी होती हैं जहाँ पर माल बहुत अच्छा मिलता है। तो यदि इतना पुण्य हमारे पास नहीं है तो छोटे-मोटे ज्ञानियों की कटपीस की दुकानें हमेशा रही हैं। और वहाँ से वही चीज ली जा सकती है कि जो मिल की दुकान पर मिलती है।

इसलिए कभी भी चित्त में इस बात का लंबा दुःख नहीं होना चाहिए कि ज्ञानी नहीं मिलेंगे तो? कि वो तो मिलेंगे (ही)। निश्चित मिल जायेंगे लेकिन तैयारी हमारी हो। वो व्यक्ति ये कहता है कि यदि ज्ञानी मिलेंगे ना, जभी कर लूँगा काम। तो ज्ञानी मिलेंगे तो ज्ञानी सांकेतिक भाषा में कहेंगे। और यदि हमारी तैयारी नहीं है तो ज्ञानी का वचन हमारे भीतर प्रविष्ट नहीं होगा। इसलिए ये जो वीतराग देव और वीतराग निर्ग्रन्थ गुरु और जिनवाणी (हैं), जहाँ इनके स्वरूप को जान लिया जाये और केवल भक्ति से नहीं लेकिन ज्ञान से सूक्ष्म ज्ञान से इस बात का निश्चय …

जैनदर्शन समीक्षा, भाग 4

पूज्य बाबूजी ‘युगल’ जी, कोटा
जैनदर्शन समीक्षा - भाग ४

हमारी आदत सदा से ऐसी है कि हम इस प्रकरण को सुनते-सुनते कहीं अन्यत्र चले जाते हैं। जैसे यहाँ बैठा-बैठा कोई दुकान चला जाता है। पर प्रकरण सुनते-सुनते हमें व्यवहार याद आने लगता है ये सुनने की सबसे बड़ी बाधा है। इसका संकेत हम बीच-बीच में करते ही आए हैं कि जो प्रकरण चलता हो, उस प्रकरण को केवल उसी दृष्टि से तन्मय होकर सुनना चाहिए। इसमें जितनी बात, पीछे की बात, आगे की बात (है) उसका स्मरण करने से, प्रकरण का जो हमारे जीवन के प्रति महान उद्देश्य है, (हमारे) जीवन की रचना-स्वर्णिम रचना, सुंदर रचना, ऐसी रचना कि जिससे जीवन … होता भी ऐसा ही है कि एक बात चलती हो और दूसरे दिन दूसरी बात (चलती हो)… हमारे साथ बात करनेवाला कोई व्यक्ति अगर लाता है, तो हम कहते हैं आप इसको छोड़िए इस वक़्त। इस समय यह बात नहीं चलती। इसकी जरूरत ही नहीं है क्योंकि ये हमारा टॉपिक नहीं है। हम इनकार कर देते हैं।

विवाह का समय हो, काफी उत्साह का, उल्लास का, मनोरंजन का (और) सुख का समय होता है। और उस समय जब खास विवाह हो रहा हो और कोई यह कहे कि अपने घर में कितने बड़े-बड़े लोग मर गए, तो कम से कम उनकी लिस्ट तो सुनाओ पहले। फेरे (तो) उसके बाद में होंगे। तो ये हुआ तो है (कि) अच्छे-अच्छे हमारे पूज्य पुरुष चले तो गए हैं। लेकिन वह समय उन्हें याद करने तक का नहीं। क्योंकि वो आँसु लाता है, दुख पैदा करता है। इस उल्लास के प्रकरण में वो व्यवधान पैदा करता है।

जब हम वहाँ यह कर सकते हैं तो यहाँ नहीं कर सकते? आचार्य तो यहाँ पर जो बात कहते हैं, वो हमें इतना आश्वस्त करके और इतनी गारंटी से कहते हैं कि यह बात कोई मनोकल्पना की नहीं है। पर साक्षात् ये तीर्थंकरों की वाणी है। और उस अनादिनिधन शब्दब्रह्म परमागम की परंपरा में ही मैंने इसकी रचना की है। इसमें जरा भी संदेह मत करना। इसमें थोड़ा भी संदेह होगा तो तुझे चिंतामणि हाथ नहीं आएगा। ये तो सबसे पहली आवश्यकता है न! शब्दब्रह्म परमाग जिनवाणी का एक अक्षर भी इधर से उधर नहीं किया जा सकता। और उसके व्याख्याता भगवान तीर्थंकर और अरहंत हैं। वे और उनकी वाणी, उनका ज्ञान और उनकी वाणी ही परम सत्य है। इसके अतिरिक्त जगत में सत्य का नाम-निशान नहीं (है)। थोड़ा कहीं और भी हो तो ये संभव ही नहीं है क्योंकि सत्य अखंड होता है। वो तो एक ही जगह रहता है और सदैव त्रिकाल अखंड भाव से रहता है। उसमें विभाग कभी नहीं होता।

क्या कोई हमारे बीच में से कह सकता है कि एक व्यक्ति आधा तो झूठ बोला और आधा सच बोला? बताइए वो कितना सच्चा (है) और कितना झूठा? सभा में जवाब नहीं है क्या इस बात का? एक व्यक्ति ने पाँच बात सत्य कही (और) पाँच बात वो झूठ बोला। तो पचास प्रतिशत सत्य और पचास प्रतिशत असत्य हुआ या नहीं? मेरी समझ में नहीं आती ये बात कि हम इतनी सी बात का निर्णय नहीं कर सकते कि सत्य में झूठ के एक अविभाग-प्रतिच्छेद को भी स्थान नहीं है; उसे सत्य कहते हैं। वो परिपूर्ण होता है, सेंट (१००) परसेंट होता है, त्रिकालाबाधित होता है और उसे challenge (चुनौती) नहीं किया जा सकता। उसके संबंध में जो उसे नहीं समझते हैं, वे कुछ भी बोलें, कुछ भी कहें। राम को आज भले ही गालियाँ दी जायें, उल्लू भले ही सूरज को ना देखे, उसका उदय हो और आँख बंद कर ले। लेकिन सूर्य की जो पूर्व दिशा है और उसमें जो उसका उदय है। उसका तो कभी भी विरोध नहीं हो सकता। उसके विरुद्ध कभी कोई घटना ही नहीं घट सकती।

तो अज्ञानी उल्लुओं ने ये जो किया है, आत्मा के संबंध में… तो जो कुछ भी किया हो लेकिन आत्मा का परिशुद्ध जो स्वरूप है, त्रैकालिक स्वरूप, जिसके सम्बन्ध में रंच भी कल्पना को, अशुद्धि की कल्पना को जहाँ गुंजाइश नहीं है - ऐसा परिशुद्ध आत्म तत्त्व जो कुन्दकुन्द की लेखनी से लिखा गया। उसमें उन्होंने उसे प्रमाणित करने के लिए … वो भी हमारे हित की बात है। उन्होंने कहा कि जो कुछ भी लिखा है तुम इसे अनुभव से स्वीकार करना। अन्यथा मेरी बात मेरे पास रह जाएगी। तीर्थंकरों की, भगवान महावीर और सीमंधर परमात्मा की वाणी, उनका ज्ञान, उनकी अनुभूति उन्हीं के पास रह जाएगी। लेकिन तुम अपने संवेदन से इसको प्रमाणित करना।

संवेदन से ही तो प्रमाणित होती है बात, और कैसे होती है? रस का कटोरा तो भरा रखा हो, अब हम मीठा-मीठा बोलें, तो वो कितना मीठा हुआ? अनंत बार बोल लें तो भी एक बार भी मीठा नहीं होता। और एक बार पी लें और एक बार भी ना बोलें, तो मीठा हो जाएगा। इसलिए संवेदन से इसको प्रमाणित करना।

पहली आवश्यकता तो यह है कि हमारा मन घूमना बंद करे। इधर उधर जाना बंद करे। ये सोचना बंद करे कि कहीं अन्यत्र भी सत्य हो सकता है। कुछ तो होगा थोड़ा तो? अनेकांत भी तो यही करता है। सत्य और झूठ को मिलाता है। कुछ थोड़ा यहाँ से लिया, थोड़ा वहाँ से लिया और एक सत्य बन गया। ऐसा तो होता नहीं है कभी। सूर्य तो सदैव प्रकाश-पुंज है, अंधकार उसमें थोड़ा भी नहीं है - ये परम सत्य है। इसी तरह सत्य अखंड होता है, त्रिकालाबाधित होता है और उसमें थोड़ी भी असत्य की कल्पना करना, वह अनंत तीर्थंकरों का तिरस्कार है। इस परमागम का तिरस्कार है। इसलिए श्रद्धा और समर्पण हो … ये तो व्यवहार श्रद्धा की बात चलती है।

व्यवहार श्रद्धा में ही अगर फर्क है तो ३२०वीं गाथा बंद कर देना चाहिए। क्योंकि जहाँ इसके वक्ता पर हमें विश्वास नहीं है, तो ये गाथा पर विश्वास कैसे होगा? क्या कहती है वो गाथा? और हम करते हैं, लोक में तो विश्वास करते हैं कि ये आदमी बिल्कुल प्रामाणिक है। यहाँ संदेह के लिए कोई स्थान नहीं है। ऐसा एक बार अपनी प्रज्ञा से निश्चय करके हम फिर बार-बार विचार नहीं करते हैं। इसी तरह यहाँ सर्व समर्पण से, हमारे जो देव हैं - ऐसा देव हमने सारी पृथ्वी पर नहीं देखा और (वो) है भी नहीं। हमारे जैसे गुरु वो विश्व में कहीं उपलब्ध नहीं हैं। और उन देव और गुरु जैसी वाणी फुटपाथों पर नहीं मिलती है। और (उनको) कहे जानेवाले जो आगम हैं, उनमें भी उसका नाम-निशान नहीं मिलता है। सत्य पर मुल्लम्मा मिल सकता है और उसको हम सत्य मान भी सकते हैं। क्योंकि मुल्लम्मे के बिना तो खोटा रुपया चलता नहीं है। इसलिए कहीं-कहीं थोड़ी बात सत्य लिखनी पड़ती है। लेकिन वह सत्य पूरा का पूरा असत्य होता है। पूरा का पूरा असत्य होता है।

गुरुदेव तो उदाहरण देते थे कि - हम एक जगह से दस बार कोई चीज खरीद कर लाए। और प्राचीन काल में तो एक-एक, दो-दो पैसे में काम चल जाता था। तो नौ बार तो इस तरह से दो-दो चार-चार पैसे की वस्तु, कोई हल्दी और धनिया और नमक और ये सब ले आए। और दसवीं बार उससे सौ का नोट लाए। और जब चुकाने गए तो नौ बातें तो मंजूर कीं और दसवी बात से इनकार हो गए। बोले वो मैं कहाँ ले गया? वो मैं नहीं ले गया। वो तुमने लिख लिया है, वो गलत है। तो वो व्यक्ति ९० प्रतिशत तो सच्चा हो ही गया। और क्या हम मान लेंगे, हम बैठे हुए लोग? ये भगवान की बात (तो) बाद में। लेकिन हम मान लेंगे इस बात को कि - हाँ! हाँ! ९० प्रतिशत तो सच्चा है, दस प्रतिशत ही तो झूठा है। कि नहीं! पक्का बेईमान है। अरे भाई! ९० प्रतिशत, नौ बातें सत्य बोली हैं। उसमें जरा भी फर्क नहीं है। (तो) एक बात में क्या फर्क पड़ गया? पर सत्य में असत्य का अंश कभी होता ही नहीं (है)। दो असत्य मिलकर सत्य नहीं बनता है, क्योंकि सत्य संपूर्ण एक स्थान पर होता है। और जब हम उसे बिखरा हुआ कल्पित करते हैं कि वेदांत भी यही बात कहता है। बौद्ध भी कुछ कहता तो है। अगर हमारे यहाँ क्षणिकवाद है, तो उनके यहाँ भी एक बात तो मिली। एक तो मिल गई बात। अब बाकी नहीं मिली तो ठीक है। बाकी जैन धर्म मिला देना उसमें। तो हो तो गया पूरा। तो तुम्हें कोई धर्म बनाना है? या धर्म ये वाणी नहीं है, धर्म वो ज्ञान नहीं है, धर्म (जो) वस्तु है - वो क्या कहती है? धर्म का प्रारंभ इसके (जानने के) बाद होता है। जब वस्तु का दर्शन हो, वास्तव में तब (धर्म का) प्रारंभ होता है। तो हम लोग तो काफी चूक गए हैं। जैन और दिगंबर मंच से हम इतना झूठ बोलते हैं, और इतना अपवाद… अपवाद क्या विराधना! देव-शास्त्र-गुरु की और नग्न दिगंबर संतो की (विराधना) कि उससे बड़ा पाप कोई जगत में दूसरा नहीं है।

पहली शर्त तो यहाँ पर आचार्य कुन्दकुन्द ने स्वयं रखी कि मेरी बात इसलिए प्रमाण है क्योंकि ये तीन बातें तो मनोविज्ञान हैं। कोई बात अगर कही जाए तो उसमें सबसे पहले हम ये पूछते हैं कि यह बात आप ही कहते हो या पहले किसी और ने भी कही है? इसकी कोई परंपरा भी है? कि नहीं केवल मैं ही कहता हूँ। तो कि हमको मान्य नहीं है। क्योंकि परंपरा किसी और ने भी… यदि यह बात सत्य है तो जगत में तो असंख्य पुरुष हुए हैं। उनको भी तो ये सत्य अनुभव में आया होगा? उन्होंने भी तो ये बात कही होगी? नहीं कही है तो फिर तुम्हारा संपूर्ण असत्य है। और, और कहीं लिखी हुई मिलती है? कि लिखी हुई तो नहीं मिलती। कि नहीं मिलती है तो भी मुझे प्रामाणिक नहीं (है)। क्योंकि मिलना चाहिए न! सत्य जब एकरूप होता है तो उसको लिखनेवाला उसको दो रूप कैसे करेगा? दो रूप कैसे लिखेगा?

इसलिए जो कुछ कहा गया है… यहाँ तो केवल हम कुन्दकुन्द की बात कर रहे हैं। लेकिन कुन्दकुन्द जैसे जो अनंत आचार्य हैं जिनका एक मात्र लक्षण शुद्धोपयोग और वीतरागभाव (है) ये उनका लक्षण है। खास, मुख्य लक्षण! शेष लक्षण तो बाहर के होते हैं। होते हैं, लेकिन वे लक्षण उनको मुनित्व नहीं देते। होते हैं अवश्य, लेकिन उनसे वे मुनि नहीं हैं। क्योंकि जो मुनि है वो आत्मा होता है और आत्मा का जो शुद्धोपयोग है वो मुनित्व है। और उस शुद्धोपयोग में जो आनंद का निर्झर झरता है वो मुनित्व है, सचमुच (तो)। उसके साथ में जो अन्य लक्षण होते हैं, उनसे इनकार करनेवाला भी अज्ञानी (हैं)। उनका ज्ञान भी साफ़ नहीं है। और उनको मुनित्व मान लेनेवाला वो भी निपट अज्ञानी।

सौभाग्यवती एक स्त्री होती है। तो हम पतिव्रता और सौभागी किसे कहते हैं? कि क्योंकि (वो) बिछिया पहनती है, वो यहाँ पर टीकी लगाती है, वो यहाँ सिंदूर, इसमें माँग में सिंदूर भरती है, ये है सुहाग? और काली साड़ी पहन ले तो? और चूड़ियाँ टूट जाए तो, तो भंग हो जाएगा सुहाग? चूड़ियाँ (तो) टूटती-फूटती रहती हैं, साड़ियाँ बदलती रहती हैं (मगर) सुहाग तो भंग नहीं होता। पर इतना अवश्य है कि कुछ सुनिश्चित चिन्ह ऐसे होते हैं कि जो उसके साथ होते हैं। लेकिन वे केवल उस सुहाग के बाह्य चिन्ह कहे जाते हैं लेकिन उनसे सुहाग नहीं है। इसलिए एक तरफ से है यह बात कि सौभाग्यवती स्त्री के ऐसे चिन्ह होते हैं। लेकिन ये चिन्ह होना सौभाग्य नहीं (है)। वह कुशीला भी हो सकती है और इतना स्वांग भी कर सकती है।

यही स्थिति हमारे यहाँ है। केवल बाह्य चिन्ह हों तो हम उनको मुनित्व तो नहीं दे सकते हैं। सही स्थिति यह है कि बात तो आत्मा की है, मुनि तो आत्मा होता है। और वह आत्मा कि जिसकी पराकाष्ठा है, उस शुद्ध चैतन्य तत्त्व पर जिसका सदा ही अवलंबन हो, जिसका जीवन ही केवल इसके सहारे टिका है और प्रतिसमय जो उसी का संवेदन करता है, वह वीतराग और सुखी संत, सुखी, परम सुखी, जिस पर अंगारे बरस रहे हों लेकिन भीतर से जो कूलर की तरह, फ्रीज की तरह ठंडा है। बाहर से धूप है, कूलर पर और फ्रीज पर (लेकिन वो) भीतर से शीतल है। उनसे पूछा जाए तो वो कहते हैं कि तुम बहकी-बहकी बातें मत करो। कि आपको धूप लगती होगी न! आप पर उपसर्ग हो रहा है न! कहते हैं ये उपसर्ग और ये जो बाहर की धूप और शीत है, ये मेरे तक पहुँचती नहीं है। इसके बीच में वज्र की बहुत परतें है। मेरे ज्ञान की परत ऐसी है कि जिसके भीतर इनका प्रवेश कभी नहीं होगा। तब तो निश्चिंतता आती है। या वो ज्ञेय चला जाए तो (निश्चिंतता) आती है? वो ज्ञेय चला जाता है इस भ्रम में तो दुखी हैं। आज तक दुखी क्यों है? एक ही बात पर (दुखी हैं कि) अगर समाधान हो जाए तो जीवन इसी समय निहाल होता है। इसी समय सारी चिंतायें बिना विचार के, बिना उनको विदाई दिए वो चली जाती हैं कि अब हमारे लिए रहने का यह ठिकाना नहीं है। ऐसी गरिमा समस्त ही दिगंबर आचार्यों की रही है।

दिगंबर ही होते हैं। ये पक्की है बात। और वो इसलिए क्योंकि उनको अब उन वस्तुओं की जरूरत ही नहीं है, आवश्यकता ही नहीं है। गर्मी है तो ऊनी कपड़े हमारे घर में तो हैं लेकिन हम (उनको) पहनते नहीं (हैं)। भाई! क्यों नहीं पहनते हो? तुमने इतना पैसा खर्च करके, इतनी मेहनत से सिलाया और इस सूट पर तुम मुग्ध भी हुए। (अब) पहनो ना इसे। कि जरूरत नहीं है। मुनिराज को कहा जाए (कि) वस्त्र क्यों नहीं हैं आपके? ये मोटी बात, बारीक बात तो और है कुछ। बोले - जरूरत नहीं है न! मैं इनको लेकर तो पैदा नहीं हुआ था। ये तो ऊपर से लादे गए थे। अब इनकी आवश्यकता नहीं है तो मैं उतार देता हूँ। उतर गए हैं, जरूरत ही नहीं (है)। आवश्यकता ही नहीं है। जब राग ही उस प्रकार का नहीं होगा तो वस्तु कैसे रहेगी? ये एक नीति है।

कोई वस्त्र छोड़े नहीं जाते, उतारे नहीं जाते। क्योंकि हमारे यहाँ तो दो द्रव्यों के थोड़े भी रिश्ते का अत्यंत इनकार है, ज़रा भी। बिल्कुल इनकार है कर्तृत्व का। कि आत्मा कपड़ा उतार सकता है? कपड़ा पहन सकता है? तो पहन सकता है और (उसने) उतार भी दिया है तो यह अहम् तो उसको पड़ा है न कि मैं पहन सकता हूँ। तो उसने तो वस्त्रमय माना है आत्मा को, और आत्मा वस्त्रमय … ये शरीर ही वस्त्रमय नहीं होता तो आत्मा तो वस्त्रमय कैसे होगा? तो ऐसी श्रद्धा जब तक ये ना जागे, व्यवहार की चर्चा करते हैं अपन थोड़ी। और बहुत आवश्यक है वो। क्योंकि हमारा मन भटकता है, मन दौड़ता है। बहुत बातें है उसमें। ये व्यवहार निभाना तो चाहिए न! तो कितना व्यवहार आज तक हम लौकिक में भी निभा पाये हैं? हमारे पुराने जो लौकिक व्यवहार थे, वे एक जरा सी बात में उस काँच के झाड़ की तरह टूक-टूक हो गए। एक थाली में खाते थे, कहते हैं आज जानी दुश्मन हैं। ये क्या हो गया है? निभाते क्यों नहीं हो व्यवहार? तो व्यवहार का निभाना केवल धर्म में बच गया? तो यहीं निभाना पड़ेगा? और यहीं शिष्टाचार यहाँ बच गया है? क्या अर्थ होता है व्यवहार का और शिष्टाचार का? अरे! जिनसे हमें वास्तव में मतलब नहीं है, प्रयोजन नहीं है, उनके प्रति ना हमारा कोई राग है, ना हमारा कोई द्वेष है। मतलब ही नहीं है। अरे! जब हमें आलू खाना ही नहीं है तो सब्जी मंडी में उसका भाव पूछने से क्या मतलब?

उसी तरह जब मतलब ही नहीं है तो फिर हमें यह कहा जाए कि व्यवहार निभाना चाहिए, शिष्टाचार निभाना चाहिए, ये कौनसी बात होती है? सचमुच तो जो परिचित हैं और हमारे विचारों के हैं, उन्हीं के साथ हमारा व्यवहार और शिष्टाचार निभ सकता है। हम व्यवहार और शिष्टाचार का दिखावा यदि करते हैं, तो वो तो मायाचार है, शिष्टाचार नहीं है। हाँ इतना अवश्य है कि हमें किसी के प्रति भी, कि जिनसे हमारा दर्शन और हमारे दार्शनिक विचार मेल नहीं खाते, तो उनसे हमारा परिचय भी नहीं है। और परिचय नहीं है तो किसी भी प्रकार का राग और किसी भी प्रकार का द्वेष हमारा उनसे नहीं है। है भी नहीं।

तो कि परिचय कर लो। कि इतनी जरूरत होगी तो अवश्य कर लेंगे। लेकिन हमें हमारा काम अगर एक ही व्यक्ति से चलता है तो अधिक परिचय की कहाँ जरूरत है? कहाँ आवश्यकता है? मुझे पैसे की आवश्यकता है और हर समय, प्रत्येक समय मेरा काम वो कांतिभाई से चल जाता है। तो बहुत लोग मिलते हैं फुटपाथों पर। कहाँ गए थे? क्या हुआ? कैसे गए थे? ऐसा काम था। पैसे की जरूरत थी वो हो गया। अरे! पर मैं तुम्हें बड़ा अच्छा आदमी बताता हूँ। यहाँ बहुत हैं। कांतिभाई कोई लगते ही नहीं है यहाँ, बंबई में। तो वहीं क्यों जाते हो? लेकिन मुझे इसकी आवश्यकता ही नहीं है न बिल्कुल? मुझे यह विकल्प आता ही नहीं है क्योंकि मेरा काम टूटता हो तो मैं ये बात करूँ। इसलिए मुझे कोई अरबपति और खरबपति चाहिए नहीं। मेरा तो एक ही देवता से काम चलता है, और वो मेरा अरिहंत परमात्मा (है)। उससे मेरे लौकिक काम भी चलते हैं, यद्यपि मैं उनसे कहता नहीं हूँ। लौकिक कामों के लिए मैं उनसे कहता नहीं हूँ, बात नहीं करता हूँ। कोई माँग उनके सामने नहीं रखता हूँ। पर ये बात कितनी विचित्र है, कि ना मैं उसके सामने कोई माँग रखता हूँ और ना वे मुझे कोई विश्वास देते हैं पर मेरे काम हो जाते हैं। अरे! तो इससे बड़ा देवता कौन मिलेगा? जहाँ सारा काम यहीं हो जाता है। माने और तो बात दूर रही कि उनसे माँग की जाए और उनसे कुछ कहलाया जाए बल्कि मेरे भीतर ये विचार तक नहीं आता कि इनके सामने कोई माँग रखूँ। और ये बिना माँग रखे ही यदि काम पूरे होते हैं। होते हैं, हुए हैं। और इससे भी बड़ा काम जो मुझे चाहिए वह भी निश्चित होनेवाला है, क्योंकि वो इनके पास है। तो फिर मुझे किसी दूसरे की कहाँ आवश्यकता है? और दूसरे से परिचय करने की भी जरूरत कहाँ है? आवश्यकता कहाँ है? तो कितना सरल हो गया! जैन धर्म ने हमको एक लोक जीवन की भी कितनी तसल्ली दी है कि हम जो धर्म के लिए, सत्य के लिए, सत्य के अन्वेषण के लिए, तलाश के लिए इधर-उधर घूमते-फिरते हैं और उसमें राग-द्वेष ही बढ़ता है। (और) आखिर हम लौट आते हैं। (तो) कहते हैं कि कुछ मिला? कि नहीं! मेरा समाधान हुआ नहीं है। तो फिर और जाओ। जाओ, यह बात तो ठीक है। पर यह तो बताओ कि तुम कहाँ तक जाओगे? क्योंकि जगत और दुनिया तो बहुत बड़ी है। इसका अर्थ यह है कि तुम्हें अभी दर्द ही नहीं है। और तुम जाओगे, जितना जाओगे, तो उसका नाम ही तो संसार परिभ्रमण है। और क्या है?

अरे! किसी डॉक्टर पर तो हमें विश्वास करना ही होगा वरना ऑपरेशन नहीं होगा। और मौत तो सिर पर झूल रही है। अब हम कहते हैं यही डॉक्टर? बस! बम्बई का यही डॉक्टर और कोई नहीं? हाँ! कहते तो ऐसा ही हैं। और बात भी ऐसी है कि यही है इस रोग का डॉक्टर और इसने सबको ठीक किया है। लेकिन साहब! मुझे यह बात थोड़ी विश्वास में नहीं आती है। मैं तो अभी तलाश करूँगा। कि करो। तुम ज़िंदा तो लौटनेवाले नहीं हो तुम्हारी तलाश में। जब तुमको यह बात बता दी गई और तुम परखो न? परख कर देखो तुम। परख कर देखो, उदाहरण देखो और परंपरा देखो। फिर और क्या देखना है? निर्णय तो इसी तरह होता है।

इसलिए देव-शास्त्र-गुरु की जिसे हम श्रद्धा कहते हैं… श्रद्धा माने - सचमुच यही हैं ऐसे। श्रद्धा का स्वर होता है कि यही मैं आत्मतत्त्व हूँ, शुद्ध चैतन्य। इसी तरह यही हैं सच्चे, अन्यत्र सत्य की तलाश करना वो बालू में तेल तलाश करना है। वो मिलेगा नहीं।

इतना परिभ्रमण, उसके साथ होनेवाला हमारा पुरुषार्थ और उसके साथ उत्पन्न होनेवाली हमारी आकुलतायें, ये सब की सब समाप्त हो जाती हैं। धर्म तो बहुत समाधान देता है।

हम जब अपनी परिस्थितियों की बात करते हैं… foreign में रहनेवाले करते हैं कि नहीं करते? foreign में जो रहते हैं… व्यवसाय के लिए गए हैं एक मात्र, और तो कुछ बात है नहीं। धर्म के लिए तो गए नहीं, वहीं रहते हैं। भगवान जिनेंद्र इस दुनिया में विद्यमान हैं। (वे) वहाँ उनको मिलते नहीं। जिनवाणी भी मिलती क्या है! अलमारी में पड़ी है। रखी नहीं है, पड़ी है। ये सब है। लेकिन प्रश्न यह है कि दोनों में से प्यारा कौन है? धर्म प्यारा है या अर्थ प्यारा है? इतना ही निश्चय कर लें तो साथ कौन देनेवाला है? धर्म आत्मा में प्रतिष्ठित होता है। पैसा तो आत्मा में प्रतिष्ठित नहीं होता। ज्ञान को आत्मा में प्रतिष्ठित किया जाता है तो वो भवांतर तक भी जाता है। … तो भी उसकी (पैसे की) राख होनेवाली है। वहाँ आत्मा के साथ तो एक अणु भी नहीं जानेवाला है। कौन है प्यारा दोनों में? कि दोनों में सचमुच तो प्राणों के मूल पर भी धर्म प्यारा है। धर्म प्यारा है तो foreign छोड़ दो - ये कहता है धर्म। साहब! ऐसे तो कैसे छोड़े? ऐसे और कैसे क्या होता है? पहले तुम ये बताओ कि ये जो तुम्हारी और हमारी बात चल रही है, इसके दूसरे क्षण में भी तुम ज़िंदा रहोगे इसकी गारंटी दे सकते हो? कि वो तो नहीं दे सकता। तो नहीं दे सकता तो ये ऐसे और कैसे क्या होता है?

श्रद्धा होती है, तो ऐसी व्यवहार श्रद्धा भी सुमेरू जैसी होती है। प्रश्न बहुत आते हैं और हमारे पास उत्तर नहीं मिलते हैं तो हम झंझट में पड़ जाते हैं। उत्तर इसलिए नहीं मिलते हैं (क्यों)कि सचमुच ज्ञान से हम काम नहीं लेते, ज्ञान को तीक्ष्ण नहीं करते। जब हमें कहा जाए कि आप परिचय तो करो? तब हमारा उत्तर ये होता है कि मुझे परिचय करना शेष ही नहीं है। मैं क्या परिचय करूँ? मुझे सारा परिचय मिल चुका है। संपूर्ण जो कुछ मिलना है वो मुझे मिल चुका है। इसलिए मुझे अब अधिक परिचय की आवश्यकता नहीं है। बस! हो गया।

ऐसा व्यक्ति कि जो बाजार में से निकलता है और सबको प्रणाम करता है। तो वो mentally (मानसिकरूप से) ठीक है वो? जो परिचित नहीं हैं उनको भी और अपरिचित … जो परिचित हैं उनको भी। वो तो सबको (करता है)। तो ठीक है दिमाग उसका? बोले पागल है (ऐसा) कहते हैं। अरे! पर हमें अगर सर्वोत्कृष्ट देवता मिला है और विश्वास है हमारा, ज्ञान है हमारे पास इसके लिए कि हम उनको तोलें। भगवान को भी तोलना है। आचार्यों ने भी तोला है कि आपकी सच्चाई को तोलना तो है। वरना आपकी सच्चाई आपके पास रह जाएगी। मेरे क्या काम आएगी? अरे! प्रोफेसर के दिमाग को तोलना नहीं है? तब न हम कहते हैं कि मेरे जैसा प्रोफेसर नहीं है किसी के पास। वो भी तो हमारे ज्ञान ने तोला या प्रोफेसर के ज्ञान ने तुलवाया? हमारे ज्ञान ने (तोला)। और ये सब जगत में असंभव नहीं है। बिल्कुल असंभव नहीं है।

जिसको वास्तव में अंतर से जिज्ञासा जागी हो उसे ऐसे देव-गुरु-धर्म ना मिलें - ऐसा आज तक विश्व में एक भी घटना अनादिकाल में नहीं है और अनंतकाल में होनेवाली नहीं है। हम ढूँढने गए थे गुरुदेव को? लेकिन अंतर में जिज्ञासा थी… सबको मिल गए वो भी नहीं मानता हूँ। भाई! हम तो उनके विरुद्ध बोलते हैं तो मानना क्या हुआ गुरुदेव का? तो (गुरुदेव तो) उनको मिले हैं कि जिन्होंने उनको तोला है, परखा है। और फिर उनके ज्ञान को और उनकी वाणी को आत्मसात करके सुमेरु जैसी अडिग श्रद्धा बनाई है। उनको गुरुदेव मिले हैं, उनको अनंत तीर्थंकर मिले हैं।

गुरुदेव की क्या बात है? गुरुदेव तो उपलक्षण हैं एक। सब कुछ मिल गया है। आगे आनेवाले अनंत तीर्थंकर वो हमें आज प्राप्त हैं। आगे आनेवाले अनंत दिगंबर संत वो हमें अभी प्राप्त हैं। सब हमारे हृदय में इकट्ठे हैं, सारे के सारे। इसलिए सही चीज तो यह है कि जैसे जगत का कोई भी व्यक्ति अपना व्यर्थ परिचय नहीं बढ़ाया करता… जहाँ उसकी गरज बनती है, बस उसे केवल उतना परिचय चाहिए। क्योंकि हमारे सारे मतलब यहाँ पूरे होते हैं तो हमें अन्य परिचय की (क्या) आवश्यकता? हमें कोई राग और कोई द्वेष जरा भी नहीं है। क्योंकि हमारा दर्शन, हमारे गुरु और हमारे देव, वो हमें राग छोड़कर द्वेष नहीं सिखाते। ये कुगुरु हैं, ये कुदेव हैं - ये तो ठीक है। वो भी एक नाम है। साहित्य में भी इस तरह के नाम आते हैं जहाँ ‘कु’ लगाकर उनकी प्रशंसा की जाती है। इस तरह की अन्योक्तियों के बहुत प्रयोग आते हैं, साहित्य में भी।

तो ‘कु’ का अर्थ खोटा, बुरा हमारे द्वेष करने लायक वो नहीं होता है। बस इतना कि - हमें उनके परिचय की आवश्यकता नहीं है। हमें जरूरत नहीं है। हमें कुछ लेना नहीं है। तो ज्ञान थोड़ा है अपने पास। थोड़े ज्ञान की सामर्थ्य केवलज्ञान से बिल्कुल कम नहीं है। जो इस ज्ञान में और केवलज्ञान में अंतर मानता है उसे तो केवलज्ञान मिलना ही नहीं है। मैं तो नहीं बोलता (ऐसा), आगम को सिर पर रखकर बोलता हूँ।

स्याद्वाद और केवलज्ञान में अंतर है। अंतर है? अरे! केवलज्ञान लोकालोक को देख लेगा तो बहुत मिल जाएगा उसे? इस सारे वैभव को देखेगा तो मजा आ जाएगा (ऐसा) कहते हैं केवलज्ञान को। केवलज्ञान को भी जो आनंद है, वो आनंद के दह में से आता है। और इस श्रुतज्ञानी को भी जो आनंद है, वो आनंद के दह में से वैसा का वैसा ही आता है। जाति में रंचमात्र अंतर नहीं है, थोड़ा भी अंतर नहीं है। तो फिर क्या बाकी (रहा)? क्या फर्क हुआ? कि अभी दुनिया तो देखी नहीं (है)। (तो कहा) कि अभी तुझे मोक्ष जाना ही नहीं है। पहले दुनिया देख ले फिर इसके बाद धीरे-धीरे जाना। और हम सब ऐसे ही हैं क्योंकि हमें अभी दुनिया बहुत देखना बाकी है।

हमारे ज्ञेय हैं न सारे पदार्थ? हमारे ज्ञेय हैं ये तो हम कहते हैं। नहीं कहते? विश्व कौन है हमारा? ज्ञेय है। तो हमारा ज्ञेय है वो। अरे! तू चुपचाप भीतर से वो मिथ्यात्व का ताना-बाना नहीं बुन रहा है? मेरा क्या संबंध है उनसे? सच्चाई तो यह है कि तेरा जगत के पदार्थों के साथ जानने का भी संबंध नहीं है - इस बात को एक बार, एक बार भीतर से बोल।

अच्छी तरह बोल। कोई (भी) संबंध… संबंध थोड़ा बताया होगा। क्योंकि जिनवाणी बोलती है, प्रवचनसार बोलता है कि ज्ञेय-ज्ञायक संबंध की अनिवार्यता (है)। ये क्या कुन्दकुन्द की वाणी नहीं है? अमृतचंद की वाणी नहीं है? पर ज्ञेय-ज्ञायक संबंध की अनिवार्यता जहाँ उन्हें कहना पड़ा, वो इसलिए कहना पड़ा कि सचमुच ये पदार्थ ये आत्मा से अन्य हैं। और इनका आत्मा के साथ कोई संबंध नहीं (है) - ये बताना था उनको। इसलिए उन्होंने ज्ञेय-ज्ञायक संबंध कहा और बाद में इनकार भी हो गए कि कोई संबंध नहीं है। ज्ञेय-ज्ञायक संबंध भी नहीं होता (है)।

संबंध तो किसी रूप में हो, हम कहते हैं। किसी रूप में (भी संबंध) जोड़ा हो लेकिन आखिर में वो संबंध है न! या तो हम उसे कहा जानेवाला संबंध मानें अथवा उसे हम वास्तविक मानें। दो ही तो बात हो सकती हैं न! कहा जानेवाला संबंध वो तो केवल कहने का होता है और कहते हैं जगत में। यहाँ जितने भी आप बैठे हैं और ये मातायें और बहनें, माने जो महिलाओं का समुदाय बैठा है, उनमें मेरे भाई, बहन और माँ कौन हैं? कहते हैं (कि) कोई नहीं है। तो फिर मैं इनको क्या कहूँ? कि ए आदमी! यहाँ आना। ऐसा बोलूँ? मैं तो यही कहूँगा भाईसाहब! पिताजी! आप आइए। थोड़ा इधर सरक जाइए। यही तो बोलता हूँ। तो बोलने में हो जाता है? वो मेरे पिताजी हो गए? महिलाओं को भी कहूँगा कि माताजी और-और जो भी, बहनजी। तो होती है वो? कोई भी किसी के साथ कोई स्त्री है, परस्पर बातचीत होती है, स्नेह है। कोई तीसरा व्यक्ति पूछता है कि ये इनसे आपका क्या रिश्ता है? तो वो कहता है (कि) ये मेरी धर्म की बहन है। कि बहन दो प्रकार की होती है? एक धर्म की और एक पाप की? माने ये आपकी धर्म की बहन है, तो जिसके साथ आप पैदा हुए हैं वो पाप की है न? तो वो नहीं है बात। पर मैं इसे किसी अन्य शब्द से अगर पुकारूँ तब तो हमारे झगड़ा हो जाएगा। और जो प्रयोजनभूत बातचीत चल रही है वो ही खत्म हो जाएगी। माने व्यवहार ही खत्म हो जाएगा। इसलिए इतना व्यवहार निभाना आवश्यक तो है लेकिन इस पर विश्वास रंचमात्र (भी) नहीं करना चाहिए। जरा भी विश्वास नहीं करते… कि असली बहन तो वही है।

इसी तरह आचार्य भी, क्योंकि व्यवहार की भाषा में ही अधिकांश बोला जाता है। निश्चय के पास प्रथम तो भाषा ही नहीं है। किंचित् भाषा भी है तो उसके पास एक भाषा है। तो कि वो क्या है? वो ये कि, जो व्यवहार (कुछ) कहता है, उसके लिए ये कहना कि - नहीं! ऐसा नहीं है। वो जो भी कहे, जो भी कहे वो, जो भी। वो तीनकाल में जो भी कहे, उसके लिए ये निश्चय क्या कहे? कि नहीं! ऐसा नहीं है। अरे! तेरी कैसी आदत पड़ी है? मैं जो बात कहता हूँ उससे तू इनकार करता है। अनंत बातें मैं कह चुका उससे तू इनकार करता है। तेरा एक ही धर्म है? कि मेरा एक ही धर्म है - असत्य से इनकार करना। क्योंकि यह बात विश्वास के लायक नहीं है। इसलिए बात तो सारी उसी से की जाती है। सब कुछ उसी से कहा जाएगा। लेकिन जैसे लोक में भी हम इन कही जानेवाली बातों पर विश्वास नहीं करते, इसी तरह यहाँ भी आचार्य उस निश्चय की भाषा में तो बोल नहीं सकते क्योंकि वह तो अनुभूति का अमूर्त ईश्वर है वो… निश्चय का।

तो भाषा में अगर हम लें तो केवल उसका कहना ही है। कि ऐसा नहीं है भाई! ज्ञेय-ज्ञायक कोई संबध होता नहीं है। वो ये बोलेगा। तुम कहते हो, ठीक है इतनी बात। पहले इस बात का निश्चय करके कहो कि ज्ञेय-ज्ञायक कोई संबंध होता ही नहीं है। पहले ये स्वीकार करो। इसके बाद तुम जो कुछ भी बोलोगे हमें कोई एतराज नहीं है क्योंकि तुम्हारा विश्वास वहाँ जम चुका है। इसलिए ये बात केवल कहने की है अर्थात् ये विश्वास की नहीं है, तो सारा जैन धर्म तुम्हारी मुट्ठी में आ गया। सब कुछ। सारा द्वादशांग तुम्हारी मुट्ठी में आ गया। यही स्थिति है।

व्यवहार, सारा द्वादशांग, उसमें अधिकांश व्यवहार मिलेगा। एक द्रव्यानुयोग है, उसमें भी बहुत बातें है (जो कि) व्यवहार के निषेध के रूप में ही आती हैं। बाकी जो तीन अनुयोग हैं उनमें तो अधिकांश व्यवहार से ही वर्णित किया जाता है। जिनको ज्ञान दशा, आनंद दशा, वीतराग दशा होती है, उनको जो विकार है उसकी भी कैसी स्थिति हो जाती है! उस विकार का भी रंग-रूप कैसा हो जाता है, ये बताना पड़ता है। तो ये बताना पड़ता है केवल। ये नहीं बताना पड़ता है कि ये इसका है और ये विश्वास करने लायक है। बस इतना बताना पड़ता है (कि) जो इसको बीमारी होती है तो कहते हैं कि लक्षण क्या होते हैं? ये बताना पड़ता है। लेकिन वो जो लक्षण हैं, वो कोई बीमारी है? बीमारी तो भीतर बैठी है। इसी तरह वास्तविक जो वीतरागभाव है वो तो भीतर बैठा है। वो तो सदा ही आनंदमय होता है। और उस वीतरागभाव के पथ पर चलनेवाले जो हम लोग हैं, बाहर से उस सौभाग्यवती स्त्री की तरह लक्षण कैसे हुआ करते हैं, कैसे परिणाम होते हैं - ये बात भी जानने लायक होती है। क्योंकि उसे ना जाना जाए तो स्वछंदता और निश्चयाभास होता है। हम नहीं जानते न! जो ये कहता है कि हमें मालूम नहीं था कभी… पर ये मालूम नहीं था इतना उत्तर पर्याप्त नहीं है। आप अपने उत्तरदायित्व को भूले हैं। अगर सचमुच हम इस श्रमण दर्शन में दीक्षित हुए हैं, तो हमारा उत्तरदायित्व है कि हम इसको सर्वांग जानें। भीतर से भी जानें बाहर से भी जानें। कैसा (है) हमारा बाहर का जीवन! और उस जीवन में, उस शुद्धता के लिए, उस शुद्ध चैतन्य तत्त्व तक पहुँचने के लिए कैसे परिणामों की जरूरत है - ये जानना बहुत आवश्यक है। बहुत! क्योंकि हर परिणाम से उस चैतन्य का चिंतन … अनुभव तो बहुत दूर है (लेकिन) चिंतन भी नहीं हो सकता। तीव्र पाप (के) परिणामों में वो बात बनती नहीं है। तो कैसी विशुद्ध भूमिका हमारी हो, ये (जानना) बहुत आवश्यक है। हम लोक व्यवहार में इतने रंजित हैं कि हम धर्म के नाम पर उसे छोड़ने को तैयार ही नहीं हैं। सबसे बड़ी दिक्कत आज ये है। बहुत बड़ी दिक्कत है। खाने में, पीने में, पहनने में हमारा चलता नहीं है। रात को खाए बिना नहीं चलता है। कि क्यों नहीं चलता है? (दिन में) एक बार खाओ। डॉक्टर कहेगा तो खाओगे कि नहीं खाओगे? कि डॉक्टर कहेगा तब तो दोनों बार खाना छोड़ दूँगा। पर कुन्दकुन्द कहेंगे तो एक बार भी नहीं छोडूँगा। तो तुझे कहाँ प्रिय हैं ये? तू नाटक क्यों करता है यहाँ बैठकर? सबसे पहले ये बोल कि इनसे अधिक कोई मुझे कोई प्रिय नहीं है जगत में। और ये जो कहते हैं जिस धर्म की, जिस दर्शन की, जिस चिंतन की, जिस विश्वास की ये बात करते हैं, वो परम सत्य है और वही मुझे प्रिय है। जगत में अन्य कोई है ही नहीं, तो प्रिय का प्रश्न ही नहीं है। इतना विश्वास पहले कर और उसके लिए अपनी भूमिका का प्रयत्नपूर्वक निर्माण कर।

जहाँ हम रहते हैं, नहीं है वहाँ जैनदर्शन। बदल दो जगह, क्या झगड़ा है? कि कमाई तो यहाँ होती है। तो कमाई तुम करते हो, अभी तो झगड़ा ही यहाँ है सब। हम (कमाई) करते हैं तुम तो यहाँ से मानकर चलते हो। अरे! ये तो जहाँ होनी होगी वहाँ तुम्हारे पैर चूमती हुई आएगी। तुम्हारे भीतर ये जो विशुद्ध भाव जागा है, ये करेगा कमाई तो। तुम्हारे हाथ-पैर नहीं करेंगे। (ऐसा भाव) कि मुझे जिनदर्शन मिलना ही चाहिए। क्योंकि हम मनुष्य हैं न! तो मैं मनुष्य गति की बात करता हूँ। जो मनुष्य बने हैं हम, तो मनुष्य के लायक जितने अधिकार, साधन, सामग्री हमारे पास है वो सारी की सारी हमारी इस चैतन्य पर समर्पित होनी चाहिए। हमारा एक ग्रास मुँह में जाए तो चैतन्य के लिए जाए। क्योंकि मैं भूखा रहकर आकुलित होता हूँ। तो ठीक है, खा लेता हूँ। लेकिन मुझे खाना नहीं है, मुझे तो चैतन्य का ही चिंतन करना है। खाना नहीं है मुझे। बिना खाए अगर चल सकता है तो मैं नहीं खाऊँगा। लेकिन खाये बिना नहीं रह पाता हूँ तो खा लेता हूँ। कोई झगड़ा नहीं है। लेकिन खाने के लिए नहीं खा रहा हूँ। मैं तो चैतन्य के चिंतन के लिए (खाता हूँ)। मेरा एक-एक ग्रास, मेरे पैसे का एक-एक, एक-एक नया पैसा इसी के लिए समर्पित है। इतना भीतर से (भाव पैदा हो)।

इसमें ये शंका मत पैदा कर देना __ सारा ही पैसा धर्म को समर्पित है, तो फिर ये छोरे भूखे नहीं मार जायेंगे? ये गालियाँ नहीं देंगे? अरे! पर वो जितना जाना है उतना ही जायेगा। तुम चिंता (क्यों) करते हो? इतनी बोलियाँ तो लेते हो, इतना नाटक तो होता है सारा का सारा बोलियों का उसमें सबके सब देते हैं। अरे! देने के लिए बोली लगाई है न! तो गया क्यों नहीं है वो? कि जितना जाना है उतना ही जाएगा। पर वो जाना है अथवा नहीं जाना है, इससे हमारे उस पुण्य का संबध ही नहीं है। हमें तो पुण्य पूरा हो चुका है। हम मुनिराज को आहारदान देते हैं और कितने में ही आहारदान की भावना रखते हैं? उनके लिए चौका लगाते हैं? वो नहीं बात है। कितना होता है? कितनी भावना होती है? तो कितने जगह करते हैं मुनिराज आहार? कि एक ही जगह करते हैं। तो औरों का क्या होता होगा, रोते होंगे? औरों को भी उतना ही पुण्यबंध (होता है), और रत्नत्रय की उतनी ही भावना मूल तो हो, केवल पुण्यबंध नहीं। उसके लिए नहीं बुलाये जाते हैं मुनिराज और (इसके लिए नहीं) उनको आहारदान दिया जाता है। मुनिराज को देखकर रत्नत्रय की प्रेरणा मिलती है। सम्यग्दर्शन नहीं है तो सम्यग्दर्शन की प्रेरणा मिलती है। चारित्र नहीं है तो चारित्र की प्रेरणा मिलती है मुनिराज से। तो वो होता तो आहार एक जगह है, लेकिन पुण्य समानरूप से सबको (मिलता है)। बल्कि आहारदानवाले को कम हो और दूसरे को अधिक हो। इसलिए पैसे से पुण्य को मत तोलना। ये कभी मत बोलना कि मेरे पास कम है इसलिए दान नहीं होता। कम है, माने रोटी नहीं खाता है? कि रोटी तो खाता हूँ। तो कितनी खाता है? कि चार खाता हूँ। तो तीन खा लेना। हाँ! ये तो ठीक है। तो एक दे देना।

तो तुझे पुण्य … तेरे पुण्य का कोई तोल नहीं है जगत की संपत्ति से। ये जो तूने इतना सा किया है। ये एक जो रोटी है, ये तीन लोग की संपत्ति के बराबर है (बल्कि) उससे भी अधिक है ये। उसका नाम दान है। उन बोलियों-फोलियों का नाम दान नहीं है। ये तो ठगी है ये स्पष्टरूप में। ये जो सारा जो रूप चला है, पञ्च कल्याणकों का, विधानों का, इसमें स्पष्टरूप से पैसे की ठगी है। और पैसा ही एक मात्र प्रयोजन हो गया है। आपको अगर सुनना पसंद नहीं हो तो बंद कर सकता हूँ। ये नहीं बोलूँ (बल्कि) और बोलूँगा दूसरी बात। ये स्पष्ट बात क्यों ना बोली जाए? इससे तो हमारे परिणाम सुधरते हैं न? इसमें क्या दिक्कत है? हमें रूप बदलने चाहिए। छोटे रूप में हो, कुछ भी हो। लेकिन हम ऐसा क्यों करते हैं? अरे! हम तो छोटे-छोटे विधान करते हैं और वहाँ भी हम इंद्र-इंद्राणी के बिना पूजा नहीं कर सकते? माने मनुष्य बनकर तो हमारी पूजा हो ही नहीं सकती। ये नाटक नहीं है ये? और हम देव हैं बड़े, ऊँचे बड़े? मनुष्य ऊँचा होता है या वो इंद्र ऊँचा होता है? चारित्र का अधिकार किसको है? कि तू नीचा उतरकर पूजा करता है, देव बनकर।

कितनी बातें कही जायें? खाने पीने की.. एक-एक बात में … अरे! विवेक और तत्त्वज्ञान, इसमें तो सब सारा व्यवहार सिमटा पड़ा है। इतना सुंदर है। सारा शिष्टाचार सिमटा पड़ा है। सारी नागरिकता, citizenship इसमें सिमटी पड़ी है, सारा का सारा। ये तत्त्वज्ञान इतना बारीक होता है और वो तो एक चिड़िया को भी होता है (फिर) हम तो मनुष्य हैं। हमें तो बहुत अधिक होना चाहिए। इसलिए जिन चीज़ों में अतिरेक हो गया है … है तो भक्ति। विधान, पंचकल्याण, पंचकल्याण से उत्कृष्ट विधान तो कोई है नहीं। लेकिन हमने तो उसका एक व्यवसाय ही शुरू कर दिया है। जो भी कराता है, सबसे पहले उसकी दृष्टि में ये है। वो बोलियों में कमी रह जायेगी तो क्या करेंगे? और ये बनाया है इतना खर्च किया है, वो पूरा नहीं हुआ तो क्या करेंगे? अरे! तुम क्या कर रहे हो ये? भगवान तो मोक्ष जा रहे हैं और हम कर क्या रहे हैं ये?

और उधर भगवान के माता-पिता (तो) उनकी भी बोलियाँ। हे भगवान! भगवान के माता-पिता की बोलियाँ! भगवान के माता-पिता नीलाम हो रहे हैं। पर जगत में, इस विश्व में कोई दिखता है भगवान के माता-पिता बनने वाला? कह दे कोई मुझे इस सभा में। इस विश्व में कोई बता दे कि जो भगवान का माता-पिता बनने लायक है, बता दे। तो फिर साहब फिर क्या करें? बंद कर दें पञ्चकल्याणक? मत बनाओ। कि प्रतिष्ठा में है भी विधान कि उनके बिना काम चल सकता है। पर हमें बनना है न! झगड़ा तो ये है। इतनी ज़्यादा विकृतियाँ है, व्यवहार की। उनको समेटे बिना कोई ३२०वीं गाथा तक पहुँच सके और इसका जो विषय है वो हमारे हाथ आ जाए, वो कल्पना है खाली। मुझे बोलते-बोलते allergy हो जाती है। क्या करें लेकिन! अपना (तो) उत्तरदायित्व है। निश्चय-व्यवहार को निभाना हमारा परम उत्तरदायित्व है क्योंकि हमारा लक्ष्य बहुत ऊँचा है। जिस व्यवहार के बिना हमारे उस लक्ष्य की पूर्ति नहीं होती तो फिर हम कैसे (उस) लक्ष्य पर पहुँच सकेंगे, इन चीजों को लेकर?

एक सुप्रीम कोर्ट का जज वो कोर्ट में जाता है। तो वो जाता है लेकिन proper dress (सही पोशाक) नहीं पहनता है। लुँगी लगा के चला जाता है, वहाँ बेंच पर। तो सबसे पहला तो उसको जो प्रश्न होता है वो कहते हैं - क्या करने आये हैं आप यहाँ? कहता है (कि) मैं statement लेने आया हूँ। Statement देने आया हूँ। बोले come proper dressed (सही पोशाक पहनकर आईये)। पहले आप घर जाइये और सही कपड़े पहनकर आइये, यहाँ खड़े होने लायक (कपड़े)। (तो वो कहता है कि) ये कपड़े बोलते हैं क्या? बुद्धि तो मेरे भीतर है। मैं __ बोलूँगा आप सुनिये तो! बोले कुछ नहीं सुना जाएगा। आप पहले proper dress पहनकर आइये, इसके बाद सारी बात हो सकती है। अन्यथा मत आइये। और भगवान भी कहते हैं come proper dressed। तुम्हारा व्यवहार बिल्कुल इसके अनुकूल हो एकदम, तब तो तुम्हें अधिकार है कि तुम निश्चय की बात कर सको। अन्यथा अधिकार भी नहीं (है)। इतना गिरा हुआ हो, और जहाँ इसका चिंतन ही न चले, ये बात यहीं रह जाए और इसके बाद ख़त्म, किस्सा ही ख़त्म, कहानी ख़त्म जैसे। तो क्या होनेवाला है?

यहाँ तो सबसे पहली यह शर्त रखी जाती है कि यदि ये तुम्हारे कलेजे में बैठ गया है तो फिर सपने में भी नहीं निकलना चाहिए। इस शर्त पर तो ये प्राप्त होता है, अन्यथा होगा नहीं। इसलिए ये तो बहुत आवश्यक है, हर बात। तो कोई कहता है कि इतने प्रतिबंध तो बर्दाश्त नहीं होते हमसे - ये सोचना ही गलत है। ये प्रतिबन्ध नहीं है, ये आजादी है ये। क्योंकि इतने प्रतिबंधों से निकाला गया है तुमको। तुम पहले इतने प्रतिबंधों में थे कि मैं इसके बना नहीं रह सकता, ये खाये बिना मेरा काम नहीं चलता। इतने प्रतिबंधों में … पहले इतनी पराधीनता तुमको थी। ये पान खाये बिना नहीं चलता, ये इलायची-सुपारी के बिना नहीं चलता। ये पान-पराग के बिना नहीं चलता। और प्याज, लहसन और आलू और वो … उनकी तो क्या बात करेंगे? वो तो सभा में बात करने लायक नहीं! इनके बिना नहीं चलता है। तो ये स्वाधीनता थी या पराधीनता थी? पराधीनता थी, जिससे हम तुमको मुक्त कर रहे हैं। तुम्हारा सोचना (ही) गलत है, आज की पीढ़ी का सोचना गलत है। ये नई पीढ़ी का। माने इतने-इतने प्रतिबन्ध, इतने restrictions? हम restrictions में नहीं रहना चाहते। ये restrictions नहीं हैं, तुम आजादी की ओर जा रहे हो। अगर तुम इतना नहीं छोड़ सकते तो मोक्ष की माँग करते हो? वहाँ तो कुछ होता ही नहीं है, कुछ रहता ही नहीं है।

इसलिए आवश्यक है कि हमारा व्यवहार बहुत संतुलित हो। खाने-पीने में, किसी भी चीज में, चिंतन में हो, विचार में हो, वार्तालाप में हो, उठने-बैठने में हो, चलने-फिरने में हो, सारा घर हमारा अहिंसा का एक मूर्तमान दिखता हो। मूर्तमान अहिंसा - उसका नाम दिगंबर जैन घर, वो दिखता हो। यहाँ तो वही विचार नहीं है। इतनी दया नहीं! क्या हो सकता है? क्या होगा? कि दया तो पालता हैं, एक चींटी भी नहीं मारते हैं। वो नहीं यहाँ कुछ कहना है। तब जब कोई अवसर आता है, तुम्हारे ऊपर कोई विपत्ति आती है अथवा किसी तुम्हारे परिचित पर कोई विपत्ति आती है, उसमें तुम कितनी हिंसा करने को तैयार हो सकते हो, वो है तुम्हारी दया। वो परिणाम कहाँ से आ गया तुम्हारा? उसका अर्थ यह है कि दया तो थी नहीं। घोर हिंसा तुम्हारे भीतर तह में पड़ी थी कि जिसको तुम्हारा विवेक जोड़ नहीं पाया। पता नहीं पड़ता (है)। वो कहाँ से आ गयी वो बात?

एक आदमी के पास agency है एक और कहता है कि मेरे यहाँ तो एक ही दाम है। बस! इतने में है ये पैकेट। इसमें एक पैसा भी नया पैसा भी इधर-उधर नहीं होगा। यहाँ तो ईमानदारी से काम चलता है। अच्छा ठीक है! और वो agency छिन गयी और दूसरा व्यवसाय करने लगा। व्यवसाय मिला नहीं कोई। तो क्या करता है? तू तो बहुत ईमानदार था। बहुत ईमान धर्मवाला था, क्या हो गया? ये कहाँ से आ गया ये, ये बेईमानी? तू थी ही नहीं ईमानदारी, बिल्कुल नहीं थी। थोड़ी भी नहीं थी, ज़रा भी नहीं थी। और उसको कोई पुण्यबंध का तो कोई सवाल ही नहीं था। पाप ही पाप बंधता था, वरना ये आ कहाँ से जाते? अब तूने ये रसगुल्ला और गुलाब-जामुन खाया ही नहीं तो उलटी कैसे हो गई? कि तेरे भीतर जो ये थी नहीं .. फिर ये आ कहाँ से गई? अरे! ठेले वाला भी किसी दीवार .. कोई निमित्त मिलता है तब तो झगड़ा होता है। और ना हो वो एक दूसरी बात। तुझे इस प्रकार के निमित्त नहीं मिलें (तो) तू ईमानदार। पर तू था पूरा बेईमान। इस तरह पूरा निर्दय है वर्तमान में। और ये सारी पहचान हमारी घरों में और मंदिरों में हो जाती है। मंदिरों में भी सब पता चल जाता है कि पूजा की थाली सरका दी। तुम बहुत अच्छे अहिंसक हो। कि साहब! खसका दिया तो क्या हुआ? कि हुआ ये कि अब तुम्हारे मोक्ष के सारे अधिकार छीन लिए गए। तुम जा नहीं सकते हो क्योंकि सब विवेक अस्त हो गया है। व्यवहार में और निश्चय में अधिकार सचमुच नहीं है।

जैनदर्शन समीक्षा, भाग 5

पूज्य बाबूजी ‘युगल’ जी, कोटा
जैनदर्शन समीक्षा - भाग ५

भिक्षावृति वो राष्ट्र का कलंक है, वो शोभा नहीं है। अगर हिंदुस्तान के ७० करोड़ आदमी भीख माँगते हों तो हिंदुस्तान बड़ा राष्ट्र कहलाएगा? अच्छी नहीं है बात। यह तो शर्म की बात है, लज्जा की बात है। इसी तरह जितना कुछ अनर्थ हुआ है, जितना कुछ दर्द हुआ है, तकलीफ हुई है, जितनी कुछ … आत्मा कष्ट के नाम पर बहुत बात करता है (मगर) समाधान चाहता नहीं (है)। हमारे चित्त में भी दुख के नाम पर अगर कोई बात पैदा हो कि मेरे को वर्तमान में यह तकलीफ है, तो आचार्य कुन्दकुन्द उसका इस गाथा में जवाब देते हैं कि - क्योंकि आत्मा को जाना नहीं है इसलिए तकलीफ है। कोई ये कहता है कि मेरे को जुकाम हो गया है और मेरे को जुकाम बहुत रहता है। तो आचार्य कुन्दकुन्द जवाब देते हैं कि आत्मा को जाना नहीं। क्योंकि जो आत्मा को जान लेता है उसके तो शरीर का ही अभाव हो जाता है, तो फिर जुकाम नहीं होता है। आत्मा को जाना नहीं है इसलिए आठ कर्म आत्मा के साथ हैं। और आठ कर्म के साथ में शरीर आदि भी हैं तब जुकाम होता है, तब बुखार आता है। इसलिए प्रत्येक ही बात का जवाब - क्योंकि बहुत प्रश्न और बहुत जवाब हैं। यहाँ तो अनंत प्रश्न और एक जवाब है। क्यों है ऐसा? (कि) आत्मा को जाना नहीं (है)। कि आत्मा का क्या नहीं जाना है? कि आत्मा एक निरपेक्ष स्वतंत्र परिपूर्ण सत्ता है - यह नहीं जाना है। और यह नहीं जानने के कारण इसको आत्मा तो मानना ही है, जानना ही है किसी को। इसलिए तुरंत अपने से भिन्न पदार्थ में आत्मत्व कर लेता है, वो बुद्धि कर लेता है। और भिन्न पदार्थों के जो सहचर हैं, भिन्न पदार्थों के जो साथ रहनेवाले हैं, तब फिर उनके सामने राग और द्वेष की झोली फैलाता है।

ये मिथ्यादर्शन से उत्पन होनेवाली दो शाखायें - राग और द्वेष। उससे इन शाखाओं का जन्म होता है। होता ही है, निश्चित ही होगा। क्योंकि जहाँ अपने से भिन्न वस्तु को मान लिया गया है, आत्मा, तो वहाँ फिर उस वस्तु का जाना कभी पसंद नहीं होगा। उस वस्तु का जाना वो अपनी मौत लगेगी, उस वस्तु का रहना ये अपना जीवन लगेगा। इसलिए उस, जिसको हमने आत्मा माना है, जिस आकृति को हमने आत्मा माना है, उस आकृति में यदि थोड़ा भी विघटन होता है, विकृति होती है और उस विकृति के कारण हमको जगत में नजर आते हैं, उनके प्रति द्वेष ना हो - ऐसा हो नहीं सकेगा। संभव नहीं होगा। और उसको थपकी देनेवाले जितने हैं उनके प्रति राग ना हो ये कभी नहीं होगा। इस तरह मिथ्यादर्शन के साथ राग और द्वेष की दो शाखायें, ये फूटती हैं और फिर सारा होता है, सब कुछ। आठ कर्म भी होते हैं, और शरीर भी होता है, चार गतियाँ भी होती हैं और ८४ लाख योनियाँ भी।

जगत में जितने जेलखाने हैं वे ईमानदारों के लिए नहीं हैं, लेकिन बेईमानों के लिए हैं। चार गतियाँ और ८४ लाख योनियाँ ये बेईमानों के लिए हैं। ईमानदारों के लिए नहीं हैं।

सबसे बड़ा ईमान क्या है? कि सबसे बड़ा ईमान यह है कि केवल मेरी सत्ता ही मेरी है। और जगत का एक परमाणु मात्र भी मेरा नहीं है। इससे बड़ा ईमान-धर्म जगत में नहीं हो सकता।

उसकी चर्चा आचार्य करते हैं (कि) सबसे पहले आत्मा को जानो। क्या विचित्र है बात! छोटा सा है न! वाक्य छोटा सा है, लेकिन छोटे से वाक्य में बहुत बात गर्भित है। और टीका में अमृतचंद्र उसका दोहन करनेवाले हैं और ये कहनेवाले हैं कि किसको आत्मा माना गया है। और किसको माना जाना चाहिए था। तो कुन्दकुन्द ने जिस आत्मा की चर्चा इसमें की है, उसको आत्मा ने आत्मा माना ही नहीं है। अन्य को भी आत्मा ने आत्मा ही माना है, लेकिन सचमुच अपना आत्मा उसके हाथ नहीं आया। और हाथ भी कदाचित् आया तो कुल-परंपरा से आया, शास्त्रों से आया, ज्ञानियों की वाणी से आया, लेकिन अपनी युक्ति और अपने अनुभव से नहीं आया। इसलिए आत्मा उधार रह गया। नकद नहीं बन सका। उसका प्रत्यक्षीकरण नहीं हुआ क्योंकि इनसे माना न हमने, आत्मा को।

उदहारण दिया है सरल, बहुत सरल। जिसको धन की इच्छा हो वो किसको जाने? कि जिसके पास धन रहता है, धन मिलता है, उसको जाने। बात प्रफुल्लता की नहीं है, लेकिन उदाहरण बहुत सुंदर है। जिसको धन की इच्छा है, जो अपने आप को दरिद्री मानता है, वह धनवाले के पास जाए। धनवाला राजा होता है, उसके पास जाए। कैसे जाए? कि सबसे पहले ये जाने कि ये राजा है और इसके पास धन है - ऐसा जाने। और फिर श्रद्धा करे कि ये राजा ही है, राजा यही है। जानने में तो दो पक्ष हो सकते हैं लेकिन श्रद्धा में दो पक्ष नहीं होते। फिर श्रद्धा करता है और फिर उसका प्रयत्न पूर्वक अनुचरण करता है। जब ये जाना कि ये राजा है, फिर उसका विश्वास किया कि यही राजा है, तो फिर उसकी ओर इसके कदम बढ़ते हैं। और तब इसकी दरिद्रता का अंत होता है। ये उपाय है सीधा सा।

इसी प्रकार मोक्ष का इच्छुक, मोक्षार्थी, मुमुक्षु माने सारी सभा और जगत के अनंत प्राणी। मुमुक्षुओं की सभा! मोक्षार्थी माने मुमुक्षु। जिसको मुक्ति की इच्छा है वह भी जीव रूपी राजा को जाने। जीव को राजा कहा। राजा उसको नहीं कहते कि जो किसी दूसरे के पास माँगने जाए। राजा तो उसको कहते हैं कि जिसके अपने सारे काम अपने यहाँ ही संपन्न होते हों, उसको कहीं दूसरी जगह किसी दूसरे की ओर, अपनी प्रजा की ओर ना देखना पड़े उसका नाम राजा। राजा होकर ही जीने को कहा है जैनधर्म में तो। एक क्षण भी जी, मगर तू ताज बनकर जी; ताज बनकर जी। अपनी नजरों को दूसरे के सामने रखकर, अपनी झोली को दूसरे के सामने फैलाकर यदि तू जीता है, (तो) अच्छा होता कि इस पृथ्वी पर तेरा जन्म ही ना होता। तू होता ही नहीं।

इसी तरह आत्मा अपनी झोलियाँ ये अजान-बेजान पुद्गल के सामने फैलाता है, तो एक बार तो यह कह दिया जाए (कि) अच्छा होता कि इस भूमंडल पर तू होता ही नहीं। तेरी जरूरत इस स्वतंत्र पृथ्वीतल पर तेरे जैसे बेकाम आदमी की जरूरत नहीं है। तू संपूर्ण सृष्टि को पराधीनता में जकड़ देना चाहता है क्योंकि तू उसका स्वरूप ही ऐसा देखता है न! वरना इस विश्व में कहा ये गुंजाइश है तुझे पुद्गल की ओर नजर करना पड़े और अपनी झोली पुद्गल की ओर फैलाना पड़े। इस लोक में तो इस प्रकार की व्यवस्था ही नहीं है। नहीं है।

आजादी में कहाँ ये व्यवस्था है कि लोग डाके डालें, लूटें, दीवारें तोड़ें, रास्ते चलते जंजीर तोड़ें। ये व्यवस्था है क्या? प्रत्येक आदमी परिश्रम करे और अपना पेट भरे, ये राष्ट्र का संदेश है। लेकिन ये सारे धंधे होते तो हैं। होते हैं लेकिन यहाँ कहीं भी राष्ट्र में इस प्रकार की गुंजाइश बिल्कुल नहीं है। क्योंकि मेहनत और परिश्रम के लिए खुला क्षेत्र है (और) करना चाहिए। इसी तरह आत्मा के लिए इस संपूर्ण विश्व में कहीं भी एक इंच ऐसी जगह नहीं है कि इसको अपनी सत्ता से सरकना पड़े और फिर इसका कोई काम पूरा हो। इसके संपूर्ण अभिलाषाओं की तृप्ति इसके भीतर से होनेवाली है, ऐसी आचार्य गारंटी देते हैं। आत्मा को जाने इसमें इतना भरा है कि आत्मा को जाने, माने आत्मा एक ऐसा राजा है, ऐसा सम्राट है कि जिसको एक बार जान लेने पर संपूर्ण परतंत्रता और भिक्षावृति समाप्त होती है - ऐसा राजा है आत्मा।

राजा भिखारी को नहीं कहते हैं। यहाँ तो हम अपने जीवन पर और जीवन के कार्यक्रम पर विचार करें। तो प्रातः काल उठकर ठीक एक भिखारी का जो धंधा है, वही हमारा धंधा है। इससे कुछ अतिरिक्त हो तो बताया जाए? और हम हैं तो अमीर बड़े-बड़े, बहुत बड़े अमीर हैं। लेकिन बड़े अमीर होने पर भी जिसका काम जिसके बिना नहीं चलता इन दोनों में बड़ा कौन है? सोचने की है बात जरा। जिसका काम जिसके बिना नहीं चलता, तो जिसका काम नहीं चलता वो बड़ा या जिसके बिना नहीं चलता वो बड़ा है? दोनों में कौन बड़ा है? जैसे चप्पल के बिना काम नहीं चलता है न अपना, तो चप्पल बड़ी हुई कि अपन बड़े हुए? माने किसका व्यक्तित्व ऊँचा रहा? पर्सनालिटी किसकी ऊँची है? और हमारा माथा ऊँचा है कि हम इतने बंगलेवाले और इतनी कारें और इतनी फैक्ट्रियाँ हैं हमारी। लेकिन हम फैक्ट्रियों के, बंगलों के, कारों के, चप्पलों के गुलाम और दास हैं। हम उनके मालिक नहीं हैं।

एक आदमी को कहा जाए कि आपके नौकर कितने (हैं)? कि २० एक है, २० एक। २० हैं नौकर। तो ये सब आपके नौकर हैं न? कि हाँ! अपने ही नौकर हैं, सबको वेतन देते हैं। लेकिन वो समझदार आदमी ये कहता है कि मुझे २० नौकरों के नौकर आप मालूम पड़ते हो। कि ऐसा कैसे है? क्योंकि उन २० के बिना आपका काम सरकता ही नहीं है। तो कौन हुआ? व्यक्तित्व किसका महान रहा?

यहाँ आचार्य आत्मा को अपना व्यक्तित्व संभलाना चाहते हैं कि धूलधानी मत हो। तेरी मट्टी पलीत व्यर्थ ही हुई है। लोक में कहीं भी इस प्रकार की गुंजाइश नहीं है। एक परमाणु जब अपने सहारे जी सकता है तो आत्मा अपने सहारे ना जीये, ये व्यवस्था किसने बनाई? ये व्यवस्था स्वीकार नहीं की जा सकती।

इसलिए जीव रूपी राजा को जानना चाहिए। और फिर इसी प्रकार उसका श्रद्धान करना चाहिए और तत्पश्चात उसका अनुचरण करना चाहिए अर्थात् अनुभव के द्वारा तन्मय हो जाना चाहिए। ये अनुभव के द्वारा तन्मय हो जाना चाहिए, यह बात सिद्धों के जैसी है। क्या करते हैं भगवान सिद्ध - वो प्रश्न पैदा होता है न! तन्मय तो यही होता है और आगे जितना काम है आत्मा को जानने और आत्मा की श्रद्धा (करने) के बाद का, वो आत्मा की तन्मयता का ही सारा का सारा व्यवसाय है। माने आत्मा में क्रमशः तन्मयता ही होती है। भगवान सिद्ध क्या करते हैं? कि वे आत्मा में तन्मय हैं - ये जवाब है।

हमको ऐसा लगता है कि भगवान सिद्ध ये कुछ काम नहीं करते हैं न! अकर्मण्य है न बिल्कुल! क्योंकि हमको काम से फुर्सत है नहीं। और हमको इसी काम में निरंतर तबीयत लगती है। थोड़े समय के लिए काम रुक जाए तो चित्त बेचैन होता है, आकुलता होती है। ये सिद्ध होने का तरीका बिल्कुल नहीं है। क्योंकि भगवान सिद्ध के पास जो अनंत शक्ति, संपत्ति है - आत्मा कोई सामान्य तत्त्व नहीं है। लेकिन अनंत शक्ति, संपत्ति वाला, अनंत शक्ति का पुंज एकमय है। उस अनंत शक्ति का भोग करना ये आत्मा का व्यवसाय है। ये भगवान सिद्ध का व्यवसाय है, ये अनंत परमात्माओं का, सर्वज्ञों का, तीर्थंकरों का व्यवसाय है। ये व्यवसाय है। हम भी ऐसा अनुभव कर सकते हैं।

एक आदमी को पूछा जाता है, भाई! तुम दिन भर मेहनत इतनी करते हो, क्या है ये बात? क्यों करते हो? कि साहब! पेट के लिए करते हैं। इसलिए करते हैं कि अगर तुम्हारा पेट यूँ ही भरा रहे और तुमको भूख ही ना लगे और वैसे ही तुमको आनंद रहे तो फिर ये धंधा करोगे? फिर काहे को करूँगा धंधा, बिना ही काम? मेरा माथा थोड़ी (ना) खराब हुआ है। तो ये जितना कुछ होता है, बस सब का सब उस तृप्ति के लिए है न! तो जहाँ संपूर्ण कर्म के नाम पर होने वाला, माने कर्म केवल कहा जाता है वो, मोक्षमार्ग को कर्म कहा जाता है पर सचमुच वो निष्कर्म कर्म है। इसलिए जहाँ वो काम पूरा हो गया तो फिर भी कुछ करना शेष रहता है क्या? इसके बाद तो भोग ही शेष रहता है। और जब काम सारा ही पूरा हो चुका है, तो ऐसा कौन मूर्ख है जो फिर काम करने की सोचेगा? इसलिए निरंतर अपने अनंत गुणों की संपत्ति में तन्मय होकर उसके आनंद में तल्लीन रहना ये भगवान सिद्ध का अनंतकाल का व्यवसाय है। ये वो करते हैं। तन्मय हो जाना चाहिए। हो जाना चाहिए, ऐसा कहते हैं आचार्य। तन्मय हो जाना चाहिए ऐसा वचन है न! करुणामय और उपदेश का वचन है कि ऐसा करना चाहिए।

जैसे कोई बीमार हो, व्यर्थ मर रहा हो, बदपरहेजी कर-करके। तब करुणा से भरा हुआ चिकित्सक यह कहता है कि तुझे ऐसा कर ही लेना चाहिए। नहीं करेगा तो जीवन से हाथ धोना पड़ेगा। इसी तरह आचार्य कहते हैं कि बहुत हो चुका है न! जीवन में - हमने जीवन के संबंध में बहुत प्रश्न किए हैं और उनके उत्तर भी बहुत पाए हैं। एक बात शांति से हमारी सुनो ऐसा कहते हैं। कि क्या सुनें? कि सर्व कष्टों के अंत के लिए सिर्फ आत्मा को जानो। क्योंकि आत्मा को जान लेने पर, अर्थात् जिस आत्मा की हम चर्चा करते हैं, उस आत्मा को जान लेने पर आत्मा की संपूर्णता का दर्शन होगा। और तब आत्मा की वृत्तियों को निश्चितरूप में आत्मा में विराम मिलेगा। फिर आत्मा की वृत्तियों का स्खलन, दूसरे की ओर जाना, अन्य के प्रति आकर्षित होना - ये सारा व्यवसाय समाप्त हो जाएगा। इसलिए हम आत्मा को जानने की बात कहते हैं।

थकावट बहुत हुई है और उपलब्धि कुछ नहीं हुई है। ८४ लाख योनियों का परिभ्रमण हुआ है पर उपलब्धि तो बताओ? आज पूछा जाता है कैसे हो? कि बस! ठीक है, ऐसे ही हैं। चल रहे हैं। चल रहे हैं, जीवन की घड़ियाँ बीत रही हैं। अरे! पर बताओ तो, ये इतना व्यवसाय किया, क्या हुआ इसका? जगत के जो कहे जानेवाले सुख हैं, उनके स्वभाव पर अगर हम एक बार विचार भी कर लें तो उन सुखों के प्रति तत्काल अनासक्त हो जायेंगे। उन सुखों का आकर्षण समाप्त हो जाएगा। बहुत संपन्न व्यक्ति हो और सारी आधुनिकतायें, जितने भी आधुनिक साधन और प्रसाधन हैं हमारे इस बाहरी जीवन के… बाहरी जीवन माने मिट्टी का बना हुआ जीवन। इस मिट्टी के जीवन को आराम देने के लिए जितने भी बाहरी साधन और प्रसाधन हैं, उनमें से एक की भी कमी ना हो। आधुनिकतम - सारे हो हमारे पास। होते हैं, हो सकते हैं ऐसे बहुत हैं धनिक, जगत में। लेकिन जिस समय व्यक्ति को असाध्य रोग होता है और उस असाध्य रोग में तो केवल इस पूरे के पूरे शरीर का एक छोटा सा अवयव खराब होता है। बाकी सारे साधन-प्रसाधन ज्यों के त्यों पड़े रहते हैं। बंगले को आँच नहीं आती अगर कैंसर हो जाए तो। वैसा (का) वैसा रहता है। सारा परिवार ज्यो का त्यों रहता है। फ्रीज और टेलीविजन जहाँ के तहाँ, ज्यो के त्यों पड़े रहते हैं। केवल शरीर के एक जरा से अवयव में थोड़ा सा परिवर्तन आया है और सारे के सारे सुख दूर हो गए हैं। ये क्या है बात?

उसको पूछा जाए कि तुमको कितना दुख है। वो कहता है कि मैं अपने दुख के परिमाण का प्रतिपादन नहीं कर सकता। मैं अपने दुख के परिमाण को कह नहीं सकता। तो कोई यों कहे कि क्यों झूठ बोलते हो? मेरे को ये बात समझ में नहीं आती है। कि क्यों समझ में नहीं आती है? इसलिए समझ में नहीं आती है कि तुम्हारा सुख इन सबसे मिलकर बना है। और अभी तो केवल उसका कोई एक करोड़वा हिस्सा भी खराब नहीं हुआ है। एक करोड़वा हिस्सा भी खराब हुआ है, बाकी इतना सुख है उसका क्या हुआ? और तुम कहते हो कि सब बर्बाद हो गया है। मैं एक क्षण के लिए भी किंचित् मात्र भी आराम अनुभव नहीं करता हूँ। तो क्या है ये बात फिर? इन सुखों की क्या है कीमत?

तो जो सुख, कहे जानेवाले सारे के सारे सुख, जिनके प्रति हमारा संपूर्ण समर्पण है यदि वे इतने थोड़े से परिवर्तन में सब के सब समाप्त हो सकते हैं, तो वो ये हमारी आस्था के लिए तो नहीं हो सकते। उन पर क्या विश्वास किया जाये? उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। ये तो प्रत्यक्ष है बीतनेवाली बात। इसमें क्या है?

आदमी के पास ४० किलो सोना हो और जवाहरात अलग हों। और जिस समय वो कैंसर हो, उस समय सबको अगर उसकी छाती पर रख दिया जाए तो कितना आराम लगेगा? सब को। चलो दूर रहे, दूर हैं लेकिन हम तुम्हारी छाती पर ही इनको रख देते हैं। फिर आराम कितना लगेगा? वो तो कहेगा इनको हटाओ यहाँ से। हटाओ न यहाँ से। क्या बेहूदा! क्या बेवकूफी करते हो? अरे! लेकिन ये तो आपके सुख के साधन थे न सबके सब? कि जिनके ममत्व में आत्मा का तो पता ही नहीं था। माने आत्मा नाम की कोई चीज हो सकती है इसका तो पता कहीं भी नहीं था। तो जिनको हमने अपनी सत्ता और अपनी आत्मा माना था और जिनके बिना एक क्षण के लिए भी नहीं रह सकते थे, आज कहते हैं कि इनको हटाओ मेरी छाती से। मेरे को दर्द होता है, तकलीफ होती है। उन सर्व कष्टों का अंत करने के लिए आचार्य कहते हैं (कि) सबसे पहले आत्मा को जानो। यह आत्मा को जानना यही महा मंगलमय और महा कल्याणमय, सबसे महत्त्वपूर्ण है। और जो सबसे पहले करने की है वो इस गाथा का विषय है। बहुत मधुर शब्दों में आचार्य कहते हैं - सबसे पहले आत्मा को जानो। आत्मा को जानो, अर्थात् अपने को जानो।

समयसार को माँ की लोरियों जैसा समझना चाहिए। फर्क सिर्फ इतना है कि एक माँ अपनी लोरियों के द्वारा बालक को सुलाती है। तो एक माँ ऐसी भी होती है जो अपनी लोरियों से बालक को जगाती है। समयसार की लोरियाँ सदा से सोए हुए बालक को जगाने की हुईं। जगत में भी ऐसी मातायें होती हैं कि जब युद्ध का समय हो और उसके पुत्र का अपने देश के प्रति, राष्ट्र के प्रति एक दायित्व हो, कर्तव्य हो… तो वो माँ कहती है - जाओ! जागो और जाओ। सीमा पर जाओ और शत्रु से पीछे मत हटना। हारकर मुझे जिंदा मुँह मत दिखाना - ऐसा वो कहती है। समयसार की वार्ता भी इसी तरह की है।

आत्मा को जानो - सबसे पहले यह बात बहुत वजनीय है और सरलतम है। सबसे पहला कर्म बताया यहाँ आचार्य देव ने, वह कोई साधारण बात नहीं (है)। सबसे पहला बताया और एक मात्र कर्म बताया। इसके पीछे फिर कोई दूसरा कर्म नहीं है, तो दूसरा कर्म रहता भी नहीं है। आत्मा को जानने के बाद फिर दूसरा कोई काम करने को शेष रह जाता हो - ऐसा नहीं है। क्योंकि आत्मा अपने को जानकर इतना तृप्त हो जाता है कि उसका मुँह फिर किसी दूसरी ओर घूमता ही नहीं। फिरता ही नहीं।

एक बालक हो जैसे, लड़का, और उसके घर में ही उसके पिता के निधान हों, लेकिन सदा से ही जिसको भीख माँगना पड़ रहा हो। उसके पिता का जो मित्र है वो उसको कहता है - तेरे घर में अक्षय-निधान हैं। तो पूछता है क्या करूँ? सबसे पहला काम वह कर। और कोई दूसरा काम करने लायक नहीं है और वह काम हो जाने के बाद फिर स्वयं तुझे अनुभव में आएगा कि कोई दूसरा काम करने लायक नहीं है। सबसे पहला काम है कि उस निधान पर विश्वास कर, उसको जान और फिर उसका अनुभव कर, उसकी प्राप्ति कर।

इसी तरह आचार्य कहते हैं (कि) सबसे पहले आत्मा को जानो। अब तक नहीं जाना, यह केवल एक क्षण के पश्चाताप का विषय बन जाए (और) बन (भी) जाता है। पश्चाताप ना आवे तो काम नहीं होता। लेकिन पश्चाताप की सीमा, उसकी मर्यादा केवल एक क्षण की है। इसके बाद काम शुरू करो कि मेरा इतना जीवन बीता उसका क्या हुआ? कि सारे जीवन पर पानी फिरा है। उस पर पानी फेर दो। ये आत्मा की कथा, आत्मा को जानने का काम अपने पुराने जीवन पर पानी फेरने का है। उसमें एक क्षण का भी विलंब नहीं करना चाहिए। समयसार का महत्व ही ऐसा है।

जहाँ-जहाँ, जब-जब समयसार का नाम लिया जाए तो संपूर्ण जिनवाणी ही समझ लेना चाहिए। किसी ग्रंथ-विशेष का पक्ष नहीं। क्योंकि समयसार है अपने सामने, इसलिए समयसार नाम हम लेते हैं। माहात्म्य समयसार का ऐसा है कि जो समयसार इसका विषय है, एक बार यदि उस पर नजर चली जाए, एक बार अगर उसका अनुभव हो जाए, तो जीवन के सारे किस्से झूठे लगते हैं। सत्य नहीं लगता थोड़ा भी।

क्या हुआ एक बार कि - एक सेठानी की एक रानी से मित्रता हुई। राजा की रानी से मित्रता हो गई, गहरी मित्रता हो गई। और वह सेठानी रानी के यहाँ आने जाने लगी। एक बार रानी बाथरूम में स्नान करती थी और उसका जो कीमती मोतियों का हार था, वो उसने बाथरूम में उतार कर रखा और फिर पहनना भूल गई। सेठानी को वहाँ जाने का अवसर मिला। और वह भी बाथरूम गई तो उसने देखा कि मोतियों का हाथ रखा है और उसने मोतियों का हार अपने कपड़ों में छिपा लिया। रानी तो भूल गई लेकिन सेठानी के जाने के बाद। फिर बहुत समय बाद याद आया कि मोतियों हार कहाँ है? तो उसकी तलाश शुरू हुई। पूछा कि कहाँ भूली थीं आप? तो बहुत स्मरण करने पर याद आया कि बाथरूम में भूली थी। तो कौन आया था? तो कि आया तो कोई नहीं था, क्योंकि सेठानी के साथ मित्रता थी और शंका बिल्कुल नहीं थी। इसलिए कोई नहीं आया था क्योंकि वो तो ले जा ही नहीं सकती है - ऐसा उसका विश्वास था। लेकिन फिर भी कहना पड़ा कि वो तो आई थी लेकिन वो तो कोई ले जानेवाली नहीं है। लेकिन जो तलाश करनेवाली होती है, खूफिया, उसको तो इन बातों पर विश्वास नहीं होता है कि जब कोई नहीं आया तो फिर कौन ले जा सकता है? रानी का जो विश्वास है वो सच्चा है।

तो उसकी तलाश शुरू हुई। और सेठानी को जब पूछा गया किसी तरह वो तो इनकार हो गई कि मैंने तो लिया नहीं है। तब उसका एक तरीका सोचा गया, खूफिया ने। एक तरीका उसका सोचा गया कि सेठानी की किसी से मित्रता कराओ। किसी सीआईडी स्त्री की उस सेठानी से मित्रता कराओ। तो एक सीआईडी स्त्री की सेठानी से मित्रता कराई गई और उनमें प्रगाढ़ मित्रता हो गई। तो स्त्रियों में तो इतनी गंभीरता नहीं होती। पेट हल्का होता है (उनका), भारी नहीं होता।

तो उस मित्रता में एक दिन वह बात कहने में आ गई कि एक दिन ऐसा हुआ कि मैं रानी के यहाँ गई थी। और इस-इस तरह से वो हार मैंने उठा लिया। सीआईडी ने उस दिन क्या किया था कि आसपास अपने दूसरे सीआईडी छिपाए थे। और वो जो सेठानी की मित्र जो सीआईडी स्त्री थी वह सारी बात उससे पूछ-पूछकर स्पष्ट करा रही थी और सुन रही थी। तो सेठानी ने अंत में कहा कि अंत में उन मोतियों का मैंने चूरा किया क्योंकि तलाश चल पड़ी थी। इसलिए मैंने उनका चूरा किया और मैंने उनको गटर में बहा दिया। इतने में क्या हुआ कि जो सीआईडी स्त्री बैठी थी उसकी निगाह थोड़ी बाहर दरवाजे की तरफ चली गई और ये सेठानी ने देख लिया। तो फिर उस सीआईडी स्त्री ने अंत में उस सेठानी से पूछा कि फिर क्या हुआ? कि फिर मेरी नींद खुल गई। माने क्या हुआ? सारी कहानी का क्या हुआ? तब सीआईडी स्त्री पूछती है कि क्या वो केवल सपना था? कि हाँ! वो सबका सब सपना था।

ठीक इसी तरह समयसार जो कहता है तो हमारे सारे स्वपनों और निद्रा में चलनेवाली बातों को झूठा साबित करता है कि आज तक जितना हुआ है वो सारा स्वप्न और निद्रा था। सब भ्रम था। जीव खाता है, जीव पीता है, जीव सोता है, जीव जागता है, चलता है, फिरता है, व्यवसाय करता है, और मोटर और बंगलेवाला है। कि ये कतई झूठी कथा है ये। इसमें थोड़ी भी सच्चाई नहीं है। समयसार इस पर पानी फेर देता है। आचार्य स्वयं कहते हैं - तेरी ये अनुभूतियाँ कतई झूठी हैं क्योंकि तू जिस आत्मा की बात करता है और तू जिस आत्मा को जानने की बात करता है कि मैं ऐसा हूँ, तो ऐसा आत्मा हमने जगत में देखा ही नहीं है। सर्वज्ञ परमेश्वर ऐसे आत्मा की सत्ता जगत में मानते ही नहीं हैं कि जैसे आत्मा को तूने कल्पित किया है। यह एक बहुत बड़ी चुनौती है हमारे ज्ञान पर। हम जो आत्मा को जानने और मानने का अभिमान करते हैं, उस पर एक चुनौती है।

भगवान सर्वज्ञ ये कहते हैं कि आत्मा जगत में है तो सही लेकिन ऐसा आत्मा जगत में नहीं है कि जो भोजन करता हो। हमने ऐसा आत्मा जगत में देखा ही नहीं और तुम तो ऐसे ही आत्मा की कल्पना कर रहे हो न! इसलिए इस गाथा में हम कहते हैं कि तुम आत्मा को जानो। क्योंकि तुमने आत्मा को खानेवाला और पहननेवाला माना है और ऐसे आत्मा की जगत में सत्ता नहीं है। है ही नहीं। आत्मा के लिए ये गुंजाइश कहाँ है कि वो अपना मुँह किसी दूसरे की ओर करे? क्योंकि स्वयं सर्वज्ञ परमेश्वर आत्मा के भीतर अनंत निधान प्रत्यक्ष देखते हैं और उसका विश्वास हमको कराना चाहते हैं। कड़े शब्दों में कहा जाए तो आचार्य कहते हैं कि तुझे शर्म आना चाहिए। तेरे भीतर पड़े हुए वैभव का दर्शन ना करके ये जड़ का और पुद्गल का जो वैभव है, उससे तू अपनी प्रतिष्ठा और इज्जत मानता है, तुझे शर्म आना चाहिए। लज्जा की है ये बात क्योंकि तेरे निधान अटूट हैं।

यह बात केवल निश्चयनय की नहीं लेकिन यह बात अत्यंत सत्य है। जो पर्याय की बात है वह तो किसी रूप में सत्य लगती है, लेकिन वह सत्य है नहीं। और यह बात तो निश्चितरूप में सत्य है, निश्चयनय से सत्य नहीं है। लेकिन आत्मा ही ऐसा है कि उसके भीतर अनंत निधान पड़े हैं। इसलिए आत्मा को जान - ये वचन बहुत गंभीर हैं क्योंकि ऐसे आत्मा को जान लेने पर तेरी चिरकाल की दरिद्रता का एक क्षण में अंत हो जानेवाला है। इसलिए हम आत्मा को जानने की बात तुझे कहते हैं। तेरी आदत अच्छी नहीं है। तू स्वयं अपनी इज्जत पर आप ही बट्टा लगाता है। तेरे निधान अनंत हैं। उन निधानों का एक बार दर्शन होने पर तेरी यह निकम्मी आदत समाप्त हो जाएगी। इसलिए हम आत्मा को जानने की बात तुझे कहते हैं। और जैसा तूने माना है वैसा आत्मा नहीं है। आत्मा तो इज्जतवाला पदार्थ है।

आत्मा को किसी ने बनाया हो, फिर उसको थोड़ा ज्ञान दिया हो, थोड़ा आनंद दिया हो - ऐसा निकम्मा आत्मा का स्वरूप नहीं है। अपने सहारे, अपने वैभव के सहारे सदा से रहने वाला, अपनी सत्ता को अपने बल पर कायम रखने वाला - ऐसा आत्मा का त्रैकालिक स्वभाव है। जाने तो ऐसा है, और ना जाने तो ऐसा है। इसलिए आत्मा को जानने की बात आचार्य कहते हैं। नहीं जाने तो आत्मा का क्या बिगड़ जानेवाला है? वो तो वस्तुस्थिति है। इसलिए कहते हैं आचार्य कि अपनी गंदी आदत को एक बार बंद कर। ये तेरी शान-शौकत के लायक नहीं है।

आपने तो यहाँ देखा होगा? सेठ साहब थे हुकुमचंदजी। बड़े गौरवशाली पुरुष हुए, ऐसा प्रसिद्ध है। कल्पना कीजिए कि पास में तुकोगंज में किसी व्यक्ति का साधारण सा मकान है, एक जैन श्रावक है वो। और वो वहाँ रहता है। सेठ साहब एक दिन भोजन कर रहे हैं और वो व्यक्ति अपने यहाँ से आम के रस का कटोरा भर कर लाता है, सेठ साहब के पास। और वो कहता है सेठ साहब! जरा ये मेरा रस भी आप चखें तो सही। तो सेठ साहब सबसे पहले कहेंगे कि - तुमको किसने बुलाया था? तुम्हारे रस की यहाँ क्या आवश्यकता थी? तुमको किसने बुलाया था? सुनकर वो व्यक्ति चला जाए और फिर दूसरे दिन उसको कल्पना हो कि शायद उनका मूड अच्छा नहीं हो उस दिन। तो चलो दूसरे दिन भी चलें। क्या बात है इसमें? दूसरे दिन भी आता है तो और अधिक नाराजी होती है। क्यों लाते हो तुम बार-बार? ये लोग हैं भोजन परोसने वाले। वे ये कहें कि क्या हो गया? ज़रा सा ले लीजिये न! क्या फर्क पड़ता है अपने? तो सेठ साहब कहेंगे कि तुम ढब्बू हो सारे के सारे, मूर्ख हो तुम। मेरी सारी इज्जत पर बट्टा नहीं लग जायेगा? कि आज का जो रस खाया गया था वो किसी दूसरे के यहाँ से आया था। क्या ऐसी मेरी इज्जत है?

इस तरह आत्मा पुद्गल के सामने अपनी अंजुली फैला-फैलाकर और उससे अपनी आवश्यकता पूरी करने की चेष्टा करे - यह आत्मा के गौरव के लायक नहीं है। एक बार तो भगवान सिद्ध भी अपना आनंद हमको प्रस्तावित करें तो हम में इतना गौरव हो कि भगवन मुझे तो जरूरत नहीं है, आवश्यकता मुझे नहीं है - इतनी ताकत हो। तब हम कहेंगे (कि) ये तो बहुत बड़ा घमंड हो जाएगा। (हाँ!) तो इसी घमंड का नाम सम्यग्दर्शन है। अपने सहारे जीना, ऐसा जो अभिमान जिसको स्वाभिमान कहते हैं वो सम्यग्दर्शन का पर्यायवाची है। किसी दूसरे के सहारे जीना ये आत्मा का कर्म और आत्मा का धर्म नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि आत्मा की स्वरूप सत्ता ही ऐसी है इसलिए उसका कर्म ये नहीं है। ऐसे आत्मा को जानो।

इसके लिए, हमारी दृष्टि को आत्मा के लायक होना पड़े। आत्मा को हमारी दृष्टि के लायक नहीं होना पड़ेगा। जैसे देखना है, बारीक चीज को देखना हो, तो वो चीज मोटी नहीं होगी। जैसे हीरे को देखना हो, मोती को देखना हो और हमारी नज़र अगर कमजोर है, तो वो मोती हाथी नहीं बनेगा। लेकिन हमको हमारी दृष्टि ही बारीक करनी पड़ेगी। इसी तरह महावीर को अपनी दृष्टि में नहीं देखना है… रजनीश ने किताब लिखी 'महावीर मेरी दृष्टि में; और पढ़ने वालों ने बड़े प्रेम से पढ़ी। लेकिन थोड़ा हम अपनी बुद्धि को तो तोल लेते कि महावीर को हम अपने तराजू पर तोलने चले हैं? जैसे एक पंगु है, लँगड़ा (और) वो सुमेरु को मापने चला है। ‘महावीर मेरी दृष्टि में’ क्या मजाक है? और जैनियों ने, दिगंबर युवकों ने उसको पढ़ा (और) उसके टेप भरे और आज भी बड़े प्रेम से पढ़ते और सुनते हैं।

इसी तरह आत्मा को अपनी गंदी दृष्टि से नहीं आँका जा सकता, नहीं पहचाना जा सकता। आत्मा तो स्पष्ट निर्मल तत्त्व है क्योंकि वह किसी का परिग्रहण करता ही नहीं। वस्तु किसी का परिग्रहण करे तो गंदी हो जाए। मिलावट में गंदगी होती है। और मिलावट, हम जैसी मिलावट की बात करते हैं वैसी मिलावट नहीं। लेकिन दो पदार्थ मिलकर बिल्कुल एक हों और दोनों की सत्ता का विलय हो अथवा एक चीज बने, एकीभूत हों उसका नाम मिलावट है। और ये तो विश्व में होता ही नहीं है। क्योंकि कौन है जगत में जो अपनी सत्ता को मिटाने को तैयार हो? एक परमाणु स्कंध में रहकर अपनी सत्ता को सुरक्षित रखता है। इसी तरह आत्म पदार्थ भी ऐसा गौरववंत है, वो अपनी सत्ता किसी में मिलाता नहीं है। लेकिन हमने आत्मा को दूसरे के साथ मिला हुआ जाना और देखा, माना - ऐसा आत्मा जगत में है ही नहीं। उसकी सत्ता ही नहीं है।

तो हमको नजर आया उसका क्या हुआ? तो हमको नजर आया उसकी कोई कीमत नहीं है। आत्मा वैसा था नहीं लेकिन हमारी नजर खराब होने से हमको नजर आया। जैसे आसमान में दो चंद्रमा दिखाई दिए हैं लेकिन चंद्रमा दो नहीं (हैं)। तो दो चंद्रमा दिखाई दें तो क्या करें? कि आसमान में से एक चंद्रमा को हटायें या अपनी निगाह ठीक करें? क्या करें हम? कि आसमान में चंद्रमा एक ही है। हम तो अपनी निगाह को ठीक करें तो चंद्रमा एक नजर आने लग जाएगा।

इस तरह अब तक जैसा आत्मा जाना गया है वैसा आत्मा जगत में है ही नहीं। उसकी सत्ता ही नहीं है। इससे अधिक हमारे ज्ञान पर थप्पड़ क्या होगी? चाहे कोई भी हो इसमें क्या है? कम जाननेवाला हो अथवा अधिक जाननेवाला हो। तो अब तक जैसा आत्मा जाना गया है वैसे आत्मा की जगत में सत्ता ही नहीं। है ही नहीं (वैसी) आत्मा की सत्ता। कहते हैं मिथ्यादृष्टि आत्मा? कि मिथ्यादृष्टि आत्मा नहीं (है)। आत्मा तो आत्मा ही है। लेकिन आत्मा को आत्मा ना देखना इसका नाम मिथ्यादर्शन है। इससे आत्मा मिथ्यादृष्टि कैसे हो गया? ये जिनवाणी के मर्म हैं, रहस्य हैं। तो कठिन कहाँ है बात? इस नवतत्त्वों की इतनी गंभीर चर्चा करते हैं न लालचंदभाई? तो उसमें सारा का सारा क्या है? कि जो नवतत्त्व हैं वैसा आत्मा कहाँ है? आत्मा तो सदा से जैसा है वैसा है। जो नवों ही तत्त्व हैं वो तो सिर्फ आत्मा को जानने अथवा ना जानने तक की कहानी है। और क्या है? जो आत्मा को नहीं जानता, कौन से आत्मा को? विद्यमान आत्मा को। स्पष्ट प्रकाशमान ज्योतिस्वरूप आत्मा को। अपने अनंत स्वभाव, अपने अनंत गुण संपन्न आत्मा को, विद्यमान आत्मा को जो नहीं जानता है उसका नाम आस्रव तत्त्व है। तो आत्मा आस्रव हो गया? क्या कमाल है? आत्मा आस्रव कैसे हो गया? आत्मा तो वहाँ का वहाँ रहा क्योंकि आत्मा का आस्रव बन जाता तो फिर आत्मा को जानने का प्रकरण ही खत्म हो जाता। कौन जानता (है) आत्मा को? आत्मा ही समाप्त हो जाता। तो आत्मा कैसे जाना जाता?

इसी प्रकार संवर और निर्जरा ये आत्मा को जानते हुए प्रगट हुए। तो फिर क्या हुआ? कि आत्मा तो वो का वही है। आत्मा तो उतना का उतना ही है, उन्होंने आत्मा को बनाया नहीं (है)। उन्होंने आत्मा में कुछ जोड़ा नहीं (है)। तो संवर-निर्जरा प्रगट होने से आत्मा बढ़ा नहीं और संवर-निर्जरा नहीं थी तो आत्मा घटा नहीं। वो तो आत्मा उतना का उतना ही था। उसका नाम असली आत्मा है और वो १७वीं गाथा का विषय है। उसको आचार्य आत्मा कहते हैं। जिसमें थोड़ी भी वृद्धि और ह्रास नहीं होता है, ऐसा विद्यमान तत्त्व त्रैकालिक आत्मतत्त्व उसका नाम आत्मा है। उसको आचार्य आत्मा मनवाना चाहते हैं क्योंकि वो जाना और माना नहीं गया है।

तब हम कहते हैं कि लेकिन जानती तो पर्याय है न? पर्याय तो जानती है लेकिन वह पर्याय वो आत्मा जैसा वर्तमान में है, विद्यमान, उसको ज्यों का त्यों जानती है? या उस आत्मा में अपनी ओर से कुछ मिलाकर जानती है? जैसा है वो आत्मा वैसा का वैसा जानती है न! जितना आत्मा है उतना जानती है न! तो फिर ये जो पर्याय है, ये तो आत्मा से दूर ही रही। आत्मा में शामिल नहीं हुई। अगर ये आत्मा में शामिल हो और फिर वैसे आत्मा का अनुभव किया जाए तो फिर आत्मा पूरा नहीं था। अधूरा था वो आत्मा।

ये शिष्य है और वो गुरु की श्रद्धा करता है। तो वो शिष्य ये अनुभव करे कि लेकिन मेरा भी तो ज्ञान है न! इनमें ही सारा का सारा थोड़ा ही है। मेरा नहीं है ज्ञान? तो गुरु श्रद्धेय होते हैं और शिष्य है वो श्रद्धा करनेवाला होता है। मैं भी तो कुछ हूँ? मेरे पास भी तो है ज्ञान? तो मैं अपना ज्ञान इनमें मिलाकर फिर श्रद्धा करूँ न! तो तेरे को ये जो गुरु महाराज हैं ये (तुझे) अल्पज्ञ नजर आयेंगे। क्योंकि सर्वज्ञता में अल्पज्ञता मिलावे तो अल्पज्ञता फलित होती है। निर्विकार में यदि थोड़ा भी विकार का अंश मिलाया जाए, मिलता नहीं है (हालाँकि लेकिन) मिलाने की कल्पना की जाए तो पूरा का पूरा आत्मा विकारी अनुभव में आएगा।

हमारे चरणानुयोग की पद्धति ऐसी है कि जैसे एक पानी का बड़ा भारी पात्र वो छाना गया और छानते-छानते एक जरा सा छींटा, एक छींटे का एक लाखवाँ हिस्सा उस पानी में गिर गया। तब ये पानी पीना कि नहीं? ऐसा चरणानुयोग वालों से, माने शुद्ध भोजन करने वालो से पूछ लें? उसमें क्या है बात? कि ये पानी अब पीने लायक नहीं रहा है? कि क्या विचित्र आदमी हो? इतने से, जरा से छींटे से पानी में क्या फर्क पड़नेवाला है? कि नहीं! सारा का सारा अनछना हो गया है। इसको सारे को पूरा छानो। इस तरह आत्मा में विकार का थोड़ा सा अंश मिलाने की गुंजाइश नहीं है। और निर्विकार परिणाम का भी थोड़ा सा अंश मिलाने की गुंजा इसमें नहीं है, ऐसा अत्यंत निर्विकार आत्मतत्त्व है। अत्यंत पवित्र आत्मतत्त्व! उस आत्मा को जानने की चर्चा आचार्य करते हैं।

इसी प्रकार मोक्षार्थी पुरुष पहले तो मोक्षार्थी पुरुष को, पहले तो आत्मा को जानना चाहिए। सरलतम भाषा में गंभीरतम बात है। मोक्षार्थी पुरुष को पहले आत्मा को जानना चाहिए, (ये) साधारण वचन नहीं हैं। मोक्ष की इच्छा रखनेवाले पुरुष का सबसे पहला कर्म कि वो आत्मा को जाने। और जो आत्मा अब तक जाना गया है उस पर पानी फेरे। ऐसी चिंता ना करे कि उसका क्या होगा? ऐसी विचित्र बात है।

जैसे रद्दी भरी हो ना किसी ने, जन्म भर मेहनत करके रद्दी भरी हो। ये फुटपाथों पर से कागज कचरे में से, गटर में से, कागज उठा-उठाकर जिसने एक कमरा भरा हो और उसको फिर एक दिन एक चिंतामणि मिल जाए। तो ये कहता है (कि) लेकिन मेरी इस मेहनत का क्या होगा? कि इसमें तू दियासलाई लगा दे। बस! इस मेहनत का यही करना चाहिए और यही होनेवाला है। और आत्मा को जानने का काम कर लेने के बाद फिर हमको बोलना, अगर तुझे कोई काम याद आवे तो हम उसके जिम्मेदार हैं। फिर कोई काम तुझे सूझे कि अब क्या करूँ, तो हमको बोलना। माने तेरे सारे कर्मों का अंत हो जानेवाला है। केवल एक मात्र आत्मा ही तेरे पास रह जानेवाला है। इसलिए आत्मा को पहले जानने की चर्चा आचार्यदेव करते हैं।

जैनदर्शन समीक्षा, भाग 6

पूज्य बाबूजी ‘युगल’ जी, कोटा
जैनदर्शन समीक्षा - भाग ६

१७-१८वीं गाथा है। आत्मा को जगाने के लिए ये जिनवाणी की लोरियाँ है। और जैसे एक बालक सोने के लिए लोरियों की अपेक्षा रखता है… मधुर गीत, (जो कि) उसकी माँ गाती है (वो) उसको मीठी लगती है। माता के सुलाने के जो गीत हैं (वो) बालक को बड़े प्रिय लगते हैं। जैसे भीतर से शरबत पीता हो ऐसा बालक को लगता है। इसी तरह आत्मा को जगाने के लिए ये अमृत जैसी लोरियाँ है।

मोक्ष कैसे होता है? इसलिए पहली शर्त तो यह हुई (कि) इन गाथाओं को मोक्षार्थी सुने। और मोक्ष की इच्छा भीतर से हो माने संसार से घबराया हुआ हो। जिस घर में आग लग जाने पर, एकदम झुलसा हुआ घर से निकला और अब उसको कोई परम विश्राम का स्थान मिलना चाहिए - ऐसी भीतर से तड़पन जिसके भीतर हो, केवल नरक से नहीं लेकिन स्वर्ग में भी तड़पन जिसको हो, वह जीव मोक्षार्थी होता है। उस मोक्षार्थी को मोक्ष कैसे मिलता है, उसकी चर्चा है।

सबसे पहले आत्मा को जाने - ऐसा सरल वचन आचार्य ने लिखा है। और इसकी चर्चा हमने की कि यहाँ आत्मा से तात्पर्य क्या है? जो आत्मा अब तक हमारे द्वारा जाना गया है, अज्ञानी के द्वारा जाना गया है, वह आत्मा तो यहाँ नहीं है। क्योंकि यदि वही होता तो फिर उसको बतलाने की और उसकी श्रद्धा करने की आवश्यकता आचार्य अनुभव नहीं करते। इसलिए हमारे द्वारा जाना गया आत्मा तो आत्मा नहीं (है)। और दूसरी बात ये कि जिस आत्मा को जानने से मुक्ति होती है, वह आत्मा ही सबसे पहले जाना जाये, जीवन का सबसे पहला कर्म और कर्तव्य यह है। और दूसरा कोई कर्म और कर्तव्य यदि महसूस होता है तो फिर आत्मा को सर्वोपरि नहीं जाना गया है। क्योंकि मोक्ष वो परमसाध्य है। परमसाध्य माने अत्यंत सुख, दुःख का आत्यंतिक क्षय और सुख का आत्यंतिक उत्पाद, पूर्ण सुख। यह जिसके अवलंबन से (और) जिसको जानने से मिलता है - तो उस आत्मा को जानने की इच्छा करनेवाले आत्मा के भीतर यदि आत्मा के सिवाय जगत के किसी अन्य पदार्थ के लिए जगह खाली हो, तो उससे बड़ा मूर्ख जगत में कोई नहीं होता। क्योंकि आत्यंतिक सुख का उत्पाद जिसके अवलंबन से होता है और उससे बड़ी चीज तो जगत में कोई दूसरी नहीं है, उससे बड़ा प्राप्तव्य और गंतव्य तो जगत में दूसरा नहीं है। फिर भी अगर किसी पदार्थ के प्रति उसके चित्त में गुंजाइश है तो वो मोक्षार्थी नहीं है।

जैसे दरिद्री को राजा बनने का अनायास (ही) एक प्रकरण आ जाये। राजा का कोई उत्तराधिकारी नहीं रहा हो तब ये निश्चय किया गया हो कि बाहर दरवाजे पर रात को जो कोई सोता हुआ मिले, उसी को राजा बना दिया जाये। तब रात को बाहर दरवाजे पर जब तलाश किया गया तो एक भिखारी सोता हुआ मिला। और निश्चय हो चुका था कि जो मिले उसी को राजा बनाया जाये। तब उसको कहा गया कि - चलो! अब उसको तो खटका हो गया बहुत बड़ा कि मेरी कोई मौत आई। बार-बार कहने पर कि तेरे को राजा बनाया जा रहा है, तू भयभीत मत हो। इस तरह जैसे लाचारी से कोई साथ हो जाता है, इस तरह वह लाचारी से साथ हो गया। और वहाँ जाकर उसका राज्याभिषेक होने लगे। तब उसको यह याद आवे कि लेकिन मेरा वो पानी का फूटा डब्बा, उसका क्या होगा? क्योंकि वह तो मेरी जीवन भर की कमाई है। तो वह राजा बनने के लायक तो नहीं है।

इस तरह आचार्य देव आत्यंतिक सुख आत्मा को संभलाते हैं। यहाँ तो इस तरह भी नहीं संभलाते हैं कि कहीं कोई ले जाये। लेकिन आत्मा के भीतर ही सदा से पड़ा हुआ संपूर्ण सुख कि जिस सुख से आत्मा की काया बनी हुई है, जिस सुख का आत्मा स्वयं निधान (है) अर्थात् आत्मा का एक-एक प्रदेश जिस सुख का ही बना हुआ है और जिस सुख में दुःख का आत्यंतिक अभाव है, क्योंकि सुख उसे कहते हैं जहाँ दुःख नहीं रहता। ऐसे हम लोगों को भगवान कुन्दकुन्द ये मुक्ति का आत्यंतिक सुख जब सुनाते हैं, उस पर विश्वास ना होकर हम अपनी किसी पुरानी कमाई को याद करें अथवा हमारा चित्त और हमारे चित्त के कोने में कोई जगह खाली रह जाये, तो हमसे बड़ा अभागा कोई दूसरा नहीं हो सकता है। इसी का नाम श्रद्धा है। और श्रद्धा किसको कहते हैं? उसका क्रम क्या है? कि बहुत सरल (है)।

सबसे पहले तो आत्मा आत्मा को जाने। क्योंकि मुक्ति का संपूर्ण व्यवसाय वह ज्ञान का ही है। आत्मा में कभी यह कमी नहीं रही कि उसके पास पैसा नहीं था इसलिए वह दुःखी रहा। अथवा उसका शरीर अच्छा नहीं रहता था इसलिए वो दुःखी रहा। उसका शरीर भी कहने की बात है लेकिन कहे बिना समझा नहीं जा सकता। इसी का नाम व्यवहार है न! यह आत्मा में कमी नहीं है। आत्मा को सुख क्यों नहीं मिला? क्योंकि उसने जगत के भोग नहीं भोगे - ऐसा नहीं है। अथवा आत्मा ने पुण्य के अनेक-अनेक कष्टमय विधान नहीं किए, आत्मा में कमी यह नहीं थी। पर आत्मा में कमी यह थी कि उसने आत्मा को जाना नहीं था। इसलिए संपूर्ण व्यवसाय ज्ञान का (ही) है।

तो सबसे पहले मोक्षार्थी पुरुष को सबसे पहले तो आत्मा को जानना चाहिए, और उस आत्मा को जानना चाहिए कि जिसकी ओर आचार्यदेव का संकेत है। उपाधिवाला आत्मा नहीं, संयोगवाला आत्मा नहीं, और विकार के आवरणवाला आत्मा नहीं अथवा वो विकार आत्मा नहीं (है)। पर इन सब के बीच रहकर भी जो बिल्कुल निरावृत्त और निर्विकार रहता है उस आत्मा की चर्चा करते हैं। और वह आत्मा सबके बीच रहकर निरावृत्त, अनावृत्त और निर्विकार कैसे रहता है? कैसे रहता होगा? और कैसे उसको उन सबके बीच में ही किसी को हटाए बिना, किसी से झगड़ा किए बिना, संघर्ष किए बिना, बड़े आराम से प्राप्त किया जा सकता है? - ऐसा मुक्ति का सरल विधान आचार्य प्रतिपादन करते हैं।

तो पहले तो उस आत्मा के स्वरूप को जाने और फिर उसी का श्रद्धान करना चाहिए कि यही आत्मा है। इसका आचरण करने से अवश्य कर्मों से छूटा जा सकेगा। यह तो थोड़ा स्पष्टीकरण किया है। पर श्रद्धा का प्रकरण केवल इतना कि यही आत्मा है। इसका आचरण करने से अवश्य कर्मों से छूटा जा सकेगा - ये इसका स्पष्टीकरण है। ये श्रद्धा का अवयव नहीं है, ये ज्ञान का अवयव है। क्योंकि श्रद्धा को ये काम नहीं करना है। और फिर उसी का अनुचरण करना चाहिए। उसी का अनुचरण करे कि पहले आत्मा को जाने। माने सचमुच आत्म वस्तु, आत्मा नाम का द्रव्य कितना है? आत्मा नाम का पदार्थ कितना है? असली आत्मा कितना है?

आत्मा के साथ अब तक क्या बीता है इससे प्रयोजन नहीं है। आत्मा ने स्वयं अपने को अब तक क्या जाना है, क्या माना है इससे प्रयोजन नहीं है। पर यह सारी घटनायें बाहर और भीतर घटित होने पर भी आत्मा का क्या हुआ है? कि यदि आत्मा का कुछ बिगड़ा है तब तो आत्मा ही नहीं है। लेकिन वहाँ एक ऐसा तत्त्व शेष रह गया है, इन सारी घटनाओं के घटने पर भी उन घटनाओं से इसका स्पर्श नहीं हुआ है। और वो ज्यों का त्यों विद्यमान है उसको आचार्य आत्मा कहते हैं। उस आत्मा को पहले जाने और फिर यही आत्मा है, यही आत्मा माने यही मैं हूँ…क्योंकि ये चर्चा मैं की है। आसमान के आत्मा की नहीं, पाताल के आत्मा की नहीं पर मैं की चर्चा है। डॉक्टर साहब ने कल कहा था कि चाहे वह आवे, चाहे तू आवे, चाहे यह आवे, चाहे मैं आवे, पर मैं समझ जाऊँगा। माने ये सारे गीत मेरे ही हैं - ऐसा समझना। इस तरह यही मैं हूँ, ऐसा जो निश्चय, अडिग निश्चय, प्रतीति उसका नाम श्रद्धा है।

यहाँ तक कदम नहीं बढ़े। यहाँ तक तो सिर्फ आत्मा का स्वरूप जाना गया (है)। आत्मा का स्वरूप जाना गया माने इतने बड़े मिश्रण में आत्मा कितना है यह जाना गया, यह माना गया और अब आत्मा को प्राप्ति का प्रयत्न अर्थात् आत्मा की ही वृत्तियाँ जो चंचल थीं और जो अन्य विषयों के प्रति चली जाती थीं अर्थात् आत्मा के विकल्पों में अन्य विषयों का संचार हो जाता था, तो वे आत्मा की वृत्तियाँ निश्चल होकर आत्मा में स्थिरता करने लगीं - इसका नाम चारित्र है। इस चारित्र में सदा ही क्रम पड़ता है और श्रद्धा में, ज्ञान में कभी क्रम नहीं पड़ता। ये एक नियम है। इसमें अपवाद नहीं है कहीं भी।

जितने भी आज तक मुक्त हुए हैं, उनके जीवन में मुक्ति का यही क्रम रहा है कि जानने में, आत्मा को जानने में क्रम नहीं पड़ा। एक ही बार में आत्मा के संपूर्ण स्वरूप को, आत्मा की सच्ची और जो असली सत्ता है उसको जान लिया गया (है), उसको मान लिया गया अर्थात् उसी पर अपना विश्वास केंद्रित कर दिया गया (है)। और उसकी प्राप्ति अर्थात् उसी में लीनता - लीनता अर्थात् वृत्तियों का जो बाहर परिभ्रमण होता है - बाहर माने होता है आत्मा के भीतर ही, पर विषय रहते हैं बाहर के - इसका नाम परिभ्रमण (है)। आत्मा के जो राग-द्वेष विकल्प हैं वे भी आत्मा से निकलकर बाहर नहीं जाते। लेकिन आत्मा के उन विकल्पों में अन्य विषयों का संचार (होता है)। अन्य विषय (जो) बनते हैं उन विकल्पों के, इसके स्थान पर उन विकल्पों का और विकल्पों में से अन्य विषयों का निष्कासन होकर जब वह वृत्ति उस आनंदमय स्वरूप में स्थिर होने लगे, लीन हो लगे, तो उसका नाम चारित्र है।

तो इसमें क्रम पड़ता है। अर्थात् सारा का सारा, संपूर्ण लीनता एक ही समय में कभी भी नहीं होती, कभी भी नहीं हुई और कभी भी नहीं होनेवाली है। उसमें, चारित्र में, निश्चितरूप से क्रम पड़नेवाला है। ये नियम ही है और इसमें कहीं concession (छूट) नहीं है। और concession (छूट) नहीं है इसीलिए ज्ञानी को मुक्ति में अगर देर लगती है। तो उसको भीतर ही भीतर इतनी झुंझलाहट नहीं होती कि देर क्यों लग रही है? जल्दी क्यों नहीं आता है? क्यों? क्योंकि उसका क्रम ऐसा है इसलिए उसको झुंझलाहट नहीं होती है (बल्कि) धैर्य प्रवर्तित होता है। और झुंझलाहट हो तो? झुंझलाहट हो तो जल्दी आ जायेगा? जल्दी आ जायेगा या गिर जायेगा? और अपना पुरुषार्थ जितना है, उसकी सामर्थ्य जितनी है, उससे अधिक अगर जोर लगाने का प्रयत्न करेगा तो गिर जायेगा। चलते हुए कदम रुक जायेंगे और पतन हो जायेगा। इसलिए जल्दी करने में, जल्दी तो नहीं होनेवाला है लेकिन विलंब होनेवाला है।

इसलिए चारित्र में … चारित्र नहीं होता यह बात तो कतई असत्य है। क्योंकि जिसने आत्मा को ही श्रेयस्कर कर माना है, संपूर्ण माना है, तो उसके चरण आत्मा की ओर ना बढ़ें - ऐसा कैसे हो सकता है? लेकिन वो आत्मा को एकदम प्राप्त करना चाहे, यह भी नहीं होता है। इसलिए बीच का संपूर्ण मार्ग धैर्य और शांति का है। जल्दी नहीं होती है। क्योंकि कभी अपने भीतर ही ऐसा प्रश्न होता है… अपने भीतर ही उत्पन्न करना चाहिए। हम किनमें उत्पन्न करते हैं? माने हमारा भी रास्ता गलत हो गया न! ये लोग जो कहते हैं चारित्र जल्दी क्यों नहीं लेते हो? तो कौन लोग कहते हैं? माने हमारा तो कहना बंद हो गया। माने हमको तो सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र हो गया न! तो वो लोग नहीं कहते पर हम लोग कहते हैं। माने मैं ये कहता हूँ कि चारित्र जल्दी क्यों नहीं होता है? तो मैं ही मूर्ख हूँ क्योंकि चारित्र का स्वरूप अभी मेरी समझ में नहीं आया है क्योंकि इसमें जल्दी होती ही नहीं है।

जैसे कहीं पहुँचना है अपने को, तो यहाँ से वो जगह १०० माइल पर है। तो उसको जाना कि वह यहाँ से १०० माइल पर है। इतना विस्तार सारा का सारा ज्ञान में आया है। जहाँ है वह भी ज्ञान में आई जगह। बीच का रास्ता भी ज्ञान में आया और जहाँ पहुँचना है वह भी ज्ञान में आया। अब श्रद्धा में क्या बाकी रह गया? तो श्रद्धा में केवल एक ही बात है कि वहाँ पहुँचना है। ये बीच का रास्ता श्रद्धा में नहीं है। ज्ञान का जो प्रकरण है उसमें सबका सब है, लेकिन श्रद्धा में तो केवल एक वह जहाँ पहुँचना है वही श्रद्धा का विषय है। ये बीच का मार्ग श्रद्धा का विषय नहीं है। यह बात कहाँ हुई? कि जहाँ अभी वो खड़ा है वहाँ हुई है यह बात। और अभी चरण बढ़े नहीं हैं। तो अब वो चरण बढ़ाना शुरू करता है। कदम बढ़ाना शुरू करता है तो उसमें तो कदम एक-एक करके ही बढ़ता है, एक-एक करके। पहले एक कदम बढ़ा, फिर उसको चुप किया, फिर दूसरा बढ़ा, फिर उसको चुप किया, फिर तीसरा कदम बढ़ा। यही क्रम है और इस तरह वो धीरे-धीरे अपने गंतव्य पर पहुँच जाता है क्योंकि गंतव्य को परम विश्राम की जगह मानता है। वहाँ पहुँचना ही है, इस तरह उसमें क्रम पड़ता है। अब जल्दी करे तो? तो जल्दी करता है तो गिर जायेगा क्योंकि शक्ति से अधिक यदि प्रयोग होगा तो वहाँ पर थकावट बढ़ेगी और जितना धीरे-धीरे चलने का क्रम था वह भी रुक जायेगा।

इसलिए दो बात (कीं) कि, चारित्र में ज्ञानी को कभी प्रमाद नहीं होता, तो चारित्र के लिए ज्ञानी को कभी उतावल नहीं होती - ये चारित्र में अनेकांत है। क्योंकि एक इधर अपन कहें कि उतावल नहीं करता तो आलसी होगा। आलसी नहीं है (बल्कि) चल रहा है। वो चल नहीं रहा है तो प्रमादी है (और) जल्दी करता है तो मूर्ख है। समझता नहीं है विधि को और विधान को। इसलिए उतावल नहीं करना चाहिए - यह सुनकर तो मुमुक्षु राजी हो जायें। और उतावल नहीं करना चाहिए - ये सुनकर अपने को भीतर ही भीतर आराम लगता है न! कि चलो! अभी तो थोड़ा भोग का मौका और मिल गया। और जल्दी करना चाहिए यह सुनकर वे लोग राजी हो जायें कि जिन्होंने मोक्षमार्ग की विधि को समझा नहीं है तो दोनों ही अज्ञानी हैं। वह मुमुक्षु तो केवल मंडल का है, मोक्ष का नहीं है। मंडल का सदस्य है, मुक्ति का सदस्य वो नहीं है। शक्तितस्त्याग ऐसा कहा है न! शक्ति के अनुसार ही त्याग और तपस्या होती है। इतना हो सकता है कि किसी का पुरुषार्थ तेज हो तो किसी का पुरुषार्थ मंद हो। लेकिन ये कभी भी नहीं होगा कि ज्ञानी के चरण मोक्षमार्ग पर बढ़ते हुए कभी रुक गए हों। अगर रुक गए हैं तो वो ज्ञानी है ही नहीं है। क्योंकि जिसको उसने अपना परमश्रेय और परमप्रिय निर्धारित किया है, उसकी ओर उसके कदम बढ़ते हुए रुक जायें - ऐसा होता ही नहीं है। कोई कहे कि ताकत नहीं हो तो? ऐसा कभी हुआ ही नहीं है कि जिसने उसको निर्धारित किया है उसके चरणों में इतनी भी ताकत का जन्म नहीं हुआ हो। उसके साथ ही शक्ति का जन्म होता है। इसलिए इस आलस्य को भी, इस प्रमाद को भी वहाँ पर गुंजाईश नहीं है। और फिर उदाहरण ले भगवान आदिनाथ का और उनका।

एक तो अपने गंतव्य पर कछुआ बढ़ता है और एक खरगोश बढ़ता है। कछुआ और खरगोश। एक तो खरगोश जाता है और एक कछुआ जाता है, लेकिन दोनों के दोनों बराबर (नियम से) पहुँचते हैं। एक जल्दी चाल से जाता है… एक भरत की चाल से जाता है और एक भगवान आदिनाथ की चाल से जाता है। भगवान आदिनाथ कछुए की गति से गए और उनके पुत्र खरगोश की गति से गए। इसलिए कहते हैं कि मोक्षमार्ग में कोई concession (छूट) भी नहीं होता है। जो जितनी मेहनत जिस ढंग से करता है, उपलब्धि उसी प्रकार से उतनी और उसी प्रकार से हो जाती है - ये नियम है। इसलिए हमको चारित्र के प्रति विमुखता का तो प्रश्न ही नहीं है। क्योंकि आनंद का जन्म और आनंद की वृद्धि - ये तो चारित्र में ही होनेवाली है। सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान के साथ अर्थात् अनुभूति के समय भी जो आनंद अनुभव में आ रहा है वो चारित्र का ही अंश है। वो सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान का अंश नहीं है। इसलिए उसके बिना तो हमारा काम पूरा होनेवाला नहीं है। ये चारित्र के प्रति ज्ञानी कभी विमुख नहीं होता।

तो कहे जानेवाले चारित्र के प्रति भी वो कभी ममतावंत नहीं होता। क्योंकि कहे जानेवाले तथा कथित माने व्यवहारचारित्र - ‘व्यवहार’ शब्द उसके साथ लगाया न! किसके साथ? कि जिस चारित्र के साथ व्यवहार शब्द लगाया है तो उसमें हमारी बुद्धि को थोड़ा परिश्रम तो करना चाहिए। माने उसको समझने का प्रयत्न तो करना चाहिए? इसके साथ ‘व्यवहार’ शब्द क्यों लगाया? और उसके साथ ‘निश्चय’ शब्द क्यों लगाया? तो एक के साथ व्यवहार और दूसरे के साथ निश्चय शब्द लगाया, उसका अर्थ ही यह है - इसके साथ जो व्यवहार शब्द है वो ये बताता है कि इसके बिना तो चारित्र, माने (कि) असली चारित्र (अर्थात्) आत्मलीनता होनेवाली ही नहीं है। लेकिन ये चारित्र बिल्कुल नहीं है, इसके बिना। इसके होने से चारित्र हो जानेवाला है - ऐसा नहीं। इसमें अस्तिरूप व्याप्ति नहीं (है)। इसके बिना तो जो वास्तविक चारित्र है, तन्मयता-आत्मलीनता वह होनेवाली ही नहीं है। लेकिन इसका नाम चारित्र बिल्कुल नहीं है। इसलिए इसके साथ में आचार्य ने ‘व्यवहार’ शब्द दिया, यह बताने के लिए कि ऐसा भी मत मान लेना कि इसके बिना ही आत्मलीनता हो जायेगी। तो यह भी मत मान लेना कि यह हो गया है तो आत्मलीनता हो गई है। ये बात मानने की नहीं है। इसलिए ‘व्यवहार’ शब्द दिया है।

जैसे हमारे घर पर कोई आवे, एक वृद्धा स्त्री आवे। और तब हमसे कोई पूछे कि ये कौन हैं? तो हम कहते (हैं कि) ये मेरी धर्म की माँ हैं। और ये? ये मेरी माताजी हैं। तो ये धर्म की माँ कौन होती हैं? इनके साथ में धर्म की माँ क्यों नहीं लगाया? और यदि धर्म की माँ हैं तो बाकी सब पाप की माँ हुईं? तो धर्म की माँ का अर्थ क्या है? धर्म की माँ का अर्थ यही है कि ये मेरी असली माँ नहीं हैं। लेकिन स्नेह के कारण, अवस्था के कारण, अत्यंत प्रेम के कारण, सानिध्य के कारण मैं इनको अपनी माँ कहता हूँ। ये अपनी माँ कहता हूँ - इसका नाम व्यवहार हुआ।

फिर से समझिये - कि मैं इनको … अब वो जानता है भीतर ही भीतर, स्पष्टीकरण नहीं करता (है)। स्पष्टीकरण करे तो जरा अच्छा नहीं होगा। इसलिए मैं इनको अपनी माँ कहता हूँ लेकिन अपनी माँ मानता तो नहीं हूँ। क्योंकि जिसके गर्भ से जन्म हो वही असली माँ होती है। इसी तरह जिसको चारित्र कहा गया, लेकिन जो वास्तव में चारित्र नहीं है तो उसको चारित्र कहा गया, इसका नाम व्यवहारनय है। लेकिन ये कहने से वो चारित्र नहीं बन गया, प्रश्न ये है। और उसको चारित्र मान भी नहीं लेना चाहिए। क्यों नहीं मान लेना चाहिए? क्योंकि वो सारा का सारा चारित्र जिसको चारित्र कहा गया है, वो सारा का सारा चारित्र कषाय का बना हुआ है - मंद कषाय। जितने भी पुण्यरूप भाव हैं वे सबके सब …

जैनदर्शन समीक्षा, भाग 7

पूज्य बाबूजी ‘युगल’ जी, कोटा
जैनदर्शन समीक्षा - भाग ७

ये समयसार परमागम का कर्ता-कर्म अधिकार है। इसकी अंतिम गाथा १४४, वो हमारी चर्चा का विषय है। चर्चा ही करते हैं हम लोग, (इसको) उपदेश नहीं समझना चाहिए। उपदेश का अधिकार तो एक मात्र तीर्थंकर परमात्मा को होता है। अथवा उनका अनुशीलन करनेवाले जो नग्न दिगंबर संत, जिन्हें एकमात्र आत्मा ही प्रिय है, और वे संत निरंतर उसी में विहार करते हैं - सचमुच वो विहार का ऐसा स्थल है, चैतन्य तत्त्व, जिसे आत्मा कहते हैं कि उसमें निरंतर ही विहार करते हुए भगवान सिद्ध को कभी थकावट नहीं लगती। इसी तरह निर्ग्रन्थ मुनिराजों का एक ही कर्म (है) - शुद्धोपयोग जिसे कहते हैं। शुद्धोपयोग माने निरंतर उस आत्म-वाटिका में विहार करनेवाला ज्ञान और उससे उत्पन्न होनेवाले आनंद का प्रति समय रसास्वादन - उसका नाम नग्न दिगंबर मुनि दशा (है)।

मुनिराजों को इस लोकोत्तर अनुभूति से, लोकोत्तर भोजन से, लोकोत्तर रसास्वादन से, कभी अवकाश ही नहीं मिलता, तो फिर वे और क्या करें? सचमुच कुछ करते ही नहीं हैं। मुनिराज शुद्ध चैतन्य-वाटिका में विहार के अतिरिक्त और कुछ करते ही नहीं हैं। कि करते हुए तो बहुत देखे जाते हैं? कितने काम करते हैं? आहारादि भी करते हैं, विहारादि भी करते हैं। कहते हैं ये वे करते हुए देखे जाते हैं लेकिन करते नहीं हैं। उनके अंतःकरण को देखो, उनका अंतःकरण इन सब क्रियाओं से टूटा हुआ है। क्योंकि उनको उस चैतन्य में पहुँचने की उतावल प्रतिसमय रहती है।

प्लेटफार्म पर खड़े रहनेवाले आदमी से पूछो कि तुम प्लेटफार्म पर खड़े हो? तो वो कहता है मैं खड़ा नहीं हूँ, मुझे तो निरंतर ट्रेन की आतुरता है। अपनी यात्रा की आतुरता है। उसी तरह इन संतों को - संत मात्र की बात है, दिगंबर संत हो। और तो जगत में कोई संत है ही नहीं। हम कितने भाग्यशाली हैं कि हमें - यह जो महापवित्र साध्य है, मुक्ति, सिद्ध दशा, परम सौख्य और परम आनंद की दशा - उस तक पहुँचने के लिए और उसका निर्देशन देनेवाले जो मिले हैं, वे भी जगत के सर्वश्रेष्ठ तीन तत्त्व हैं, सर्वश्रेष्ठ। भगवान अरहंत, निर्ग्रंथ दिगंबर संत, नित्य चैतन्य विहारी और उनकी यह वाणी, जिनवाणी, आगम, परमागम, शब्दब्रह्म - किसी (भी) नाम से कहें और ये सब अनादि-अनंत होते हैं।

सबसे पहले भावलिंगी संत कौन से हुए? - ऐसा होता नहीं, होगा भी नहीं ऐसा। क्यों नहीं होता है? इसलिए नहीं होता है कि सबसे पहले अगर हम किन्हीं भावलिंगी संत को - भावलिंगी माने चैतन्य विहारी, और द्रव्यलिंगी माने देहविहारी, मिट्टीविहारी, मिट्टी में विहार करने वाले। और भावलिंगी माने? वर्तमान में निषेध नहीं है। क्योंकि वे वर्तमान में थोड़ी (नया) होते हैं! तो वर्तमान से पूछो, वर्तमान काल से पूछो कि तू भावलिंगी संत क्यों नहीं होने देता है? तो उसका उत्तर यह है - मुझे तो कोई एतराज़ नहीं है। आत्मा उस चैतन्य में प्रचुर विहार करने का पुरुषार्थ करे और भावलिंग को प्राप्त करे। काल को जरा भी कोई तकलीफ और आपत्ति नहीं है।

ये कुन्दकुन्द आदि जितने संत हुए शताब्दियों की परंपरा में - कुन्दकुन्द तो सर्वप्रथम कहे जाते हैं क्योंकि उन्होंने सबसे पहले ये द्वादशांग की कलम चलाई। उसके बाद तो बहुत हुए, हजारों, लाखों संत (हुए), सभी हमारे वंद्य हैं। ये तीन हमें मिले तो वो भी ऐसे मिले कि जगत के सर्वोत्कृष्ट (मिले हैं)। हम कितने भाग्यशाली हैं, लेकिन कितने अभागे हैं कि इनका जीवन में जरा भी उपयोग नहीं कर पाए। जरा भी उपयोग नहीं कर पाए।

आज गाथा पढ़ते हैं, जिनवाणी पढ़ते हैं और उसका अर्थ इसमें लिखा होता है, लेकिन समझने में हमारी बुद्धि गायब है। बोले ये तो शब्द ही हमने नहीं सुने। तो जिन्होंने जिनवाणी के शब्द नहीं सुने, वे जिनवाणी को माँ समझते हैं? कि जिनवाणी के शब्द माने ये तो साक्षात् सुधा है, ये तो अमृत है साक्षात्। और इस अमृत का पान हम नहीं करते क्योंकि सदा से विष पीते आए हैं। मोह का विष, ममत्व का विष चढ़ा है सदा से, इसलिए जिनवाणी पसंद नहीं आती और इसमें दूसरों के आश्रित रहते हैं। सुन लेते हैं, सुना देते हैं। सुनानेवाले हैं तो सही न! तो सुन लेते हैं। कि तुम बहुत चतुर हो, सुन ही नहीं लेते हो। पर उसको सुनते हो जिसकी तुम्हें गरज नहीं है। और सुनने के बाद जो करना होता है वह गरज का काम होता है। तो व्यक्ति केवल सुनकर नहीं रह जाता पर उसमें प्रवृत्ति करता है। जिनवाणी को सुनकर यदि हमारी प्रवृत्ति उसके विषयभूत चैतन्य तत्त्व में नहीं हुई तो शायद हमसे बड़ा पापी, पाखंडी, अधर्मी जगत में दूसरा नहीं है। चिंतामणि को पाकर जिससे कौए उड़ाए उससे अभागा कौन होगा? ये हमने कौए उड़ाए हैं इन तीन महारत्नों को पाकर। तीन रत्न नहीं कहे? तीन रतन जगमाहिं।

लेकिन बंद है आज, जिनवाणी ही बंद है। कौन खोले? और सुने भी (तो कहे कि) बात कठिन है, समझ में नहीं आती है। तो जिनवाणी यह कहती है कि तू दुष्ट है तू, तेरा अभिप्राय दुष्ट है। तुझे तेरा नाम समझ में नहीं आता, मैं जो बताती हूँ? मैं तो तुझे तेरा नाम ही तो बताती हूँ? तूने एक नाम और एक स्वरूप होने पर भी ये जो अनेकरूप धारण किए हैं, नकली, इन नकली नामों से तू अपने आप को पुकारता आया और मानता आया। मेरा कहना केवल यह है कि अपना नकली नाम बताना बंद कर दे। इसकी सजा जेल होती है, नकली नाम की। ये बात समझ में नहीं आती?

नकली नाम कौन बताता है? झूठा नाम कौन बताता है कोर्ट में? और फिर क्या वो मुक्त हो जाता है? हमने क्या किया है? हमसे कोई पूछे कौन हो? दिखता नहीं है क्या? - सबसे पहले तो ये कहेंगे। मनुष्य हूँ और कौन हूँ? कि सच बोलो, सच। मनुष्य हो? कि सदा बने रहोगे मनुष्य? मनुष्यत्व का तो अंत हो जाता है, क्या उसके साथ आत्मा का भी अंत हो जायेगा? चैतन्य तत्त्व का भी अंत हो जायेगा? तो तुम मनुष्य नहीं हो, आज से इस बात को स्वीकार करो। ये कहती है जिनवाणी तो। (और बोलते है कि) अभी तो बहुत कठिन है। ये तो बहुत कठिन है। और ये जो बहुरूपिये जैसे वेश हैं - एक बहुरूपिया भी इतना समझदार होता है कि अपने बहुरूपों में विश्वास ना करके अपनी एकरूपता में विश्वास करता है। और वो जो बहुरूप है, जाकर उसका उद्घाटन कर देता है। अंत में उद्घाटन कर देता है। और जो उस बहुरूप के चक्र में आ जाए तो वो चला जाता है। लेकिन वो भी अपनी एकरूपता पर विश्वास करता है। वो मानता है कि ये वेश है, कल उतर जाएगा।

इस तरह जो-जो उतर जानेवाली चीजें हैं, वे-वे आत्मा नहीं हैं। जो-जो समाप्त हो जानेवाली चीजें हैं, वे-वे आत्मा नहीं। देह (वो) आत्मा नहीं है। देह के साथ जो संयोग है वे आत्मा नहीं हैं। उसके साथ में चलनेवाले हमारे मोह-राग-द्वेष, वे भी आत्मा नहीं हैं। मोह-राग-द्वेष तो झूठ बोलने को कहते हैं। झूठ बोलना आत्मा है? झूठ बोलना आत्मा का स्वभाव है? यहाँ तो आत्मा का स्वभाव ज्ञान कहते हैं। तो ज्ञान झूठ बोलता है? ये सूरज झूठ बोलता है? यह (तो) हर वस्तु को ज्यों का त्यों दिखा देता है। रात्रि के अंधकार में सारी वस्तुओं की एकरूपता न्यारी-न्यारी होने पर भी, जहाँ एकरूपता दिखाई देती है, आँखें अंधी हो जाती हैं सूझते हुए भी। उसी तरह अज्ञान के अंधकार में जो अंध हैं हम लोग, उनको हमसे भिन्न जितने भी भाव, जितने भी तत्त्व, जितना भी जगत है, वो सब हमारा दिखाई देता है। जिनवाणी कहती है, इस पाप को आज ही बंद करो। ये महापाप है ये। अपने से भिन्न किसी भी तत्त्व पर, किसी भी वस्तु पर कब्जा करने की भावना, कब्जा घोषित करना, कब्जा करने का प्रयत्न करना, इससे बड़ा अपराध जगत में दूसरा नहीं है। इसी की सजा है नर्क और निगोद।

इस चैतन्य में विहार कैसे होता है? आत्मा प्रिय लगना चाहिए सबसे बड़ी बात है। और लगता है, मिथ्यादर्शन में भी प्रिय तो आत्मा ही लगता है। सुनने की है बात। लेकिन जिसे आत्मा माना गया है वो प्रिय लगता है। वहाँ भी दो भेद तो बराबर चलते हैं, एक मैं (अर्थात्) मेरा और सब पराये। ये दो भेद तो मिथ्यादर्शन में भी चलते हैं। लेकिन वो भेद झूठे हैं क्योंकि वहाँ जिनमें भेद नहीं करना चाहिए और जो सबके सब पराये हैं, उनमें भेद करके वो मिथ्यादृष्टि, अज्ञानी, पापी - वो दो भेद करके कुछ को अपना मान लेता है और कुछ को पराया मान लेता है। और वे उसके रहते नहीं हैं। जिनको वो अपना मान लेता है, वे रहते नहीं है। मान लेता है खाली, बना नहीं लेता। तो ऐसे मानने से क्या फायदा कि जहाँ बने नहीं एक भी?

देह का एक परमाणु भी आज तक बड़ी सुरक्षायें देने पर और प्रयत्न करने पर भी हमारा नहीं बन पाया। और अंतिम समय में हमने लाखों मिन्नतें की हों। लाखों मिन्नत इस शरीर की की हों लेकिन ये एक क्षण के लिए भी ठहर नहीं पाया। बोला - मेरा समय हो गया है यात्रा का। यह तो केवल धर्मशाला में मैंने विराम लिया था। तुम भूल गए कि मेरे साथ ममत्व कर बैठे। मैं भी तुम्हारे जैसा ही इस कुदरत का यात्री हूँ और मेरी यात्रा अनंत है। ये पुद्गल को सुना कभी किसी ने? शरीर से निकलते हुए ये जो मौन स्वर हैं ये किसी ने सुने आज तक? शरीर बोलता नहीं हर किसी को मरते समय? कि तू क्यों मेरे से … मेरे से चाहता क्या है? तू जो चाहता है उसका एक अंश भी, उसका एक कण भी मेरे पास नहीं है। बोल क्या कहना है तेरा? वो आत्मा को बोलता है। तू सुख चाहता है न? तो मेरे पास तो सुख का नाम-निशान ही नहीं है। मेरे पास तो हड्डी और माँस तो है, तू क्या करेगा इसका? ये संदेश प्रतिसमय शरीर दे रहा है पर आत्मा बहरा हो गया है, ज्ञानमय होने पर भी। उसको जगाती है जिनवाणी। इसलिए प्रसन्नचित्त होना चाहिए।

सबसे पहले तो ये कि तीन रत्न जिसको मिल गए वो अब संसार में रहेगा? संसार में रह गया उसका बाकी? जिसको देव, शास्त्र, गुरु जैसे तीन रत्न, तीन चिंतामणि जिसे मिले, उसका संसार अब शेष नहीं रहा। और यदि उसे यह शंका है (कि) क्या मालूम क्या होगा, पता नहीं? तो तेरे को तेरा पता नहीं है? कि तेरे परिणाम कैसे चलते हैं इसका तुझे स्वयं पता नहीं है? पता है, इसीलिए तुझे शंका होती है कि तू इस माँ की वाणी का विश्वास नहीं करता। तू अनंत तीर्थंकरों का अनादर करता है और उनकी पूजा करता है, इससे बड़ा नाटक कौनसा होगा? नाटक नहीं (बल्कि) धोखा और छल। उधर पूजा करता है (और इधर) एक बात मानता नहीं है। वो कहते हैं तू शुद्ध चैतन्य है। ये कहता है कि - नहीं! ये तो ये कैसे हो सकता है? मैं तो अभी वर्तमान में तो मनुष्य हूँ। (तो) वस्तु का भी कोई वर्तमान, भूत और भविष्य होता है? वस्तु - भाई! जड़ भी कभी पैदा नहीं हुआ तो चेतन कभी पैदा हुआ है? अनादि-अनंत तत्त्व है तू, ये सुनकर तुझे उछल पड़ना चाहिए; कि जिसकी अनादिता और अनंतता में कोई संशय नहीं है, उसको जगत में मारनेवाला और उसके रास्ते में आनेवाला कोई पैदा हुआ है? इतना हुआ है कि मैंने स्वयं उस अपनी प्रतिष्ठा का अनादर किया है। इज्जत गवाई है मैंने अपनी अपने हाथों (से)। चैतन्य अनंत शक्तियों का, संपत्तियों का निधान होने पर भी, हमने उसको दरिद्री माना और पुद्गल के हाथों उसका विक्रय किया, बेचा उसको।

जिनवाणी से बड़ी कोई चीज हो सकती है? जिसका पढ़ना ही बंद है - ऐसा युग आया है - और कहते हैं (कि अभी) पंचम काल है। तो पंचम काल है तो क्या-क्या छूटा पंचम काल में? पंचम काल में जो बड़े हमारे पूर्वज थे उनका तो पहनावा और खानपान शुद्ध था, अच्छा था। और आज कोट-पेंट कैसे चल गए पंचम काल में? और कैसे परिवर्तन हो गए और तरह-तरह के? काल का कोई दोष नहीं हुआ करता है क्योंकि काल तो पर तत्त्व है, अलग चीज है वो। काल एक अलग पदार्थ है कि जो हमारे किसी काम में बाधा नहीं देता। जिनवाणी में भी कहने के लिए काल की ओर से बहुत बातें मिलती हैं। सच्चाई यह है कि काल ने आज तक हमको कोई बाधा नहीं दी (है)।

विदेह में क्या सभी मोक्ष जाते हैं? हम विदेह जाने की सोचते हैं न? अपन भी विदेह चलें एक बार तो, वहाँ भगवान हैं। अरे! पर भगवान तो हैं पर तेरा पात्र कितना (बड़ा) है? वो भगवान रखेंगे भी सही तो तेरा पात्र तो जरा सा है, श्रुतज्ञान का। इसलिए यहाँ जो मिलनेवाला है, वही (विदेह में) भगवान से मिलनेवाला है। यहाँ अगर नहीं मिलेगा तो भगवान से भी नहीं मिलेगा। ये समवसरण ही है, हम समवसरण में बैठे हैं। मैं कोई नहीं तीर्थंकर हूँ। पर तीर्थंकर जो बात कहते हैं वो बात अपन करते हैं। मन की (बात) बिल्कुल नहीं करते। कसम है मन की बात (नहीं) करना, कल्पना की बात (नहीं) करना। ये तो अनादि-अनंत सत्य है ये, परम सत्य है।

सत्य कभी नया नहीं होता, सत्य के वक्ता कभी नये नहीं होते। जो नया होता है वो असत्य ही होता है। जो नये-नये दर्शन खड़े हुए, उनका क्या हुआ? होते हैं और अंत हो जाता है। लेकिन वस्तु व्यवस्था पर जो केंद्रित है, उस दर्शन का, उस धर्म का कभी अंत नहीं होता। क्योंकि वो तो सीधा ये बोलता है कि आम कैसा है? कि आम से क्या पूछता है? इससे पूछ लो। चख के देख लो, इसमें क्या है? किससे पूछना, भगवान से पूछोगे (आम) कैसा होता है? चख लो न कैसा होता है? हम तो चखकर कहते हैं कि आम मीठा होता है। उसी तरह ज्ञान - वो वस्तु को पूरा छान कर, देखकर बोलता है और कहता है कि जगत का अणु-अणु न्यारा-न्यारा (है)। एक-एक अणु परमेश्वर है।

परम ईश्वर कौन होता है? परम ईश्वर वो कि जिसके ऊपर कोई नहीं है, जिसकी सत्ता को किसी ने बनाया नहीं है, जिसकी सत्ता का कभी कोई अंत नहीं कर सकेगा। (वो) परमेश्वर नहीं है? जड़ भी परमेश्वर है। इसी तरह मैं चेतन भी परमेश्वर हूँ क्योंकि मुझे किसी ने बनाया नहीं है। किसके आश्रित रहूँ? जब मुझे किसी ने नहीं बनाया और मेरी सत्ता अत्यंत निरावलम्बी है, तो फिर मैं किसके आश्रित मोक्ष प्राप्त करूँगा? मुक्ति स्वयं मेरे अधीन है। अरे! मैं मुक्त हूँ, यही तो मुक्ति है। और क्या मुक्ति है?

मुक्ति क्या होती है? सदा से विद्यमान जो चैतन्य तत्त्व है, वो न्यारा का न्यारा नहीं है? सबके बीच रहने पर भी है तो वो अलग, न्यारा ही है। सब्जी में जो नमक है वो न्यारा नहीं है? बिल्कुल मिला हुआ दिखाई देने पर भी उसका भिन्न स्वाद बहुत आराम से लिया जा सकता है। इसी तरह चैतन्य सारे विश्व के बीच में - मैं अत्यंत न्यारा तत्त्व हूँ। न्यारा हूँ, ये मेरा गौरव है, ये मेरी गरिमा है। जब मैं वजनीय तत्त्व हूँ कि मैं आज तक न्यारा रह सका और मेरी सत्ता ज्यों की त्यों है। उसमें आज तक कोई आँच नहीं आई।

इसका निश्चय केवल अनंत परमात्मा की वाणी जिसे जिनवाणी-परमागम कहते हैं, केवल उसी से होता है; अन्यत्र नहीं होता। इसमें कितना आराम मिल गया? पर आज के जो मनचले लोग हैं, बुद्धि के दुश्मन, वे इसकी परिभाषा क्या करते हैं? बोले जैनी द्वेषी होते हैं, द्वेषी। इनको दूसरे की बात नहीं सुहाती है। कि तुमसे बड़ा द्वेषी है जगत में कोई? तुमको सबकी बात सुहाती है? तुमने किसी को १००० रूपया दिया है और वो ये कहता है कि मैं तो १०० ले गया था, तुम उससे प्रेम करते हो या द्वेष करते हो? क्योंकि वो झूठ बोलता है। तो जो झूठ बोलनेवाले विचार और दर्शन हैं, उनसे प्रेम करें हम? और अपने सत्य को मिला दें उसमें? हमारा तो साक्षात् आँखों से देखा सत्य है। केवलज्ञान की आँख से देखा हुआ (सत्य है)। ये कल्पित नहीं है। जो कल्पना से खड़े होते हैं वे असत्य ही होते हैं। जो वस्तु को देखकर बात करता है वो सत्य ही होता है। उसमें असत्य होता ही नहीं है। तो जो मुक्ति की गारंटी देनेवाले हैं, कोई (भी) लोग हों, ये द्वेष है क्या?

एक व्यक्ति झूठ बोलता है, तो हम ये कहते हैं वो झूठ बोलता है, यह हम सत्य कहते हैं या द्वेष करते हैं? वो झूठ बोलता है - ये हमारा वचन सत्य है या झूठ है? सत्य है। और द्वेष है? ये बाजार में ठग आ गया है ये हमने सबको कहा ये हमने द्वेष किया उसके प्रति? यही ये बात कहता है दर्शन। जितना कुछ जगत है ये, उसमें तेरा एक चप्पा भी नहीं है क्योंकि तुझे आवश्यकता नहीं है। तू इतना संपूर्ण तत्त्व है और सम्राट है विश्व का क्योंकि तेरे पास ज्ञान और आनंद जैसी चीज़ें हैं, जो जगत के पास नहीं (हैं)। uncommon (असाधारण) है तू। कि uncommon है। Uncommon नहीं चाहिए? uncommon सूट चाहिए, uncommon साड़ी चाहिए foreign की। कि ये uncommon नहीं है? असाधारण तत्त्व है वो। पारमार्थिक तत्त्व कहा है आचार्यों ने इसको, आत्मा को। हम सभी जितने बैठे हैं, पारमार्थिक तत्त्व हैं - लोकोत्तर। जगत में एक भी ऐसा पदार्थ नहीं है। इससे अपनी महिमा नहीं आना चाहिए? और तो महिमा करे - शरीर इतना सुंदर, सूट ऐसा और नोटों के बंडल - इसकी तो महिमा करे जिनमें आग लग जानेवाली है; एक क्षण में जो राख हो जानेवाले हैं। लेकिन आज तक चैतन्य की राख नहीं हुई। लाखों शमशान जल गए (मगर) चैतन्य की राख नहीं हुई।

आत्मा मर गया होता तो ये शास्त्र लिखे जाते? किसके लिए लिखे? अनंत तीर्थंकरों की वाणी, वो केवल आत्मा के लिए होती है। जड़ के लिए नहीं होती। क्योंकि उसको समझाएगा कौन? लेकिन उस वाणी में ये कहा जाता है कि तू शुद्ध चैतन्य तत्त्व है। ये जड़ नहीं है तू। जो तू अपने आप को मान बैठा है, इनके साथ होने के कारण तू अपने आप को यही मान बैठा है, ये एकदम असत्य है, झूठ है। इसलिए इसे बंद कर दो। इसको बंद करने में क्या समय लगेगा?

कोई कहता है कि मैं झूठ बोलना छोड़ना चाहता हूँ। तो दूसरा कहता है - सत्यवादी - ये छोड़ दो, अभी छोड़ दो। कि नहीं! नहीं! सोचता हूँ, धीरे-धीरे छोडूँगा। अरे! धीरे-धीरे क्यों छोड़ता है? धीरे-धीरे कैसे छोड़ेगा असत्य को? धीरे-धीरे माने आज कितना छोड़ेगा? कि आज ५० प्रतिशत छोडूँगा। तो छूटा कुछ? थोड़ा छूटा? माने झूठ और सत्य ये भी कुछ आधे और पाव होते हैं? २५ और ५० प्रतिशत होते हैं? अरे! सत्य १०० प्रतिशत (cent percent) और असत्य भी १०० प्रतिशत।

ये दर्शन १०० प्रतिशत सत्य है ये, इसमें रंच (मात्र भी) अविश्वास करने की बात नहीं है। यह कहकर आचार्य हमको एक बहुत बड़ी राहत देते हैं, बहुत बड़ा आराम देते हैं कि - अब तुमको सुख और शांति के लिए, और उस आत्मा के स्वरूप को जानने के लिए अन्यत्र नहीं घूमना पड़ेगा। हमारा कितना परिश्रम और कितना परिभ्रमण समाप्त हो गया है? बोले असली चीज मिलती है तो वो केवल इस प्रतिष्ठान पर, इस दुकान पर मिलती है। तो फिर कौन बुद्धिमान है जो भटकेगा?

इसी तरह हम भटकेंगे? कि साहब! कहते हैं। आत्मा की बात तो सब करते हैं। सब करते हैं, ये अद्वैत, वेदांत भी करता है। बिल्कुल जैनदर्शन जैसी बात करता है वो। बिल्कुल जैनदर्शन जैसी। अरे! पर जैनदर्शन जैसी बात जैनदर्शन नहीं है क्योंकि उसमें संपूर्णता होनी चाहिए। केवल एक बात लेकर अगर किसी ने कह दी है तो वो तो बिल्कुल असत्य है, सत्य का अंश नहीं है। सत्य कभी भी आँशिक नहीं होता है। क्योंकि पदार्थ सत् है और उसका जो संपूर्ण विवेचन है, उसका जो संपूर्ण ज्ञान है, वो सत्य है। ये सत्य की परिभाषा है और क्या है?

उसकी चर्चा गाथा करती है और ये विधि बताती है। हमारे सारे प्रश्नों का उत्तर इस गाथा में है। हमने ये तो समझ लिया। जगत का स्वरूप समझा, आत्मा का स्वरूप समझा, अब क्या करें? ये एक प्रश्न (कि) अब क्या करें? कि अब तुम ये करो। गाथा का विषय, आत्मा की परमानंदमय अनुभूति करना हो, तो ये विधि है उसकी। क्योंकि जगत के पास तुम्हारे लिए कुछ नहीं है। तुम स्वयं जगत के उत्कृष्ट तत्त्व हो। इसलिए जगत से सारी आशायें और सारी अभिलाषायें छोड़ दो। वो तुम्हें कुछ देनेवाला नहीं और तुम्हें (उनकी) आवश्यकता नहीं। तुम स्वयं इतने भरचक हो, आत्मा इतना भरचक है, संपत्ति से, गुण के निधानों से कि उसमें एक चप्पा खाली नहीं है - कहाँ रखोगे? कैसे समायेगा उसमें? अनंत गुण नहीं कहे आत्मा में? अनंत। एक परमाणु में भी अनंत गुण। परमाणु! जो (कि) दूरबीन से भी नहीं दिखाई देता (है) और आत्मा तो उससे भी महान है। वो गुण माने उसकी संपत्ति, उसका धन, उसके रत्न - रत्नों का पिटारा है आत्मा।

ये एक बार विश्वास में (तो) आए - हमें तो आत्मा की एलर्जी हो गई है। आत्मा आते ही कहते हैं ये फिर आत्मा आ गया। अरे! आत्मा नहीं आ गया, तू परमेश्वर आ गया, तेरे गीत गाए जा रहे हैं ये। भगवान तीर्थंकर हमारे गीत गाते हैं। बोलो! इससे बड़ी क्या बात होगी? भगवान तीर्थंकर की वाणी, इसमें किसके गीत आते हैं? हमारे नहीं आते (हैं)? हमारे आते हैं। अनंत तीर्थंकर जिसका यशोगान करें, ऐसा पारमार्थिक उत्कृष्ट तत्त्व मैं हूँ, इसका नाम सम्यग्दर्शन है।

होना चाहिए … कि उसमें जो महापाप हैं, वे समाप्त हो जायें। भाई! जिन पाप परिणामों के होने पर ये तत्त्वज्ञान, आत्मा की सुंदर चर्चा सुनी ही नहीं जा सकती, अच्छी नहीं लगती, तो वे पाप परिणाम तो निश्चितरूप में छोड़ने ही लायक होते हैं। भाई! कंठ ही बंद हो गया हो तो भोजन कैसे उतरेगा? इसलिए उसको खुलने लायक तो करो। ये जो पाप परिणाम हैं, तीव्र पाप (के), निरंतर उसी-उसी का जगत ही जगत का विचार, आत्मा का तो कभी विचार आवे ही नहीं। यह भी विचार नहीं आवे कि मैं इतना उत्कृष्ट तत्त्व, इतना पवित्र तत्त्व होने पर भी, सचमुच मैंने अपने भावों में कैसे-कैसे कुकर्म किये हैं? और जगत का एक अणु भी मेरा ना होने पर भी मैंने इस जगत पर अपने अधिकार घोषित किए, इससे बड़ा पाप और कौन हो सकता है? कौन बर्दाश्त कर सकता है इस बात को? कौनसा राष्ट्र बर्दाश्त करेगा कि उसकी एक इंच भूमि को कोई ले ले? पाकिस्तान बर्दाश्त करेगा कि हिंदुस्तान बर्दाश्त करेगा? और यदि ये हो जाएगा तो? हो जाएगा तो दो आदमी लड़ लेंगे कहते हैं। दो आदमी नहीं लड़ लेंगे? महायुद्ध होगा एक इंच भूमि के लिए।

और इस अपराधी आत्मा ने, शुद्ध होने पर भी, शुद्ध माने कोई मिलावट नहीं (है) इसमें। लेकिन अपनी कल्पनाओं से, अपने आसपास इकट्ठे हुए पदार्थों को अपना घोषित किया। जैसे वो बावला व्यक्ति नदी के किनारे खड़ा होकर राजा की सेना आती है तो कहता है कि ये सब मेरा है। और आज्ञा देता है - चलो आओ, इधर आओ, यहाँ खड़े रहो। और वो राजा जाने लगता तो (कहता है कि) कहाँ जा रहा है? पागल है। आत्मा भी उन्मत्त हुआ है। तो दिन और रात क्या होता है? तो क्या छोड़ दें? छोड़ दें तो ये वाणी भी पापमय है। क्योंकि छूटा हुआ था उसे क्या छोड़ेगा? तूने किया ही कब था वो? तूने एक नया पैसा कमाया ही कब था जो अब छोड़ रहा है? कि दुकान छोड़ दूँ? अरे भई! दुकान हुई कब थी तेरी? तू दुकानमय कब हुआ था जो अब छोड़ रहा है? हुआ ही नहीं था। वो तो छूटी ही हुई थी। छूटी हुई होने पर भी महा अपराध करके तूने उसके साथ अपनत्व किया। बस! यही निगोद है, जिसको निगोद कहते हैं। सजा मालूम है क्या होती है उसकी? करोड़ों वर्षों की आयु हो उसमें भी मौत का डर लगे। और वहाँ एक श्वास में १८ बार जन्म और १८ बार मरण। ये किसका फल है? केवल इसका फल कि जो चीज हमारी नहीं है उस पर हमने अपने अधिकार घोषित किए, लेकिन चीज हमारी कभी नहीं बनी। तो नहीं बनी तो फिर अपराध क्या हुआ? कि ये जो तेरी मनशा खराब है, जो दंड है, वो हमेशा मनशा का लगता है। काम का नहीं लगता। अभिप्राय (intention) खराब है। उस intention को ठीक करने के लिए आचार्य हमें विधि बताते हैं।

अपनी १४४वीं गाथा है और कर्ता-कर्म अधिकार है। कर्ता-कर्म की चर्चा तो इतने से में समझ लेना कि जो हमारा चैतन्य (है), सत्ता है हमारी आत्मा जिसे कहते हैं, जीव भी कहते हैं, जीवास्तिकाय कहते हैं, चैतन्य तत्त्व कहते हैं कई नामों से पुकारा जाता है। उसके अतिरिक्त एक अणुमात्र के प्रति अपना अधिकार घोषित करना, उसकी क्रिया को करनेवाला अपने आप को मानना, उसको ग्रहण करने वाला (मानना), उसे छोड़नेवाला अपने आप को मानना - ये अपराध है। तो इसमें सारे कर्ता-कर्म का अंत हो जाता है। यहाँ तो आचार्य यहाँ तक आए थे - ये जो अपनी अंतिम गाथा है, इसके पहले आचार्य …

आत्मा का अनुभव करने से पूर्व क्या होता है? और यदि कोई उस प्रक्रिया में अटक जाता है तो वो भी अपराध है। वो भी आत्मा तक नहीं पहुँचता (है)। ये प्रक्रिया पहले आचार्य ने दी। तो सारे जगत को न्यारा जाना। अपने भीतर उत्पन्न होनेवाले मोहादिक - मोह माने मिथ्यादर्शन। मिथ्यादर्शन माने जो हमारा नहीं है उसे हम अपना माने, इसका नाम मिथ्यादर्शन। आत्मा हमारा है, उसको अपना ना माने। आत्मा परमशुद्ध तत्त्व है क्योंकि उसमें किसी की मिलावट नहीं है। उसको अशुद्ध माने दुःखी माने, इसका नाम मिथ्यादर्शन।

हम कहते है न, दुःख नहीं है क्या? दुःखी नहीं हैं क्या हम वर्तमान में? दुःख नहीं है, दुःख (तो) कल्पना से उत्पन्न होता है। सुख वास्तविक है। सुख आत्मा का स्वरूप है। मिश्री को यदि नमक में डाल दिया जाए तो खारी-खारी लगती है। (तो) मिश्री खारी है? इसी तरह आत्मा परमशुद्ध तत्त्व है क्योंकि उसमें किसी की मिलावट नहीं है। लेकिन हम उस मिश्री की तरह आत्मा को अन्य पदार्थों को साथ लेकर अनुभव करते हैं, तो आत्मा की खारी अनुभूति (वह) मिथ्यादर्शन होगी। वो तो होगा ही होगा और क्या होगा? इसका नाम मिथ्यादर्शन है। और मिथ्यादर्शन क्या होता है? एक मिनट में जिसकी धज्जियाँ उड़ जायें, ये ज्ञान हो जाए तो एक मिनट में जिसको बिखेर दे, समाप्त कर दे सदा के लिए - ऐसी ताकत ज्ञान में है। और उस शक्तिवाला आत्मतत्त्व है। इतना साहस भीतर आना चाहिए कि ऐसा निरापद, ऐसा अव्याबाध तत्त्व हूँ कि जिसकी सत्ता तो आज तक कोई समाप्त कर नहीं पाया। नरक में टुकड़े-टुकड़े हुए तो मेरे नहीं हुए, शरीर के हुए। टुकड़े करने की कोशिश तो की गई लेकिन मेरे टुकड़े नहीं हुए, आत्मा के। क्योंकि आत्मा के टुकड़े हो जाते तो (वो) खत्म हो जाता। फिर मोक्ष जाने की बात कौन करता? कोई अवकाश ही नहीं रहता।

तो इससे पूर्व जो बात कही, तो ये सारी बातें तो छूट ही गईं कि मैं मोही, रागी, द्वेषी हूँ, अथवा मैं पाप-पुण्य का कर्ता हूँ, पाप और पुण्यभाव मेरे हैं, इत्यादि-इत्यादि। ये सब मिथ्यात्व के अंश है। ये बात तो गई। लेकिन मेरा आत्मा शुद्ध है, आनंद का केंद्र है, अनंत शक्तियों का निधान है, ऐसा आत्मा के अनुभव के पहले चलनेवाला विचार और उस विचार में अटक जाना, संतुष्टि (satisfaction) हो जाए कि मैं तो आत्मा का ही विचार कर रहा हूँ। ये आत्मा का विचार करते-करते आत्मानुभूति हो जाएगी, अपराध है ये। कैसा बेलिहाज दर्शन है ये!

शुद्धात्मा का विचार! तो शुद्धात्मा के विचार को आचार्य ‘पक्ष’ कहते हैं। वो भी निश्चयनय का पक्ष; कि तू पक्ष में पड़ गया है। विचार से क्या होनेवाला है? विचार से तो जगत के काम भी नहीं होते। जब तक विचार रहता है तब तक काम नहीं होता। जब कार्य परिणति होती है तो विचार नहीं रहता। तो आत्मा साक्षात् विद्यमान तत्त्व है, इसमें भरे हुए अमृत को पी क्यों नहीं लेता है? विचार क्या करता है? तब ये कहता है कि विचार आए बिना तो रहता नहीं है क्योंकि जिस आत्मा का अनुभव करना है, उस आत्मा का विचार तो आएगा ही आएगा। तब आचार्य कहते हैं कि आएगा तो सही लेकिन उसमें मुग्ध मत हो जाना। तो विचार की जो श्रंखला है, विचार का जो सिलसिला है, वो समाप्त होकर अनुभूति प्रगट हो जाएगी और वास्तविक (जो) आनंद (है) उसका रसास्वादन होगा। कि जो आत्मा में भरा है… आत्मा में आनंद भरा है, ये बात निश्चय करके सभा में से उठना। आनंद से लथपथ है आत्मा का सारा प्रदेश-प्रदेश।

जिनको आत्मा की सत्ता ही स्वीकार नहीं है उनके लिए जिनवाणी नहीं है। वो तो नास्तिक है। उसको क्या कहा जाए? कि कहाँ है आत्मा? कहाँ है जरा बताओ? ये आँखों से सब दिखते हैं, आत्मा तो नहीं दिखता। पर जो आँखों के बिना दिखता है, उसे आँखों से क्यों देखना (है)? ये तो आँखों के बिना दिखता है आत्मा। वो आँख, कान, नाक से नहीं दिखता है। ये आँख, कान, नाक, इनमें आत्मा को देखने की सामर्थ्य - ये नहीं (है बात)। ये तो बिल्कुल जड़ ही हैं। ये कोई देखने-वेखने का धंधा नहीं करते हैं - ये तो पुद्गल है, इसमें ज्ञान कहाँ है? लेकिन इनके नाम से ही पुकारा जानेवाला ज्ञान, हमारे भीतर का, जिसे मतिज्ञान कहते हैं, उसमें भी आत्मा के अनुभव की ताकत नहीं है। स्थूल है वो। आत्मा सूक्ष्म तत्त्व है। इसलिए उसका अनुभव करने के लिए ज्ञान को भीतर सूक्ष्म बनाना होता है।

तो गाथा अपन पढ़ते हैं। समय तो हो गया भैया। ४५ मिनट दिये थे न? गाथा पढ़ लेते हैं। ये १४४ गाथा है। देखिए!

सम्मद्दंसणणाणं एसो लहदि त्ति णवरि ववदेसं।
सव्वणयपक्खरहिदो भणिदो जो सो समयसारो॥१४४॥

जो सर्व नयपक्षों से रहित कहा गया ये गाथा का अर्थ है ये। टीका तो और भी खुदाई करेगी। वो तो पाताल का शोधन करेगी टीका तो। लेकिन ये तो गाथा का ही अर्थ है। ये जो सिलसिला चला आया है, वर्णन का, उसके संबंध में आचार्य कहते हैं कि - अब तक आत्मा का अनुभव करने के लिए उस आत्मसन्मुख, आत्मार्थी, मुमुक्षु - मुमुक्षु बदनाम हो गया न आज? अरे! मुमुक्षु तो हर ज्ञानी, हर व्यक्ति, हर जीव जो मुक्ति चाहता है उसको मुमुक्षु कहते हैं। सिद्ध कौन नहीं बनना चाहता है? कि सब बनना चाहते हैं। तो मुमुक्षु कहने से घबराते क्यों हो? ‘मोक्तुं इच्छति’। जो मुक्त होना चाहता है, उसको मुमुक्षु कहते हैं। इसमें आचार्य के शब्द आये हैं। ऐसा नहीं घड़ लिया हो सोनगढ़ ने, मुमुक्षु। इसमें शब्द हैं कि जो मुक्त होना चाहता है।

ये सिद्धचक्र विधान का साध्य क्या है? सिद्ध दशा नहीं है? मुमुक्षुता से अगर घृणा करते हो, एलर्जी है, तो उठा दो विधान को। उसकी कहाँ जरूरत है? अरे! सिद्धों के सुख से जो घृणा करता है, मुमुक्षुता से घृणा करता है न? जो उसको नहीं चाहता है, तो वो तो निरंतर संसार में रुलना ही चाहता है। अटवियों में भटकना चाहता है। वो तो नर्क और निगोद में ही रहना चाहता है। ये तो पक्की है बात।

आत्मा पसंद आना चाहिए, अपनी सत्ता पसंद आनी चाहिए। हर अज्ञानी को, हर मिथ्यादृष्टि को, जिसे वह अपना मानता है, वही पसंद होता है। उसी में गहरा ममत्व होता है। और अन्य में? जिसको पराया मानता है (उसमें)? पराया मानता है तो उसके प्रति इतना राग ही नहीं होता। हवाई जहाज में एक्सीडेंट हुआ और उसमें अपना बच्चा भी था। अब सुनते ही तिलमिला गए। उसमें सवा सौ आदमी थे और केवल एक बचा है। तो हम तो रोने लगे। सारे घर में रोना-पीटना मच गया। ठीक है। तो इसके बाद समाचार आया कि आपका बच्चा सुरक्षित है। अब वो दुःख कहाँ गया? और वो जो १२४ मरे हैं उनका क्या हुआ? उनके लिए हमारे १२४ आँसू भी टपके?

तो मिथ्यादर्शन की बात करते हैं अपन, मिथ्यादर्शन। मिथ्यादर्शन में भी जिसे हम अपना मानते हैं, उसके प्रति हमारी इतनी प्रियता, उसके प्रति हमारा इतना स्नेह, गहरा… गहरी प्रीति होती है। तो सम्यग्दर्शन में जहाँ चैतन्य मिल जाए तो उसके भाग्य का क्या ठिकाना है? ये तो चर्चा मिथ्यादर्शन की है। सारा बाजार जल जाए और हमारी दुकान बच जाए, तो देखो फिर, उसके कलेजे का फोटो खींचो। बहुत बुरा हुआ जी, अच्छा नहीं है। आग लग गई सब। अरे! पर देखें तेरे कलेजे का फोटो तो ले लें एक बार (कि) उसमें कितना घाव हुआ है, दर्द कितना है? क्योंकि तेरी (दुकान तो) बच गई न! ये मिथ्यादर्शन की चर्चा है ये तो।

सम्यग्दर्शन में तो जो वास्तव में मैं हूँ और मेरा है। मैं ही मेरा हूँ, और जगत में मेरा हुआ भी कौन है? होता भी नहीं है और मैंने तो प्रैक्टिकल देखा है ये। ये जितने हैं सारे के सारे, इनमें कौन रह जानेवाला है? और इन सब में मेरा ममत्व फैला है। तो कौन रह जानेवाला है? कोई रहनेवाला नहीं है, लेकिन मैं तो रह जानेवाला हूँ। नर्क में भी रहूँगा, निगोद में भी रहूँगा। निगोद में १८ बार जन्म और मरण कहा गया लेकिन मैं मरा नहीं। बताओ! कैसी विचित्र है बात? आत्मा नहीं मरा, १८ बार जन्म और मरण होकर भी। वो जन्म और मरण कहने की बात (है)। कहने की माने, नहीं हुआ सो (ऐसा) नहीं। वो भी एक घटना घटी, लेकिन फिर भी आत्मा तो सुरक्षित रहा। नहीं रहता तो हम सब आए कहाँ से, सारे के सारे? जितने भी सिद्ध हुए, वो भी वहीं से आए सारे के सारे। तो सबके रहने का एक ठिकाना (है) खास। और सब वहाँ से, हम सब वहीं से आए हैं। तो बचकर कैसे आ गए जब १८ बार मरे और जन्मे तो? कि आत्मा मरता ही नहीं है, उसका स्वरूप ही यह है। क्योंकि अनादि-अनंत किसे कहते हैं? जिसका कभी जन्म नहीं हुआ और जिसको कभी मौत आती ही नहीं है।

तो जिसने आत्मा का यह स्वरूप जाना कि ना मेरा जन्म होता है और ना मैं मरता हूँ और ना कोई मेरे भीतर प्रविष्ट हो सकता है - जगत का पदार्थ (हो) भयंकर से भयंकर। अणुबम हो भले ही, प्रलय हो भले ही, लेकिन वह मेरे भीतर प्रविष्ट नहीं होती। कितना निर्भय और निश्चिंत हो गया वो? एक वरदान की तरह से। ऐसा स्वरूप केवल जिनवाणी बताती है। और ये आत्मा की सत्ता का निश्चय करने के लिए इतना काफी नहीं है। कि ये जो जान रहा है ये कौन है? ये मैं जानता हूँ या नहीं जानता हूँ? कि जानता तो हूँ। तो जानता है वही तो आत्मा होता है। अरे! अरे! आँख बंद करके यदि किसी ने मिश्री खाई है और फिर वो पूछता है कि ये मिश्री क्या होती है? अरे! तुझे ये जो मीठा-मीठा लग रहा है यही तो मिश्री है। और क्या होती है मिश्री? तो आत्मा तो आँख बंद करके भी उसका स्वाद होता है, लिया जाता है। और ये जो ज्ञान है, जानना है, कि जो और जड़ पदार्थों में नहीं पाया जाता - पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल - ये जड़ हैं, अचेतन हैं। इनमें ज्ञान भी नहीं (और) आनंद भी नहीं। इनमें नहीं पाया जाता लेकिन केवल मेरे में पाया जाता है।

तो ये जो प्रति समय जानना-जानना चलता है यही तो मैं हूँ, यही तो आत्मा है। आत्मा की सत्ता सिद्ध करने के लिए कितनी युक्तियाँ चाहिए? कोई बहुत बड़ा लॉजिक, विधान चाहिए? ये हूँ तो सही मैं क्योंकि अन्य पदार्थों में… ये लाउड स्पीकर जानता नहीं है, ये इंद्रियाँ नहीं जानती हैं। पाँच इंद्रियाँ जो कही जाती हैं और दुनिया में जो भेद किए जाते हैं, ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रिय इत्यादि, नहीं है वो बात। ये प्रतिसमय जानना स्वयं मेरे अनुभव में आता है कि मैं जानता हूँ। बस वही आत्मा। हो गया आत्मा का निश्चय। और यह निश्चय जिनवाणी के अतिरिक्त और कोई नहीं कराता। निष्पक्ष भाव से बिल्कुल! क्योंकि सारे दर्शन नये हैं (वे) कल्पना से खड़े हुए हैं। और ये सर्वज्ञ और वीतराग का दर्शन है। ये कहना द्वेष नहीं पर परमसत्य है। ये जीव को सन्मार्ग पर लाकर मुक्ति भेजने का विधान है ये। हित की बात नहीं कही जाए? हित की बात।

एक प्रोफेसर कहेगा कि जो विद्यार्थी हैं वे सब गलत टीचर के पास पड़े हैं। और सब गलत ही गलत है। तो जो सही प्रोफेसर है, वो ये नहीं बोलेगा कि तुमको अब तक सब गलत पढ़ाया गया है। तो वो झूठ बोला? वो उनका द्वेषी है? तो जिनवाणी द्वेषी है? अरे! (जिनवाणी तो) जीव का हित चाहती है, परम हित चाहती है। क्यों व्यर्थ कष्ट पाता है सुख का निधान होकर? दुःख क्यों पाए जीव? कष्ट का नाम-निशान जिसके भीतर नहीं है। कष्ट (तो) कल्पना से खड़ा होता है। और जो सुख है वो तो उसका स्वरूप ही है, उसके साथ घुलामिला है। लेकिन विस्मरण हो गया है इसलिए अनुभव में नहीं आता।

कोई भी वस्तु घर में हो, तो उसका पता नहीं है तो खायेंगे कैसे? और बनेगी कैसे? इसलिए अनंत शक्तियों का निधान जो आत्मतत्त्व है, संपत्तिशाली, उसके अनुभव की ये गाथा है। कैसे अनुभव हो उसका? ऐसी मन में एक आतुरता पैदा होना चाहिए। जब सर्वोत्कृष्ट तत्त्व और वो भी मैं हूँ और उसी का विस्मरण, भुलावा, मुझे सदा से रहा और ये जिनवाणी माँ बार-बार उसकी याद दिलाती है, प्रेरणा देती है, एक बार तो उसका अनुभव कर। एक बार उसका स्वाद आ जाएगा तो कभी जीवन में विस्मरण नहीं होगा। दूसरे में चित्त नहीं लगेगा। सारे जगत से प्रीति टूट जाएगी और केवल एकमात्र उस चैतन्य में ही प्रीतिवंत हो जाएगा। ये माँ के स्वर हैं असली। जगानेवाली माँ! थपकी दे देकर सुलानेवाली नहीं। ये थपकी है ये। समयसार की गाथायें ये आत्मा को जगानेवाली थपकियाँ हैं। मधुर-मधुर थपकियाँ, संगीत है ये। समयसार आत्म-संगीत!

तो जो सर्व नयपक्षों से रहित कहा गया माने जो जिसको अपने संबंध में, अपनी शुद्धता के संबंध में, अपने निधानों के संबंध में होनेवाले विचार, वो आत्मा के अनुभव के पहले आते तो हैं। लेकिन जो बुद्धिवंत होता है, प्रबुद्ध होता है वो उन विचारों में संतुष्ट नहीं होता। वो उस विचार कक्षा को भी छोड़ने लायक मानता है। उसको आतुरता ये रहती है कि ये विचार क्यों लंबे होते हैं? काम क्यों नहीं होता है? मुझे तो अनुभव करना है क्योंकि मैं तो आनंद का प्यासा हूँ। और ये विचार उस आनंद में बाधा हैं। जब तक विचार करता हूँ तब तक आनंद मिलता नहीं है। उसको कहते हैं नयपक्ष, उस विचारकोटि को, चिंतन की कोटि को।

वह समयसार है; वो समयसार है माने? वो जो अनुभूति है वही समयसार है। जिसमें सर्व नयों के विचार अर्थात् आत्मा संबंधी सर्व प्रकार के विचारों का, विकल्पों का अंत हो गया है, वो समयसार है। इस समयसार को ही केवल सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान ऐसी संज्ञा मिलती है। ये जो अनुभूति हुई उसी का नाम सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान है। टीका …

जैनदर्शन समीक्षा, भाग 8

पूज्य बाबूजी ‘युगल’ जी, कोटा
जैनदर्शन समीक्षा - भाग ८

उपस्थित बंधुओ, माताओं और बहनों! अभी हमारे उत्साही युवकों ने - कहना चाहिए कि हमारे अध्यात्म गगन के ये उदीयमान नक्षत्र हैं। उन्होंने आज के विषय पर काफी विस्तार से चर्चा की। विषय भी कुछ कठिन नहीं है। सरल विषय है। और सचमुच देखा जाए तो दोनों बातें न्यारी-न्यारी हैं।

आज की वैज्ञानिक प्रगति और जैनधर्म - दो न्यारी-न्यारी बातें हैं। जहाँ जैनधर्म का मूल आधार एक अमूर्त्त चेतन तत्त्व है, वहाँ विज्ञान का मूल आधार वह चेतन तत्त्व जिसके भीतर रहता है, वो शरीर है। दोनों बिल्कुल भिन्न-भिन्न बातें हैं, क्योंकि जैनदर्शन को हम पूरी तरह समझने का यत्न नहीं करते या नहीं कर पा रहे, इसलिए इस प्रकार की उलझनें पैदा हो जाती हैं। कुछ आश्चर्य भी उत्पन्न होते हैं कि आज विज्ञान ने इतनी प्रगति की है। और जब हम ये कहते हैं कि विज्ञान ने जो प्रगति की है, वह बात जैनधर्म में पहले से ही है, तो हमारा मन मानता नहीं है। माने जैन लोग ही मानने को तैयार नहीं है तो दूसरे कैसे मानेंगे? कि तुम तो अपने जैनधर्म को सबके साथ जोड़ देते हो, उसे ऊँचा बताने के लिए।

अगर सचमुच जैनधर्म के पास यह बात पहले से ही है तो फिर आज का जो वैज्ञानिक विकास है, उसकी जैन-साहित्य में चर्चा क्यों नहीं मिलती? लेकिन उत्तर बहुत सरल है उन लोगों के लिए कि जो वैज्ञानिक विकास से विस्मित हैं, आश्चर्य में डूबे हैं, उनको जैनधर्म कहता है कि जैनधर्म में उनके आज के विकास की चर्चा इसलिए नहीं मिलती क्योंकि वो जैनधर्म का विषय ही नहीं है। जैनधर्म के पास इतना समय ही कहाँ है कि वह परमाणुओं में किस किस प्रकार के परिवर्तन और उनके पारस्परिक संश्लेष और विश्लेष से, उनके मिलने और बिछड़ने से, क्या-क्या काम हो सकते हैं - इससे जैनधर्म को क्या पड़ी है?

जैनधर्म तो विज्ञान का मूल आधार जो शरीर है, और जिसके सुख के लिए उसने इतना विकास किया है, वो तो इस सारे प्रश्नों को एक ही उत्तर में समाप्त कर देता है कि हमें तो शरीर से कुछ भी मतलब नहीं है। हमारा तो पहला काम ही यह है कि ये जो शरीर हमारे साथ है, हम इससे ममत्व तोड़ें। और जब इससे ममत्व तोड़ना ही है अथवा टूट ही जाता है, तो इस शरीर के लिए अन्य लोगों ने अपने ज्ञान को किस तरह उपयोग किया और लगाया, तो जैनदर्शन उसमें चकित क्यों होगा? उसको इस बात का क्यों आश्चर्य होगा? कि जिसके विकास में यदि जिसका मूल शरीर है, उससे ही जैनधर्म को कोई मतलब नहीं है सचमुच तो, क्योंकि उसके साथ रहने पर भी उस शरीर के साथ अपना किंचित् मात्र भी संबंध अनुभव नहीं करता… तो उस शरीर को लेकर और शरीर के लिए जितना विकास विज्ञान के नाम पर होगा, उसमें व्यवसाय करना जैनधर्म का काम कैसे हो सकता है? इसलिए जैनाचार्यों के पास इस बात के लिए समय नष्ट करने का कोई कारण ही नहीं था और स्वयं जो भगवान गणधर और तीर्थंकर परमात्मा हुए - उनकी वाणी में तो कितनी बात आती है! लेकिन उनका जो गुंथन किया गया, उसमें भी ये विकास नहीं आया तो क्यों आता? क्योंकि उससे सचमुच कोई गरज ही नहीं है।

विज्ञान का आज जो विकास हुआ है वो संपूर्णरूप से शारीरिक है। जैनदर्शन ने तो अपने जो सर्वज्ञ प्रतिपादित सिद्धांत हैं, उनमें इस विकास के फार्मूले, इस विकास के जो गुण हैं, वे दे दिए हैं। और विज्ञान का ये जो विविधमुखी विकास है, ये सारे मूलभूतरूप में जैनधर्म में सुरक्षित हैं। क्योंकि विज्ञान का एकमात्र आधार अणु है। अणु और उसकी शक्तियों का विश्लेषण करना - वह भी क्योंकि विज्ञान आत्मा को नहीं मानता, तो सर्वज्ञ को तो क्यों मानने चला? इसलिए वो जितना कुछ विकास करेगा, तो उस वैज्ञानिक के पास जितना ज्ञान होगा, ज्ञान का जितना विकास होगा, उतना ही तो वो कर पाएगा। जैनदर्शन का कहना तो यह है कि तुमने अभी विकास किया ही क्या है? ठीक है!

पहले यह बातें नहीं थी और आज यह बातें हुई, लेकिन इससे क्या हुआ? अणु के पास तो इतनी शक्तियाँ हैं कि अभी तुम्हें उनका पता ही नहीं है। जिन अनंत शक्तियों की मैं बात करता हूँ, जैनधर्म बात करता है, उसका तुमको कहाँ पता है? इसलिए विज्ञान मिट जाएगा लेकिन एक अणु की भी पूरी शक्तियों के विकास का वो पता लगा सके, ये संभव नहीं है। और विज्ञान के ये विकास - क्योंकि विश्व का यह ये जो प्रवाह है, यह अनादि-अनंत है। तो ऐसे अनंत विज्ञान वे पहले उद्भूत हो चुके, इनका उद्भव हो चुका और ये मिट चुके। लेकिन जैनदर्शन का जो शाश्वत सत्य है, उसने अणु के संबंध में भी जो कहा, वह अमिट है। और उसका जो आत्मतत्त्व है वो तो अमिट है ही।

इटली के एक वैज्ञानिक ने कहा, जिन्होंने जैनदर्शन का बारीकी से अध्ययन किया। उन्होंने भले ही जैनदर्शन के सिद्धांतों को पूरी तरह नहीं समझा हो, तो भी जो निष्पक्ष दार्शनिक और विचारक हुए, उन लोगों ने निष्पक्षता से यह बात कही, कि - हमने अनेक भारतीय दर्शनों का अध्ययन किया है। लेकिन जो बारीकी और जिस बारीक वस्तु के संबंध में एक व्यापक चिंतन और व्यापक प्रतिपादन हमने जैनदर्शन में पाया वो अन्यत्र नहीं है। इसलिए इटली का वो विद्वान, दार्शनिक विद्वान - टोरी, उसने कहा कि ज्यों-ज्यों पदार्थ विज्ञान का विकास होगा त्यों-त्यों जैनदर्शन के सिद्धांत प्रमाणित होंगे। माने जैनदर्शन से विरुद्ध विज्ञान ने कोई विकास किया हो ये बात संभव नहीं है। कितना सुंदर है उस दार्शनिक का वचन! कि मैंने यह पाया है जैनदर्शन को पढ़कर, उसने अणु का जो वर्णन किया है और अणु की जिन शक्तियों का प्रतिपादन जैनदर्शन ने किया है, तो आज विज्ञान उन्हीं का तो विकास कर रहा है। उसने अणु की कोई रचना की हो अथवा अणु का विकास जिसरूप में नहीं हो सकता हो, उसरूप में उसने कोई पौद्गलिक विकास किया हो, तो हम विज्ञान को नतमस्तक हो सकते हैं। लेकिन यह तो उसकी सामर्थ्य नहीं है।

और एक सबसे बड़ी बात यह कि जैन - ये तो सब मूर्त्त तत्त्व का विश्लेषण है, विज्ञान का। लेकिन जैनदर्शन ने जिस अमूर्त्त तत्त्व का विश्लेषण किया है। केवल विश्लेषण ही नहीं किया, उसके स्वरूप को हथेली की तरह स्पष्ट रखा। हथेली में जैसे रख देते हैं उस तरह स्पष्ट रखा। और उसकी अनुभूति की विधि का प्रतिपादन किया और उसकी अनुभूति की, जैन महर्षियों ने अथवा जिन्होंने जैनदर्शन पर विश्वास किया, ऐसे ज्ञानियों ने। तो उस अमूर्त्त तत्त्व का जो लोग अनुभव कर चुके उनके लिए मूर्त्त का अनुभव क्या कीमत रखता है?

इसलिए विज्ञान ने जितना विकास किया है, केवल समझना चाहिए कि हमको अपने जीवन में प्रारंभ से ही जो संयोग मिले हैं, उन्हीं संयोगों में तो विकास हुआ है। नया क्या मिला है? आज जो वस्त्र हैं, आज से ५० वर्ष पहले, ६० वर्ष पहले वो वस्त्र नहीं थे। और आज उन वस्त्रों का रूप बदल गया (तो) ये संयोगों का ही तो रूप बदला है। तो जो संयोग हमें जीवन में उपलब्ध हैं और जैनदर्शन का जो प्रारंभिक स्वर है, वो उनसे ममत्व तोड़ने का ही है। तो फिर वे संयोग चाहे कितने ही विकसित हों और कैसा ही रूप हमारे सामने लेकर आवें लेकिन सर्वज्ञ के शिष्य जो हम लोग हैं, वे उसके सामने विस्मित नहीं होंगे (और) हमें कोई आश्चर्य नहीं होगा। क्योंकि हम जानते हैं कि सर्वज्ञ ने पहले से ही अणु की अनंत शक्तियाँ प्रतिपादित की हैं। और वही हो सकता है कि जो उसकी शक्तियों में पड़ा है, उसी की अभिव्यक्ति हो सकती है। अन्य कुछ नहीं हो सकता।

ये बात उन लोगों के मस्तिष्क में झनझनाती है, वहाँ खड़ी होती है कि - विज्ञान ने कितना विकास और आविष्कार किया है। तो वे लोग इस बात को देखकर आश्चर्यचकित होते हैं कि जिनको संयोगों में प्रीति है। जो इस बाह्य विश्व के प्रति ममत्वशील हैं उनको विस्मय होता है। लेकिन जो निर्ममत्व के मार्ग पर लगे हैं, जिन्होंने निर्ममत्व का ही अधिकार, निर्ममत्व का ही चैप्टर जिन्होंने पढ़ा है और सुना है, तो वे इस भौतिकता का चाहे कितना ही विकास हो, कितने ही रूप लेकर ये हमारे सामने आवे लेकिन जैनदर्शन कभी विचलित नहीं होता। और नया कभी - जैनदर्शन माने? जैनदर्शन के पद्चिन्हों पर जिसने अपने चरण रखे हैं और जिसने चलना शुरू किया है, उसको कभी विस्मय होगा ही नहीं।

आज ये जितने भी साधन हुए, संयोग ही तो हैं और क्या हैं? पहले ये लाउडस्पीकर नहीं थे। तो कहते हैं लोगों को सुनाई ही नहीं पड़ता था। वक्ताओं को जोर-जोर से बोलना पड़ता था। और आज लाउडस्पीकर हो गए ये विज्ञान की ही तो कृपा है। लेकिन विज्ञान की क्या कृपा है? हमने जो ये माना है कि ये लाउडस्पीकर ने आत्मा को इतनी सुविधायें दी हैं, यहाँ से तो अज्ञान का प्रारंभ होता है। तो इस अज्ञान का अंत कहाँ होगा? इसलिए कोई सुख और कोई सुविधा वो आत्मा को चाहिए ही नहीं। उसे आवश्यकता ही नहीं है।

अगर आज भीड़ ना हो और लाउडस्पीकर ना हो तो क्या कोई व्यक्ति वो आत्मचिंतन नहीं कर सकता? आत्मा का हित नहीं करेगा? हमेशा के लिए मैदान खुला है कि चाहे भीड़ हो अथवा ना हो। लेकिन जिसके भीतर उस चैतन्य का ममत्व जागा है और जिज्ञासा जागी है, उसे तो ना मालूम कितने अनुपम-अनुपम साधन मिलेंगे। अरे! स्वर्ग जैसा मिलेगा - ये क्या करेगा लाउडस्पीकर? ये टीवी क्या करेगी, एरोप्लेन क्या करेगा? क्या करेंगे ये? उसे तो अपने आप स्वर्ग मिलनेवाला है, बिना इच्छा के और बिना चाह के। और समवसरण में कितने लाउडस्पीकर लगते होंगे? कैसे सुनते होंगे लोग? और वो भी एकाक्षरी ध्वनि, ॐ। क्या विचित्र है बात! ये समवसरण में कैसी इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था है कि जहाँ केवल एकाक्षरी, एक ही अक्षर ॐ का, वो धारावाहिक, जैसे बरसात होती है उस तरह से चलता है। और लोगों के कानों में, अपनी-अपनी भाषा में, ये तिर्यंच भी जो सड़क पर चलते हैं, वो भी अपनी-अपनी भाषा में उसको समझते हैं। ये लाउडस्पीकर क्या करेगा? क्या वैज्ञानिक ये आविष्कार कर सकेंगे? ये संभव नहीं है बात। इसलिए सचमुच देखा जाए तो विज्ञान ने हमें कुछ नहीं दिया है। इतना अवश्य हुआ है कि हमारे पास चार संज्ञायें - आहार, भय, मैथुन और परिग्रह (है)। और सबका मूल जो ममत्व है, वो तो पहले से ही विद्यमान है। और हम स्वयं पागल होकर, आँखें बंद करके, ज्ञान को जहर देकर विज्ञान के पीछे पड़े हैं। इससे हमारा अहित हुआ है, जरा भी हित नहीं हुआ है। थोड़ा भी हित नहीं हुआ है।

विज्ञान तो शरीर के पोषण की बात करता है। विज्ञान में आत्मा तो है ही नहीं। और आत्मा तो नहीं है, लेकिन शरीर का पोषण किस तरह से हो - वो विधियाँ वो तरह-तरह की प्रस्तावित करता है। उसमें कहाँ अहिंसा के लिए स्थान है? और क्या कभी हो सकेगा? केवल भौतिकी विद्या - मैं देह हूँ, ये जो मूल अविद्या है, ये अविद्या ही जिसका मूल है - ऐसा विज्ञान। उस विज्ञान से आत्मा को कभी कुछ मिल सकेगा? इसलिए बिल्कुल आश्चर्य की बात नहीं है। विज्ञान में तो वैज्ञानिकों ने अपने ज्ञान को बहुत लगाकर ये इतने विकास किए हैं, लेकिन हम स्वतः ही परमाणुओं की शक्तियों को आसमान में देखते हैं। तरह-तरह के परिवर्तन हम अपने आप ही देखते हैं। करें तो जरा वैज्ञानिक इन पर कंट्रोल, इस कुदरत पर; हो नहीं पाएगा।

इसलिए एक दूसरे दार्शनिक ने बहुत सुंदर बात कही कि आज की जो साइंस है, उसके संस्थापक भगवान महावीर थे। अब इससे अधिक और क्या हो सकता है? ये निष्पक्ष लोगों की बात है। क्योंकि जैनधर्म को गालियाँ तो बहुत दी गई हैं। अनेकांत को भी बहुत गालियाँ दी गई हैं। लेकिन आज के निष्पक्ष विद्वानों ने ये कहा कि अगर ये लोग जैनदर्शन को पढ़ने की तकलीफ करते, तो इनके मुँह से ये शब्द नहीं निकलते, इन विद्वानों के मुँह से। कहलाते तो ये विद्वान और दार्शनिक हैं, संत कहलाते हैं। लेकिन इनके मुँह से ये शब्द नहीं निकलते जैनधर्म के प्रति। इसलिए विज्ञान में तो धर्म का नाम-निशान नहीं है। हम क्या विज्ञान की बात (करें)! हमें विज्ञान की आवश्यकता कहाँ है? और कौन से युग में आवश्यकता रही है? ये तो अपने आप ही विकसित हो गया, हम क्या करें? और विकसित हो गया तो, जैसे अन्य संयोग हमें मिले हैं, उस तरह इसका कोई भी संयोग, कोई भी विकास यदि हमारे काम का हो और उसका आधार यदि अहिंसक हो, तो हम उसे काम में ले लेते हैं - निर्ममत्व भाव से। इससे आगे हमारा विज्ञान के साथ कोई संबंध नहीं है। और ना विज्ञान पर हमारा कोई आश्चर्य है, कोई विस्मय है।

हमें तो - जो विज्ञान शब्द लोगों को नया मालूम पड़ता है और यहाँ तो भेदविज्ञान अनादि-अनंत है। और लोगों को विज्ञान नया मालूम पड़ता है कि ये साइंस है, साइंस। अरे! तुमको उस साइंस का पता नहीं है। एक जो दूसरी साइंस है, भेदविज्ञान की कि जो इस विज्ञान से बहुत आगे है और ये विज्ञान उस साइंस तक कभी - इसका प्राणांत हो जाएगा, इस विज्ञान का - लेकिन वो वहाँ भेदविज्ञान की साइंस तक पहुँच ही नहीं सकेगी। जैन साहित्य उससे भरा पड़ा है, भेदविज्ञान से। और वो तो ये कहता है कि सिद्धि तुम्हारे विज्ञान से नहीं लेकिन उस भेदविज्ञान की साइंस से सिद्धि होनेवाली है। आज तक जितने भी सिद्ध परमात्मा हुए, जितने भी जीव दुःखों से मुक्त हुए हैं, वे भेदविज्ञान की साइंस से हुए हैं। वे इस भौतिक विज्ञान की साइंस से नहीं हुए।

इसलिए विषय को जरा भी जोड़ने से कुछ मतलब नहीं है। ये तो आज की बुद्धि फिर गई है। वो बोले आज क्या करें हम? कि क्या करें? कुछ भी नहीं करना है न! विज्ञान को अपनी जगह रहने दो, इसके आविष्कारों को भी अपनी जगह रहने दो, केवल अपने आप को समेटो। रिस्ट्रिक्शन अपना करना है, अपने आप को समेटना है, फैलाना नहीं है। ये हम जो फैलाव करते हैं तब समस्यायें खड़ी होती हैं। तब हमारे सामने प्रश्न पैदा होते हैं। क्या करें! ये विज्ञान की चकाचौंध के मारे हमको परेशानी है, फुर्सत नहीं है। और ये हमको बलात् अंगीकार करना पड़ता है। लेकिन जिसने धर्म का अवलंबन लिया है और धर्म के प्राण उस चैतन्य का अवलंबन लिया है, उसके सामने तो सारे प्रश्नों के उत्तर हैं। उसके सामने जगत का कोई प्रश्न ही बाकी नहीं है। ये विज्ञान का क्या प्रश्न है, ये तो कुछ भी प्रश्न नहीं है। अरे अणु का विकास हो गया इसमें क्या धरा है? इसमें क्या है?

आज तो जो एरोप्लेन बने हैं, वो तो बनाए गए हैं और उनकी एक तकनीक भी है, कला भी है। लेकिन ये देव लोग जो भ्रमण करते हैं, विमानों में, ऐरोप्लानों में, वो किसने बनाए? और उसको कौन चलाता है? और उसमें कौनसा पेट्रोल होता है? और पहले जो उड़न-खटोले, जिनका वर्णन आता है, उनको कौन चलाता था? तो ये विज्ञान से एक कदम आगे की बात है या नहीं है? कि तेरे एरोप्लेन के लिए तो ना मालूम क्या-क्या चाहिए! और फिर एक्सीडेंट भी चाहिए। पर हमारे पास तो, धर्म तो बहुत आगे की बात है, केवल पुण्य का जो विज्ञान है, उनसे ऐसे उड़नखटोले मिलते हैं कि जिनका कभी एक्सीडेंट ही नहीं होता।

जैनधर्म कुछ ऐसे समाधान प्रस्तुत करता है - धर्म की नहीं है बात, लेकिन जैनदर्शन के पास सारे विश्व के प्रश्नों की समाधान हैं। उसके पास कोई प्रश्न क्योंकि सम्यग्ज्ञान के पास, तत्त्वज्ञान के पास, कोई प्रश्न शेष नहीं रहता है, बचता नहीं है। इसलिए विज्ञान भी कोई प्रश्न नहीं है। हम स्पष्टरूप में देखते हैं कि विज्ञान के इस विकास से जो लोग शरीर के प्रति ममत्वशील हैं तो उन्होंने हिंसा का आधार लिया है। वे अधिक हिंसा में प्रवृत्त हुए हैं, अधिक झूठ में प्रवृत्त हुए हैं। चोरियाँ बढ़ी हैं। पाप बढ़े हैं, पुण्य नहीं बढ़ा है; धर्म की बात तो बहुत दूर है (परंतु) विज्ञान के विकास से पाप ही बढ़ा है। पाप बढ़ा है तो नरक के रास्ते खुले हैं। निगोद के रास्ते खुले हैं।

विज्ञान ने हमको क्या दिया है? हमको पराधीन बनाया है। कहते हैं (कि) इसके बिना हमारा काम नहीं चलता है। सब चलता है। किसके बिना काम नहीं चलता है आत्मा का? जो आत्मा स्वयं अकृत्रिम है, स्वावलंबी है, जिसको कोई आधार नहीं चाहिए, जिसको दूसरा कोई विज्ञान नहीं चाहिए, जिसको शरीर भी नहीं चाहिए उस आत्मा को किसका अवलंबन है? ऐसे स्वावलंबी आत्मतत्त्व को जो एक बार पहचानता है, तो वह लोक में चाहे कैसे ही आश्चर्य हों… विज्ञान तो कोई विशेष आश्चर्य नहीं है, इससे भी बड़े-बड़े आश्चर्य होते हैं। लेकिन वो आत्मवैज्ञानिक, वो उनसे जरा भी चकित नहीं होता है। उसके ज्ञान में विस्मय नाम की बात पैदा ही नहीं होती।

अरे! रेवती रानी का उदाहरण हमारे पास नहीं है? कि देव ने जो माया की, उस माया से २५वें तीर्थंकर का रूप बन गया, समवशरण बन गया, दिव्यध्वनि होने लगी। और रेवती रानी को सुनाया गया कि समवसरण आया है, चलो। बोले वो होता ही नहीं है। बस! उसके पास एक ही समाधान है। अरे भई! समवशरण है, देखो जरा चल के देखो। दिव्यध्वनि हो रही है, देखो तो चलकर। बोले होता ही नहीं है। अब तो समवशरण होना ही नहीं है। तीर्थंकर हैं कहाँ, जो समवशरण होगा? कहाँ विस्मय है? समवशरण जैसी एक रचना, अनायास, कोई सामान्य बात तो नहीं होती। लेकिन जो तत्त्व पर दृढ़ है, तत्त्व पर जो आत्मा खड़ा है तो उसको लोक का चाहे कोई कैसा ही आश्चर्य हो…आश्चर्य कहा जाता है लेकिन तत्त्वज्ञान के कोष में आश्चर्य नाम का कोई शब्द नहीं होता। वे किस पर आश्चर्य करें? अनंत हैं पदार्थ और उन पदार्थों का विज्ञान भी बहुत विस्तार से है।

हमें तो - हमें ही क्या, हमारे जो सर्वज्ञ हैं, जिनकी चर्चा अभी अपने मानमलजी ने की कि हमें यह सिद्ध करना चाहिए कि सर्वज्ञ होते हैं। कहते हैं वो सिद्ध है। उसमें क्या सिद्ध करना है? सर्वज्ञ (को)। अरे! ज्ञान है या नहीं ज्ञान? अभी थोड़ा तो है? थोड़ा है और यदि ज्ञान में हीनाधिकता और तारतम्य देखा जाता है, तो फिर वो ज्ञान पूर्ण क्यों नहीं हो सकता? सीधी सी तो बात है।

और वो किसी का पूर्ण अवश्य हुआ है क्योंकि वो पूर्ण होता है ये बात तो संभावना में है न? जब तारतम्य है उसमें, विकास देखा जाता है - कि जैसे आज वनस्पति में कितना सा ज्ञान है। और यह कीड़े-मकोड़े इनके पास कितना ज्ञान है। और मनुष्य के पास कितना है! जब मनुष्य के पास ज्यादा है, इनमें कम है, तो मनुष्य के पास उसकी पूर्णता कहाँ है? उससे भी अधिक हो सकता है? तो अधिक कितना हो सकता है? कि ज्ञान शक्ति जितनी है उसका पूरा विकास हो सकता है। ये सर्वज्ञ हो गया। उसको साबित करने में क्या है? और जिस दर्शन ने ज्ञान को स्वीकार किया, ज्ञानवाले को स्वीकार किया, ज्ञान तत्त्व का विश्लेषण किया तो वहाँ सर्वज्ञ कैसे नहीं होगा? और यदि जगत में, इस अनादि-अनंत विश्व में, यदि सर्वज्ञ नहीं हुआ है तो फिर हम ये कैसे कह सकते हैं कि ज्ञान पूर्ण भी हो सकता है? जब उसकी पूर्णता का पुरुष कि जिनका ज्ञान पूर्ण हुआ है, वे हुए हैं, और उनको हम सर्वज्ञ कहते हैं। क्योंकि जैनदर्शन ने इस बात का पूरी तरह विश्लेषण किया है इसलिए हम ये मानते हैं कि जैनदर्शन में सर्वज्ञता है। और जिसके पास सर्वज्ञता है उसका संपूर्ण साहित्य सत्य है। उसकी संपूर्ण वाणी सत्य है। क्योंकि वहाँ पर असत्य के लिए कोई गुंजाइश हो ही नहीं सकती है।

इसलिए जैनदर्शन का मूल आधार सर्वज्ञता है, ये बात बिल्कुल निर्विवाद है। दूसरे लोग भी यह बात कहते हैं (कि) अंतरात्मा है हमारा, परमात्मा है हमारा। सब कुछ है, ये सब कहते हैं। लेकिन साथ ही जैनदर्शन ने उस सर्वज्ञता के साथ में जो वीतरागता लगाई वो अन्यत्र उसकी कल्पना भी नहीं है। तो इसलिए यहाँ तो पहले वीतरागता है और बाद में सर्वज्ञ होता है। वहाँ सर्वज्ञता तो है लेकिन पूरा राग है। तो जैनदर्शन ये बोला कि जहाँ राग है वहाँ सर्वज्ञता हो ही नहीं सकती है। क्योंकि यदि वहाँ सर्वज्ञता हो जाएगी तो खुदा गंजे को नाखून ना दे? वो तो खुजला-खुजला के ही मर जाएगा। क्योंकि उसका वो राग तो विद्यमान है और उसे सर्वज्ञता मिल गई तो उसका तो चित्त ही ठिकाने नहीं रहेगा, उसे (तो) सब दिखाई देगा। और बड़ा मुश्किल हो जाएगा जीना अगर पहले सर्वज्ञता हो गई तो। इसलिए उसे पहले वीतराग होना चाहिए ताकि वो कहीं ना अटके। और कहीं भी उसका चित्त स्खलित ना हो।

ये विज्ञान नहीं है तो क्या है ये? बोले पहले सर्वज्ञता क्यों नहीं की? कि बाद में कर देते, उसमें क्या है? पहले वीतरागता नहीं, सर्वज्ञता पहले, वीतरागता बाद में। इसमें क्या दिक्कत है जैनधर्म को? कि बहुत बड़ी दिक्कत है। वो तो उससे ज्यादा कष्टवाला व्यक्ति तो कोई होगा ही नहीं दुनिया में, अगर पहले सर्वज्ञता हो जाए और बाद में वीतरागता (हो तो)। वीतरागता तो होगी नहीं उसको? कैसे होगी? और वो तो महादुःखी होगा, दुनिया का सबसे दुःखी जीव अगर होगा तो वो सर्वज्ञ होगा। तो ये विज्ञान नहीं है? और ये अमूर्त विज्ञान है कि जिसको - अमूर्त को जो जाननेवाले हैं, बिल्कुल प्रत्यक्ष जो अनुभव करते हैं, निरंतर, ऐसे पुरुषों ने, ऐसे परमात्माओं ने जिसका प्रतिपादन किया, तो वही उसका पूरा विश्लेषण कर सकते हैं। और इसीलिए जैनदर्शन उस सर्वज्ञ का दर्शन है, सर्वज्ञता उसका मूल आधार है। और वो उसका जो प्रारंभ है वह निर्ममत्व से होता है। और निर्ममत्व से जिसका प्रारंभ हो, उसके लिए आज के विज्ञान जैसे अनंत विज्ञान आते-जाते रहेंगे, लेकिन वह कभी उधर आकर्षित ही नहीं होगा कि मुझे मतलब नहीं है लेकिन। होगा कुछ पच्चीसवाँ समवसरण आया होगा, मुझे मतलब नहीं है लेकिन। तो वो जाता ही नहीं है, वो उधर देखता ही नहीं है।

कितने ही शरीर के पोषण के लिए विज्ञान ने कितनी बातें की हैं, आज के चिकित्साविज्ञान ने? क्योंकि आज का विज्ञान तो विविधमुखी है न? सब क्षेत्रों में उसने व्यवसाय किया है। लेकिन यह बात उसमें कहाँ है? वो तो ये पसंद करता है कि इसमें जितने बैक्टीरिया हों, बैक्टीरिया माने वो जीव हों - (बस) उतना ही पोषण मिलता है। और जैनदर्शन तो ये कहता है कि हमें शरीर की जरूरत नहीं है तो बैक्टीरिया की कहाँ जरूरत है? और इस दर्शन की बहुत बड़ी विशेषता ये कि इसने अमूर्त आत्मतत्त्व का तो पूरी तरह विश्लेषण किया। लेकिन अन्य जो इसके विश्लेषण हैं, जैसे हमारे रहन-सहन के तरीके, खाने-पीने के जो उपादान हैं, उन उपादानों का भी जैनदर्शन ने कितना विश्लेषण किया है कि जो किसी दर्शन में संभव नहीं है। कहीं संभव नहीं है। क्योंकि वहाँ अहिंसा ही नहीं है, अहिंसा का स्वरूप ही नहीं है। जहाँ अहिंसा का स्वरूप परिपूर्णता को नहीं प्राप्त करता है, परिपूर्णता तो दूर की बात है, प्रारंभ भी नहीं है। बल्कि हिंसा का ही जहाँ विधान है तो वहाँ इस बात को ढूँढने कौन जाएगा, कौन कोशिश करेगा, कि कहाँ-कहाँ तो जीव मिलते हैं और कहाँ-कहाँ जीव नहीं मिलते? तो वो आलू-गोभी का विश्लेषण क्यों करेंगे? कि इसमें इतने जीव होते हैं और इतने जीव नहीं होते। वो क्यों करेंगे? क्योंकि उनके पास अहिंसा का विधान है ही नहीं। अहिंसा का स्वरूप ही उनके पास नहीं है।

और आज के विज्ञान की यही स्थिति है। आत्मा को वो स्वीकार ना उसने किया है, ना वो कभी करेगा। क्योंकि उसकी जो प्रयोगशालायें हैं वहाँ जो सिद्ध हो जाए, वो ठीक है। और ये विज्ञान तो बदलता रहेगा। आज एक वैज्ञानिक ने आज जो कहा, कल वो बात बदल जाएगी। लेकिन जैनदर्शन का जो विज्ञान है, वो ना आज तक बदला है और ना कभी बदलेगा। वो अमिट है क्योंकि वो सर्वज्ञ का है। ये सब बातें हैं कि जो विज्ञान को जैनधर्म के साथ जोड़ने से इंकार करती हैं। कि हमें उससे क्या मतलब है? चाहे कितना ही विकास हो, कैसे ही रूप लेकर ये जगत के जो भौतिक पदार्थ हैं, अचेतन पदार्थ हैं, वे आवें। लेकिन हमें तो उनसे कोई मतलब नहीं है। और जितनी हमारी कमजोरी है, उस कमजोरी में अहिंसा के आधार पर, अपरिग्रह के आधार पर, जितना कुछ हम ले पाते हैं, ले लेते हैं - उसमें कहाँ दिक्कत है। हम रोटी भी तो खाते हैं कि नहीं खाते?

उसी तरह विज्ञान ने यदि कोई विकास किया है और वो यदि हमारे काम का है, तो हम उसका उपयोग कर लेते हैं। वो नहीं भी होता तो हमारा तो काम नहीं बिगड़ता। हमारा तो मुक्तिमार्ग पहले भी खुला था और वो आज भी खुला है। इसलिए विज्ञान, वो आज चर्चित बहुत है। और लोग आँख बंद करके वहाँ पहुँचना चाहते हैं। पर यहाँ धरती पर तो रह लो। तुम्हें यहीं रहना नहीं आता (तो) तुम वहाँ कैसे रहोगे? आखिर वहाँ पहुँच भी जाओगे अगर तो वहाँ से नीचे आओगे ही आओगे - तुम्हारा मन नहीं लगेगा। चित्त ही नहीं लगेगा। क्योंकि वहाँ कहाँ है ऐसे चक-चिक? इसलिए बहुत बातें, विज्ञान की कल्पनायें धरी रह जायेंगी। और अंत में जिस समय प्रलय होगा उस समय सारे विज्ञान नष्ट हो जायेंगे। लेकिन आत्म-विज्ञान का नाश कभी होनेवाला नहीं है।