जैन दर्शन गणित
संकलन
आचार्य १०८ श्री धर्मभूषण जी महाराज
ॐ श्री वीतरागाय नमःॐ
जैन दर्शन गणित
(जैन आध्यात्मिक तत्त्व चर्चा)
संकलनः
आचार्य श्री 108 धर्मभूषण जी महाराज
प्रकाशकः
अखिल भारतीय जैन युवा फेडरेशन
मेरठ शाखा, मेरठ
ॐ जैन दर्शन गणित ॐ
प्रथम संस्करण : सन् 1989, दिल्ली
द्वितीय संस्करण : सन् 1993, दिल्ली
तृतीय संस्करण : सन् 2001, मेरठ (3000 प्रतियाँ)
चतुर्थ संस्करण : सन् 2003, मेरठ (1100 प्रतियाँ)
पंचम संस्करण : सन् 2006, मेरठ (3500 प्रतियाँ)
षष्ठम संस्करण : सन् 2009, मेरठ (1100 प्रतियाँ)
सप्तम संस्करण : सन् 2011, दिल्ली (1000 प्रतियाँ)
अष्टम संस्करण : सन् 2014, दिल्ली (1000 प्रतियाँ)
नवम् संस्करण : सन् 2021, मेरठ (1000 प्रतियाँ)
न्यौछावर धनराशि : रु. 70.00 केवल
मुद्रक :
यूरेसिआ प्रिन्टिंग प्रेस
बाबा मनोहर नाथ मन्दिर के सामने,
सूरजकुण्ड रोड, मेरठ
: प्राप्ति स्थान :
*श्री 108 शान्तिनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर
तीरगरान, मेरठ शहर-250 002
फोन : 9837637542, 9312461512
*श्री दिव्यांश जैन
किशन फ्लोर मिल
रेलवे रोड, मेरठ 250 002
मोबाईल/वाट्सऐप : 9456481400
*श्री सौरभ जैन
नवकार टैक्सटाइल
खण्डक बाजार, मेरठ 250 002
मोबाईल/वाट्सऐप : 9897241464
*श्री अतुल जैन
शान्तिनाथ एन्कलेव
निकट श्री 108 शान्तिनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर
तीरगरान, मेरठ शहर-250 002
मोबाईल/वाट्सऐप : 9312461512
*श्री पंकज जैन
259, ठठेरवाड़ा, जैन औषधालय वाली गली,
मेरठ शहर-250 002
मोबाईल/वाट्सऐप : 9837637542
प्रस्तुत ग्रन्थ में आर्थिक सहयोग प्रदान करने वाले
पुण्यार्जक
21,500.00 श्रीमती मगनमाला जैन पत्नी स्व० श्री नानक चन्द जैन
(क्राकरी वाले परिवार), तीरगरान, मेरठ शहर
11,000.00 निशा जैन, मोनिका जैन, नेहा जैन, छोंपीवाड़ा,
मेरठ शहर
11,000.00 अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन (महिला शाखा),
मेरठ शहर
5,151.00 श्री आशीष जैन पुत्र श्री सुभाष चन्द जैन, बीरु कुँआ,
मेरठ शहर
5,100.00 श्रीमती नीलम जैन पत्नी श्री अजय कुमार जैन,
छोंपीवाड़ा, मेरठ शहर
5,100.00 अलका जैन, नीलाक्षी जैन, ठठेरवाड़ा, मेरठ शहर
5,000.00 श्री सौरभ जैन, नवकार टैक्स्सटाइल, खन्दक, मेरठ शहर
2,100.00 श्री शगुन जैन पुत्र श्री राजीव जैन, नेहरू रोड, मेरठ
2,100.00 श्री सचिन जैन पुत्र श्री राजेन्द्र कुमार जैन, राम गली,
तीरगरान, मेरठ शहर
2,100.00 श्री हंस कुमार जैन (किताब वाले), नेहरू रोड, मेरठ
2,300.00 श्री निखिल जैन पुत्र श्री संजय जैन, पल्लवपुरम, मेरठ
2,100.00 श्री निखिल जैन शास्त्री, कोतमा (म.प्र.)
2,100.00 श्रीमती पूजा जैन, पीयूष जैन, गाजियाबाद
2,100.00 श्रीमती सीमा जैन पत्नी स्व० श्री ब्रजमोहन जैन, ब्रह्मपुरी,
मेरठ
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1,100.00 श्रीमती सन्तोष जैन पत्नी स्व० श्री सहदेव जैन,
थापर नगर, मेरठ
1,100.00 श्रीमती अभिलाषा जैन, छोंपीवाड़ा, मेरठ शहर
1,100.00 डा० विनोद जैन (हाई यूनानी दवाखाना वाले),
वैली बाजार, मेरठ
1,100.00 नमन जैन पुत्र श्री मयंक जैन, बीरु कुँआ, मेरठ शहर
1,100.00 श्रीमती अंजू जैन पत्नी श्री गुलाब चन्द जैन (किताब
वाले), पत्थर बालान, मेरठ शहर
1,100.00 श्रीमती कविता जैन पत्नी श्री पवन जैन, ऋषि नगर,
मेरठ
1,100.00 श्रीमती रजनी जैन पत्नी स्व० श्री मुकेश जैन, देवलोक,
मेरठ
प्रकाशन के सम्पादन के पुण्यार्जक
- डा० विनोद जैन (हाई यूनानी दवाखाना वाले),
- श्री अजय कुमार जैन छोंपीवाड़ा
- श्री अनन्त जैन, शेखर जैन (किताब वाले)
- श्री अतुल जैन खन्दक बाजार
- श्रीमती कविता जैन ऋषि नगर, बागपत रोड
- श्रीमती सन्तोष जैन थापर नगर
- श्रीमती अलका जैन, संयम जैन ठठेरवाड़ा
जैन दर्शन गणित
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आचार्य परम्परा में
आचार्य श्री 108 धर्मभूषणजी महाराज
परम पूज्य आचार्य श्री 108 शान्तिसागर जी महाराज (छाणी)
परम पूज्य आचार्य श्री 108 सूर्यसागर जी महाराज
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विजयसागर जी महाराज
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमलसागर जी महाराज (भिण्डवाले)
परम पूज्य आचार्य श्री 108 निर्मलसागर जी महाराज
समकालीन - परम पूज्य आचार्य श्री 108 जयसागर जी महाराज
परम पूज्य आचार्य श्री 108 शान्तिसागर जी महाराज (हस्तिनापुर वाले)
परम पूज्य आचार्य श्री 108 धर्मभूषण जी महाराज
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शास्त्राभ्यास की महिमा
हे भव्य ! शास्त्राभ्यास के अनेक अंग हैं। शब्द या अर्थ का बाँचंना या सीखना, सिखाना, उपदेश देना, विचारना, सुनना, प्रश्न करना, समाधान जानना, बारंबार चर्चा करना इत्यादि अनेक अंग हैं, वहाँ जैसे बने तैसे अभ्यास करना, यदि सर्वशास्त्र का अभ्यास न बने तो इस शास्त्र में सुगम या दुर्गम अनेक अर्थों का निरूपण है, वहाँ जिसका बने उसका ही अभ्यास करना; परन्तु अभ्यास में आलसी न होना।
देखो! शास्त्राभ्यास की महिमा, जिसके होने पर परम्परा आत्मा अनुभव दशा को प्राप्त होता है, मोक्षरूपफल को प्राप्त होता है। यह तो दूर ही रहो, तत्काल ही इतने गुण प्रकट होते हैं - (1) क्रोधादि कषायों की तो मंदता होती है। (2) पंचेंद्रियों के विषयों में प्रवृत्ति रुकती है। (3) अति चंचल मन भी एकाग्र होता है। (4) हिंसादि पाँच पाप नहीं होते। (5) स्तोक (अल्प) ज्ञान होने पर भी त्रिलोक के तीनकाल संबंधी चराचर पदार्थों का जानना होता है। (6) हेय-उपादेय की पहचान होती है। (7) आत्मज्ञान सन्मुख होता है अर्थात् ज्ञान आत्मसन्मुख होता है। (8) अधिक-अधिक ज्ञान होने पर आनन्द उत्पन्न होता है। (9) लोक में महिमा-यश विशेष होता है। (10) अतिशय पुण्य का बंध होता है। सो इत्यादि गुण शास्त्राभ्यास करने से तत्काल ही उत्पन्न होते हैं; इसलिए शास्त्राभ्यास अवश्य करना।
तथा हे भव्य! शास्त्राभ्यास करने के समय की प्राप्ति महादुर्लभ है; कैसे सो कहते हैं।
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एकेन्द्रियादि असंगीपर्यी जीवों को मन नहीं और नारकी वेदना से पीडित तिर्यंच विवेकरहित, देव विषयासक्त; इसलिए मनुष्यों को अनेक सामग्री मिलने पर शास्त्राभ्यास होता है। सो मनुष्यपर्याय की प्राप्ति ही द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव से महादुर्लभ है।
वहाँ द्रव्य से तो लोक में मनुष्यजीव बहुत अल्प हैं, तुच्छ संख्यात-मात्र ही हैं, और अन्य जीवों में निगोदिया अनन्त हैं, दूसरे जीव असंख्यात हैं।
तथा क्षेत्र से मनुष्यों का क्षेत्र बहुत स्तोक (थोड़ा ही) अढ़ाई द्वीप मात्र ही है और अन्य जीवों में एकेन्द्रियों का क्षेत्र सर्व लोक है, दूसरों का कितने ही राजू प्रमाण है।
और काल से मनुष्य पर्याय में उत्कृष्ट रहने का काल स्तोक है, कर्मभूमि-अपेक्षा पृथक्त्व को टिपूर्व मात्र है और अन्य पर्याय में उत्कृष्ट रहने का काल-एकेन्द्रिय में तो असंख्यात पुद्गल-परावर्तनमात्र और अन्य में संख्यात पल्यमात्र है।
भाव अपेक्षा शीघ्र शुभाशुभ से रहित ऐसे मनुष्यपर्याय के कारणरूप परिणाम होने अतिदुर्लभ है। अन्य पर्याय के कारण अशुभरूप या शुभवरूप या शुभरूप होने सुलभ है। अशुभरूप व शुभरूप परिणाम होना दुर्लभ है।
इस प्रकार शास्त्राभ्यास का कारण जो पर्याप्त कर्मभूमिया मनुष्यपर्याय उसका दुर्लभपना जानना।
- प्रस्तावना, सभ्यज्ञानचंद्रिका
___ जैन दर्शन गणित ___ 8 ___
जीवन परिचय
प.पू. 108 आचार्य गुरुवर श्री धर्मभूषण जी
गृहस्थ का नाम : श्री प्रेम चंद जैन
जन्म स्थान : करनवाल (मेरठ) उ०प्र०
जन्म तिथि : श्रावण शुक्ल सप्तमी वि०सं० 1996
पिता का नाम : स्व० श्री डालचंद जैन
माता का नाम : स्व० श्रीमती हुकमा देवी जैन
धर्मपत्नी का नाम : स्व० श्रीमती शीलवती जैन
भाई : स्व० श्री सलेख चन्द जैन एवं स्व० श्री रूप चन्द जैन
बहिन : श्रीमती कमला देवी जैन एवं श्रीमती जय माला जैन
सुपुत्र व सुपुत्री : श्री आदिश जैन, श्रीमती अब्जना जैन
विवाह : 15 वर्ष की आयु में
संयम मार्ग : 17 वर्ष की आयु में शुद्ध जल का त्याग
प्रतिज्ञा आचार्य श्री 108 विमलसागर जी महाराज के समक्ष।
द्वितीय प्रतिमा : भाद्रपद शुक्ल 15, वि०सं० 2021 में
आचार्य श्री 108 शिव सागर जी महाराज से
ब्रह्मचर्य व्रत : श्रावण शुक्ल सप्तमी वि०सं० 2025 में
आचार्य श्री 108 विमलसागर जी महाराज से
क्षुल्लक दीक्षा : रामपुर मनिहारन, जिला सहारनपुर में फाल्गुन शुक्ल दशमी
वि०सं० 2037 में दिनांक 15 मार्च 1981 को आचार्य 108
श्री शांतिसागर जी महाराज से
मुनि दीक्षा : आचार्य 108 श्री शांतिसागर जी महाराज हस्तिनापुर से
गनौर मण्डी, जिला सोनीपत में, चैत्र कृष्ण 15, सम्वत्
2051 में, दिनांक 10 अप्रैल 1994 को।
आचार्य पद : मुजफ्फरनगर ज्येष्ठ शुक्ल 3 सम्वत् 2054 दि. 8 जून 1997
मुनि दीक्षा प्रदत्त : मुनि श्री 1058 ज्ञानभूषण 8 जून 1997, मुजफ्फरनगर, मुनि
श्री 108 सम्यक्त्व भूषण : 10 मार्च 2000, मेरठ, मुनि श्री
108 चारित्र भूषण जी 10 मार्च 2000, मेरठ, मुनि दीक्षा श्री
108 भारत भूषण जी 28 जनवरी 2007, हस्तिनापुर मुनि
दीक्षा श्री क्षमा भूषण जी 9 मार्च 2008 हस्तिनापुर
समाधि : 26 नवम्बर, 2010
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आचार्य श्री धर्मभूषण जी के
संघ के 24 नियम
-
संघ के साथ कोई आर्यिका, क्षुल्लिका व ब्रह्मचारिणी नहीं
रहेगी। -
संघ के त्यागीगण आहार व विहार के समय किसी भी प्रकार
के बाज-साज नहीं बजने देंगे। -
कोई भी त्यागी अपनी जन्म-तिथि व दीक्षा-तिथि नहीं
मनवाएंगे। -
संघ के आहार के पश्चात् किसी प्रकार का प्रसाद नहीं
बटेगा। -
किसी भी संस्था या मन्दिर निर्माण के लिये, संघ का कोई
भी त्यागी चंदा एकत्रित नहीं करेगा। -
आचार्य पुष्पदन्त, भूतबली एवं कुन्दकुन्द की आम्नाय के
किसी भी ग्रन्थ का (चाहे वह कहीं से भी प्रकाशित हो)
निषेध नहीं किया जायेगा। ना ही जिनवाणी माँ का अपमान
होने देंगे। -
अग्नि में धूप डालना, दीपक से आरती उतारना, निर्वाण
दिवस के दिन किसी भी प्रकार का लड्डू चढ़वाना, सामग्री
में हार-सिंगार के फूल का प्रयोग, पंचामृत एवं स्त्री द्वारा
अभिषेक, भगवान् को चंदन लगाना व हरे फूल एवं फल
चढ़ाना - इस बीस पंथ की क्रियाओं का इस संघ में कोई
समर्थन नहीं होगा।
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-
कोई भी संघस्थ त्यागी वीतराग भगवान् के सिवाय
पद्मावती, क्षेत्रपाल व अन्य किसी भी देवी/देवताओं का
किसी भी प्रकार से प्रचार-प्रसार नहीं करेगा। -
आहारचर्या के समय किसी भी संघस्थ त्यागी का हरे सचित्त
फलों से पड़गाहन नहीं होगा। -
किसी भी संघस्थ त्यागी की दीपक आदि द्वारा आरती नहीं
होगी। -
पिच्छीधारी किसी भी त्यागी को वाहन का उपयोग करने की
आज्ञा नहीं होगी। -
संघस्थ कोई भी साधु अपने पास पिच्छी, कमण्डलु व शास्त्र
के अलावा अन्य किसी भी प्रकार का परिग्रह नहीं रखेगा। -
रात्रि में तेल-मालिश का निषेध होगा।
-
संघ में पंखा, कूलर व हीटर, टेलीफोन, मरकरी लाईट, एयर
कंडीशन और मच्छरदानी एवं इसी प्रकार के अन्य साधनों का
कोई भी त्यागी उपयोग नहीं करेगा। -
आचार्य श्री की आज्ञा के बिना संघ में कोई कार्य नहीं होगा।
-
सभी महिलाओं के लिए त्यागियों का चरण स्पर्श वर्जित है।
महिलाओं का सूर्यास्त के पश्चात् मुनियों के पास आना
वर्जित है। -
संघ के साधुओं को नकली दाँत लगाकर आहार लेना व
दातार द्वारा नकली दाँत लगाकर देना, दोनों वर्जित हैं। -
संघ के कोई भी त्यागी हल्दी, टमाटर, पपीता, भिण्डी,
तरबूज, पत्ती वाली वनस्पति, आडू, लीची व टाटरी आदि
जैन दर्शन गणित -----11-----
का उपयोग नहीं करेंगे व गैस व कुकर का बना भोजन नहीं
लेंगे।
19. संघ का कोई भी त्यागी ऐसे मंच पर नहीं चलेगा जहाँ हरे
फूलों का उपयोग किया गया हो।
20. संघस्थ साधुओं (मुनियों, ऐल्लक, क्षुल्लक) के केशलोंचन
का कोई समारोह नहीं होगा एवं इसकी कोई पत्रिका भी नहीं
छपेगी।
21. संघ का पिच्छीधारी कोई भी साधु रथयात्रा के साथ नहीं
चलेगा व संघ में जिनेंद्र भगवान् की प्रतिमा साथ नहीं रहेगी।
22. कोई भी साधु व्यक्तिगत कुटिया या मठ बनाकर नहीं रहेगा
एवं सामाजिक स्थान उपलब्ध होते हुए किसी श्रावक के
निवास स्थान पर नहीं ठहरेंगे।
23. संघ में कोई भी शिथिलता (जैसे- समय पर सामायिक,
प्रतिक्रमण, भक्ति व स्वाध्याय न करना, किसी भी प्रकार
की विवक्ता करना) सहन नहीं होगी। अगर कोई त्यागी
नियम के विपरीत क्रिया करेगा तो उसे पद छोड़कर जाना
होगा।
24. हमारा ध्येय समाज के पक्ष-विपक्ष में न उलझकर मात्र
आत्म-कल्याण का ही है और समाज को भी आत्महित की
ही प्रेरणा देना है।
नोट :-
उपर्युक्त नियमावली इसी संघ की आचार संहिता है, अन्य
भी माने तो अच्छी बात है।
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प्राक्कथन
मानवीय व धार्मिक मूल्यों में गिरावट का जो परिदृश्य उभर रहा है वह अत्यंत
भयावह है। मानव की अमानवीय प्रवृत्तियाँ जिस स्तर पर है, वहाँ से लौटने की कोई
उम्मीद नहीं दिख रही। अतीन्द्रिय के स्थान पर ऐन्द्रियक्ता का वर्चस्व है। अर्थ-दृष्टि
प्रबल है, तत्त्व दृष्टि निर्बल। धर्मस्थल बढ़ रहे है, धर्म सिसक रहा है। भाषणों की
भरमार है, आचरण नदारद है। दर्शन से शून्य है, प्रदर्शन ही एकमात्र सहारा है।
छलना को प्रभावना समझा जा रहा है। शास्त्रों का सम्मान प्रकार देखकर, गुरुओं
का सम्मान चकाचौंध (ग्लैमर) देखकर और जिनबिम्बों का सम्मान चमत्कार आदि
देखकर होने लगा है। पूज्य और पूजकों की साँठ-गाँठ से धर्म-क्षेत्र में भी वर्चस्व की
राजनीति ने गहरे पैर जमा लिए हैं। व्यक्तिवादिता की दीमक समाज को खोखला कर
रही है। सर्वज्ञ अधिकार-बोध ही है, कर्तव्य-बोध कही नहीं। जिस वर्ग का यह कर्तव्य
था कि वह समाज को संकीर्णताओं से निकालकर प्रभुत्व बनाता, किन्तु उसकी उर्जा
तो नवीन कुरीतियों व अंधविश्वासों को गढ़ने एवं भीड़ इकट्ठी करने की पँतरेबाज़ी में
संलग्न है। जिनवाणी के प्रकाष्कों का अंदाज़ राजनीतिक दलों के प्रकाष्को जैसा हो
गया है। ‘सत्य सो मेरा’ के स्थान पर ‘मेरा सो सत्य’ - यह स्थायी संहिता बन गई है।
शिथिलाचार की पोषक नवीन-नवीन व्याख्याएँ और प्रमाणों की खोज भी बदस्तूर
जारी है।
बहरहाल, जब भी कुछ बहुत बुरा होता है तो उम्मीद बँधती है कि जरूर कुछ
अच्छा होने वाला है। कुछ अच्छे की यह उम्मीद हमें निराश नहीं होने देती। जो भी हो,
जीवन को मंगल से भरने की संभावनाओं का अभी अभाव नहीं हुआ है। इसका
कारण यह है कि तीर्थंकरों, केवलियों, श्रुतकेवलियों के विरह में भी उनको निर्दोष
वाणी आज भी सुरक्षित हैं। श्रुत रूपी सागर में से चुने हुए किसी एक अमृत वचन में
रत्नत्रय व समाधि की असीम संभावनाएँ निहित होती हैं। अतः पतन के इस दौर में
एक मात्र कोई आश्रय दिखाई देता है तो वह शास्त्र है। इस विषम काल में भी
तीर्थंकरों की वाणी आज हमारे बीच उपलब्ध है, इससे बड़ा सौभाग्य दूसरा ही नहीं
सकता।
जिस समय अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर को निर्वाण हुआ तब चतुर्थ दुष्पमा
काल के तीन वर्ष, आठ माह और पंद्रह दिवस शेष थे। भगवान् महावीर के पश्चात्
बासठ वर्षों में तीन अनुबद्ध केवली हुए - गौतमस्वामी, सुधर्मास्वामी और
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जम्बूस्वामी। आखिरकार केवलियों का भी विरह हो गया और आगे के सौ वर्षों में
पाँच श्रुतकेवली हुए - आचार्य विष्णु, आचार्य नंदिमित्र, आचार्य अपराजित,
आचार्य गोवर्धन एवं आचार्य भद्रबाहु। इसके बाद एक-एक अंग का ज्ञान हीन होता
गया और अंततः मात्र एक अंग (आचारांग) का ज्ञान ही शेष रह गया था।
हम जिस युग में श्वास ले रहे हैं यह अवसर्पिणी काल है। प्रत्येक कल्पकाल में
समय का पहिया दो प्रकार से घूमता है, एक उत्सर्पिणी और दूसरा अवसर्पिणी।
उत्सर्पिणी में सब कुछ वृद्धिंगत होता है और अवसर्पिणी में ह्रासोन्मुखी। एक उत्थान
का युग है और एक पतन का। वर्तमान युग अवसर्पिणी का है। इसका पंचम काल
‘दुष्पमा’ चल रहा है। इस युग में तीर्थंकर व केवली होने की पात्रता वाला जीव जन्म
नहीं लेता। शेष शुभ संयोग भी धीरे-धीरे विलुप्त होते जाते हैं। शारीरिक बल,
आत्मबल, साधक की सरलता, सहृदयता, प्रबुद्धता, उच्च मानवीय मूल्य हमारे हाथ
से खिसकते जाते हैं।
युग तेजी के साथ करवटें ले रहा था। भगवान् महावीर के निर्वाण के
लगभग छह सौ वर्षों में मूल द्वादशांग विलुप्त हो गया। अंग और पूर्वों के कतिपय
अंशों का ज्ञान गुरु-परम्परा से आचार्य धरसेन, आचार्य गुणधर, आचार्य
भूतबलि-पुष्पदन्त, आचार्य कुन्दकुन्ददेव, आचार्य यतिवृषभ सदृश महान्
परोपकारी आचार्यों को हुआ और उन्होंने उपलब्ध ज्ञान को लिपिबद्ध करने का
उपक्रम किया। यदि इन आचार्यों ने युगानुरूप शास्त्रों की रचना नहीं की होती तो इस
युग का साधक-समुदाय तो समुद्र पानी से विलग मछली की तरह तड़प-तड़प
कर मर जाता। तीर्थंकरों, केवलियों, श्रुतकेवलियों, अंग-ज्ञानियों के अभाव में इन
श्रुतधर आचार्यों ने तीर्थंकर की कमी महसूस नहीं होने दी। परम्परा तीर्थंकरदेव के
विरह में पूर्वाचार्यों द्वारा लिपिबद्ध शास्त्रों ने ही हमें जीवित रखा। अतः पूर्वाचार्यों के
इस अनंत उपकार से यह युग कभी उऋण नहीं हो सकता।
‘आगम चक्खु साहू’ (प्रवचनसार, गाथा 234) अर्थात् ‘साधु आगम-चक्षु हैं’।
सांसारिक प्राणी दुनिया को चर्म-चक्षुओं से देखते हैं, किन्तु साधक-वर्ग तो सब कुछ
आगम-रूपी चक्षुओं से देखता है। कलिकाल-सर्वज्ञ आचार्य कुन्दकुन्ददेव की उक्त
घोषणा हमें स्मरण कराती है कि इस युग में साधना के आधार शास्त्र ही होंगे। एक
सच्चा साधक स्वयं के संपूर्ण जीवन को आगम की साक्षी में ही देखता है। जिस
समय हमारी आँखों के सामने शास्त्र होता है उस समय हम अल्पज्ञ होते हुए भी
अल्पज्ञ नहीं रहते। उस समय हम केवलज्ञान रूपी चक्षुओं से समस्त संसार को
जैन दर्शन गणित
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देखते हैं। छह द्रव्य, सात तत्त्व, स्वर्ग-नरक, आठ कर्म, भूत-भविष्यत्-वर्तमान की
चौबीसी, तीन लोक का वर्णन आदि विषय हम शास्त्रों के आधार पर ही तो जानते हैं।
शास्त्र वह दिव्य दृष्टि है जिसके द्वारा इन विषयों के उन रहस्यों का साक्षात्कार करते हैं
जिनको अल्पज्ञ कभी प्रत्यक्ष नहीं जान सकता। शास्त्र आँखों में लगाया जाने वाला
वह अंजन है, जिसके लगाते ही हम उन अर्थों का साक्षात्कार कर लेते हैं, जो अर्ध
एकमात्र सर्वज्ञ के ज्ञानगोचर होते हैं। आगम के बिना साधक का एक कदम भी
चलना असंभव है।
यदि कोई अभागा जीव तुच्छ इन्द्रियों से सत्-असत् का निर्णय करेगा तो उसे
पतित होने से कोई नहीं रोक सकता। यदि आँखों से पूँछा जाये कि ‘दुनिया क्या है?’,
तो उसका तो एक ही उत्तर होगा कि ‘ये रंग व आकृतियों ही दुनिया है।’ इसी प्रकार
यदि जिह्वा से पूँछा जाये कि ‘दुनिया क्या है?’, तो उसका यही उत्तर होगा कि ‘ये
खट्टा-मीठा आदि स्वाद ही दुनिया है।’ इसी प्रकार स्पर्शेन्द्रिय के लिए स्पर्श,
कर्णेन्द्रिय के लिए ध्वनि और घ्राणेन्द्रिय के लिए गंध ही दुनिया है। यदि हम इन्हीं से
इस विश्व का निर्णय करेंगे तो लोकोत्तर तत्त्वों का बोध असंभव हो जायेगा और हम
बहिरात्मा ही बने रहेंगे। सागर हों या अनागर, सभी को साधना का आधार शास्त्र ही
हैं। साधना के आधारभूत जीवादि सात तत्त्व, नौ पदार्थ, व्रत, शील, यम, नियम
आदि सभी के सम्यक् परिज्ञान के लिए शास्त्र ही शरणभूत हैं। अतः प्रत्येक जिज्ञासु
का प्रथम कर्तव्य आगम का सेवन है। आचार्य कुन्दकुन्ददेव लिखते हैं -
एयगदो सम्मणी एयग्गं णिच्छिदस्स अत्थेसु।
णिच्छित्ति आगमदो आगमचेदा तदो जेदु।।
प्रवचनसार-गाथा 232
(श्रमण एकाग्र होता है; एकाग्रता पदार्थों का निश्चय करने वाले के होती है;
पदार्थों का निश्चय आगम द्वारा होता है। अतः आगम की चेष्टा अर्थात् आगम का
अभ्यास ही श्रेष्ठ चेष्टा है।)
रयणसार में तो आचार्य यह तक लिखते हैं - ‘अज्झयणेण मे झाणं’ (गाथा
95) अर्थात् ‘पंचमकाल में शास्त्रों का अध्ययन ही ध्यान है।’
साधकों में साधु परमेष्ठी का स्थान सर्वश्रेष्ठ है। ज्ञान-ध्यान-तप में लीन रहना
साधुओं की जीवन-शैली है। बारह प्रकार के तपों में आचार्यों ने स्वाध्याय का
माहात्म्य इन शब्दों में बताया है -
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बारसविहम्मि य तवे सव्वभंतेरे बाहिरे कुसलदिट्ठे।
णत्थि अत्थि ण वा होहिदि सज्जायं सं तवो कम्मं।।
मूलाचार आ. वट्टकेर गाथा 976, एवं
भावती आराधना आचार्य शिवार्य गाथा 106
(बारह प्रकार के अंतरंग और बहिरंग तपों में स्वाध्याय जैसा तप न है और न ही होगा।)
जिनवाणी का स्वाध्याय हमें जीवन का सही अर्थ-बोध कराता है। “मैं कौन हूँ..
मेरा स्वरूप क्या है…, जीवन की सार्थकता क्या है…, जीवन में आकुलता
क्यों है…, विपरीतताओं में हम बिखर क्यों जाते हैं…, सफलताओं में हम
संतुलित क्यों नहीं रह पाते…, सबकुछ पाकर भी अंततः असंतुष्टि और बेचैनी
क्यों बनी रहती है…, सुख के लिए एक भी पल प्रयत्न रुकता नहीं और सुख
एक पल को मिलता नहीं…। आदि-आदि असंख्य सवालों का एक ही उपाय है,
वह है स्वाध्याय। स्वाध्याय से ही हमें ज्ञान होता है कि “मैं ज्ञान-दर्शनमयी एक
शुद्धात्म द्रव्य हूँ। शरीरादि बाह्य पदार्थों में आत्मबुद्धि दुःख का मूल कारण है।
पर के साथ संलग्न होना ही आकुलता है। स्वरूप की विस्मृति ही जीवन में
हर्ष-विषाद की उत्पादक है और स्वरूप की जागृति ही जीवन में समतारस की
सृष्टि करती है। कोई अन्य वस्तु मुझे सुखी-दुखी नहीं कर सकती, बल्कि
आत्मा से विमुक्तता ही समस्त आपदाओं की जननी है। सुख-दुःख का कारण
मेरे भीतर है अतः अन्य जीवों से उनसे उम्मीदें बांधना, बैरभाव रखना, यह सब
उन्मार्ग है। समस्त आरंभ-परिग्रह छोड़कर, प्राणिमात्र के प्रति साम्यभाव रखते
हुए अपने परमात्मस्वरूप में स्थिरता ही सुन्दरतम जीवन-शैली है। लौकिक
सुख-दुःख कर्मोदय के अनुसार अपने-अपने समय पर होते हैं, इनमें राग-द्वेष
करना व्यर्थ है। अपनी संपूर्ण ऊर्जा को बाहर से समेटकर अपने आत्मस्वरूप
की उपलब्धि में झोंकना ही श्रेयस्कर है।”
शास्त्रों को पढ़ने का अर्थ है स्वयं को पढ़ना। आगम एक जादुई दर्पण है जो हमें
हमारा भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों का बोध कराता है। आगम हमें भूतकाल में की
गई भूलों को पुनरावृत्ति की संभावनाओं को क्षीण करता हुआ वर्तमान के सम्यक्
पुरुषार्थ को स्फुरायमान कर, सुनहरे भविष्य का मार्ग प्रशस्त करता है। आगम हमें
कभी अकेला, असहाय, दीन-हीन, असमर्थ नहीं होने देता। जिस समय पूरी दुनिया
- जैन दर्शन गणित
- 16 -
हमारा साथ छोड़ दे, कर्मोदय हमारी समस्त अनुकूलताओं को छीन ले, उस समय
एक मात्र आगम ही है जो हमें अकेला नहीं होने देता। सामने मृत्यु खड़ी हुई हो,
सबकुछ तहस-नहस करने को तैयार हो, उस समय आगम ही हमें मृत्यु के समक्ष
पराक्रम के साथ आँख-में-आँख मिलाने की ताकत देता है। आगम की शरण में
आकर मानो सारी आपदाएँ ही समाप्त हो गई हों। यही कारण है कि आचार्य शिवार्य
लिखते हैं:
कंठगदेहि वि पाणेहि साहुणी आगमदो दु कादव्वो।"
भगवती आराधना-गाथा 156
(कंठगत प्राण होने पर भी साधुओं को आगम का सेवन करना चाहिए।)
जीवन के अंतिम क्षणों में किसी एक गाथा, श्लोक, सूत्र अथवा एक पद का
ध्यान करते-करते साधक की समाधि हो जाती है। श्रुत के सेवन का महत्त्व बताते
हुए आचार्य वट्टकेर लिखते हैं:
विणयेण सुदमदीधं जदिमिण पमादेण होदि वि विस्सरिदं।
तमु तमुदव्वादि परभवे केवलणाणं आवहदि।।
मूलाचार: गाथा 286
(विनय से किया गया श्रुताभ्यास कदाचित् प्रमादवश विस्मृत होने पर भी वह परभव
में जीव को केवलज्ञान में स्थापित कर देता है।)
इस युग में जो भी जीव श्रुत-सेवा में संलग्न हैं वे सभी सागर-अनगार
कोटि-कोटि बहुमान के योग्य है। जिनवाणी किसी भी जीव द्वारा लिखी हो, कहीं से
भी प्रकाशित हो, वह पूज्य है। कलिकालसर्वज्ञ आचार्य समंतभद्रस्वामी द्वारा शास्त्र
का जो स्वरूप निर्धारित किया है वह अद्भुत है:
आप्तोपज्ञमनुल्लंध्यं-दृष्टेष्ट-विरोधिकम्।
तत्त्वोपदेशकं कृत्सं शास्त्रं कापथघटटनम्।।
रत्नकरण्डश्रावकाचार: श्लोक 09
(शास्त्र आप्त के द्वारा कहा गया, वादियों के द्वारा अलध्य, प्रत्यक्ष-अनुमान से
अबाधित, तत्त्वोपदेशक करने वाला, सभी जीवों का हितकारी और मिथ्यामार्ग का
खण्डन करने वाला है।)
आचार्यश्री ने जो कसौटी निर्धारित की है वह रोमांच पैदा कर देती है।
जैन दर्शन गणित
- 17 -
लेखन-प्रकाशन-संपादन को उपयुक्त कसौटी पर कसने से वर्तमान की अनेक विसंगतियों का समाधान हो सकता है। कतिपय विभाजनकारी शक्तियाँ ने शास्त्रों को भी लेखक, प्रकाशक, कालखण्ड आदि के नाम पर बाँटने के प्रयास किए और दुर्दैव से अभी भी जारी हैं। विभाजन द्वारा वर्चस्व की राजनीति करने वाली शक्तियों को समंतभद्रदेव का चिन्तन दिशाबोध दे सकता है।
वर्तमान दौर में कतिपय साधुओं ने चर्या के उच्च मानक स्थापित करते हुए धर्ममार्ग की गरिमा को बनाये रखा। इस परंपरा में आचार्य श्री धर्मभूषण जी महाराज का नाम विशेष स्मरणीय है। उनका तत्त्वज्ञान निर्मल था। उन्होंने धर्ममार्ग में सदैव शुद्ध आम्नाय का आग्रह रखा। सामाजिक राजनीति व विसंवादी से वे हमेशा दूर रहे। तत्त्वज्ञान और आम्नाय में उन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया।
आचार्य श्री धर्मभूषण महाराज की श्रुतभक्ति से कौन अपरिचित है। प्रस्तुत कृति उनके शुल्लक जीवन में की गई श्रुतसेवा का जीवंत स्मारक है। शुल्लक श्री कुलभूषण जी महाराज (पश्चात् आचार्य धर्मभूषण जी महाराज) के द्वारा संकलित इस पुस्तक का प्रथम प्रकाशन ईसवी सन् 1989 में दिल्ली से प्रकाशित हुआ था। प्रारंभ में इसका आकार-प्रकार छोटा था, किन्तु बाद में अनेक उपयोगी सामग्री जुड़ती गई और प्रस्तुत आकार तैयार हो गया। प्रथम संस्करण आते ही समाज ने इसे हाथों-हाथ लिया। इस पुस्तक की माँग इतनी अधिक बढ़ी की अब तक इसके आठ संस्करण निकल चुके हैं। पाठकों की बढ़ती हुई भारी माँग को देखते हुए यह नवम् संस्करण प्रकाशित होना सचमुच हर्ष का विषय है।
पुस्तक का नाम ‘जैन दर्शन गणित’ है। यद्यपि गणित करुणानुयोग का विषय है, किन्तु इस पुस्तक में चारों अनुयोगों को सारभूत सामग्री का समावेश है। ‘गणित’ से आशय केवल इतना है कि इसमें 01 से लेकर 31 तक की संख्या में जो-जो भी है, उसका संकलन किया गया है।
संख्या के आधार पर सामग्री के संकलन का भाव शुल्लक जी के मन में अनायास नहीं आया, अपितु यह शैली द्वादशांगमयी श्रुत से प्रमाणित है। बारह अंगों में तीसरे ‘उपांग’ (स्थानांग) में 01 से 10 तक की संख्या में होने वाली वस्तुओं का संकलन इसी शैली में किया गया है। इस अंग का प्रमाण 4200 पद प्रमाण है। अतः विषयों के संकलन की यह शैली हमारे मूल द्वादशांग से प्रमाणित है। 01 से 31 तक
— जैन दर्शन गणित — 18 —
की संख्या में जो कुछ भी उपलब्ध शास्त्रों में है, वह प्रायः सब कुछ इस संकलन में आ गया है। यह संपूर्ण संकलन लेखक के अथक श्रम का जीवंत दस्तावेज है। इस श्रम में श्रुतभक्ति की वैसी ही मनोभूमि है जैसी किसी समय जैनेन्द्र सिद्धान्त कोशकार शुल्लक श्री जिनेन्द्र ‘वर्णी’ की थी।
संख्या के प्रारूप के अलावा सैंकड़ों विषयों का विवरण देने से यह ग्रन्थ एक अनूठी रचना के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। संख्यात्मक विवरण के अलावा शेष विषय को मुख्यतः पाँच शीर्षकों में विभाजित किया गया है - 1. प्रथमानुयोग, 2. करणानुयोग, 3. चरणानुयोग, 4. द्रव्यानुयोग, 5. प्रतिक्रमण। इसके अलावा आखिर में कतिपय उपयोगी पाठों का संकलन किया गया है।
शास्त्रों को कथन करने की पद्धति को अनुयोग कहते हैं। शास्त्रों में समागत कथन-पद्धतियों को चार भागों में विभाजित किया गया है - प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग एवं द्रव्यानुयोग। ये सभी अनुयोग सर्वज्ञ-प्रणीत हैं। जैसे गाय के चारों स्तनों में धवल, निरंजन, गुणकारी, मधुर दुग्ध निकलता है, उसी प्रकार इन चारों अनुयोगों से वीतरागता का अमृत झरता है। चारों ही अनुयोग मिलकर हमारे जीवन को परिपूर्ण बनाते हैं। चारों अनुयोगों में ये उक्त समानताएँ होते हुए भी चारों अनुयोगों की अपनी एक दुनिया है। इनकी शैली व सरोकारों में इतनी भिन्नता है कि कभी-कभी अनेक मिथ्या धारणाएँ भी पनप जाती है।
सामान्यतः चारों ही अनुयोग सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की साधना के लिए अनिवार्य हैं तथापि इनकी अपनी-अपनी एक अलग भूमिका भी है। ये चारों अनुयोग हमारे जीवन के विविध पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। हमारे जीवन के चार पहलू हैं-दृष्टि, भाव, आचरण और आदर्श। ये चारों ही अनुयोग हमारे जीवन के इन चारों पहलुओं को तराशते हैं। दृष्टि को तराशता है द्रव्यानुयोग, भावों की निर्मलता का प्रेरक है करणानुयोग, क्रिया को सुधारता है चरणानुयोग और हमारे संपूर्ण जीवन के उत्कर्ष के लिए आदर्श दिखाता है प्रथमानुयोग। द्रव्यानुयोग हमें बताता है कि हमारी स्वयं के प्रति कैसी दृष्टि होनी चाहिए; करणानुयोग बताता है कि हमारे भावों का क्या फल होता है; चरणानुयोग हमें बताता है कि हमारा व्यवहार कैसा हो; और प्रथमानुयोग हमारे जीवन का दर्पण है, जिसमें हम अपना प्रतिबिम्ब देख सकते हैं और अपनी दशा और दिशा का मूल्यांकन कर सकते हैं।
इस युग में अनुयोगों का सर्वप्रथम कथन आचार्य समंतभद्र स्वामी ने ‘रत्नकरण्ड
— जैन दर्शन गणित — 19 —
श्रावकाचार’ में किया है। परवर्ती शास्त्रों में चार अनुयोगों के स्वरूप पर अधिक विमर्श नहीं हुआ। एकमात्र आचार्यकल्प पंडित टोडरमलजी ने ‘मोक्षमार्ग प्रकाशक’ के आठवें अधिकार में इस विषय पर अद्भुत विमर्श किया है। यह विवेचन पंडित टोडरमलजी के जीवन की संपूर्ण श्रुतसाधना का सारभूत है। अकेला यह एक ही प्रकरण उन्हें कालजयी बनाता है। आगम में प्रवेश के पूर्व प्रत्येक पात्र जीव को इसका अध्ययन अवश्य करना चाहिए।
जब हम अनुयोगों की पद्धति नहीं समझते तो अनेक आभास खड़े हो जाते हैं। यदि हम द्रव्यानुयोग से स्वयं की क्रिया को देखते हैं तो निश्चयाभास खड़ा होता है और यदि चरणानुयोग से स्वयं की दृष्टि का मूल्यांकन करेंगे तो व्यवहाराभास खड़ा होता है। यदि सावधानी और पारदर्शिता के बिना शास्त्रों का अध्ययन हो तो अनेक विसंगतियाँ भी खड़ी हो जाती है। अतः पाठक का यह दायित्व है कि शास्त्रों में जो प्ररूपणा जिस उद्देश्य से की गई हो उसे उसी रूप में ग्रहण करें।
‘प्रथमानुयोग’ में संकलित जैनधर्म की प्राचीनता, तीर्थंकरों का विवरण, संघ व पट्टावलियों का परिचय; प्रमुख ऐतिहासिक व्यक्तियों, गौरवशाली आचार्यों और कालजयी विद्वानों के व्यक्तित्व-कृतित्व का विवरण बहुत ही सारगर्भित है। चौबीस तीर्थंकरों के जीवन-संबंधी महत्त्वपूर्ण सारणियाँ अत्यन्त उपयोगी हैं। कतिपय विषय ऐसे भी हैं ‘प्रथमानुयोग’ में ऐतिहासिक तथ्यों के समावेश से इसके विषय की सीमा का विस्तार कर दिया गया है। समयसार, तत्त्वार्थसूत्र, रत्नकरण्डश्रावकाचार, द्रव्यसंग्रह, छहढाला आदि रचनाओं का परिचय देकर साहित्य के ऐतिहासिक तत्त्वों का समावेश भी सहज ही हो गया है। श्वेताम्बर-दिगम्बर के भेद, संघ आदि विषय ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।
‘करणानुयोग’ में इस अनुयोग की प्रकृति के अनुरूप गणित को मुख्यता है। पंचपरमेष्ठी के गुण, कर्म की 148 प्रकृतियाँ, त्रिलोक, कालचक्र, गुणस्थान, शलाका-पुरुष, तीर्थंकर, मानस्तंभ, समवशरण, चक्रवर्ती, अकृत्रिम जिन-चैत्यालय आदि के वर्णन को पढ़कर सहज ही केवलज्ञान की महिमा से हृदय भर जाता है। आचार्य कुन्दकुन्ददेव लिखते हैं-
तिवकालिज्जिवसयं सव्वत्तथं सव्वच्वं चित्तं।
जुगवं जाणदि जोइँणो आणाँणस्स माहप्पं ।।
प्रवचनसार-गाथा 51
— जैन दर्शन गणित — 20 —
(तीनों काल में सदा विधम, अनेक प्रकार के, सभी देशों के समस्त पदार्थों को
जिनेन्द्रदेव का ज्ञान चुपचाप जानता है; अहो ज्ञान का माहात्म्य !)
‘चरणानुयोग’ में मुनिचर्या के अन्तर्गत आहार-शुद्धि, छह आवश्यक, सात शेष
गुण आदि के वर्णन एवं श्रावकों से संबंधित अनेक व्यवहारिक बातों का विश्लेषण
किया है। खासतौर पर आम्नाय में आने वाली अनेक क्रियाओं के निषेधार्थ विशेष
प्रयत्न किया गया है। श्रावकों द्वारा किए जाने वाले विविध धार्मिक अनुष्ठानों में
पद्मावती आदि देवी-देवताओं की पूजा, अग्नि व धूप का प्रयोग, निर्वाण लाडू,
पंचाभूत अभिषेक, स्त्री-अभिषेक, फूल चढ़ाना, दीपक से आरती, अखण्ड ज्योति,
मूर्तियों को चन्दन लगाना, गंधोदक को मस्तक के अलावा अन्य अंगों पर लगाना,
फलाजाली प्रतिमाओं का चलन आदि क्रियाओं का कठोरता से निषेध किया गया है।
मंदिर में लगने वाली चौरासी असातनाओं का उल्लेख भी विषय को अत्यन्त
व्यवहारिक बना देता है।
‘द्रव्यानुयोग’ में छोटे-छोटे प्रश्नों के द्वारा षट्द्रव्यमयी विश्व के स्वरूप को
अत्यन्त बोधगम्य शैली में प्रस्तुत किया है। द्रव्य-गुण-पर्याय का स्वरूप, छह द्रव्यों
के लक्षण, सामान्य-विशेष गुण, सात तत्त्व, मोक्ष के प्रकार, जीव का स्वरूप एवं
महिमा, सुख-दुःख का स्वरूप, पुण्य-पाप की एकता, सम्यक्त्व की प्राप्ति का उपाय
आदि विषय सचमुच मन को छूने वाले प्रकरण हैं।
लेखक ने निष्पक्षता के साथ आध्यात्मिक तत्त्वों को जिस निडरता के साथ
प्रस्तुत किया है वह हृदय को आनंद से भर देता है। अन्यथा वर्तमान में आध्यात्मिक
रूपण्णाओं पर कथायाभाव के कारण अनेक प्रकार की छींटाकशी करते हुए शास्त्रों
का अर्वणवाद किया जा रहा है। अध्यात्म में रूचिवंत जीवों को हाशिये पर लाने के
अनेक प्रयत्न किए जा रहे हैं। आगम की इस शैली को समाप्त करने का ही मानो व्रत
लिया हो। अनेक-अनेक हथकण्डों से जीवों को अध्यात्म से दूर करने के प्रयत्न हो
रहे हैं। आश्चर्य यह है कि ये सब उस वर्ग का द्वारा हो रहा है जो स्वयं को श्रमण
संस्कृति का सबसे बड़ा संरक्षक व संवर्धक मानता है। विभाजन की राजनीति करने
वाले इस वर्ग ने समाज में विघटन की जो त्रासदी दी है, इतिहास इसके लिए उन्हें
कभी क्षमा नहीं करेगा।
‘प्रतिक्रमण’ खण्ड में श्रावक प्रतिक्रमण एवं गौतमस्वामी द्वारा रचित प्रतिक्रमण
पाठ के साथ-साथ विविध पाठों का संकलन इस रचना को साधना के स्तर पर भी
उपयोगी बनाता है। हिन्दी में अनूदित सामायिक पाठ, चौबीस तीर्थंकर वंदना, नीरव
निर्झर, बारह भावना, वीतराग स्तोत्र, परमानंद स्तोत्र, परमात्म स्वरूप, प्रायश्चित्त
विधि, विविध भक्तियाँ, कुन्दकुन्दरात्क का पदानुवाद, समाधिमरण पाठ आदि का
संकलन बहुत ही मार्मिक है। ये सभी पाठ इतने मनमोहक हैं कि साधक इनके जरिये
अलग ही भावभूमि में पहुँच जाता है। सबसे अंत में कुछ अन्य उपयोगी सामग्री, जैसे
तेरहपंथ के तेरह नियम जैसे उपयोगी विषय भी हैं।
इस प्रकार यह संग्रह ग्रन्थ आचार्य श्री के क्षुल्लक जीवन की गहरी भूतभक्ति व
साधनात्मक चिन्तन का प्रतिफलन है। इस संग्रह में शास्त्रीय, तात्विक, व्यवहारिक,
ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, दार्शनिक तत्त्वों की व्यापक दिग्दर्शन कराया गया है।
विविध-विविध विषयों के संकलन का ही यह परिणाम है कि किसी भी प्रकार का
जिज्ञासु हो, हरेक जिज्ञासु की शंकाओं का समाधान एवं अज्ञान की निवृत्ति, इस
रचना से सहज ही हो जाती है।
इस अद्भुत रचना के द्वारा अज्ञान का कारा टूटे और अखिल विश्व में सम्यग्ज्ञान
का प्रकाश हो, यही भावना है। कहा है-
जेण तच्चं विउज्झैज्ज जेण चित्तं णिरुज्झदि।
जेण अत्ता विसुज्झैज्ज तं णाणं जिणसासणे।।
मूलाचार-गाथा 267
(जिससे तत्त्व का बोध होता है, जिससे मन का निरोध होता है, जिससे आत्मा शुद्ध
होता है, जिनशासन में उसका नाम ज्ञान है।)
वीर निर्वाण संवत 2547
श्रावण शुक्ल दशमी
16 अगस्त, 2021
डॉ. मनीष कुमार जैन
मेरठ (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल नं. 9528762447
विषय सूची
क्रम संख्या
- एक
- दो
- तीन
- चार
- पाँच
- छह
- सात
- आठ
- नौ
- दस
- ग्यारह
- बारह
- तेरह
- चौदह
- पन्द्रह
- सोलह
- सत्रह
- अठारह
- उन्नीस
- बीस
- इक्कीस
- बाईस
- तेईस
- चौबीस
- पच्चीस
- छब्बीस
- सत्ताईस
- अट्ठाईस
- उनतीस
- तीस
- इकतीस
- अनुयोगों के भेद
पृष्ठ संख्या
31
35
43
53
64
75
82
87
94
99
107
109
112
114
118
119
126
128
130
131
133
134
135
136
139
143
143
144
146
147
148
149
कुछ अन्य उपयोगी तत्त्व
प्रथमानुयोग
- राज्य के पद
- जैन धर्म की प्राचीनता
- दिगम्बर वेश पाँच
- तीर्थंकरों के बल का प्रमाण
- महावीर स्वामी के बाद तीन केवली
- स्थानक वाईस टोला श्वेताम्बर पंथ
- स्थानक तेरह पंथ श्वेताम्बर पंथ की स्थापना
- तीर्थंकरों के वर्ग
- तीर्थंकरों के सिद्धत्व के आसन
- तीर्थंकरों के वंश
- तीर्थंकरों की मोक्षस्थली
- ऐतिहासिक राज वंश
- दिगम्बर मूल संघ
- दिगम्बर जैन संघ
- दिगम्बर जैनाभासी संघ
- पट्टावलिये तथा गुर्वावलिये
- पौराणिक राज वंश
- संवत्सर निर्देश
- वीर निर्वाण संवत् निर्देश
- विक्रम संवत् निर्देश
- ईसवी संवत्
- गुप्त संवत् निर्देश
- कुछ प्रसिद्ध ऐतिहासिक जैन पुरुष
- बारह चक्रवर्ती
- कुन्दकुन्द आचार्य
- कुन्दकुन्दाचार्य की रचनाएं
- बनारसीदास
- पं. टोडरमल
- धर्मभूषण
- आध्यात्मिक शास्त्र तथा उनके रचयिता
- तत्त्वाथै सूत्र
- अष्टपाहुड़
- पंचास्तिकाय
जैन दर्शन गणित
151
151
152
153
153
155
155
155
155
155
155
155
156
156
156
157
158
158
159
159
160
160
161 से 165
166
167
168
168
169
169
170
171
172
173
- 24 -
- समयसार
- नियमसार
- प्रवचनसार
- तत्त्वाथैसूत्र
- षटखंडाला
- रत्नकरण्ड श्रावकाचार
- द्रव्य संग्रह
- चौबीस तीर्थंकरों का चार्ट
- तीर्थंकरों के पंचकल्याणक स्थान
- तीर्थंकर काल में शलाका पुरुष
- विरह जाने वाले 123 जीव
- कुछ प्रमुख जीवों की वर्तमान एवं भावी पर्यायें
- नव दर्शन तालिका
- 30 चौबीसी के 720 तीर्थंकर
- एक समय में 170 तीर्थंकर
- पात्र के भेद
- श्वेताम्बर आम्नाय व दिगम्बर आम्नाय में मतभेद
- तत्त्व बोध
- तथ्य की बातें
- संसार में अन्ध
- अमूल्य विचार
करणानुयोग
- अरहन्तों के छयालीस गुण
- आचार्यों के 36 गुण
- उपाध्यायों के 25 गुण
- मुनियों के 108 गुण
- मुनियों के 28 मूलगुण
- खुल्लक, ऐल्लक व आर्यिका के 105 गुण
- कर्मों की 148 प्रकृतियां
- णमोकार मन्त्र
- माला में 108 दाने क्यों
- स्त्री इन्द्रों के नाम
- बालबल्य का प्रमाण व रंग
- नरकों की भूमियों के रुढ़िगत नाम
- नरकों की भूमियों के सार्थक नाम
- रत्नाप्रभा भूमि का विस्तार
जैन दर्शन गणित
174
175
176
177
177
178
178
179 से 192
193
194
195
196 से 198
199 से 202
203 से 208
209 से 212
213
214 से 220
221 से 224
225 से 227
227
228 से 229
231
232
232
232
232
232
233
235
236
236
236
237
237
237
- 25 -
- नरकों के बिल
- नरकों के प्रमाण
- नरकों का विस्तार
- नरकों में सम्यक्त्व के कारण
- स्वर्ग के नाम
- स्वर्गों में इन्द्रों का वर्णन
- नन्दीश्वर द्वीप
- जम्बूद्वीप की परिधि
- जम्बूद्वीप नाम की सार्थकता
- जम्बूद्वीप के सात क्षेत्र
- जम्बूद्वीप से आगे के समुद्रों एवं द्वीपों का वर्णन
- भरत क्षेत्र के छह खण्ड
- म्लेच्छ खण्ड
- विदेह क्षेत्र का समवसरण
- मानसभ
- तीर्थंकरों के चिह्न की पहचान
- पाण्डुक शिला का वर्णन
- तीर्थंकर माता का दूध नहीं पीते
- तीर्थंकर के शरीर की विशेषताएँ
- समवसरण का माहात्म्य
- दिव्यध्वनि
- मानुषोत्तर पर्वत
- मल-मूत्र किसको नहीं होता
- चन्द्रमा व सूर्य का प्रमाण
- एक चन्द्रमा का परिग्रह
- विमान तीन प्रकार के
- सूर्य का गमन
- जीवों में लेश्याओं का विधान
- मनुष्य के भेद
- चक्रवर्तियों का वर्णन
- व्यक्तता - अव्यक्तता
- पुद्गल द्रव्यों के भेदों का कथन
- स्कन्धों के प्रकार
- अंगुल के प्रकार
- पाद से कोश पर्यन्त की परिभाषाएँ
- योजन का माप
जैन दर्शन गणित
237
238
238
238
238
239
239
239
240
240
240
240
241
241
241
241
241
242
242
242
243
243
244
244
244
244
244
244
245
245
247
247
248
248
249
249
- 26 -
(यह मूल ग्रन्थ का प्रारम्भिक अंश है: सम्पूर्ण ग्रन्थ (432 पृष्ठ) संलग्न PDF में पढ़ें।)
मूल दस्तावेज़ (PDF): 1924.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है