जैन आचार्यों की समकालीन युगचेतना
-प्रो. वीरसागर जैन
आचार्य समन्तभद्र और हेमचन्द्र दोनों ने ही दो श्लोक ऐसे लिखे हैं, जिनका आशय है कि जिनशासन के ह्रास और विकास- दोनों में ही मुख्य कारण वस्तुतः उसके वक्ता हैं; वर्तमान काल में जो जिनशासन का ह्रास दिखाई देता है, उसका मुख्य कारण है- सुयोग्य वक्ता का अभाव, और यदि आज भी कोई सुयोग्य वक्ता मिल जाए तो इस कलियुग में भी पूरे विश्व में जिनशासन का एकच्छत्र शासन हो सकता है | आचार्य समन्तभद्र और हेमचन्द्र के वे दोनों श्लोक मूलतः इसप्रकार हैं-
“कालः कलिर्वा कलुषाशयो वा श्रोतुः प्रवक्तुर्वचनाशयो वा ।
त्वच्छासनैकाधिपतित्वलक्ष्मीप्रभुत्वशक्तेरपवादहेतुः ॥” - आचार्य समन्तभद्र, युक्त्यनुशासन,
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(अर्थ- हे जिनेन्द्र ! आपके शासन के एकाधिपत्व के अपवाद का कारण वर्तमान में कलिकाल है, श्रोता का कलुषाशय है अथवा वक्ता का वचनाशय है |)
“श्राद्धः श्रोता सुधीर्वक्ता युज्येयातां यदीश तत्।
त्वच्छासनस्य साम्राज्यमेकच्छत्रं कलावपि ॥” - आचार्य हेमचन्द्र, वीतरागस्तोत्र, 3
(अर्थ- हे जिनेन्द्र ! यदि सुयोग्य श्रोता-वक्ता मिल जाएँ तो आज कलियुग में भी आपके शासन का एकच्छत्र साम्राज्य हो सकता है |)
गम्भीरतापूर्वक विचारणीय है कि ऐसे कौन-से गुण हैं कि जिनसे कोई सुयोग्य वक्ता आज भी पूरे विश्व को प्रभावित कर सकता है | मेरी दृष्टि से, ऐसे सुयोग्य वक्ता में निम्नलिखित दो गुण अवश्य होने चाहिए -
- स्वयं तत्त्व को सही से समझा हो |
- दूसरों को समझाने की कला में प्रशिक्षित हो |
अधिकांश वक्ताओं में पहला ही गुण नहीं मिलता | वे समझाते तो खूब हैं, पर वे उसे स्वयं ही ठीक से नहीं समझे होते हैं | मात्र जैसा शास्त्र से या गुरु से सुना-सीखा होता है, उसे वैसा ही रटकर दूसरे लोगों को समझाने लग जाते हैं, उन्हें स्वयं भी पता नहीं चलता है कि अभी वे स्वयं ही उस विषय को भलीभांति नहीं समझे हैं | शरीर और आत्मा भिन्न-भिन्न हैं, आस्रव-बंध दुःखरूप है, समस्त आरम्भ-परिग्रह दुःखरूप है, मात्र मोक्ष दशा ही सुखरूप है, इत्यादि आगम-वाक्यों को वे बोलते तो हैं, परन्तु इनका आशय अभी उन्हें स्वयं को ही ठीक से भासित नहीं हुआ होता है | यही कारण है कि बात नहीं बनती, कहीं-न-कहीं गड़बड़ हो ही जाती है | वे दूसरों के प्रश्नों का ठीक से समाधान नहीं कर पाते हैं, उनके तर्कों के आगे निरुत्तर हो जाते हैं, स्वयं ही भ्रम में पड़ जाते हैं अथवा क्रोधादि करके जबरदस्ती अपनी बात को श्रोता पर थोपने लगते हैं, इत्यादि | अतः सर्वप्रथम तो स्वयं को विषय का एकदम सही-सही, वैज्ञानिक-जैसा पूर्ण समीचीन ज्ञान होना चाहिए | उसमें कहीं भी कोई भी आग्रह या अन्धानुकरण आदि नहीं होना चाहिए | जिसे स्वयं समीचीन ज्ञान हुआ हो ऐसा वक्ता अत्यंत दुर्लभ है | आचार्य कुन्दकुन्द कृत समयसार की टीका ‘आत्मख्याति’ में उपदेशदाता में 4 गुण कहे गये हैं - आगम का सेवन, परापर गुरु का उपदेश, युक्ति का अवलम्बन और अन्त में स्वानुभव | इसका अभिप्राय यही है कि जो वक्ता केवल आगम के सेवन और परम्परा गुरु के उपदेश तक ही नहीं रुकता, अपितु उसके बाद युक्ति का अवलम्बन लेकर स्वानुभव भी करता है, वही सुयोग्य वक्ता है |
स्वयं समझ लेने के बाद उसे दूसरों को समझाने की कला होना - यह और भी बड़ी बात है | स्वयं समझना आसान है, पर दूसरों को समझाना आसान नहीं होता | उसके लिए एक अलग ही प्रकार की अद्भुत कला अपेक्षित होती है, जो सबमें नहीं होती | इसके लिए तो विशेष प्रशिक्षण भी लेना पड़ता है | दूसरों को समझाने के लिए एक विशेष भाषा-शैली ही नहीं, मनोविज्ञान एवं देश-काल आदि अन्य अनेक विषयों के ज्ञान की भी विशेष अपेक्षा होती है | यही कारण है कि शास्त्रों में वक्ता के स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया गया है |
दूसरों को समझाने के लिए वक्ता में अपार करुणा भी होनी चाहिए, केवल ज्ञान और प्रशिक्षण ही पर्याप्त नहीं है | करुणा ही एक ऐसा तत्त्व है जिससे कोई वक्ता संसारी जीवों के कष्टों को बिना उन्हें दुखी किए सहजता से दूर कर सकता है | करुणा के बिना संसार में निमग्न जीवों को मुक्तिमार्ग में चलाना तो दूर, उनसे आत्मीयता पूर्वक बात करना भी सम्भव नहीं है | यही कारण है कि आचार्य गुणभद्रस्वामी ने वक्ता के गुणों में करुणा को सर्वोपरि स्थान दिया है | यथा -
“जना घनाश्च वाचाला सुलभा स्युर्वृथोत्थिताः ।
दुर्लभा ह्यन्तरार्द्रा स्युः जगदभ्युदयजिहीर्षवः ॥” - आत्मानुशासन अर्थ - ऐसे जन और ऐसे घन (बादल) तो लोक में बहुत सुलभ हैं जो वृथा ही उठ खड़े होते हैं, किन्तु ऐसे जन और ऐसे घन अति दुर्लभ हैं जो जगत्-कल्याण की भावना से अन्दर तक भीगे हुए हैं ।
दूसरों को समझाने के लिए वक्ता में समकालीन युगचेतना भी अवश्य होनी चाहिए । जिस वक्ता में समकालीन युगचेतना होगी, वही सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित कर पाएगा ।
आजकल अधिकांश वक्ताओं में समकालीन युगचेतना का भी बड़ा अभाव देखा जाता है, जो बहुत बड़ी कमी है । ऐसा इतिहास में पहले कभी नहीं था । यदि हम इतिहास में जाकर देखें तो ज्ञात होता है कि सभी पूर्वाचार्यों में बड़ी गहरी समकालीन युगचेतना पाई जाती थी और इसीलिए वे अपने उद्देश्य में अत्यंत सफल होते थे । प्राचीन जैनाचार्यों ने जो महान् धर्मप्रभावना की है, उसके पीछे एक सबसे बड़ा कारण यही रहा है कि उनमें समकालीन युगचेतना पाई जाती थी ।
समकालीन युगचेतना से तात्पर्य है कि अपने समय की समस्याओं से अवगत रहना और उनका समाधान भी प्रस्तुत करना; अपने चिन्तन, प्रवचन, लेखन आदि को युगानुरूप रखना । पूर्व के सभी जैनाचार्यों में यह समकालीन युगचेतना बहुत गहरी पाई जाती थी, इसके अनेक प्रमाण प्रस्तुत किये जा सकते हैं । यथा -
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उन्होंने किसी एक ही भाषाविशेष का आग्रह नहीं रखा, अपितु जब जैसा समय आया तब वैसी ही भाषा का प्रयोग किया । उदाहरणार्थ जब लोग प्राकृत में बात को समझते थे तो प्राकृत का प्रयोग किया और जब लोग संस्कृत में बात को समझने लगे तो संस्कृत का प्रयोग किया । इसी प्रकार अपभ्रंश, ब्रज, हिंदी आदि अनेक भाषाओं का उन्होंने युगानुरूप प्रयोग किया । इसीप्रकार कन्नड़, तमिल, मराठी आदि भाषाओं का प्रयोग भी देश-काल की आवश्यकतानुसार किया । यह उनकी बहुत गहरी समकालीन युगचेतना थी ।
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भाषा ही नहीं, शैली के स्तर पर भी उन्होंने युगानुरूप परिवर्तन किया । जैसे कि जब गाथा अधिक चलती थी तो गाथा लिखी, सूत्र चलने लगे तो सूत्र लिखे, कारिकाएँ चलने लगीं तो कारिका लिखी, पद चलने लगे तो पद लिखे, इत्यादि ।
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प्रायः सभी जैनाचार्यों ने अपने ग्रन्थों में अपने-अपने समय में प्रचलित सभी मतों/सम्प्रदायों/ दर्शनों/विचारधाराओं का अध्ययन-समीक्षण प्रस्तुत किया । जैसे- आचार्य अकलंक ने अपने समय में प्रचलित/लिखित सम्पूर्ण विचारधाराओं (धर्मकीर्ति आदि की मान्यताओं) का सयुक्तिक निरसन अपने ग्रन्थों में किया है। इसीप्रकार आचार्य कुन्दकुन्द ने भी अपने समय की समस्याओं/मान्यताओं (द्विक्रियावादी आदि) पर खुलकर अपने विचार व्यक्त किये हैं | यही बात आचार्य समन्तभद्र, पूज्यपाद, विद्यानंद, प्रभाचंद्र, जिनसेन, जयसेन आदि सभी पर घटित होती है | यहाँ सभी के उदाहरण प्रस्तुत करने का अवकाश नहीं है | कभी पृथक् से लिखने का प्रयास करूंगा |
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सभी जैनाचार्यों ने अपने धर्म को किसी जाति, लिंग, वेश, क्रिया आदि की कट्टर सीमाओं में भी नहीं बांधा, अपितु उन्हें देश-काल-परिस्थिति के अनुसार रहने देने का निर्देश दिया | उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “सर्व एव हि जैनानां प्रमाणं लौकिको विधिः | यत्र सम्यक्त्वहानिर्न न चापि व्रतदूषणम् ||” यह भी उनकी बहुत गहरी समकालीन युगचेतना थी |
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सभी जैनाचार्यों ने अपने भक्तों की व्यक्तिगत, मानसिक, पारिवारिक, सामाजिक,राजनीतिक आदि समस्याओं को भी ध्यान से सुना | उनको मना नहीं किया कि हमसे तो केवल दार्शनिक प्रश्न ही पूछो | और न केवल सुना, सुनकर उन्हें उन समस्याओं का उत्तम समाधान भी बताया | उदाहरणार्थ मैना सुन्दरी आदि की कथाओं को देखा जा सकता है |
इसी प्रकार की और भी अनेक बातें यहाँ बताई जा सकती हैं, किन्तु अभी संक्षेप में ही कुछ संकेत करके विराम लेता हूँ | कहने का कुल तात्पर्य यही है कि सभी पूर्वाचार्यों में बहुत गहरी समकालीन युगचेतना पाई जाती थी और वह आज भी हर वक्ता / लेखक में अनिवार्य रूप से होनी चाहिए, तभी वह अपनी बात (जिनशासन) को पूरे विश्व तक ठीक से पहुंचा पाएगा | आज के वक्ताओं को आधुनिक विश्व के प्रति जागरूक रहना होगा और फिर उसे आधुनिक भाषा एवं आधुनिक शैली का आश्रय लेकर ही बड़े रोचक ढंग से समझाना होगा, तभी हमारे पूर्वाचार्यो का यह स्वप्न साकार हो सकेगा कि “त्वच्छासनस्य साम्राज्यमेकच्छत्रं कलावपि ॥” अर्थात् हे जिनेन्द्र ! आज कलियुग में भी आपके शासन का एकच्छत्र साम्राज्य हो सकता है |
सौभाग्य से आज तो समय भी बहुत अनुकूल है | केवल इसलिए ही नहीं कि आज वैज्ञानिक संसाधन बढ़ गये हैं, बल्कि इसलिए कि आज लोगों में वैज्ञानिक चेतना बढ़ी है | आज लोगों में पहले जैसी कट्टरता/संकीर्णता नहीं रही है कि हाथी के पैर के नीचे दबकर मर जाएँगे, पर जैन मन्दिर में प्रवेश नहीं करेंगे | आज लोग स्वयं तर्क से हर बात को समझने की कोशिश करते हैं कि ईश्वर जगत् का कर्ता-धर्ता हो सकता है या नहीं, आदि | पहले तो इतिहास में ऐसा समय भी आया है कि यदि कोई व्यक्ति इस बात को समझाता था कि ईश्वर जगत् का कर्ता-धर्ता नहीं है तो उसे ईश्वरविरोधी कहकर जहर पिला देते थे या फांसी पर लटका देते थे, पर अब पूरा माहौल बदल गया है । आज लोग इस विषय पर भी शांतिपूर्वक सुनने-समझने तैयार हुए हैं । जैन दर्शन का विचार पक्ष ही नहीं, आचार पक्ष भी आज बहुत विश्वसनीय सिद्ध हो रहा है । स्वास्थ्यविद और पर्यावरणविद भी जैन आचार को बहुत उपयोगी बता रहे हैं । इसी प्रकार की और भी अनेक बातें हैं । ऐसे में यदि कोई सुयोग्य वक्ता मिल जाए तो आज के समय में अवश्य ही जैन धर्म को विश्व धर्म बनाया जा सकता है । जिनशासन के वक्ताओं को इस विषय पर गम्भीरतापूर्वक चिन्तन करना चाहिए । (शतेषु जायते शूरा..वक्ता दशसहस्रेषु )