हम जिनवाणी को पढ़ते हैं, सुनते हैं और दूसरों को सुनाते भी हैं।
लेकिन कभी शांत होकर अपने भीतर झाँककर देखा है—
जिनवाणी ने मुझे कितना बदला?
हमने शास्त्रों के पन्ने तो पलट दिए,
पर क्या अपने जीवन के पन्ने पलटे?
हमने दूसरों को क्रोध छोड़ने की सीख दी,
पर अपने क्रोध को कब छोड़ा?
हमने क्षमा की महिमा सुनाई,
पर अपने मन में बैठे हुए पुराने द्वेष को कब विदा किया?
हमने अपरिग्रह पढ़ा,
पर अपनी इच्छाओं का विस्तार कब रोका?
धर्म सुनना बहुत आसान है,
धर्म को समझना थोड़ा कठिन है,
लेकिन धर्म को अपने आचरण में उतारना सबसे कठिन है।
जिनवाणी का उद्देश्य केवल हमारे ज्ञान को बढ़ाना नहीं,
बल्कि हमारे कषायों को घटाना है।
यदि प्रतिदिन जिनवाणी पढ़ने के बाद भी
क्रोध वही है, अहंकार वही है, मोह वही है,
तो हमें एक बार रुककर स्वयं से पूछना चाहिए—
मैं जिनवाणी पढ़ रहा हूँ या केवल शब्दों को पढ़ रहा हूँ?
क्योंकि शास्त्र पढ़ने से शब्द हमारे पास आते हैं,
लेकिन शास्त्र को जीने से गुण हमारे भीतर आते हैं।
सच्चा श्रावक वह नहीं जो बहुत धर्म की बातें जानता हो,
सच्चा श्रावक वह है जिसके व्यवहार से
धर्म की पहचान होने लगे।
आइए, आज से एक संकल्प लें—
जिनवाणी का एक सिद्धांत पढ़ेंगे,
उसे समझेंगे
और फिर उसी दिन अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे।
क्योंकि जिनवाणी का सबसे सुंदर स्थान
पुस्तक का पन्ना नहीं, हमारा जीवन है।
रिया शास्त्री, शाश्वत