तर्ज़-- मन की वीणा से गुंजित (स्वागत गीत)
जिन की वाणी से गुंजित ध्वनि ओम् की,
जिनवाणी माँ तुम्हीं, जिनवाणी माँ तुम्हीं। (२)
ये ही माता सदा ईश कहती मुझे (२)
ये ही माता स्वयं सिद्ध कहती मुझे।
।। जिनवाणी माँ तुम्हीं… ।।
। अंतरा - 1 ।
स्व को पामर लखा, जिनवाणी ने कहा…
तू तो भगवान् अरूपी है, निज रस पगा।
जिनवरों ने कही, गणधरों से गुथी,
है परम तारणी, जिनवाणी माँ तुम्हीं।
।। जिन की वाणी से… ।।
। अंतरा - 2 ।
स्व को अशरण लखा, जिनवाणी ने कहा।
तू तो शरणा स्वयं की ही, स्व ही अघा।
जिनवरों ने कही, गणधरों से गुथी,
है परम तारणी, जिनवाणी माँ तुम्हीं।
।। जिन की वाणी से… ।।
अंतरा - 3 ।
पर का कर्ता बना, जिनवाणी ने कहा।
तू तो कर्ता नहीं, व्यर्थ दुःख को भरा।
जिनवरों ने कही, गणधरों से गुथी,
है परम तारणी, जिनवाणी माँ तुम्हीं।
।। जिन की वाणी से… ।।
। अंतरा - 4 ।
जिनवाणी को लखा, जिसमें स्वात्म भरा।
स्व का चिन्तन हुआ, जिससे सुख को चखा।
जिनवरों ने कही, गणधरों से गुथी,
है परम तारणी, जिनवाणी माँ तुम्हीं।
।। जिन की वाणी से… ।।
रचनाकार: अरहम जैन (Arham Jain), खड़ैरी
Instagram: @arham_Jain2311