हित-चिन्तवन | Hit-Chintavan

तर्ज : अहो चैतन्य आनंदमय…

हमें एक कार्य करना है, कि सम्यक्दर्श प्रगटाना।
अन्य की चाह नहीं हमको, हमें सुख अपना है पाना है।।1।।

अरे ! हम खुद के ही राजा हैं, अतुल वैभव हमारा है।
मिथ्यात्व में वैभव, न जाना हम हमारा है।।2।।

इसी से हम भिखारी हो, खाक दर-दर की छाने हैं।
खेद है माँगते पर से, नहीं आत्मा पिछाने हैं।।3।।

बेड़ी को डालते पैरों और मुक्ति को भी चाहें।
पूर्व में चलते-चलते भी, पहुँचना पश्चिम में चाहें।।4।।

कल्पना विष को खाकर के, अमर होने की करते हैं।
उपल पर बीज बोकर भी, फसल की आस धरते हैं।।5।।

अरे! खुद ही विचारें हम, असम्भव कैसे सम्भव है।
जो वस्तु घर में रखी है, वह बाहर कैसे सम्भव है।।6।।

ज्ञान स्वभावी हैं हम भी, मूर्ख फिर कैसे बनते हैं ?
मान्यता उल्टी रख करके, भ्रमण हम भव में करते हैं।।7।।

यहीविपरीत बुद्धि मात्र ही, सब दुःख का कारण है।
यही शुद्धि में बाधक है, यही सब सुख हारण है।।8।।

फँसे चिरकाल से इसमें, छूट इससे न पाये हैं।
इसी से सुदृढ़ होते हैं, हमारे भव के पाये हैं।।9।।

नींव मजबूत होवे तो, दुर्ग ये गिर नहीं सकता।
मूल को तो बिना काटे, ये भवतरू गिर नहीं सकता।।10।।

मोह को नाश करने का, मात्र बस एक साधन है।
श्रवण श्री जैनवाणी का, और जिनधर्म धारण है।। 11।।

सत्य जिनदेव का मारग, मोक्ष के महल जाने का।
प्रथम सोपान सत् दर्शन, ज्ञान-चारित्र पाने का।। 12।।

बिना आत्मानुभव किये, ये चारित्र हमने पाला है।
अंधेरा ही रहा प्रतिक्षण, न पाया कुछ उजाला है।। 13।।

मनुज पर्याय पाई है, बड़े ही भाग्य हैं जागे।
कि सम्यग्दर्श हो जावे, कि जिससे भ्रमण भय भागे।। 14।।

अन्य कोई न अवसर है, जो ऐसा कार्य बन पाये।
ये चिन्तामणि सम दुर्लभ, नहीं खोकर के मिल पाये।। 15।।

अतः कर्तव्य है आत्मन्, कार्य अपना संभालें खुद।
प्रीति पर द्रव्यों से तजकर, स्व में दृष्टि लगालें खुद।। 16।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह