( लावनी छंद)
हे स्व पर प्रकाशक नाथ प्रकाशित कर दो।
जिन गुण से प्रभु तुम भरे वे मुझ में भर दो।।
मैं जानूँ जिनको नहीं मुझे वह जानें।
मैं जाननहार हूँ रह गई ये सब बातें।।
पर प्रभुवर तुम तो जड़ चेतन के ज्ञानी।
वे तुममें मिले न तुम उनमें हे स्वामी।।
बस जानूँ निज को यही भावना दृढ़ हों।।1।।
मैं करूं किसी का फल कोई दे जाए।
यह मान-मान कर गीत इसी के गाए।।
तुम निज को निज से स्वयं ज्ञान के फल हो।
पर जानो प्रभु पर उन पर से तुम पर हो।।
मुझे स्वयं की सीख मिले यह बल दो ।।2।।
हे ज्ञान पिंड चलती ज्ञप्ति क्रियाएँ।
तुम ज्ञायक मैं भी समझ मुझे यह आए।।
जो दिखे प्रभु उनमें यह शक्ति नहीं है ।
मुझमें शक्ति है तभी ये भक्ति बड़ी है।।
है शक्ति नहीं पर भक्ति प्रभु हर क्षण हो।।3।।
तुम लोकलोक प्रकाशक जन यह कहते।
निश्चय से प्रभु तुम आत्म तत्त्व में रहते ।।
है ज्ञान अनेकानेक कथन व्यवहार।
निश्चय षट्कारक भेद भिन्न यह ज्ञान।।
मैं मुझे ही मुझसे मेरे हेतु बस हों।।4।।
नित स्वयं प्रकाशक प्रभु तुम स्व के ज्ञानी।
शब्द अर्थ अरु ज्ञान के युगपद ग्राही।।
मैं एक-एक कर जानूं भूलूं तत्क्षण।
त्रैलोक्य जानो चैतन्यज्ञान से प्रतिक्षण।।
हे निर्मल जिन मेरी परिणति निर्मल हो।।5।।
रचनाकार: अम्बर जैन (Ambar Jain), जयपुर