तर्ज : आत्मन् अपनी वैभव गाथा…
अवलम्बन एक आपका ही, शुद्धातम ही तारणहार प्रभो ।
शुद्धात्म स्वरूप दिखाकर प्रभु, करते भव से उद्धार अहो ।। 1 ।।
निज शुद्धातम के सिवा जगत में, दिखे न कोई अपना है।
झूठी है आश पराई भव सुख मृगतृष्णा अरु सपना है ।। 2 ।।
देखे जहँ सुख की आशा से, वहाँ भीषण दुखमय ज्वाला है।
घाते अनुभूति होश हरे, वह अरे हलाहल हाला है।। 3।।
आत्मानुभूति ही महामंत्र, जो मोह महा विष नाशक है।
आत्मानुभूति ही परमानंदमय, स्व-पर विवेक प्रकाशक है ।। 4 ।।
निज रस का वेदन होते ही, पुरुषार्थ ढले खुद अंतर में।
बाहर में कुछ न सुहाता है, उपयोग रमे खुद अंतर में ।। 5 ।।
विभु ! धन्य भाग्य दर्शन पाया, आनंद हृदय में छाया है।
अब नहीं विभावों की चिंता, निरपेक्ष परम ध्रुव ध्याया है ।। 6 ।।
मेरे स्वरूप में है ही नहीं, मैं तो हूँ ज्ञाता रूप सदा।
छोडूं न कभी निज रूप अरे, होता नाहिं पर रूप कदा ।। 7 ।।
जब दृष्टि ध्रुव पर आन टिकी, तब कैसे भव भरमाऊँगा।
निश्चय ही शीघ्र प्रभो ! तुम संग मैं भी सिद्धालय आऊँगा ।। 8 ।।
हे परमोपकारी ! तृप्त हुआ, कृतकृत्य हुआ मानो मुक्त हुआ।
है निर्विकल्प अद्वैत नमन, निज में निज से संतुष्ट हुआ ।। ९ ।।
खेद नहीं प्रतिकूल में, अनुकूल में नहिं मान हो।
तृप्त निज में ही रहूँ, उपयोग में उपयोग हो।। 10।।
ज्ञानमय आराधना, प्रतिक्षण सहज निष्काम हो।
प्रभु! आप सम आनंदमय, समता सु आठों याम हो ।। 11 ।।
निश्चिंत निज में ही रहूँ, निर्द्वन्द्व आनंदमय सदा ।
परभाव हों संयोग में, उनरूप नहीं होऊँ कदा।। 12।।
हूँ नित्य जाननहार प्रभु, अक्षुण्ण प्रभुतावान हूँ।
अनुभूति ज्ञानानन्दमय मैं सहज ही भगवान हूँ।। 13।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह