ज्ञानी माता-ज्ञानी पुत्र संवाद | Gyani Mata-Gyani Putra Samvad

माता-
सुखी रहो घर माँहि बेटा हठ तजो ।। 1 ।।

बेटा -
जागो उर वैराग्य माता मोह तजो ।। 2 ।।

माता -
समय खेलने का यह बेटा, क्या कुछ कमी दिखाय।
क्यों वन जावे धरे योग क्यों, मोकों व्यर्थ रुलाय ?
सुखी रहो घर माँहि, बेटा हठ तजो ।। 3 ।।

बेटा-
चिर तैं भ्रमते बहु दुःख पाये, अब यह अवसर आयो ।
आत्मबोध आनन्दमय पायो, और न कछू सुहायो ।।
जागो उर वैराग्य, माता मोह तजो ।। 4 ।।

माता-
कोमल तन है हीन सहंनन कैसे साधो योग।
कैसे चित्त लगेगा वन में, छोड़ मनोहर भोग ।।
सुखी रहो घर माँहि, बेटा हठ तजो ।। 5 ।।

बेटा -
घर तो कारागृह सम लागे, विषय हलाहल रूप।
अशरण भवसागर में दीखे, शरण शुद्ध चिद्रूप ।।
जागो उर वैराग्य, माता मोह तजो ।। 6 ।।

माता-
कौन सँभालेगा ये वैभव, पाले कौन कुटुम्ब ।
कौन को देख के धैर्य धरूँगी, कौन कहेगा अम्ब ।।
सुखी रहो घर माँहि, बेटा हठ तजो ।। 7 ।।

बेटा -
धूल समान जगत का वैभव, भासा सर्व असार ।
झूठी प्रभुता झूठी ममता, भव-भव में दुःखकार ।।
जागो उर वैराग्य, माता मोह तजो ।। 8 ।।

माता-
जग में आये हो तो देखो, जग के भी कुछ ठाठ।
जिससे फिर आकर्षण में फँस, होय न बारा-वाट ।।
सुखी रहो घर माँहि, बेटा हठ तजो ।। 9 ।।

बेटा -
अविनाशी सुखमय निज वैभव, निज पद ही है सार।
पाने योग्य स्वयं में पाया, आनन्द अपरम्पार ।।
जागो उर वैराग्य, माता मोह तजो ।। 10 ।।

माता-
योग मार्ग में घोर परीषह, अरु उपसर्ग सताय ।
नाना स्वाँग अरु ऋद्धि दिखाकर, देव कभी ललचाय ।।
सुखी रहो घर माँहि, बेटा हठ तजो ।। 11 ।।

बेटा-
निर्भय स्वयं सिद्ध शुद्धातम, भय नहीं दीखे कोय।
पूर्ण स्वयं में, तृप्त सहज ही, वांछा ही नहीं होय ।।
जागो उर वैराग्य, माता मोह तजो ।। 12 ।।

माता -
देख रही थी तेरी दृढ़ता, धनि तेरा वैराग्य।
जाओ सुख का यही मार्ग है, झूठा जग अनुराग ।।
ध्याओ आत्मस्वरूप, मैं भी कब दीक्षा धरूँ ।। 13 ।।

बेटा-
धन्य हुआ तुमसी माँ पाई, पायो आत्मस्वरूप।
आनन्दित हो वन को जाऊँ, धरूँ दिगम्बर रूप ।।
जागो उर वैराग्य, माता मोह तजो ।। 14 ।।

माता-
कौन है माता, कौन है बेटा, सब ही हैं भगवान।
नित्य निरंजन शुद्ध-बुद्ध प्रभु, निश्चय सिद्ध समान ।।
ध्याओ आत्मस्वरूप, मैं भी दीक्षा धरूँ ।। 15 ।।

बेटा -
रहूँ सहज निर्ग्रन्थ अकिञ्चन, ध्याऊँ आतमराम।
मोह नशाऊँ, कर्म भगाऊँ, पाऊँगा शिवधाम ।।
जागो उर वैराग्य, माता शिव लहूँ।। 16 ।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह