ज्ञान चिंतन एवं अज्ञान चिंतन | Gyan chintan evan agyan chintan

(हरिगीतिका)
हिंसा के पथ पर चल रहे, उपदेश भी उसका दहे।
नरक के एग्ज़ाम में, वे पास होते ही रहें।।
रुलन ऐसा वे करें, कि पाप को तज दूँगा मैं।
पर एक पण सुन तो जरा, कब नियम का पालन करें।।
समय तो है निज आत्मा, क्यों खोजता भिन्न पुद्गलों में।
फात्मा और आत्मा में अधोऽर्ध्व का यह फर्क है।।
जागृत करूँ मैं विवेक को, जागृत करूँ मैं विनम्रता को।
मुझे कोश की है कामना, मुझे कोष तो नहीं चाहिए।।
फात्मा को धर लिया अरु आत्मा को खा लिया।
पर द्रव्य में नहीं आत्मा है, आत्मा तो हूँ स्वयं।।
संसार का गुण तद् है, जो है क्रिया के रूप में।
विलोम करूँ इस क्रिया को, ताकि मैं आत्मा पा सकूँ।।

रचनाकार: मोक्षार्थी तन्मय जैन (Moksharthi Tanmay Jain), उदयपुर
Instagram: @TanmayJain627