आत्मन्! सोच तज झूठा, शरण कोई नहीं मुझको ।
जरूरत ही नहीं तुझको, स्वयं परिपूर्ण लख खुद को ।। टेक।।
निजी अस्तित्व से जीता, नहीं कोई नाश कर सकता ।
अहो ! वस्तुत्व शक्ति से, परिणमन भी स्वयं होता।।
तुझे चिन्ता पड़ी है क्या ? परणति ही करे खुद को ।।1।।
नहीं इहलोक - परलोक, नहीं है वेदना कोई |
अरक्षा और अगुप्ति, नहीं होवे कभी चोरी ।।
नहीं कुछ भी कदा होवे, सप्त भय है नहीं मुझको ।। 2 ।।
अहो! अक्षय तेरा वैभव, सहज सुख सिंधु लहरावे ।
नहीं कर्मादि, रागादिक, ज्ञान में ज्ञान ही आवे ।।
ज्ञानमय रूप ही तेरा, ज्ञान में भासता तुझको ।। 3 ।।
स्वयं ही तू प्रभु तेरा, तेरी महिमा है सर्वोत्तम ।
नहीं बनना, नहीं होना, सहज ही तू है लोकोत्तम।।
नहीं शंका, नहीं गुंजाइश, सहज सुखमय लखो खुद को।।4।।
तेरी मुक्ति नहीं पर में, चले युक्ति नहीं पर में ।
तेरा सर्वस्व स्व में ही, नहीं कुछ भी अरे पर में ।।
दैन्य वृत्ति तेरी झूठी, सदा ही प्रभु लखो खुद को ।। 5 ।।
तेरा गुरु है नहीं बाहर, अहो ! तू ही परम गुरु है |
अनादर क्यों करे निज का, निरवलम्बी परम प्रभु है ।।
सहज निरपेक्ष ध्रुव ज्ञायक, मात्र ज्ञायक समझ खुद को ।। 6 ।।
रचियता - आदरणीय बाल ब्रह्मचारी पंडित श्री रवीन्द्र जी आत्मन्
Source - सहज पाठ संग्रह