गुरूशिष्य चतुर्दशी | Gurushishya Chaturdashi
(दोहा)
कहूँ दिव्यध्वनि शिष्य मुनि, आयो गुरु के पास ।
पूज्य सुनहु इक बीनती, अचरज की अरदास ॥ १ ॥
आज अचंभौ मैं सुन्यो, एक नगर के बीच ।
राजा रिपु में छिप रह्यो, राज करें सब नीच ॥ २ ॥
नीच सु राज्य करै जहाँ, तहाँ भूप बलहीन ।
अपनो जोर चलै नहीं, उनही के आधीन ॥ ३ ॥
वे याकी मानें नहीं, यह वासों रसलीन ।
सत्तर कोड़ाकोड़िलों, बन्दीखाने दीन ॥ ४ ॥
बन्दीवान समान नृप, कर राख्यो उहि ठौर ।
वाको जोर चलें नहीं, उनही के सिरमौर ॥ ५ ॥
वे जो आज्ञा देत हैं, सोइ करें यह काम ।
आप न जानें भूप मैं, ऐसो है चित भ्राम ॥ ६ ॥
उनकी वेरीसों रचे, तजि निज नारि निधान ।
कहो स्वामि सो कौन वह, जिनको ऐसे ज्ञान ॥ ७ ॥
कौन देश, राजा कवन, को रिपु, को कुल नारि ।
को दासी कहु कृपा करि, याको भेद विचारि ॥ ८ ॥
गुरु बोले समकित बिना, कोऊ पावै नाहिं।
सबै रिद्धि इक ठौर है, काया नगरी माहिं ॥ ९ ॥
काया नगरी जीव नृप, अष्ट कर्म अति जोर।
भाव अज्ञान दासी रचे, पगे विषय की ओर ॥ १० ॥
विषय बुद्धि जहाँ है नहीं, तहाँ सुमति की चाह ।
जो सुमती सो कुल त्रिया, इहि याको निरवाह ॥ ११ ॥
आप पराये वश परे, आपा डास्यो खोय।
आपा आपु न जानही, कहो आपु क्यों होय ॥ १२ ॥
आप न जानें आप को, कौन बतावन हार।
तबहि शिष्य समकित लह्यो, जान्यो सबहि विचार ॥ १३ ॥
इहि गुरु शिष्य चतुर्दशी, सुनहु सबै मन लाय।
कहै दास भगवंत को, समता के घर आय ॥ १४ ॥
स्रोत — बृहद् आध्यात्मिक पाठ संग्रह · रचनाकार: भैया भगवतीदास जी
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