जीवन के वास्तविक पथ दर्शक होते हैं एकमात्र हमारे गुरु,
प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ना होता है उन्हीं से शुरू,
एकमात्र ध्येय गुरु का होता है हर शिष्य पढ़े और आगे बढ़े,
इसलिए तो भगवान् सीमंधर की वाणी सुनकर,
आचार्य कुंदकुंद अपना कल्याण कर गए,
ज्ञान के भंडार से परिपूर्ण वही गुरु शिक्षा देने में,
नहीं छोड़ते हैं कुछ कमी,
जिज्ञासु शिष्य वही होते हैं जो पढ़कर,
करते हैं अपनी आँखें नमी,
धन्य हैं वे गुरु जो सम्यक् प्रकार से जिनवाणी का,
रसास्वादन कराते हैं बारंबार,
समयसार जी जैसे महान् ग्रंथ का पूरा निचोड़ निकालकर बताया,
यह गुरुदेव श्री की महिमा है अपरंपार,
महान् व्यक्तित्व की धनी ऐसे गुरुदेव श्री जैसे गुरु मिले,
आत्मा का सार समयसार सुनकर,
मानो गुलाब की तरह सबके भाग्य खिल उठे,
वही थे शिवभूति मुनि जिनको न था णमोकार मंत्र का भी ज्ञान,
संसार असार जानकर तथा आत्मा को पहचान कर,
प्राप्त कर लिया केवल ज्ञान,
गुरुओं के मार्गदर्शन बिना जीवन तो है ही बेकार,
महाभाग्य से मिला है उनका समागम,
तो करो गुरुओं के लक्ष्य साकार,
माता-पिता ने पालन-पोषण करके बड़ा किया,
और गुरुओं ने आगे बढ़ाना सिखाया,
सभी गुरुओं का दर्जा रखना है जीवन में समान,
नहीं सहेंगे उनके प्रति किसी ने किया हुआ अपमान,
ज्ञानियों से मिलता है सम्यक् ज्ञान,
अगर है लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति का,
तो चलो गुरुओं के बताए मार्ग,
पर रखो उनका ऊँचा नाम और करो आदर भाव से उनका सम्मान ।।।।
रचनाकार: अबोली अभय जैन (Aboli abhay Jain), उदयपुर
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