गुरुदेव अए रे, बड़े ही सौभाग्य से ।
गूँज गया भारत सारा, ॐकार नाद से ॥ टेक ॥
शुभाचार धर्म बनकर, बैठा चुपचाप था।
शास्त्र ज्ञान में ही माना, मुक्ति का माप था॥
वीतरागी ज्ञान जागा, तेरे ही प्रताप से ॥1 ॥
कर्ता कर्म की भ्रांति, करती हैरान थी।
ज्ञाता स्वभाव से हूँ, दुनिया जनजान थी ॥
चेतन है जाननहारा, बतलाया शान से ॥2॥
लाए थे संग में गुरुवर, सीमंधर देशना ।
चेतन रस झरती वाणी, हरती मन वेदना ॥
महाशक्तिशाली आतम, दर्शाते चाव से ॥3 ॥
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन