मुझ वारिद के तुम पवन हो,
मुझ पतझड़ के तुम चमन हो,
एकांत में करूँ ऐसे मनन हो,
अवगाहन दाता मेरे गगन हो।
मन में रहते तुम अमन हो,
स्वरूप झलके तुम वो दर्पण हो,
बिगड़ी बनाते तुम वो करण हो,
शत-शत बार करूँ ऐसे तुम नमन हो।
नाव के खिवैया तुम मेरे तारण-तरण हो,
मस्ती में झूमूँ जिसमें तुम वो भजन हो,
हर क्षण साथ रहते मेरे तुम लखन हो,
शब्द कम पड़ने लगें ऐसे तुम कथन हो।
कभी पूर्ण न हो सके वो अद्भुत वर्णन हो,
बैठक मेरी हर पल जिसमें ऐसे तुम सदन हो,
अज्ञान तम को हरने वाली पहली किरण हो,
मस्तक झुके चरणों में जिनके मेरा वो वंदन हो।
शीश पर जो सजे तुम मेरे चंदन हो,
उज्ज्वल है काया अनमोल तुम रतन हो,
इन नैनों को चैन नहीं जब तक न मिलन हो,
और कुछ भी न जानूँ बस तुम्हीं मेरी शरण हो।
मुझ वारिद के तुम पवन हो…
रचनाकार: अंशिका जैन (Anshika Jain), जयपुर
Instagram: @Jain__anshika03