गुरुवर मेरे उर में आओ, ऐसे आओ कभी न जाओ।
भेदज्ञान की ज्योति जगाओ, मोह अंधेरा दूर भगाओ॥
सम्यक् वस्तु स्वरूप दिखाओ, हाथ पकड़ कर मुझे उठाओ॥टेक॥
मिथ्या जगत् प्रपंचों से गुरु, मेरा चित घबराया है।
यहाँ धूल में शूल छिपे हैं, शरण न कोई दिखाया है॥
शरणागत हूँ अहो मुनीश्वर, सम्यक् शिवपथ दरशाओ॥1॥
भूल आपको पर ममता में, व्यर्थ गुरो ! मैं भरमाया।
अपने को बंधन में डाला, पर का कुछ नहीं कर पाया॥
पर तो पर ही निज नहीं होवे, आत्म-साधना मुझे सिखाओ॥2॥
सुख के भ्रम से भव भोगों में फँसकर, दुख ही दुख पाया।
गुरु गम्भीर गिरा सुनकर, सुख सागर अंतर दर्शाया॥
हुई विरक्ति संयम देकर, जीवन मेरा सफल बनाओ॥3॥
सहज सदा ही समता वर्ते, हो प्रसन्नता अंतर में।
आधि-व्याधि-उपाधि रहित, हो सहज लीनता अंतर में॥
यही चाह है यही राह है, अंतर में उपयोग रमाओ॥4॥
अब तो विरह सहा नहीं जाता, अभिलाषा है दर्शन की।
सेवा को तो हाथ तरसते, चाह चरण स्पर्शन की॥
दोषों का शुभ प्रायश्चित दे, मुझको अब निर्दोष बनाओ॥5॥
ज्ञेयों से निरपेक्ष ज्ञानमय, सहज सतत ही अनुभव हो।
निर्विकल्प निर्द्वन्द्व निराकुल, परम शान्तिमय जीवन हो॥
गुरु चरणों में शीस नवाऊँ, मंगल आशिष वर्षाओ॥6॥
भला बुरा जैसा भी मैं हूँ, शिष्य आपका कहलाता।
मेरे दोषों से खेद अरे ! अपवाद आपका भी होता॥
हो प्रभावना मंगलकारी, ऐसा लायक मुझे बनाओ॥7॥
प्रथम भूमिका में हे गुरुवर, सहजपने अवलम्बन दो।
मेरा भी पुरुषार्थ जगे यों, निज में निज अवलम्बन हो॥
स्वाश्रय से ही शिव पद पाऊँ, मेरे तारण हार कहाओ॥8॥
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह