गुरु-प्रसाद से ही ज्ञान-प्राप्ति
-प्रो. वीरसागर जैन
‘पद्मनंदी-पंचविंशतिका’ में कहा गया है कि- ‘गुरोरेव प्रसादेन लभ्यते ज्ञानलोचनम्।’ अर्थात् गुरु के प्रसाद (प्रसन्नता) से ही ज्ञाननेत्र प्राप्त होता है । यह बात बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण प्रतीत होती है, क्योंकि ऐसी बात अन्यत्र भी अनेक स्थानों पर आई है, जहाँ बहुत जोर देकर कहा गया है कि गुरु के प्रसाद से ही ज्ञान प्राप्त होता है, अन्यथा कथमपि ज्ञान प्राप्त नहीं होता है।
यद्यपि ज्ञान-प्राप्ति के तीन साधन बताए गए हैं- देव, शास्त्र और गुरु, परन्तु उक्त सूक्ति में ‘एव’ पद का प्रयोग करके ऐसा कह दिया गया है कि मात्र गुरु के प्रसाद से ही ज्ञान की प्राप्ति होती है, अन्य कोई उपाय नहीं है । देव एवं शास्त्र की बात छोड़ दी गई है, उसका कारण यह है कि उन्हें यहाँ गौण कर दिया गया है, क्योंकि देव एक तो वर्तमान में उपलब्ध नहीं हैं, दूसरे वीतराग होते हैं । इसी प्रकार शास्त्र भी निर्जीव होते हैं, वे बोलते हुए भी एक प्रकार से कुछ नहीं बोलते हैं । गुरु ही मात्र ऐसे हैं जो वर्तमान में उपलब्ध भी होते हैं और किंचित् रागी भी होते हैं, अत: वे हमारी ज्ञान-साधना में विशेष योगदान कर सकते हैं ।
किन्तु विचारणीय बिन्दु यह है कि आखिर उनसे ज्ञान-प्राप्ति कैसे होती है । उक्त सूक्ति में इसी का उत्तर देते हुए बताया गया है कि ज्ञान-प्राप्ति गुरु के प्रसाद से ही होती है । यही बात यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य है ।
गुरु के प्रसाद का अर्थ होता है- गुरु की प्रसन्नता । आचार्य पद्मनंदी कहना चाहते हैं कि ज्ञान एक ऐसी ही वस्तु है कि उसे केवल गुरु को प्रसन्न करके ही प्राप्त किया जा सकता है, अन्य किसी उपाय से नहीं प्राप्त किया जा सकता, किसी बड़े हथियार आदि के बल से भी नहीं । दुनिया की अन्य सभी वस्तुएँ तो धन आदि से प्राप्त की जा सकती हैं, किन्तु ज्ञान तो गुरु को प्रसन्न करके ही प्राप्त किया जा सकता है । जिसप्रकार गाय से दूध प्यार से ही प्राप्त किया जा सकता है, उसे मार-पीटकर नहीं । मारने-पीटने से तो बल्कि वह रहा-सहा दूध भी ऊपर चढ़ जाएगा । उसी प्रकार गुरु को प्रसन्न करके ही ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है, जबरदस्ती नहीं । चाहे कोई बहुत बड़ा डाकू-लुटेरा भी हो तो वह बंदूक दिखाकर भी गुरु से ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता । बंदूक दिखाने से तो बल्कि रहा-सहा ज्ञान भी ऊपर चढ़ जाएगा । बंदूक से वह गुरु को मार तो सकता है, पर उनसे ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता | इसलिए ज्ञान प्राप्त करने का एक मात्र उपाय यही है कि उन्हें येन-केन प्रकारेण प्रसन्न किया जाए |
ज्ञान कहीं खेत में भी नहीं उगता है कि उसे वहाँ उगाकर प्राप्त किया जा सके । ज्ञान कहीं जमीन में भी नहीं मिलता है कि उसे खोदकर निकाला जा सके । ज्ञान किसी रसोई में भी नहीं बनाया जा सकता है कि उसे वहाँ तैयार किया जा सके । ज्ञान कहीं बाजार में भी नहीं बिकता है कि उसे वहाँ से खरीदा जा सके । ज्ञान तो उसके धारक पुरुष अर्थात् गुरु के पास जाकर ही उसे प्रसन्न करके ही विनयपूर्वक प्राप्त किया जा सकता है । यही एक मात्र उपाय है । अन्य कोई उपाय विश्व में नहीं है ।
जिस प्रकार धन की प्राप्ति किसी सेठ या राजा आदि धनवान को प्रसन्न करके ही हो सकती है, किसी निर्धन से नहीं, उसी प्रकार ज्ञान की प्राप्ति किसी ज्ञानवान गुरु को प्रसन्न करके ही हो सकती है ।
तथा धन की प्राप्ति तो फिर भी चोरी करने या लूट लेने आदि के जबरदस्ती के तरीकों से भी हो सकती है, पर ज्ञान की प्राप्ति तो चोरी, लूट आदि के जबरदस्ती के तरीकों से भी नहीं हो सकती है । उसके लिए तो गुरु को प्रसन्न करना ही एक मात्र उपाय है । अन्य कोई उपाय विश्व में नहीं है ।
अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि आखिर गुरु को प्रसन्न कैसे किया जाए ?
इस प्रश्न का ठीक से उत्तर लिखना कठिन है, परन्तु प्रत्येक ज्ञानार्थी व्यक्ति को इस विषय पर गंभीरता से चिंतन-मनन करना चाहिए । इससे उसे अवश्य उत्तर प्राप्त होगा ।
बहुत-से लोग समझते हैं कि धन आदि देने से गुरु को प्रसन्न किया जा सकता है, परन्तु यह उनकी बड़ी भूल है । सच्चा गुरु धन आदि देने से प्रसन्न नहीं होता है । बहुत-से लोग समझते हैं कि उनका शॉल, माला आदि से अभिनंदन-सम्मान करने से, उनकी जय बोलने से उनको प्रसन्न किया जा सकता है, परन्तु यह भी उनकी बड़ी भूल है । सच्चा गुरु इनसे भी प्रसन्न नहीं होता है । बहुत-से लोग समझते हैं कि उनके पैर दबाने, मालिश करने आदि से उनको प्रसन्न किया जा सकता है, परन्तु यह भी उनकी भूल ही है । सच्चा गुरु इन कार्यों से भी प्रसन्न नहीं होता है ।
तो फिर विचारणीय है कि आखिर गुरु किससे प्रसन्न होते हैं ? यही बहुत महत्त्वपूर्ण बात है, जो प्रायः लोग नहीं समझ पाते हैं । प्रथम तो लोग ‘गुरु से ज्ञान मिलता है’ -यह नहीं समझ पाते हैं और कदाचित् यह समझ में आए आ जाए तो ‘उनको प्रसन्न कैसे किया जाता है’ -यह नहीं समझ पाते हैं । इसीलिए उन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो पाती ।
ध्यान रहे यहाँ जिसे ‘ज्ञान’ और ‘गुरु’ कहा जा रहा है वह सब आध्यात्मिक बात है, साधारण लौकिक नहीं । लौकिक ज्ञान और उसे देनेवाले शिक्षक कदाचित् धन आदि से प्रसन्न होते होंगे । परन्तु यहाँ जिस गुरु की बात है वह वीतराग होता है, उसे सांसारिक प्रलोभनों से प्रसन्न नहीं किया जा सकता । उसे तो वास्तव में सच्ची जिज्ञासा, विनम्रता या कहिए पात्रता से ही प्रसन्न किया जा सकता है । लौकिक ज्ञान और उसे देनेवाले शिक्षक भी - मैं समझता हूँ कि - सांसारिक प्रलोभनों से प्रसन्न नहीं होते, छात्र की जिज्ञासा, विनम्रता या पात्रता से ही प्रसन्न होते हैं, परन्तु कदाचित् वे तो फिर भी धन-मान आदि से प्रसन्न हो जाएं, परन्तु आत्मसाधक या आध्यात्मिक गुरु इनसे कथमपि प्रसन्न नहीं होते, वे तो शिष्य की सच्ची जिज्ञासा, विनम्रता या पात्रता से ही प्रसन्न होते हैं । अतः यदि हमें उनसे ज्ञान प्राप्त करना है तो अपने अंदर सच्ची जिज्ञासा, विनम्रता या पात्रता उत्पन्न करनी होगी, अन्य कोई उपाय नहीं है ।
जो लोग सच्चे जिज्ञासु या पात्र नहीं हैं, ऐसे ही समय पास कर रहे हैं, प्रमादी हैं, निरुत्साही हैं; गुरु उनको ज्ञान नहीं दे पाते हैं । गुरु को शिष्य की जिज्ञासा या पात्रता उसके व्यवहार से शीघ्र पकड़ में आ जाती है । सच्चा जिज्ञासु या सुपात्र शिष्य आसानी से गुरु की पकड़ में आ जाता है । ज्ञानी गुरु उन पर ज्ञान की मूसलाधार वर्षा करते हैं ।