गुणावली सिद्धों की (बाबू युगल जी) | Gunavali Siddhon Ki (Babu Yugal Ji)

श्री सिद्धचक्र मण्डल विधान के अवसर पर पूजन करते हुये अध्यात्म प्रवक्ता बाबू ‘युगल’ जी कोटा अष्टान्हिका महापर्व आषाढ़ मास जुलाई 1976 कोटा

गुणावली सिद्धों की…

कविवर पण्डित संतलालजी कृत
श्री सिद्धचक्र विधान :
जयमाल अर्थ - बाबू ‘युगल’ जी द्वारा

लेखक
‘युगल’ जैन एम.ए., साहित्यरत्न
कोटा

सम्पादन
ब्र. नीलिमा जैन
कोटा

प्रकाशक
आचार्य कुन्दकुन्द फाउण्डेशन
कोटा
मो. 94141-81512

प्रथम संस्करण : 1100 प्रतियाँ (15 दिसम्बर 2024)
श्रद्धेय पूज्य बाबूजी ‘युगल’ जी, कोटा जन्म शताब्दी वर्ष के अन्तर्गत 1924-2024

मूल्य : स्वाध्याय

निजलीन परम-स्वाधीन बसो,
प्रभु! तुम सुरम्य शिवनगरी में।
प्रतिपल बरसात गगन से हो,
रसपान करो शिव-गगरी में।।
ये सुर-तरुओं के फल साक्षी,
यह भवसंतति का अंतिम क्षण।
प्रभु ! मेरे मंडप में आओ,
है आज मुक्ति का उद्घाटन।।

  • ‘युगल’

प्राप्ति स्थान -
:diamond_suit: आचार्य कुन्दकुन्द फाउण्डेशन
85, चैतन्य विहार, आर्य समाज की गली,
रामपुरा, कोटा (राज.) 324006
मो. 94141-81512 (चिन्मय जैन)

मुद्रक : देशना कम्प्यूटर्स
मो. 9928517346

वंदित्तु सव्वसिद्धे…

‘तीन लोक चूड़ामणि’, शिव ईश, सिद्ध भगवन्त ‘उत्तान धवल छत्र’ के सदृश नाना मणिरत्नों से जड़ित ‘ईषत प्राग्भार पृथ्वी’ (सिद्ध शिला) से 7050 धनुष ऊपर जाकर, ‘तनुवातवलय’ (लोक का अंत) में एक में अनंत विराजित हैं - जो निरन्तर अपनी चैतन्य गगरी से बरसने वाले चिरंतन सौख्य का रसपान किया करते हैं ऐसे गुणाधिपति ‘सिद्धेश’ का यशोगान करने वाला विशालकाय काव्य ‘श्री सिद्धचक्र मण्डल विधान’ जैन जगत के हिन्दी पूजन, विधान साहित्य का अध्यात्म व भक्ति से अलंकृत एक ऐसा अक्षय वैभव है, जिसको पाकर संपूर्ण विश्व उपकृत हुआ है, और सच कहें, इसका मूल्यांकन अन्य रचनाओं से करना, अशक्य अनुष्ठानवत्, महासागर को अंजुली में भर लेने जैसी बालवत् चेष्टा ही होगी।

आत्मदृष्टा कुशल काव्यकार पंडित संतलालजी सा. द्वारा रचित कालजयी रचना ‘श्री सिद्धचक्र विधान’ की तत्त्वज्ञान से तरंगित सरिता में निखिल दिगंबर जैन समुदाय स्नान करता हुआ आ रहा है एवं इसे अपनी अनंत श्रद्धा समर्पित कर गौरवान्वित भी है, क्यों ? इसके पीछे एक सत्य तथ्य यह है कि विधान के शुभ सुकाल में परिणाम भूमि अत्यन्त कोमल हो जाने से, सिद्ध परमात्मा की गुणावली द्वारा, उनके अन्तस् की आनंदानुभूतियों को हम अपने अल्प श्रुतज्ञान में ज्यों का त्यों प्रतिबिंबित कर लेते हैं, ऐसी अद्भुत सामर्थ्य से भरपूर यह सिद्धों का चक्र है।

संत कविराज का जन्म सन् 1834 में एवं देहावसान सन् 1886 में हुआ मात्र 52 वर्ष की आयु के मध्य ही आपने इस उत्कृष्ट, मोह निवारक काव्य की रचना की है यह सिद्धहस्त विधान ब्रजभाषा से मण्डित, आठ पूजाओं में विभक्त तथा 2024 छन्दों में निबद्ध है, प्रत्येक पूजा में छन्द संख्या द्विगुणित एवं संभवतः 44 प्रकार के विभिन्न रसमयी छन्द, अपनी विशिष्ट चाल में चित्रवत् चल रहे हैं - इन छन्दों के पठन से लगता है कि वे छन्द शास्त्र के भी विशेष ज्ञाता थे, इसमें उनके कवित्व की निपुणता सशक्त भाषा व भावों का ऊर्ध्व प्रवाह व उपमा, यमक, रूपक, अनुप्रास आदि अलंकार बड़ी सजीवता के साथ स्फुरित हुए हैं।

एक ओर मार्मिक पहलू - कि उन्होंने बड़ी ही सहजता व स्वाभाविक वेश में सिद्ध प्रभु के गुणों की अभिनव अभिव्यक्ति की है, लगता है मानो इस महाकाव्य के प्रणयन काल में उनके स्वच्छ ज्ञान दर्पण में, अनंत सिद्ध झलक रहे हों या सीधा वार्तालाप कर रहे हों और स्वतः ही पौद्गलिक शब्द वर्गणा निःसृत हो उन्हें बारंबार नमन कर मुदित हो रही हो।

सचमुच सिद्ध विधान के द्रव्यपक्ष की कोमल धरा पर जैन सिद्धान्तों का भावात्मक पक्ष भी अपने परिशुद्ध स्वरूप में प्रगट हुआ है दोनों एक-दूसरे के पूरक बन समानरूप से गतिमान हो रहे हैं। एक महत्त्वपूर्ण बात यह कि छन्दों की बहुलता में भी पढ़ते-पढ़ते पाठक का मन विराम नहीं पाता, बल्कि अविराम इस शीतल धारा में डूबता चला जाता है उसे ऐसा बलिष्ट मानसिक आहार मिल जाता है कि अनंत भविष्य में भी उसकी प्रसन्नता का अंत नहीं होता, वह हँसता ही चला जाता है।

सच - दि. संस्कृति के इतिहास में यह ‘स्वर्णमयी शिला लेख पट्ट’ चिर काल तक जीवंत रहेगा, जीवंत रहेगा।

सिद्ध भगवन्तों के अनन्य उपासक, भाववाही ‘सिद्ध पूजन’ के प्रणेता, पूज्य बाबू ‘युगलजी’ को यह विधानराज सदैव अति ही प्रिय रहा है, अतः किसी मंगल घड़ी में उन्हें इसके रसास्वादन का सहज ही प्रशस्त विकल्प खड़ा हो गया, फलस्वरूप कोटा नगरी में सन् 1976 आषाढ़ मास में अष्टान्हिका पर्व पर विशाल स्तरीय ‘महा विधान सिद्धचक्र’ का पावन अनुष्ठान रचा गया, आठ दिवसीय पूजा के विधि पूर्वक संचालन में प्रमुख नायक व गायक के रूप में पू. बाबूजी विराजित रहे और संगीत के वाद्य यंत्रों की नास्ति पूर्वक एवं विधान की अर्घ्यावली के क्रम में अपनी एक निराली छटा के साथ सम्पन्न हुआ यह दृश्य देख ऐसा लगता था - मानो पू. बाबूजी के चित्तभूमि की परम विशुद्धि से उनके भावश्रुत की वेदी में अनंत सिद्ध प्रतिष्ठित हो गये हैं या फिर उछलते पौरुष में साक्षात्कार का विलक्षण क्षण था वह।

‘सिद्ध चक्र पूजन’ की अजस्र धारा में सिद्ध ध्वनियाँ ही ध्वनित होती रहीं और इसकी अष्ट जयमाल के गंभीर अर्थ, इसमें वर्णित विषय के अनुरूप पू. बाबूजी द्वारा सायंकाल के प्रवचन में लिये गये, सच गांभीर्यता के लिए क्या

कहें ? स्थान-स्थान पर लघु दृष्टान्त, रूपक, यमक, श्लेष्म आदि अलंकारों के बीच से उन जटिल भावों को खींच पाना एक बलिष्ठ ज्ञानधर साहित्यकार को ही संभव है। गूढ़ छन्दों का सुन्दर प्रांजल, सटीक, मनोहर, विश्लेषण कर, संक्षिप्त में श्रोताओं को लिपिबद्ध करवाने का अपूर्व कार्य किया और महा सौभाग्य से यह अमर परिशीलन हमारे हाथों में आ गया।

सचमुच, इस गहन विधान सिन्धु की जयमाल के कुछ दुरुह छन्दों की सम्यक् भावानुरूप व्याख्या तो श्रोताओं, सुधीजनों व विद्वानों के भी ज्ञान के अगम्य सी थी, जिन्हें पूज्य बाबूजी कौतूहली वेश में पूछ लिया करते थे, लेकिन ज्ञान की काफी कसरत भी अर्थ खोजने में असमर्थ रही, इसका लघु अंश आपके समक्ष रखती हूँ।

षष्ठम जयमाल, प्रथम छन्द (दोहा)

थावर शब्द विषय धरै, त्रस थावर पर्याय।
यों न होय तो तुम सुगुण, हम किह विधि वर्णाय।।1।।

ऐसे ही अनेक छन्दों में मनरंजन के साथ अर्थ सींचाई हुआ करती थी। निस्पृहमना पूज्य बाबूजी को प्रारंभ से ही अपने गद्य-पद्य साहित्य प्रकाशन के प्रति अरुचि ही बनी रही, अति आग्रह पर भी वे सदा मौन साधक का रूप धारण करते रहे - समय तो बीतता ही चला गया, परन्तु सिद्धिप्रदाता इस सिद्धचक्र जयमाल के भावपूर्ण व सुस्पष्ट अर्थ का अनमोल अवशेष मेरे (पुत्री ब्र. नीलिमा) पास शेष था, सच! इसका अवलोकन व संकलन कर, हृदय सिद्ध प्रभु की झंकारों से झंकृत हो उठा, अतः दीर्घ काल से छिपी यह निधि स्वतः अपने कालक्रम में सिद्धत्व की प्रकाश रश्मियाँ बिखेरती हुईं उदित हो रही हैं, आशा है विधान रसिक बन्धुवर्ग इसकी तलहटी में ‘स्व सिद्धात्म’ का अवश्य दर्शन करेंगे।

इस पुनीत कार्य को अध्यात्मप्रवक्ता पण्डित देवेन्द्रकुमारजी बिजोलियां ने अपने मार्गदर्शन द्वारा शीघ्रता से सम्पन्न करवाया, अतः हम उनके अत्यन्त आभारी हैं। हमारे जीवन में लौकिक वांछा विहीन यह विधान सिद्धचक्र अनंत सिद्धों के सुखद संवेदन की मधुर गुनगुनाहट बन जावें, भविजन ऐसा विश्वास जागृत करें।

इस अनूँठे संकलन के प्रारंभ में पूज्य बाबूजी द्वारा लिखित सुगठित लेख ‘पूजन एवं विधान एक लोकोत्तर अनुष्ठान’ भी संकलित किया गया है, जिसमें दिगंबर जैन परम्परा व आगम के आलोक में त्रिरत्न वीतरागी देव, शास्त्र, गुरु का परम सत्य स्वरूप, उनकी अपूर्व महिमा, जैन श्रावक के षट्कर्म, प्रक्षाल पूजन व विधान की यथोक्त विधि एवं पूजा के आठ द्रव्यों का सम्मान कर उनकी उपयोगिता और आवश्यकता का बड़ा ही सुन्दर तार्किक शैली में मनोवैज्ञानिक विवेचन किया है, जो जैन श्रावक के अवश्य पठनीय, चिंतनीय एवं अनुकरणीय है।

वे लिखते हैं - ‘‘जैन श्रावक को षट् कर्म जीवन में पापाचार व भयंकर दुर्वासना से बचाने के लिए ‘सुधा संजीवनीवत् है’ इसके बिना वह प्राण विहीन काया के समान है।’’ ‘‘श्रावक का जीवन अंतरंग व बहिरंग पवित्र भावना से अनुरंजित होता है।’’ ‘‘पूजन एक ऐसा सहज मधुर धाार्मिक कर्म है, जिसमें संपूर्ण तत्त्वज्ञान भक्ति के संगीत में घुलकर मधुर आस्वाद लेता है। जहाँ तत्त्वज्ञान में मस्तिष्क की प्रधानता होती है, वहीं पूजन में हृदय मुख्य होता है।’’

‘सिद्धवंशी’ पू. बाबू युगलजी के पावन जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर उनके स्मरणार्थ हमारा समग्र उज्ज्वल धवल परिवार धवल धरा के अधिपति सिद्धीश्वरों के चरणों में यह प्रकाशपुंज ‘गुणावली सिद्धों की’ असीम श्रद्धापूर्वक समर्पित कर रहा है। सचमुच इसके छनकते छन्द सिद्धत्त्व के प्रतिछन्द बन आद्योपांत सिद्ध की धुरी पर चक्र लगाते हुए, ध्रुव, अचल और अनुपम दशा की ओर प्रयाण की प्रेरणा दे रहे हैं, ऐसा यह जयमाल ‘अर्थ संग्रह’ हमारे मधुर जीवन का सुरभित पुष्पहार बन जावे।

ऐसी अगणित भावभरी रत्नमयी अर्घावली ‘सिद्धचक्ररत्न’ को अर्पित करती हूँ - ‘‘प्रभो मेरे मंडप में आओ, है आज मुक्ति का उद्घाटन’

सिद्धों की छांव में -
15 दिसम्बर 2024 - ब्र. नीलिमा जैन, कोटा

पोस्ट:
लोकोत्तर अनुष्ठान - पूजन एवं विधान
सिद्धचक्र विधान की जयमाल के अर्थ

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लोकोत्तर अनुष्ठान - पूजन एवं विधान

- बाबू जुगलकिशोर जैन ‘युगल’, कोटा (राज.)

दिगंबर जैन संस्कृति पुरातन पुरुष त्रैलोक्य पूज्य तीर्थंकर परमात्मा पर आधारित अत्यन्त गरिमामय संस्कृति है, जिसके अंचल में प्रत्येक व्यक्ति जीवन के स्वच्छ पटल पर आत्म-विद्या के सुरभित संस्कारों का बीजारोपण कर, सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् का मंगलकारी पथ प्रशस्त करता है।

जैन कुल में प्रसूत एक नन्हा बालक जब जैन जिनालय या शिक्षालय में प्रवेश करता है तो तभी से उसे जैनत्व का पाठ पढ़ाकर उसकी सुरक्षा के लिए कुछ नियमों में प्रतिबद्ध कर दिया जाता है, जिससे वह अपने लौकिक व पारलौकिक जीवन का सहजता, सरलता व शांतिपूर्वक संचालन कर सके एवं निर्दोष, सुखी व सदाचारी जीवन का हर कदम पर निर्वाह हो सके। आर्ष मार्ग तथा जैनागम में इन्हें जैन श्रावक के ‘षट्-कर्म’ संज्ञा से उल्लेखित किया है।

श्रावक का स्वरूप - श्रमण संस्कृति अर्थात् वीतरागता और उससे सम्बन्धित विचार तथा आचार पर विश्वास रखने वाला प्राणी श्रावक कहलाता है, वह चाहे मनुष्य हो अथवा तिर्यंच।

वैसे श्रावक शब्द का प्रयोग प्रायः जैन कुलोत्पन्न व्यक्ति के लिये रूढ़ हो गया है किन्तु वास्तव में जैन कुल में उत्पन्न प्रत्येक व्यक्ति को श्रावक नहीं कहा जा सकता किन्तु जैनेतर कुलोत्पन्न उस प्राणी को भी श्रावक कह सकते हैं, जो जैन विचार और आचार में विश्वास रखता हो। वैसे श्रावक शब्द एक जाति विशेष के लिये भी प्रयुक्त होता है, किन्तु यहाँ वह भी इष्ट नहीं है।

जिन अर्थात् विजेता। अज्ञान आदि आत्म विकारों पर विजय पाने वाला। उनके द्वारा प्रतिपादित तत्त्वों को जीवन में साकार करने वाला ही जैन श्रावक हो सकता है। श्रावक के लिये यह आवश्यक है कि उसका अंतरंग और बहिरंग जीवन क्षमा, शौच तथा त्याग आदि की पवित्र भावनाओं से अनुरंजित हो। श्रावक नाम का प्राणी मुक्ति का पथिक होता है, अतः मुक्ति विरोधी दुर्वासनाएँ अथवा हिंसा असत्य आदि की महापापमय भावनाएँ उसके हृदय को स्पर्श नहीं करतीं।

इस युग में हम श्रावक संज्ञक प्राणी को अनेक दुर्वासनाओं से अविष्ट तथा उसके लोक-जीवन को अन्याय, अनैतिकता तथा अनाचार का केन्द्र पाते हैं, वह वास्तव में श्रावक शब्द की बड़ी भारी अवज्ञा है, वहाँ तो धर्म के उदय की भी सम्भावना नहीं है। अनेक प्रकार के गर्हित आचार-विचार से मुक्त करके प्राणी की हृदय भूमि को कोमल बनाने के लिये, ऐसी कोमल! कि उसमें धर्म का बीजारोपण किया जा सके, इसलिए श्रावक के षट कर्मों की आवश्यकता है।

इनके द्वारा श्रमण चर्या के प्रति आस्था जागृत होती है और उसे जीवन में साकार करने के लिए पवित्र प्रेरणाएँ भी मिलती हैं एक बात और भी है कि सांसारिक प्राणी जीवन के अधिक क्षणों में जगत के पापमय वातावरण के सम्पर्क में रहता है, अतः ऐसे प्राणी को, कि जिसका हृदय पाप की प्रवृत्तियों से अत्यन्त कलुषित और कठोर बन गया है, उसे पवित्र और कोमल बनाने के लिए तथा उसे धर्म के आँगन में लाने के लिये, इन षट कर्मों का बड़ा भारी महत्त्व है जैसे हमारे स्थूल लौकिक जीवन के लिये हवा-पानी और अन्न आवश्यक होते हैं, उसी प्रकार प्राणी को मानसिक खाद्य देने के लिये षट् कर्मों की महती आवश्यकता है।

भयंकर पापाचारों से जिसका मन नष्ट प्रायः हो चुका हो, भले ही ऐसा प्राणी भौतिक उपलब्धियों से समृद्ध हो, ऐसे प्राणी को संजीवन देने के लिए षट कर्म अमृत का कार्य करते हैं। जैसे स्थूल भौतिक जीवन की सफलता के लिए आहार, विहार, आजीविका आदि अपेक्षित होते हैं, उसी प्रकार प्राणी के अंतरंग जीवन को सुरक्षित रखने के लिए षट् कर्म सर्वोत्कृष्ट उपादान हैं।

षट्कर्म :- देवपूजा, गुरु-उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान। ये षटकर्म श्रावक के जीवन की पवित्रता और उज्ज्वलता के लिये नित्य करणीय हैं, अतएव इन्हें श्रावक के छह आवश्यक भी कहते हैं; इनके बिना प्राणी प्राण विहीन काया के समान होता है।

देव पूजा :- देव उस पुरुष को कहते हैं जो साधारण लोक मानव के स्तर से ऊँचा उठ गया हो और जिसका जीवन आदर्शों का अनुशीलन करके लोक का सामान्य प्राणी देवत्व को प्राप्त कर सके। अतः देव निर्दोष होना चाहिए वह कुछ ऐसा भी न हो जो नितान्त अगम और अगोचर हो कि जिसके स्वरूप का पता भी न चल सके; क्योंकि ऐसा देव हमारे लिये किसी प्रयोजन की वस्तु नहीं बन सकता। हाँ, वह केवल हमारे आश्चर्य का विषय ही हो सकता है।

देव की एक विशेषता यह भी होनी चाहिए कि वह सम्पूर्ण जगत के रहस्यों को एक ही क्षण में साक्षात् कर लेने वाला हो अर्थात् उसका ज्ञान विकास के चरम बिन्दु को पहुँच चुका हो जिसे दर्शनकार कैवल्य अथवा सर्वज्ञता भी कहते हैं। उसके साथ यह भी अपेक्षित है कि उस देव की वाणी जगत के अंतरंग और बहिरंग रहस्यों का जगत के समक्ष उद्घाटन कर सके, जिससे भ्रान्त जगत सत्य का अनुसंधान करके अपना जीवन पथ प्राप्त कर सके। उसकी वाणी से आगम अर्थात् सत्साहित्य की एक ऐसी धारा की सृष्टि हो कि अनवधि काल तक मोह तमिस्रा में खोये प्राणी को प्रकाश स्तम्भ के समान आलोक देती रहे। (कारण कि भगवान अरहन्त की तरह जिनवाणी भी समान वन्दनीय एवं पूजनीय है; क्योंकि भगवान जिनेन्द्र के निमित्त से मोक्षमार्ग के जिस प्रयोजन की सिद्धि होती है उसी मोक्षमार्ग की सिद्धि जिनवाणी से भी होती है।)

दिगम्बर गुरु - अरहन्त देव एवं जिनवाणी के सदृश भगवान अरहन्त द्वारा उपदिष्ट अंतर-बाह्य चारित्र का पालन करने वाले नग्न दिगम्बर वीतराग मुनिराज भी समानरूप से वन्दन एवं पूजा करने योग्य हैं; क्योंकि राग अत्यन्त हीन हो जाने से दिगम्बर मुनिराज रत्नत्रय की प्रचुरता से सुशोभित होते हैं। संयम के लिये पिच्छी एवं शुद्धि के लिये कमण्डल हो, इसके अलावा मुनि के पास कोई बाह्य परिग्रह नहीं होता। दिगम्बर साधु सिंह की तरह वनवासी एवं वनविहारी होते हैं घोर उपसर्ग एवं परिषहों में भी अंतर-बाह्य चारित्र से विचलित नहीं होते। तीन कषाय के अभाव में अंतरंग शुद्धिरूप आनन्ददशा तथा बाहर परम-विशुद्ध परिणामपूर्वक अट्ठाईस मूलगुण एवं तेरह प्रकार के चारित्र मुनिराज का लक्षण होता है मुनिराज का यह स्वरूप त्रैकालिक है; विदेहक्षेत्र अथवा भरतक्षेत्र आदि देश तथा चतुर्थकाल अथवा पंचमकाल आदि के कारण मुनिराज के स्वरूप में कभी अंतर नहीं आता।

पूजा के अंग :-

पूजा के तीन अंग होते हैं पूज्य, पूजक और पूजा।

पूज्य - पूज्य वही देव हो सकता है जो निर्दोष हो अर्थात् वीतराग हो तथा सर्वज्ञ और हितोपदेशी हो।

पूजक - ऐसे देव का पूजक भी देव जैसा होता है देव वीतरागी सर्वज्ञ होते हैं तो इसे वीतरागता और सर्वज्ञता प्रिय होती है। मुक्ति के बाधक तत्त्व मोह और राग इसको आदरणीय नहीं होते और इसकी पूजा का प्रयोजन भी मोह और राग का क्षय करके वीतरागता की उपलब्धि कर लेना ही होता है। सम्पूर्ण जगत के निकट जा-जाकर थका हुआ यह पूजक परम वीतराग पुरुष के निकट आकर अनायास ही रुक जाता है; मानों सदा से जिसकी उसे चाह थी, वह उसे वीतराग के चरणों में ही मिल गई हो।

देव दर्पण होता है और यह पुजारी अनादि अज्ञान से आवृत्त अपना कलुषित प्रतिबिम्ब उसमें देख-देखकर उसे साफ करता है। पूजक बड़ा विवेकी और पुरुषार्थी भी होता है; भगवान पर ही अपना सम्पूर्ण समर्पण करके पुरुषार्थ से विमुख नहीं होना चाहता किन्तु देव के स्वरूप में अपना अनुसंधान करता हुआ धैर्यपूर्वक स्वयं देवत्व की ओर बढ़ता जाता है। अतः वीतरागता की उपलब्धि के लिए अपनी निर्बलदशा में देव को साधन भी बनाता है और देव के आदर्शों का प्रतिपल अनुशीलन करता हुआ अंत में साध्य की उपलब्धि कर लेता है सही अर्थ में इस प्रकार का पूजक बनने की पात्रता श्रावक में ही होती है। जगत की वे मान्यताएँ जो पूज्य से कुछ आशा लेकर चलती हैं, अंत में साध्य से परिच्युत होकर निराशा के गर्त में ही गिरती हैं, क्योंकि कुछ लेने-देने वाला और जिसकी चेष्टाएँ साधारण मानवों जैसी हों उसे पूजा कैसे समर्पित की जाए और उसके प्रति पूजक की श्रद्धा जागे भी तो कैसे ?

पूजा - पूजा में इस अनुष्ठान से पूर्व होने वाले देव-दर्शन के विधि-विधान भी गर्भित हैं। पूजा पूज्य के सम्मान अथवा उसके गुणानुवाद को कहते हैं। पूज्य में साधारण प्राणी के स्तर से जो असाधारणता होती है, पूजक पूजा में उसी का सम्मान करता है। पूजा का पूजापा केवल बाह्य सामग्री नहीं किन्तु वह पूजापा देवोचित होता है जैसा देव वैसी पूजा। देव वीतरागी है तो उसका पूजापा भी वीतराग होगा; उसके बिना उस देव की पूजा नहीं बन सकेगी। जिसे राग अर्थात् संसार से स्नेह है और जिसकी पूजा में स्वर्गों के ऐश्वर्य नृत्य करते हों, वह पूजा इन वीतरागी देवता को नहीं मिलेगी।

पूजा स्वयं पुण्य परिणाम है; किन्तु उसका प्रयोजन राग के क्षय पूर्वक अपने (पूजक के) भीतर वीतरागता को जन्म देना है। पूजक को न पूजा का परिणाम अभीष्ट है और न उसका फल, वह दोनों में निरीह भाव से वर्तता है उसका आश्रय उदात्त है, अतः मात्र पूजा के पुण्य भाव से वह संतुष्ट नहीं हो जाता, किन्तु सम्पूर्ण वीतरागता को लेकर ही विराम लेता है। भूमिका कमजोर है, अवस्था दुर्बल है अतएव पूजादिक का भाव तो आता ही है; किन्तु उस भाव में तन्मयता न होकर उसे उस भाव के विषय के साथ एकत्व है।

पूजा के भेद :- भाव पूजा और द्रव्य पूजा।

भाव पूजा - निश्चय भाव पूजा और व्यवहार भाव पूजा।

निश्चय भाव पूजा - जो पूजक अपने ज्ञानानन्दस्वरूप नित्य शुद्ध ध्रुव आत्मस्वभाव को ही उपादेय-आश्रय करने योग्य मानता है और उसके अतिरिक्त जगत के सम्पूर्ण जड़-चेतन पदार्थों को अपने लिए अकिंचित्कर मानता है और इस प्रकार जिसे निरन्तर अपने शुद्ध स्वभाव की उपासना ही प्रवर्तमान होती है, वह निश्चय भाव पूजा है।

व्यवहार भाव पूजा - अपने शुद्ध स्वभाव के उग्रता करके उत्तरोत्तर स्थिरता बढ़ाने के लिए जो देव का सानिध्य करता है और उसमें स्थिर होने के लिए देव के गुणानुवादपूर्वक जो पुनः पुनः प्रेरणाएँ प्राप्त करता है, पूजक का यह विधान व्यवहार भाव पूजा कहलाता है क्योंकि यह भाव पुण्य है और देवाश्रित होने से पराश्रित ही है।

द्रव्य पूजा - तीन लोक में एक मात्र अपने भीतर विद्यमान शुद्ध ज्ञायकस्वभाव को ही जिसने श्रेयस्कर माना है और अज्ञानदशा में प्रवर्तित जगत की सम्पूर्ण दासता से जिसने इन्कार कर दिया है, ऐसा पूजक मुक्ति की प्रेरणाएँ लेने के लिये जब देव का सान्निध्य और गुणानुवाद करता है, तब इस पुनीत कार्य में चित्त को अधिकाधिक स्थिर करने के लिये वह अन्य और भी बाह्य पदार्थों का अवलम्बन लेकर उनके माध्यम से अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है, उसे द्रव्य पूजा कहते हैं।

द्रव्य पूजा में आठ वस्तुओं का विधान होता है और वे सबके सब पूजक के मात्र बाह्य अवलम्बन होते हैं; किन्तु पूजा में जैसे भावों का महत्त्व है, द्रव्य का महत्त्व भी कुछ कम नहीं है।

आज के बौद्धिक मानव का यह एक प्रश्न है कि जब देव द्रव्य पूजा को स्वीकार नहीं करते तो वह आवश्यक भी नहीं है? किन्तु यह बात बौद्धिक तो हो सकती है पर तात्त्विक नहीं। पूजा में प्रयुक्त जिन द्रव्यों के अवलम्बन से हमारे मुक्ति जैसे महान कार्य की यदि साधना होती है तो पूजा के द्रव्य का यह कुछ कम महत्त्व नहीं है; भले ही देव उस पूजा को स्वीकार न करें और हम पूजा देव को देते भी कब हैं उसमें तो जितना कुछ होता है वह सब हमारे द्वारा हमारे भीतर हमारा ही होता है।

लौकिक अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए हम क्या-क्या नहीं करते हैं? बड़े से बड़ा आर्थिक भार भी वहन करते हैं; फिर पूजा के द्रव्यों से सम्पन्न होने वाले मुक्ति जैसे महान कार्य में उसकी पुरुषार्थ की उपयोगिता और महत्त्व का अंकन नहीं कर सके और इसे अपव्यय कहें तो यह बौद्धिक विकार ही होगा।

द्रव्य पूजा में आठ द्रव्यों का विधान होता है और वे सबके सब पूजक के भावों के प्रतीक होते हैं। प्रत्येक ही द्रव्य के समर्पण के द्वारा पूजक अपने भावों की ही अभिव्यक्ति करता है, उनसे पूजक की भीतरी चाह का भी पता चलता है। यद्यपि सभी द्रव्य लगभग एक ही प्रयोजन के प्रतीक हैं किन्तु पूजक की अभिव्यक्तियाँ उनके सहारे भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हैं - जैसे जल के समर्पण में वह जन्म-जरा-मरण के विनाश की बात करता है, तो चन्दन में भवाताप के विनाश की और अक्षत में अक्षय पद की प्राप्ति की और इसी प्रकार शेष द्रव्यों में भी; किन्तु सबके पीछे भावना तो केवल एक ही है, क्योंकि जन्म-जरा-मृत्यु का विनाश, भव आताप का विनाश अथवा अक्षय पद की प्राप्ति तीनों निर्वाणस्वरूप ही हैं। किन्तु विकारों के प्रकार अनेक होते हैं और विकारों के अभाव में उत्पन्न होने वाली अवस्था एक ही प्रकार की होती है, अतएव विकारों के माध्यम से भावों की अभिव्यक्ति अनेक प्रकार की हो जाती है। इस प्रकार द्रव्य पूजा हमारे लिये निम्न प्रकार उपयोगी बनती है -

  1. द्रव्यों के माध्यम से पूज्य का जो भी गुणानुवाद किया जाता है उससे पूजक के भावों का परिचय मिलता है।

  2. द्रव्य चित्त की एकाग्रता के लिये बड़े सुन्दर अवलम्बन का कार्य करते हैं।

  3. द्रव्यों को हम विविध प्रकार से प्रतीक बनाकर भावविशुद्धि की प्रेरणाएँ लेते हैं। जैसे जल उज्ज्वलता, स्वच्छता, शीतलता का प्रतीक होता है, अतएव जल के इन गुणों को जल चढ़ाते समय ध्यान में रखने से भावनाओं को विशेष प्रकार का उत्साह और विशुद्धि मिलती है। जल चढ़ाता हुआ पूजक मन ही मन परम प्रसन्न और उत्साहित होकर इस विश्वास के साथ उसका समर्पण करता है कि मानों मल का विनाश करने वाले जल का समर्पण करते हुए मेरे जन्म-जरा-मृत्यु का विनाश भी हो रहा है।

  4. पूजा के आठों ही द्रव्य एक निर्वाण के ही प्रतीक होते हुए भी उनके माध्यम से होने वाली भावाभिव्यक्तियाँ अनेक प्रकार की होने के कारण और उनके द्वारा पूजा की पद्धति में उत्तरोत्तर परिवर्तन होने के कारण पूजक पूजा के प्रति उपेक्षा भाव को प्राप्त नहीं होता, वरन् उत्साहित होता जाता है। यदि केवल एक ही द्रव्य हो और पुनः पुनः हम उसी का उच्चारण करें और बार-बार वही हमारे सामने रहे तो हमारी चित्त-वृत्ति पूजा में अधिक समय तक स्थिर नहीं रह सकेगी, क्योंकि रागी मन एक ही जगह बड़ी कठिनाई से स्थिर रहता है। अतः अष्ट द्रव्य का विधान इतना महत्त्वपूर्ण और मनोवैज्ञानिक है कि उसमें परिवर्तन की कल्पना एकदम निरतिशय सी लगती है।

यह भी प्रश्न किया जाता है कि पूजा के द्रव्य आठ ही क्यों होते हैं? किन्तु यदि पूजा के द्रव्यों की संख्या घटा दी जाए या बढ़ा दी जाए तो भी इस प्रश्न का कभी समाधान होने वाला नहीं है। यदि उनको घटाया जाए तो भी प्रश्न वही होगा कि उनकी संख्या इतनी ही क्यों? और यदि बढ़ा दी जाए तो भी इसी प्रश्न की पुनरावृत्ति होगी। अतः महापुरुषों के द्वारा स्वीकृत यह परम्परा ज्यों की त्यों स्वीकार करने योग्य है।

पूजा के द्रव्यों को घटाने में वही बाधा आती है कि उससे चित्तवृत्ति परिवर्तन न पाने के कारण अस्थिर हो जायेगी। यदि उन्हें बढ़ा दिया जाए तो भी वर्णन की एक लम्बी तालिका सी हो जाने के कारण पूजा की भावात्मकता कम हो जायेगी।

आठ द्रव्यों की संख्या सुगमतापूर्वक याद रक्खी जा सकती है और उन्हें हम जिस जिस प्रकार से प्रतीक बनाते हैं तथा उनके माध्यम से द्रव्य समर्पण सम्बन्धी मन्त्रों की रचना होती है, वह अनपढ़ लोगों की स्मृति में भी सुगमता से अवधारण हो सकते हैं। द्रव्यों की एक लम्बी तालिका होने पर उनके मन्त्रों को तथा उनके क्रम को याद रखना बड़ा कठिन होगा। साथ ही उनको सम्पादन तथा उनको तैयार करना भी अधिक श्रम साध्य हो जायेगा और पूजा का यह विधान यदि अधिक कठिन हुआ तो इसके प्रति उतनी श्रद्धा और आकर्षण नहीं रह सकेगा जितना वह अष्ट द्रव्यों की एक सरल और सीमित विधान में देखने को मिलता है।

पूजा के अंग -

पूजा के पाँच अंग होते हैं - 1. आह्वानन, 2. स्थापन, 3. सन्निधिकरण, 4. पूजन, 5. विसर्जन।

  1. आह्वानन - पूजक जिन पूज्य की पूजा करता है, उनके प्रति उसे भक्ति का इतना अतिरेक होता है कि वह यह चाहता है कि पूज्य उसके सामने ही रहें। अतएव उन्हें बुलाने का वह एक भावात्मक विधान करता है और कहता है कि ‘आप आइये आइये’ इसे आह्वानन कहते हैं।

  2. स्थापन - आह्वानन के उपरान्त भी पूजक को संतोष नहीं होता, अतः वह चाहता है कि जब तक मैं पूजा करूँ, पूज्य मेरे सामने ही बैठे रहें; अतः वह कहता है - ‘आप बैठिये बैठिये।’

  3. सन्निधिकरण - स्थापना के उपरान्त भी पूजक का मन नहीं भरता और उसकी भक्ति का प्रवाह अधिकाधिक उमड़ता ही चलता है, अतः पूज्य का दूर बैठना भी उसे प्रिय नहीं लगता; वह तो मानो पूज्य को आत्मसात् कर लेना चाहता है; अतः पुनः कहता है ‘आप मेरे निकट बैठिये, निकट बैठिये।’

  4. पूजन - इसके उपरान्त आठ द्रव्य और जयमाल के द्वारा होने वाला पूज्य का विविध प्रकार का गुणानुवाद अथवा गुणगान पूजन कहलाता है।

  5. विसर्जन - पूजक इस अंग में पूजा के विस्तृत विधान का संकोच करके उसकी मंगलमय समाप्ति करता है और अपनी जानी- अंजानी सभी भूलों के लिये, अपनी सभी प्रकार की कमजोरियों को स्वीकार करता हुआ पूज्य से क्षमायाचना करता है। पूजा का यह विधान समाप्ति को प्राप्त हो जाने पर भी पूजक के हृदय में पूज्य के प्रति भक्ति का वेग समाप्त नहीं होता। विसर्जन से पूर्व पूजक लोक के सभी प्राणियों के प्रति निर्वाण प्राप्ति की शुभकामना करता है, जिसे शान्ति विधान कहते हैं।

श्रावक का उपास्य देव सर्वज्ञ वीतराग और हितोपदेशी ही होता है, अन्य चार जाति के देवों में कोई उसका पूजा पात्र नहीं होता। भले ही उनमें सम्यग्दृष्टि देव भी होते हैं किन्तु वे यथायोग्य आदर के ही पात्र होते हैं; तथा वे सभी देव अव्रती होते हैं और अव्रती की पूजा का जैन धर्म में विधान नहीं है। इन देवों की पूजा के प्रचलन द्वारा पाखण्ड को प्रोत्साहन देने के लिये लोग उनकी पूजा का समर्थन करते हैं। वे कहते हैं कि ‘सम्यग्दृष्टि देव जैन शासन के रक्षक होते हैं अतः उनकी पूजा करना चाहिये’ किन्तु यह तर्क उचित नहीं है। जो देव सम्यग्दृष्टि होते हैं, वे तो पूजा की अपेक्षा के बिना ही अपना कर्तव्य समझकर ही जैन शासन की प्रभावना करते हैं और जो देव मिथ्यादृष्टि अथवा धर्म विमुख होते हैं उनसे तो धर्म की प्रभावना का भी कोई अवकाश नहीं है क्योंकि उनमें राग-द्वेष और विषय-कषाय की ही बहुलता होती है।

सम्यग्दृष्टि देवों के बहाने देव पूजा के समर्थक लोग वास्तव में बड़ा भारी अनर्थ करते हैं। प्रथम तो देवों के सम्यक्त्व और मिथ्यात्व का भी हमको ज्ञान नहीं होता और जो सम्यग्दृष्टि ही हैं, वे स्वयं पूजा नहीं चाहते और उनके प्रति पूजा का विधान भी नहीं है अतः अन्य देवों के पूजा की बात जगत में पाखण्ड को प्रोत्साहन देने की ही है। देव पूजा के बहाने व्यक्ति अपनी विषय-वासनाओं और अभिलाषाओं को ही पूरा करना चाहता है और इस प्रकार देव पूजा के जो विधान हम जैनेतर मान्यताओं में देखते हैं, इस देव पूजा के प्रचार से हमारे यहाँ भी उसी प्रकार की विडम्बनाओं की पुनरावृत्ति होगी; यहाँ तक कि जिन देवों की विद्यमानता भी नहीं है, उनकी भी नई-नई कल्पनाएँ होगी और इस प्रकार धर्म का विशुद्ध वीतराग स्वरूप राग के घटाटोप में लुप्त हो जायेगा।

यह भी तर्क किया जाता है कि मिथ्यादृष्टि देव गुरु आदि का शिष्टाचार के नाते व्यवहार में यदि आदर सत्कार या उनको प्रणाम आदि कर लिये जाएँ तो कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये, किन्तु यह बात सर्वथा असत्य है। आचार्य श्री समन्तभद्र का भी रत्नकरण्ड श्रावकाचार में ऐसा आदेश है कि सम्यग्दृष्टि जीवों को भयादि के वश से कुदेवादि को प्रणाम और विनय भी नहीं करना चाहिये।

वास्तव में जो देव धर्मात्मा होते हैं, उनके साथ तो सम्यग्दृष्टि साधर्मी जैसा व्यवहार रखता है किन्तु धर्म द्वेषी कुदेवों के साथ तो किसी भी प्रकार के सम्बन्ध का वहाँ प्रश्न ही नहीं है; भले ही इस प्रकार के देवों में बड़े-बड़े आश्चर्यकारी चमत्कार भी देखे जाएं किन्तु सम्यग्दृष्टि कभी उन आकर्षणों में नहीं पड़ता। लोग ऐसा समाधान निकालते हैं कि हमारे ऊपर अथवा सन्तानादि पर किसी प्रकार की आपत्ति, रोग अथवा पीड़ा आई हो तो उनको थोड़ा सा प्रणाम विनय आदि करने में हमारा और धर्म का क्या बिगाड़ होगा ? किन्तु गहराई से विचार किया जाये तो सम्यग्दृष्टि अपने लौकिक प्रयोजन के लिये लोक के मिथ्यादृष्टि लोगों के पास तो जा सकता है, किन्तु जिनकी पूजा से मिथ्यात्व के भयंकर पाखण्डों की परम्परा को प्रोत्साहन मिलता हो, ऐसे कुदेवों के निकट जाना अपने स्वाभिमान की हानि समझता है और लोक तो अनुकरण प्रिय होता है, अतः इसकी परम्परा में भी भारी अनर्थों की सम्भावनाएँ हैं।

लोक में भी हम इस प्रकार के स्वाभिमानी लोग देखते हैं, जो चाहे किसी परिस्थिति में उनकी कितनी ही हानि हो जाये लेकिन अपने सिद्धान्त के विरोधी लोगों के पास जाने की कल्पना भी नहीं करते हैं।

सम्यग्दृष्टि भी धर्म को जीवन की सर्वोत्कृष्ट वस्तु मानता है, अतः जहाँ सत्य धर्म का साक्षात् विरोध देखता है, उन देवों से अपना कोई सम्बन्ध नहीं रखता। यह भी कहा जाता है कि इन देवों को प्रणाम और विनय नहीं करना इनके प्रति द्वेष का सूचन करता है, किन्तु यह तर्क तो नितान्त निर्मूल है, क्योंकि वास्तविक वस्तु का परिज्ञान हो जाने पर कृत्रिम वस्तु से सम्बन्ध विच्छेद कर लेना और उसके प्रति मध्यस्थ हो जाना द्वेष नहीं कहलाता है। जैसे मार्ग में पड़ी हुई धूल का सेवन हमारे उदर को हानि करता है, अतः यदि हम उसका सेवन नहीं करते तो क्या उस धूल के प्रति हमको द्वेष पड़ा है? द्वेष नहीं है, किन्तु हमारे प्रयोजन की वस्तु नही होने से हमें उसके प्रति मध्यस्थ भाव है। सम्पूर्ण लोक इस बात को इसी प्रकार स्वीकार करता है।

अतः जैन श्रावक एक मात्र अरहन्त पुरुष में ही अथवा उनकी वाणी व निर्ग्रन्थ गुरुओं में ही अपनी वीतरागता का प्रयोजन हल होता जानकर उन्हीं का दर्शन पूजन भक्ति और उपासना करता है। अन्य देव अथवा गुरु लौकिक दृष्टि से भले ही बड़ी सुन्दर-सुन्दर वार्ता करते हों, उनके कथानक तथा उनकी प्रवचन शैलियाँ भी बड़ी आकर्षक हों किन्तु सम्यग्दृष्टि अन्तरदृष्टा होने के कारण इस छल में कभी भी फँसता नहीं है। जैसे खोटे रुपये को चलाने के लिये उस पर कृत्रिम मुलम्मा (आवरण) चढ़ाया जाता है; उसी प्रकार वीतरागता के विरोध की जगत की समग्र मान्यताएँ और उनके अनुयायी भी मिथ्याधर्म के प्रचार के लिये अनेक छद्म करते हैं। यदि हमें कुछ इस प्रकार की उलझन प्रतीत हो कि हम सच्चे-झूठे की परीक्षा कैसे करें तो उसकी परीक्षा के लिये हमें स्वयं भी अनेकान्त के द्वारा वस्तुस्वभाव को समझना होगा और यदि वीतरागता हमारी कसौटी होगी तो फिर सत्य असत्य का निर्णय हमारे लिये कोई समस्या ही नहीं रह जायेगा।

पूजा एवं तत्त्वज्ञान - यद्यपि पूजा तत्त्वज्ञान के बिना नहीं होती, किन्तु उसमें आदि से अन्त तक भक्ति की ही मुख्यता रहती है। प्रकरण के अनुसार उसमें तत्त्वज्ञान आता तो है किन्तु वह भक्ति का ही रूप धारण करके आता है यद्यपि दोनों ही मोक्षमार्ग के हेतु हैं, किन्तु एक ही परिणति के समय दूसरा गौण रहता है। तत्त्वज्ञान एकान्त चिंतन की वस्तु है और भक्ति में भगवान का सान्निध्य होता है, अतएव तत्त्व की चिन्तनधारा भक्ति के अवसर पर लम्बी नहीं होती।

पूजा के इस महा मंगलमय नित्य विधान में यह बात विशेष स्मरण रखने लायक है कि पूजा ऐसे शान्त स्वर में की जाये जिससे दर्शन एवं पूजन करने वाले अन्य लोगों के भावों में व्यवधान न हो।

पूजा की संगीतमयता के कारण उसके साथ वाद्यों का उपयोग भावों में स्फुरणा तो लाता है, किन्तु वाद्यों का उपयोग उस मर्यादा तक ही होना चाहिये जहाँ तक वे हमारी भावों की रचना में निमित्त बनते हों, वाद्यों की धमाल एवं शोर में पूजा के शब्द एवं भाव भी गायब हो जाएँ तो वह वाद्यों का सही उपयोग नहीं है। प्रायः वाद्यों के निर्माण में चर्म आदि का उपयोग होता है, अतएव ऐसे वाद्य तो जिनालय में भी नहीं आने चाहिये फिर पूजा में तो उनके उपयोग का प्रश्न ही नहीं उठता।

पूजन एक ऐसा मधुर एवं सहज धार्मिक कर्म है, जिसमें सम्पूर्ण तत्त्वज्ञान भक्ति के संगीत में घुलकर मधुर आस्वाद देता है। जहाँ तत्त्वज्ञान में मस्तिष्क की प्रधानता होती है, वहीं पूजा में हृदय मुख्य होता है, इसीलिए भक्ति का यह अंग यद्यपि तत्त्वज्ञान के बिना कार्यकारी नहीं होता, फिर भी तत्त्वज्ञान का चिंतन भक्ति की कोमल भावधारा का उल्लंघन करके उदित नहीं होता।

पूजा किसी भी लौकिक अथवा पारलौकिक अभिलाषाओं को लेकर नहीं की जाती; क्योंकि मोक्षमार्ग एवं मुक्ति ही उसका एक मात्र प्रयोजन होता है, किसी भी लौकिक प्रयोजन को लेकर की जाने वाली पूजा में पूजा के बाह्य विधि-विधानों की काया तो साथ रहती है, पर ( प्राण ) भाव गायब हो जाते हैं। सच्चाई तो यह है कि किसी भी अभिलाषा को लेकर की जाने वाली पूजा में भक्त और भगवान के बीच में एक अभिलाषा खड़ी हो जाती है अतएव वह पूजा भगवान तक पहुँचती नहीं है और पुण्य की भाव-भूमि समाप्त हो जाने से पाप की ही सम्भावना होती है।

एक और महत्त्वपूर्ण अंसदिग्ध तथ्य यह कि पूजन एवं विधान की पवित्र परम्परा नई चलाई हुई नहीं, बल्कि अनादि की है, इसका कथन स्पष्टतया हमारे जैन आगम में प्राप्त होता है कि अनंत तीर्थंकरों की सनातन धर्म धारा में महान अनुष्ठान पंचकल्याणक के समय तथा अष्टान्हिका, दशलक्षण आदि पर्वादि के अवसर पर, इन्द्रादि, चक्रवर्ती, सामान्य गृहस्थ व श्रावक के द्वारा पूजन, अभिषेक, कल्पद्रुम विधान, इन्द्रध्वज विधान का उल्लेख प्रथमानुयोग में अत्यन्त श्रद्धा व सत्यता के साथ उपलब्ध होता है, इससे सिद्ध है कि पूजन व विधान की पावन परम्परा नवीन नहीं, बल्कि अनादि की है।

दिगम्बर पूजन साहित्य विधा का एक सर्वोत्कृष्ट अंग मंडल विधान भी है, जो हमारे परिणामों की विशेष विशुद्धि की अपेक्षा रखता है हिन्दी मंडल विधान व पूजन साहित्य में, प्राचीन विद्वान आत्मज्ञानी कवि संतलालजी, वृन्दावनजी, टेकचंदजी आदि कवियों द्वारा रचित, तात्त्विक भावों से युक्त विधान वर्तमान में हमें प्राप्त हैं, जिनका समय-समय पर प्रसंगानुसार आयोजन भी होता देखा जाता है। सचमुच! इस प्रशस्त कार्य के समय पूजक भक्ति की तरंगित सरिता में भीगकर, अपने भावों को प्रक्षालित करता हुआ आत्मा का सुमधुर स्वाद लेता है बल्कि स्वयं उसमें डूब जाता है, ऐसी द्रव्य स्तुति में भी पूज्य-पूजक की अभेदता की पराकाष्ठता होती है।

मंडल विधान की पवित्र श्रृंखला में सिद्धचक्र मंडल भी पूजन साहित्य की विशालकाय अनुपम कृति है, जिसके प्रत्येक पद में भक्ति व तत्त्वज्ञान का अनूठा संगम है, जो उपासक के चित्त की अतिशय भावभंगिमा को कई गुना बढ़ा देता है।

सिद्धचक्र विधान का प्रयोजन

दिगम्बर जैन धर्म के सभी विधानों में सिद्धचक्र विधान का सर्वाधिक महत्त्व है, क्योंकि सिद्धचक्र विधान का प्रयोजन सिद्धों के गुणों का स्मरण करते हुए अपनी आत्मा को पवित्र सिद्धदशा तक पहुँचाना होता है और आत्मा के लिए इससे उत्कृष्ट दूसरा उद्देश्य भी नहीं हो सकता। सिद्धचक्र विधान में केवल सिद्धों के गुणों का स्मरण मात्र नहीं होता, वरन् उससे यह पता चलता है कि सिद्ध भगवान पतित से पावन कैसे बन गये हैं। सिद्धों के स्वरूप को देखने एवं सुनने से पता चलता है कि सिद्धों की श्रद्धा, ज्ञान, चारित्र आदि सभी पर्यायें अपनी चैतन्य सत्ता के सन्मुख होकर प्रतिसमय अनन्त आनन्द का भोग कर रही हैं।

इससे निश्चित होता है कि अपनी सत्ता के सन्मुख होना ही स्वाधीन आनन्द की प्राप्ति का एकमात्र उपाय है। अतएव सिद्धों की पूजा करने वाला अपने आपको सिद्धों के गुणगान तक ही सीमित नहीं रखता, वरन् सिद्धों को आदर्श बनाकर अपनी परिपूर्ण सत्ता के अवलम्बन से सिद्धदशा का उद्यम प्रारम्भ करता है। सचमुच किसी का गुणगान करने मात्र से तो लोक में भी कोई स्थायी उपलब्धि नहीं होती, इसलिए सिद्धों का उपासक सिद्धों के अनुकरण से अपनी अनन्त शक्ति सम्पन्न आत्मा का विश्वास करके उसमें पड़ी हुई शक्तियों को जगाता है और अन्त में सिद्ध बन जाता है। यदि आत्मा में पड़ी हुई शक्तियों का ज्ञान एवं श्रद्धान ही न हो तो सिद्धों के गुणगान विविध प्रकार से अपने दोषों को कहना और उनसे कुछ माँगना सिर्फ अरण्य रुदन है। उससे कदाचित् स्वर्ग भी मिल जाय तो भी अन्त में अधोगति ही होती है।

सिद्धचक्र विधान के साथ विशेषरूप से मैना सुन्दरी की कथा जुड़ी है। जिसका रूप अज्ञान के कारण काफी विकृत हुआ है, यह एक बहुचर्चित कथा है कि मैना सुन्दरी ने सिद्धचक्र विधान कराया और उसके पति श्रीपाल का कोढ़ दूर हो गया। यह तथ्य संशय करने लायक तो नहीं है क्योंकि सिद्धचक्र विधान के बाद श्रीपाल का कोढ़ दूर होना कोई अनहोनी या अनुचित बात नहीं है, किन्तु सचमुच मैना सुन्दरी ने सिद्धचक्र विधान का आयोजन श्रीपाल का कोढ़ दूर करने के लिए किया हो यह विश्वास करने योग्य नहीं है, क्योंकि मैना सुन्दरी जैनधर्म एवं जैन तत्त्वों की श्रद्धालु नारी थी, इसलिए निश्चित ही उसने सिद्धचक्र विधान का आयोजन व्याधिग्रस्त श्रीपाल के चित्त में शुद्धात्म भावना जगाने के लिए ही किया था। कोढ़ दूर करने जैसे लौकिक प्रयोजन की सिद्धि के लिए किया जाने वाला कोई भी धार्मिक अनुष्ठान तो पुण्यभाव भी नहीं है और श्रीपाल ने भी सिद्धचक्र विधान इस प्रयोजन से नहीं सुना। इसका आशय है कि सिद्धचक्र विधान के निमित्त से श्रीपाल के चित्त में शुद्धात्म भावना का उदय हुआ और उस समय उत्पन्न हुए महान पुण्य परिणाम से असाता आदि कर्म का संक्रमण साता में हो गया हो कि जिससे उसका कोढ़ दूर हो गया हो।

और एक समस्त जैन बन्धुओं से अपरिचित तथ्य यह है कि राजा श्रीपाल एवं मैनासुन्दरी जैसे धर्मात्मा सम्यग्दृष्टि पुरुष तो चतुर्थकाल के समय में हुए और पण्डित सन्तलालजी कृत सिद्धचक्र विधान का रचना काल सन् 1834 से 1886 के मध्य में माना गया है, अतः मुक्ति प्रदायक इस विधान को उनके कुष्ठ रोग के साथ जोड़ना किंचित् भी उचित नहीं है। इस तथ्य में आद्योपांत सत्यता का अंश भी उपलब्ध नहीं होता।

श्रीपाल के कोढ़मय शरीर पर मैना सुन्दरी द्वारा गंधोदक छिड़कने की बात भी सही नहीं लगती, बल्कि ऐसा लगता है कि यह बात पीछे से जोड़ी गई है क्योंकि भगवान जिनेन्द्र के प्रक्षालन का गन्धोदक का जैसी पवित्र वस्तु केवल शीश पर चढ़ाने के उपयोग की होती है, गन्दे शरीर पर छिड़कर कर व्याधियाँ मिटाने जैसा ढोंग करने के लिए नहीं। संभवतः श्रीपाल पर गन्धोदक छिड़कने जैसी घटना को प्रामाणिक मान लेने के कारण ही आज के युग में गन्धोदक जैसी पवित्र वस्तु की उपलब्धि का अत्यधिक दुरुपयोग हुआ है और हम लोग न केवल उसे शरीर जैसी अपवित्र वस्तु पर छिड़कने, बल्कि पिलाने तक लगे हैं। इससे व्याधि तो मिटती नहीं है वरन् बेहद् पाप और संचित हो जाता है।

जिन प्रतिमा की मनोज्ञता बनाये रखने के लिए उस पर लगी हुई रज को दूर करके जिस शुद्ध मर्यादित जल से उसका अभिषेक अथवा प्रक्षाल किया जाता है, उस जल को जिन प्रतिमा से स्पर्शित होने के कारण पवित्र गन्धोदक कहते हैं। पूज्य पुरुष की प्रतिमा से स्पर्शित हुआ वह जल पवित्र होने पर भी पीने योग्य नहीं है क्योंकि वह रजादि संयुक्त होता है। जन्माभिषेक के समय भी इन्द्र और देव क्षीर सागर के जिस पवित्र जल से पाण्डुक शिला पर तीर्थंकर भगवन्तों का अभिषेक करते हैं उस जल को देव अथवा मनुष्य कोई भी पीते तो नहीं हैं। शरीर तक पर नहीं लगाते हैं, इसलिए गन्धोदक शरीर पर लगाने अथवा पीने योग्य पदार्थ नहीं है। पूजा के द्रव्य की तरह गन्धोदक भी निर्माल्य वस्तु है, इसलिए हमारे लिए वह सम्मान विनय के अतिरिक्त और किसी उपयोग की नहीं है।

गन्धोदक का अर्थ - गन्ध उदक अर्थात् सुगन्धित जल से होता है, किन्तु कोई सुगन्धित वस्तु मिलाकर उसे सुगन्धित नहीं किया जाता वह तो मात्र शुद्ध मर्यादित जल ही होता है। जो पवित्र जिन प्रतिमा एवं सुगन्धित प्रतिमा से स्पर्शित होने के कारण सुगन्धित कहलाता है और जन्माभिषेक के समय क्षीरसागर के पवित्र जल से भगवान (बालक तीर्थंकर) का जो अभिषेक किया जाता है, वह भगवान के शरीर से स्पर्शित होकर सुगन्धित हो जाता है, क्योंकि बाल भगवान का शरीर जन्म से ही महा-सुगन्धित होता है।

सिद्धचक्र विधान के रचयिता अध्यात्म के गम्भीर मर्मज्ञ कवि संतलालजी थे। सिद्धचक्र विधान में उन्होंने सिद्धों के गुणानुवाद के माध्यम से जैनदर्शन के अध्यात्म के सूक्ष्म और गम्भीर रहस्यों का उद्घाटन किया है। जैन अध्यात्म की पहली शर्त यह है कि उसमें प्रवेश करने के लिए अपनी आत्मा को सिद्धों की पूर्ण एवं पवित्र पर्याय की तरह पूर्ण एवं पवित्र (भावकर्म, द्रव्यकर्म, नोकर्म रहित) स्वीकार किया जाय क्योंकि प्रत्येक ही संसारी आत्मा भी वर्तमान में ही द्रव्यस्वभाव की अपेक्षा से पूर्ण एवं पवित्र ही है। पर्याय में भ्रम केवल उस आत्मा को पूर्ण एवं पवित्र नहीं मानने जितनी है और आज भी वहीं चला आया। पर्याय की भूल के समय में ही आत्मद्रव्य की अनादि अनन्त स्वाभाविक शुद्धता समाप्त नहीं होती, अतएव जैनदर्शन में धर्म का प्रारम्भ ही अपने आत्मद्रव्य को सिद्धों जैसा पूर्ण एवं पवित्र मानने से ही होता है? इस प्रकार संतलालजी ने सिद्धचक्र विधान के माध्यम से समयसार की पहली गाथा ‘वंदित्तु सव्व सिद्धे…’ के सदृश प्रथम ही अनन्त सिद्धों की अपनी आत्मा में स्थापना का महान मंगल सन्देश दिया है।

सिद्धचक्र विधान की जयमाल के अर्थ

प्रथम जयमाल

(दोहा)
जग आरत भारत महा, गारत करि जय पाय।
विजय आरती तिन कहूँ, पुरुषारथ गुणगाय।।

इस पहली जयमाल में अध्यात्म मर्मज्ञ कविवर श्री संतलालजी ने आत्मा को अज्ञान की दुखमय निम्नतम दशा से परमानन्दमय सिद्धावस्था तक पहुँचने की विधि का युद्ध के रूपक द्वारा सजीव चित्रण किया है।

अर्थ - सारा संसार अज्ञान से उत्पन्न कष्टों के महाभारत से दुःखी है। भगवान सिद्ध ने उसे नष्ट करके अपने पराक्रम से उस पर विजय प्राप्त की। संसाररूपी महाभारत महादुःखमय है। भगवान सिद्ध ने उसका अन्त करके उस पर विजय प्राप्त की इसलिए मैं भगवान सिद्ध के पराक्रम पुरुषार्थ का गुणगान करता हुआ उनकी विजय की आरती (स्तोत्र) कहता हूँ अर्थात् उनके गुणों का कीर्तन करता हुआ उनकी विजय की आरती (स्तुति) को कहता हूँ।

(पद्धड़ी)
जय करण कृपाण सु प्रथम बार,
मिथ्यात्व सुभट कीनो प्रहार।
दृढ़ कोट विपर्यय मति उलंघि,
पायो समकित थल थिर अभंग।।1।।

भावार्थ - हे सिद्ध भगवान! आपने पहली ही बार अधःकरण, अपूर्णकरण, अनिवृत्तिकरणरूपी कृपाण (तलवार) से मिथ्यात्व रूपी महान योद्धा (महाभारत का), पर प्रहार करके उसे समाप्त कर दिया। अतः हे भगवान आपकी जय हो! इसके साथ ही विपर्यय मति अर्थात् मिथ्याज्ञानरूपी सुदृढ़ कोट का उल्लंघन करके सम्यक्त्व रूपी स्थिर एवं सुखद स्थान को प्राप्त किया। जो कभी भंग नहीं होता। यहाँ सर्वप्रथम में मिथ्यात्वरूपी योद्धा पर प्रहार किया।

निज पर विवेक अंतर पुनीत,
आतम रुचि वरती राजनीत।
जग विभव विभाव असार एह,
स्वातम सुखरस विपरीत देह॥2॥

भावार्थ - अपने और पर के विवेकरूप सम्यग्ज्ञान के द्वारा पवित्र आत्मा की अन्तररुचि जगाकर राजनीति अर्थात् श्रेष्ठ नीति को प्रसारित किया, वैराग्य को जगाने के लिए आपने यह चिन्तन किया कि संसार का वैभव एवं आत्मा की राग-द्वेषरूप परिणति नितान्त असार है और यह शरीर आत्मा के सुख से रीता होने के कारण विपरीत स्वभाव वाला है।

तिन नाशन लीनो दृढ़ संभार,
शुद्धोपयोग चित्त चरण-सार।
निर्ग्रन्थ कठिन मारग अनूप,
हिंसादिक टारण सुलभ रूप॥ 3 ॥

भावार्थ - हे भगवन्! आपने जगत के वैभव विभाव एवं देह का अभाव करने के लिए चारित्र के लिए सारभूत शुद्धोपयोग को धारण किया। तीर्थंकरों का अनुपम निर्ग्रन्थ मार्ग कठिन तो कहा जाता है, किन्तु हिंसादिक विकारों का तो वह बड़ी सरलता से यूँ ही क्षय कर देता है।

द्वयबीस परीसह सहन वीर,
बहिरंतर संयम धरण धीर।
द्वादश भावन, दशभेद धर्म,
विधि नाशन बारह तप सु पर्म॥ 4॥

भावार्थ - हे भगवन्! आपने नग्न दिगम्बर दीक्षा धारण करके बड़ी वीरता से बाईस परीषहों को सहन किया और शुद्धोपयोग से उत्पन्न धैर्य के द्वारा बाह्य और अभ्यन्तर (निश्चय और व्यवहार) संयम को धारण किया और भावकर्म एवं द्रव्यकर्म का नाश करने के लिए बाहर भावनाओं का चिन्तन तथा दस प्रकार के धर्म और बारह प्रकार के तप को अङ्गीकार किया।

शुभ दयाहेत धरि समिति सार,
मन शुद्ध करण त्रय गुप्ति धार।
एकाकी निर्भय निःसहाय,
विचरो प्रमत्त नाशन उपाय॥ 5॥

भावार्थ - हे भगवन् आपने दया के लिए शुभ समिति को धारण किया और मन के शुद्ध करने के लिए तीन गुप्ति - शुद्धात्मा का सेवन करने के लिए मन वचन काय (गुप्ति) का पालन पश्चात् प्रमत दशा का नाश करने के लिए आपने किसी के साथ के बिना अकेले निर्भय विचरण किया। मुनि महाधीर व वीर एकाकी विचरण करते हैं। यहाँ तक तो प्रमत्त दशा भी अकेले मुक्ति की बढ़ते चरण है।

लखि मोहशत्रु परचंड जोर,
तिस हनन शुकल दल ध्यान जोर।
आनन्द वीर रस हिये छाय,
क्षायक श्रेणी आरंभ थाय॥ 6॥

भावार्थ - जब आपने देखा कि मोह शत्रु का बल बहुत प्रचण्ड है तो आपने उसका नाश करने के लिए शुक्लध्यान की महाबलवती सेना को सक्रिय किया। तब वीर रस से उत्पन्न आनन्द से हृदय भर गया और क्षपक श्रेणी में आरुढ़ हुआ।

बारम गुणथानक ताहि नाश,
तेरम पायों निजपद प्रकाश।
नव केवललब्धि विराजमान,
दैदीप्यमान सोहे सुभान॥ 7॥

भावार्थ - बारहवें गुणस्थान में आपने मोह का सर्वनाश कर दिया और तेरहवें गुणस्थान में अपनी आत्मा के अनन्त वैभव सम्पन्न पद अर्थात् साम्राज्य को प्राप्त किया, तब आप दैदीप्यमान सूर्य की तरह नौ केवल लब्धि, अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख, क्षायिक दान, क्षायिक लाभ, क्षायिक भोग, क्षायिक उपभोग, क्षायिक वीर्य और क्षायिक सम्यक्त्व से सुशोभित हुए।

तिस मोह दुष्ट आज्ञा एकांत,
थी कुमति स्वरूप अनेक भांति।
जिनवाणी करि ताको विहंड,
करि स्याद्वाद आज्ञा प्रचंड।। 8।।

भावार्थ - एकान्तवाद के महादोष से ग्रस्त उस दुष्ट मोह की आज्ञा से अनेक प्रकार की कुमति अर्थात् विविध मत मतान्तररूप मिथ्याज्ञान का प्रवर्तन हो रहा था। आपने अपनी दिव्य वाणी के द्वारा एकान्त के उन विविध रूपों का नाश करके पवित्र स्याद्वाद की प्रचण्ड आज्ञा का प्रवर्तन किया।

वरतायो जग में सुमति रूप,
भविजन पायो आनंद अनूप।

थे मोह नृपति उपकरण शेष,
चारों अघातिया विधि विशेष॥ 9॥

भावार्थ - तब संसार में सुमति (अनेकान्त स्वरूप सम्यग्ज्ञान) का प्रवर्तन हुआ और भव्य जीवों ने अपनी शुद्धात्मा के आश्रय से अनुपम आनन्द प्राप्त किया। इसके बाद हे भगवन्! चार अघातिया कर्मों के रूप में मोह राजा के जो उपकरण (सामान) शेष थे। (शेष दशवाँ छन्द में)

है नृपति सनातन रीति एह,
अरि विमुख न राखे नाम तेह।
यो तिन नाशन उद्यम सुठानि,
आरंभ्यो परम शुकल सु ध्यान॥10॥

भावार्थ - उनका नाश करने के लिए आपने परम शुक्ल ध्यान का उपक्रम शुरू किया क्योंकि राजाओं की सदा से ही यह रीति रही है कि अपने विमुख जो शत्रु होता है उसका नाम निशान भी नहीं रखते।

तिस बलकरि तिनकी थिति विनाश,
पायो निर्भय सुख निधि निवास।
यह अक्षय जोत लई अबाधि,
पुनि अंश न व्यापो शत्रु व्याध॥11॥

भावार्थ - शुक्लध्यान के बल से उन अघातिया कर्मों की स्थिति का नाश करके आपने अनन्त सुखों का निधान, निर्भय निवास (अनन्त सुख सम्पन्न अपनी सत्ता में विश्राम) प्राप्त किया और सर्व बाधा रहित अक्षय अखण्ड ज्योति (अक्षय आनन्द मय केवलज्ञान) आपने उपलब्ध की, इसके पश्चात् अनन्त काल तक शत्रु की थोड़ी भी बाधा का अनुभव नहीं हुआ।

शाश्वत स्वाश्रित सुख श्रेय स्वामि,
है शांति संत तुम कर प्रणाम।
अन्तिम पुरुषारथ फल विशाल,
तुम विलसौ सुखसौ अमित काल॥12॥

भावार्थ - हे भगवन्! आप अपनी आत्माश्रित सुख लक्ष्मी के शाश्वत् स्वामी बन गये। मैं संतलाल इसी शाश्वत शान्ति के लिए आपको प्रणाम करता हूँ। हे भगवन् उस अन्तिम पुरुषार्थ का ही यह महा फल है कि आप अनंतकाल तक सुख में विलास करते रहेंगे।

(घत्ता)

परसमय विदूरित पूरित निज सुख समयसार चेतनरूपा।
नाना प्रकार पर का विकार सब टार लसै सब गुणभूपा॥13॥

ते निरावर्ण निर्देह निरूपम सिद्धचक्र परसिद्ध जजूँ।
सुर मुनि नित ध्यावै आनंद पावैं, मैं पूजत भव भार तजूँ।।

भावार्थ - भगवान सिद्ध परसमय प्रवृत्ति अर्थात् मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, मिध्याचारित्र से रहित है। अपने सुख से परिपूर्ण है और चैतन्यस्वरूप समयसार हैं, पर स्वभावरूप विविध प्रकार के विकार का नाश करके अपने सर्वगुणों के सम्राट के रूप में सुशोभित होते हैं, वे भावकर्म, द्रव्यकर्म, नोकर्म के सर्व आवरण रहित हैं। अशरीरी है और उपमा रहित है। अतः मैं उन प्रसिद्ध सिद्धों के समूह की पूजा करता हूँ। देव और मुनिराज भी नित्य उनका ध्यान करते हैं और आनन्द प्राप्त करते हैं। मैं भी उन भगवान सिद्ध की पूजा करता हुआ भव के भार से मुक्त हो जाऊँ - ऐसी मेरी कामना है। ❖❖❖

द्वितीय जयमाल

(दोहा)
पञ्च परम परमात्मा, रहित कर्म के फन्द।
जग प्रपञ्च विरहित सदा, नमों सिद्ध सुख कन्द।।1।।

भावार्थ - सिद्ध भगवान पञ्च परमेष्ठियों में परम परमात्मा हैं। वे कर्म के बंधनों से रहित हैं, जगत् के विस्तार से सदा ही अलग रहते हैं। ऐसे सुख के निकेतन सिद्ध परमात्माओं को मैं नमन करता हूँ।

दुखकारन द्वेष विडारन हो,
वश डारन राग निवारन हो।
भवितारन पूरण कारण हो,
सब सिद्ध नमों सुखकारन हो।। 2 ।।

भावार्थ - हे सिद्ध परमात्मा! दुःख का कारण जो द्वेष है, उसका आपने नाश कर दिया है और सारे जगत को वश में करने वाले राग को आपने समाप्त कर दिया है। भव्य जीवों के लिए आप पूर्ण कारण हैं। ऐसे सुख के हेतु सिद्ध परमात्माओं को मैं नमस्कार करता हूँ।

समयामृत पूरित देव सही,
पर आकृत मूरति लेश नहीं।
विपरीत विभाव निवारन हो,
सब सिद्ध नमों सुखकारन हो।। 3 ।।

भावार्थ - हे भगवन्! आप आत्मा के अतीन्द्रिय आनन्द अमृत के पूर्ण रसास्वादी सच्चे देव हैं। आप भावकर्म, द्रव्यकर्म और नोकर्म के पराकारों से सर्वथा रहित हैं। दुःखदायी विभावों का आप नाश करने वाले हैं। अतः मैं सुख के हेतु सभी सिद्धों को प्रणाम करता हूँ।

अखिना, अभिना अछिना,
सुपरा, अभिदा अखिदा, अविनाशवरा।
यमजाम जरा दुःख जारन हो,
सब सिद्ध नमों सुखकारन हो।। 4।।

भावार्थ - आप खिन्नता रहित, भिन्नता रहित, क्षय रहित, भेद रहित, खेद रहित, अविनाशी और सर्वश्रेष्ठ हैं। आप संसार से संतप्त प्राणियों के मृत्यु, जन्म और जरा के दुःखों को जलाने वाले हैं, मैं सुख के हेतु आप सभी सिद्धों की वन्दना करता हूँ।

निर-आश्रित, स्वाश्रित वासित हो,
पर आश्रित खेद विनाशित हो।
विधि-धारन, हारन, पारन हो,
सब सिद्ध नमों सुखकारन हो।। 5।।

भावार्थ - हे भगवन्! आप निरावलम्बी हैं और सदा अपने ही आश्रित रहते हैं। पर के अवलम्बन से उत्पन्न खिन्नता का आपने नाश कर दिया है। कर्मों को धारण करने वाले अर्थात् कर्मों से घिरे हुए संसारी जीवों का आप पालन करने वाले हैं। अतः मैं सुख के हेतु सभी सिद्ध भगवन्तों को वन्दना करता हूँ अथवा मुक्ति की विधि को धारण करने वालों का आप पालन करने वाले हो।

अमुधा, अछुधा, अद्विधा अविधं,
अकुधा सुसुधा, सुबुधा सुसिधं।

विधि, कानन दहन हुताशन हो,
सब सिद्ध नमों सुख कारण हो।।6।।

भावार्थ - हे भगवन्! आप मोहरहित, क्षुधारहित, दुविधा रहित, विविधता रहित और विविध मिथ्या प्रवृत्तियों से रहित हैं एवं परम अमृतमय कैवल्यरूप सुबुद्धिमय एवं सम्यक् प्रकार गुणमय हैं और कर्मरूपी वन को जलाने के लिए दावानल हैं, अतः मैं सुख के हेतु प्रणाम करता हूँ।

शरनं, चरनं, वरनं, करनं,
धरनं, चरनं, मरनं, हरनं।
तरनं भव वारिधि तारन हो,
सब सिद्ध नमों सुखकारन हो ।।7।।

भावार्थ - हे भगवन्! आपके चरणों की शरण कल्याण करने वाली है और आपके चारित्र का धारण मृत्यु का नाश करने वाला है। आप संसार सागर के तरण-तारण हैं। अतः मैं सुख के हेतु सर्व सिद्धों को नमस्कार करता हूँ।

भववास त्रास विनाशन हो,
दुखरास विनास हुतासन हो।
निज दासन त्रास निवारन हो,
सब सिद्ध नमों सुख कारन हो।।8।।

भावार्थ - हे भगवन्! संसार के निवास से उत्पन्न दुःख का आप नाश करने वाले हो और दुःखों की राशि को नष्ट करने के लिए आप अग्नितुल्य हैं और अपने भक्त (आपके मुक्ति पद पर चलने वाले) के कष्टों का आप निवारण करने वाले हैं। अतः हे सुख के हेतु सिद्ध भगवन् मैं आपके चरणों में शीश झुकाता हूँ।

तुम ध्यावत शाश्वत व्याधि दहै,
तुम पूजत ही पद पूज लहै।
शरणागत ‘संत’ उभारन हो,
सब सिद्ध नमों सुखकारन हो।। 9।।

भावार्थ - हे भगवन्! आपका ध्यान (आपके समान अपनी आत्मा का ध्यान) करने से सदा के लिए भव व्याधि का अंत हो जाता है और आपकी पूजा करने से भी परम पूज्य पद की प्राप्ति होती है। शरण में आये हुए सन्तलाल अथवा शरण में आये हुए ज्ञानियों का आप उद्धार करने वाले हैं, अतः मेरे सुख के हेतु हे सिद्ध भगवन्! मैं आपको वन्दन करता हूँ।

(दोहा)
सिद्धवर्ग गुण अगम है, शेष न पावै पार।
हम किंह विधि वरणन करें, भक्तिभाव उर धार।। 10।।

भावार्थ - सिद्ध भगवान के गुणों का वर्णन असम्भव है, हजार जिह्वाओं द्वारा भी उनके गुणों का पार पाना संभव नहीं है; हम उनके गुणों का वर्णन कैसे करें? केवल भक्ति के वश होकर ही उनके गुणों के वर्णन का प्रयास कर रहे हैं।

तृतीय जयमाल

(दोहा)
पञ्च परमपद ईश है, पञ्चम गति जगदीश।
जगत प्रपञ्च रहित बसे, नमूँ सिद्ध जग ईश।।
परम ब्रह्म परमातमा, परम ज्योति शिवथान।
परमातम पद पाइयो, नमों सिद्ध भगवान।।1।।

भावार्थ - सिद्ध भगवान पञ्च परमेष्ठियों में सर्व महान हैं। पञ्चम गति अर्थात् मुक्ति के स्वामी हैं सदा ही जगत् के प्रपञ्च से रहित रहते हैं। जगत् में सर्वोत्तम उन सिद्ध भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ। भगवान सिद्ध परम ब्रह्म हैं, परमात्मा हैं, परम ज्योति हैं और शिव अर्थात् मुक्ति में निवास करते हैं। उन्होंने परमात्मा का पद प्राप्त किया है। अतः मैं सभी सिद्ध भगवन्तों को प्रणाम करता हूँ।

(कामिनी मोहन)
जन्ममरण कष्ट को टारि अमरा भये,
जरादि रोग-व्याधि परिहार अजरा भये।
जय द्विविधि कर्ममल जार अमला भये,
जय दुविधिटार संसार अचला भये।। 2 ।।

भावार्थ :- हे सिद्ध भगवन्! आप जन्म-मरण के कष्ट का अन्त करके अमर हो गये, बुढ़ापा, रोग और व्याधियों का परिहार करके जरा रहित हो गये, भावकर्म और द्रव्यकर्मरूप दो प्रकार के कर्म विकार का नाश करके निर्मल हो गये और भाव एवं द्रव्य दो प्रकार के संसार का अन्त करके अचल हो गये, हे भगवन्! आप जयवन्त वर्ते।

जय जगतवास तज जगतस्वामी भये,
जय बिनाश नाम थिर परमनामी भये।
जय कुबुद्धिरूप तजि सुबुद्धिरूपा भये,
जय निषधदोष तज सुगुण भूपा भये।। 3 ।।

भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! आप जगत के निवास को छोड़कर भी जगत के स्वामी बने और नाम का विनाश करके सदा के लिए आप परमनामी हो गये, अपने स्वरूप के अज्ञानरूप कुबुद्धि का नाश करके आप कैवल्य की सुबुद्धिरूप हुए हो।

कर्मरिपु नाशकर परम जय पाइये,
लोकत्रयपूरि तुम सुजस घन छाइये।
इन्द्र नागेन्द्र धर शीश तुम पद जजैं,
महा वैरागरसपाग मुनिगण भजैं।। 4 ।।

भावार्थ - हे भगवन्! कर्म वैरी का नाश करके आपने परम विजय प्राप्त की है (जिसकी कभी पराजय नहीं होगी) और तीनों लोक में ही आपके सुयश के बादल छा रहे हैं। इन्द्र और नागेन्द्र आपके चरणों में शीश धरकर आपकी पूजा करते हैं और महान वैराग्य के रस में डूबकर मुनिवृन्द आप ही को भजते हैं।

विघनवन दहन को अघन घन पौन हो,
सघन गुणरास के वास को भौन हो।
शिवतिय वशकरन मोहिनी मन्त्र हो,
काल क्षयकार बेताल के यन्त्र हो।। 5 ।।

भावार्थ - हे भगवन्! विघ्नों के वन का नाश करने के लिए आप दावानल हैं। पापरूपी बादलों के लिए आप प्रचण्ड पवन के समान हैं, अनन्त गुणों की सघन राशि के आप भवन है, शिवनारी को वश में करने के लिए आप वशीकरण मन्त्र के समान हैं और काल (मृत्यु) का क्षय करने के लिए आप बेताल के यंत्र के समान हैं।

कोटिथित क्लेश को मेटि शिवकर रहो,
उपल की नकल हो अचल इकथल रहो।
स्वप्न में हूँ न निज अर्थ को पावहिं,
जे महा खल न तुम ध्यानधरि ध्यावहीं।। 6 ।।

भावार्थ - हे भगवन्! भव के क्लेश की दीर्घ स्थिति को समाप्त करके आप निरन्तर मङ्गलस्वरूप रहते हैं और एक ही स्थान पर इस तरह अचल रहते हैं, मानों पाषाण की प्रतिमा हो। हे भगवन्! जो महादुष्ट प्राणी आपको अपने ध्यान में धारण नहीं करते हैं, वे स्वप्न में भी अपने मनोरथ को प्राप्त नहीं होते हैं।

आपके जाप बिन पाप सब भेटं ही,
पाप की ताप कों पाप कब मेटंही।
संत निज दास की आस पूरी करो,
जगत से काढ़ निज चरण में ले घरो।।7।।

भावार्थ - आपके जाप के बिना समस्त पापों से भेंट होती है और पाप के परिताप को पाप कैसे मिटा सकता है? हे भगवन्! संतलाल आपका दास है, उसकी आशा पूरी करिये और उसे संसार से निकाल कर अपने चरणों में धारिये।

(धत्ता)

जय अमल अनूपं, शुद्धस्वरूपं,
निखिल निरूपं धर्मधरा।
जय विघन नशायक, मंगलदायक,
तिहुँ जगनायक परमपरा।। 8 ।।

भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! आप अमल हैं, अनुपम हैं, शुद्ध हैं और निखिल विश्व में धर्म को धारण करने वाले एकमात्ररूप हैं। आप विघ्नों को नाश करने वाले हैं, मङ्गल देने वाले हैं और तीन लोक के सर्वश्रेष्ठ स्वामी हैं। हे भगवन् आप जयवंत वर्ते!

चतुर्थ जयमाल

(दोहा)
तीर्थङ्कर त्रिभुवन धनी, जा पद करत प्रणाम।
हम किह मुख वर्णन करें, तिन महिमा अभिराम।। 1।।

भावार्थ - तीन लोक के स्वामी तीर्थङ्कर भगवान, भगवान सिद्ध के जिस पद को (भगवान सिद्ध जैसे अपने स्वरूप को) प्रणाम करते हैं अर्थात् निरन्तर अनुभव करते हैं, उन भगवान सिद्ध की मधुर महिमा का हम किस मुख से वर्णन करें।

(चौपाई)
जय भवि-कुमुदन मोदन चंदा,
जय दिनन्द त्रिभवुन अरविंदा।
भव-तप हरण-शरण रस कूपा,
मद ज्वर जरन हरण घनरूपा।। 2।।

भावार्थ - हे भगवन्! भव्य जीवरूपी कुमुदों को खिलाने के लिए आप चन्द्रमा के समान हैं और तीन लोक के प्राणीरूपी कमलों को खिलाने में आप सूर्य के समान हैं। आप जयवन्त वर्तें। भव ताप को नष्ट करने के लिए आपकी शरण शीतल रसकूप तुल्य है और मान के ज्वर की जलन को हरने के लिए आप मेघ स्वरूप हो।

अकथित महिमा अमित अथाई,
निर उपमेय सरसता नांई।
भावलिङ्ग बिन कर्म खिपाई,
द्रव्यलिङ्ग बिन शिव पद पाई।। 3 ।।

नय विभाग बिन वस्तु प्रमाणा,
दयाभाव बिन निज कल्याणा।
पंगु सुमेरु चूलिका परसै,
गुंग गान आरम्भे स्वर सैं॥4॥

यों अजोग कारज नहीं होई,
तुम गुणकथन कठिन है सोई,
सर्व जैन शासन जिनमांहि,
भाग अनंत धरै तुम नाहिं।। 5 ।।

भावार्थ - आपकी महिमा अमिट, अथाह और अकथ्य है। जगत् के किसी भी पदार्थ से उसकी समानता नहीं हो सकती, इसलिए वह अनुपमेय है। हे भगवन्! जैसे कोई भावलिङ्ग धारण किये बिना कर्म का क्षय करना चाहता हो, द्रव्यलिङ्ग के बिना मोक्ष प्राप्त करना चाहता हो, नय विभाग के बिना वस्तु स्वरूप को जानने का प्रयत्न करता हो, दयाभाव के बिना, कल्याण की इच्छा रखता हो, पंगु सुमेरु की चोटी के स्पर्श का उद्यम करता हो और गूँगा मधुर स्वर से गाने का आरम्भ करता हो, तो जैसे ये असम्भव कार्य नहीं हो सकते। उसी प्रकार आपके गुणों की महिमा का कथन भी असम्भव है। सारे ही जैन शासन में जो आपकी महिमा गायी गई है। वह आपके स्वरूप की महिमा का अनन्तवाँ भाग भी नहीं है।

गोखुर में नहिं सिंधु समावे,
वायस लोक अन्त नहीं पावै।
तातें केवलभक्ति भाव तुम,
पावन करो अपावन उर हम।। 6 ।।

भावार्थ - हे भगवन्! गाय के खुर जितने गर्त में समुद्र नहीं समाता है और कौआ कभी भी लोक के अंत को नहीं पाता है, इसी तरह आपके गुणगान में असमर्थ होने पर भी मैं केवल आपकी भक्ति के वश होकर ही आपके गुण गाता हूँ, हमारे हृदय अपवित्र हैं, हे भगवन्! उन्हें पवित्र कीजिए।

जे तुम यश निज मुख उच्चारैं,
तै तिहुँ लोक सुजस विस्तारै।
तुम गुणगान मात्र कर प्रानी,
पावैं सुगुण महा सुखदानी।। 7 ।।

भावार्थ - हे भगवन्! जो जीव अपने मुँह से आपका सुयश गाते हैं, उनका यश तीनों लोक में फैल जाता है। जगत् का जीव मात्र आपका गुणगान करके ही महा सुखदायी सुगुणों को प्राप्त कर लेता है।

जिन चित्त ध्यान सलिल तुम धारा,
ते मुनि तीरथ है निरधारा।
तुम गुण हंस तुम्हीं सरवासी,
वचन जाल में लेत न फाँसी।। 8 ।।

भावार्थ - हे भगवन्! जिन मुनियों ने अपने ध्यानरूपी जल में आपकी प्रतिष्ठा की है, निश्चितरूप में वे मुनि ही सच्चे तीर्थ हैं। आप ही गुणरूपी मोतियों को चुगने वाले हंस हैं और आप ही शुद्धात्मतत्त्व के मानसरोवर में क्रीड़ा करते हैं, अतः आपको वचनों के जाल में नहीं बाँधा जा सकता अर्थात् आपकी महिमा को वचनों से नहीं कहा जा सकता।

जगत बन्धु गुण सिन्धु दयानिधि,
बीजभूत कल्याण सर्वसिधि।
अक्षय शिव-स्वरूप श्रियस्वामी,
पूरण निजानन्द विश्रामी।। 9।।

भावार्थ - हे भगवन्! आप जगत के बन्धु, गुण समुद्र और दया के निधान हैं। आप कल्याण के मूल बीज और सर्वसिद्धिमय हैं। आप अक्षय, शिवस्वरूप और मुक्तिलक्ष्मी के स्वामी हैं और निरन्तर अपने पूर्णानन्द में ही विश्राम करते हैं।

शरणागत सर्वस्व सुहितकर,
जन्म-मरण दुःख आधि-व्याधि हर।
‘संत’ भक्ति तुम हो अनुरागी,
निश्चै अजर अमर पद भागी।। 10।।

भावार्थ - हे भगवन्! आप शरण में आये हुए का परम हित करने वाले सर्वस्व हैं। जन्म एवं मरण के दुःख तथा आधि-व्याधि को हरने वाले हैं क्योंकि संतलाल भी आपकी भक्ति का अनुरागी हुआ है, इसलिए निश्चित ही अजर-अमर पद अर्थात् मुक्ति को प्राप्त करेगा।

(घत्तानंद)
जय जय सुखसागर, सुजस उजागर, गुण गण आगर तारण हो।
जय संत उधारण, विपति विडारण, सुख विस्तारण कारण हो।।

तुम गुण गान परम फलदान, सो मंत्र प्रमान विधान करूँ।
जहरी कर्मनि वैरी की कहरी, असहैरी भव की व्याधि हरूँ।।11।।

भावार्थ - सुख के सागर, लोक व्यापी यश के धनी, गुण समूह के सदन और भव्य जीवों को तारने वाले हैं, सिद्ध भगवान आपकी जय हो। आप सन्तों का उद्धार करने वाले विपत्तियों का नाश करने वाले और सुख की प्राप्ति के एकमात्र कारण हैं। आप जयवन्त वर्तें। आपकी महिमा के गीत परम फल अर्थात् मुक्ति देने वाले हैं। इसलिए मैं मन्त्रों के द्वारा यह विधान करता हूँ और मैं जुल्म करने वाले कर्मों की, जहरीली बेड़ियों को तोड़कर भव की व्याधि का हरण करूँगा।

पंचम जयमाल

(दोहा)
शिव गुण सरघा धार उर, भक्तिभाव है सार।
केवल निज आनन्द करि, करूँ सुजस उच्चार।।

भावार्थ - श्रेष्ठ भक्तिभावपूर्वक हृदय में भगवान सिद्ध के गुणों की श्रद्धा धारण करके, मात्र अपने आनन्द के लिए मैं सिद्ध भगवान का यशोगान करता हूँ।

(पद्धड़ी)
जय मदन कदन मन करण नाश,
जय शांतिरूप निज सुख विलास।
जय कपट सुभट पट करन सूर,
जय लोभ क्षोभ मद दंभ चूर।।1।।

भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! आप काम के निवास मन का नाश करने वाले हैं। शान्तिस्वरूप अपने स्वभाव के सुख का निरन्तर भोग करने वाले हैं। आप कपटरूपी योद्धा को पराजित करने वाले महाशूरवीर और लोभ, क्षोभ, मद और दम्भ को चूर-चूर करने वाले हैं। आपकी जय हो!

पर-परिणतिसों अत्यन्त भिन्न,
निज परिणतिसों अति ही अभिन्न।
अत्यन्त विमल सब ही विशेष,
मल लेश शोध राखो न शेष।। 2।।

भावार्थ - हे भगवन्! आप मोह-राग-द्वेष आदि परभावों से अत्यन्त भिन्न और ज्ञान और आनन्द अपनी परिणति से अत्यन्त अभिन्न हैं। आपके समस्त ही गुणों की पर्यायें निर्मल हो गई हैं और विकार को ढूँढ़-ढूँढ़कर उसका एक अंश भी आपने शेष नहीं रखा है।

मणिदीप सार निर्विघन ज्योत,
स्वाभाविक नित्य उद्योत होत।
त्रैलोक्य शिखर राजत अखण्ड-
सम्पूरण द्युति प्रगटी प्रचण्ड।। 3।।

भावार्थ - हे भगवन्! मणिदीप की तरह आपकी ज्ञान-ज्योति निर्विघ्न अर्थात् अविचल है और किसी सहारे के बिना स्वाभाविक ही नित्य उसका प्रकाश हो रहा है। आप तीन लोक के शिखर पर अचल विराजते हैं और आपका सम्पूर्ण स्वरूप प्रचण्डता से प्रकाशमान हो रहा है।

मुनि मन-मन्दिर को अन्धकार,
तिस ही प्रकाशसौं नशत सार।

सो सुलभ रूप पावै निजार्थ,
जिस कारण भव-भव भ्रमैं व्यर्थ।। 4।।

भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! मुनियों के मन मन्दिर का अन्धकार (रागादि विकार), आपके उस स्वरूप के प्रकाश से ही नष्ट होता है। जगत् के अज्ञानी प्राणियों ने अत्यन्त सुलभ अपने उस अर्थ अर्थात् शुद्ध चैतन्यस्वरूप को प्राप्त नहीं किया इसलिए भव-भव में व्यर्थ भ्रमण कर रहे हैं।

जो कल्प-काल में होत सिद्ध,
तुम छिन घ्यावत लहिये प्रसिद्ध।
भवि पतितन को उद्धार हेत,
हस्तावलंब तुम नाम देत।।5।।

भावार्थ - अनेक कल्पकाल बीत जाने पर भी सिद्धदशा को प्राप्त नहीं होते। वे एक क्षण में ही आपका ध्यान करके मुक्ति को प्राप्त कर लेते हैं। हे भगवन्! संसार में पड़े हुए भव्य जीवों के उद्धार के लिए आपका नाम हस्तावलम्बन के समान है।

तुम गुण सुमिरण सागर अथाह,
गणधर सरीख नहीं पार पाह।
जो भवदधि पार अभव्य रास,
पावे न वृथा उद्यम प्रयास।। 6।।

भावार्थ - हे भगवन्! जैसे अभव्य जीव का भवसागर को पार करने का प्रयत्न वृथा होता है, उसी प्रकार आपके गुणों का सागर अथाह है, गणधर सरीखे भी उसका पार नहीं पाते हैं।

जिन-मुख द्रहसों निकसी अभंग,
अति वेगरूप सिद्धान्त गंग।
नय-सप्त-भंग, कल्लोल मान,
तिहुँ लोक यही धारा प्रमान।। 7।।

भावार्थ - हे भगवन्! आपके भी मुखरूपी दह से जो वेगवती सिद्धान्तरूपी गंगा निर्बाध निकली, उसी गंगा की पवित्रधारा सप्त भङ्ग की कल्लोल करती हुई तीन लोक में बह रही है।

सो द्वादशाङ्ग वाणी विशाल,
ता सुनत पढ़त आनंद रसाल।
यातें जग में तीरथ सुधाम,
कहिलायो है सत्यार्थ नाम।। 8।।

भावार्थ - वही विशाल द्वादशाङ्ग वाणी है, जिसे सुनने और पढ़ने में महान आनन्द होता है, इसलिए जगत् में आपकी दिव्यवाणी तीर्थधाम के नाम से प्रसिद्ध हुई और उसका यह नाम अत्यन्त सार्थक है।

सो तुम ही सों है शोभनीक,
नातर जल सम जु बहै सु ठीक।
निज पर आतमहित आत्मभूत,
जब से है जब उतपत्ति सूत।। 9।।

भावार्थ - वह दिव्यवाणी का तीर्थ आपसे ही सुशोभित हो रहा है, अन्यथा आपके बिना तो वह सामान्य जल के समान है और वह तीर्थ स्व-पर का कल्याण करता हुआ अनादि से ही विद्यमान है।

ज्यों महाशीत ही हिम प्रवाह,
है मेटन समरथ अगनि दाह।
त्यों आप महा मङ्गलस्वरूप,
पर विघन विनाशन सहज रूप।। 10 ।।

भावार्थ - हे भगवन्! जैसे हिम (बर्फ) का महा शीतल प्रवाह ही अग्नि की दाह को मिटाने में समर्थ होता है। उसी प्रकार दूसरों के विघ्नों का सहज ही विनाश करने के लिए आप महान मङ्गल स्वरूप हो।

है ‘सन्त’ दीन तुम भक्ति लीन,
सो निश्चय पावै पद प्रवीण।
तातें मन वच तन भाव धार,
तुम सिद्धनकूं मम नमस्कार।। 11 ।।

भावार्थ - हे भगवन्! निर्बल संतलाल आपकी भक्ति में लीन हुआ है, इसलिए वह निश्चित ही मुक्ति को प्राप्त करेगा अतः मन, वचन, काय से भावपूर्वक मैं आप सभी सिद्धों को नमन करता हूँ।

(दोहा)
जो तुम घ्यावें भावसों, ते पावें निज भाव।
अगनि पाक संयोग करि, शुद्ध सुवर्ण उपाव।। 12 ।।

भावार्थ - हे भगवन्! जो भावपूर्वक आपका ध्यान करते हैं, वे पुरुष अपने स्वभाव को प्राप्त करते हैं जैसे अग्नि का पाक दिया जाने पर सोना शुद्ध हो जाता है। ❖ ❖ ❖

षष्ठम जयमाल

(दोहा)
थावर शब्द विषय धरै त्रस थावर पर्याय।
यो न होय तो तुम सुगुण, हम किह विधि वर्णाय।। 1।।

भावार्थ - स्थावर अर्थात् अचल शब्द (भाषा वर्गणा) चल (शब्दरूप) और अचल (भाषा वर्गणारूप) दो प्रकार की पर्याय को धारण करता है। यदि शब्द में ऐसी शक्ति न हो तो हे भगवन्! हम आपके गुणों का वर्णन कैसे कर सकते हैं।

तिस पर जो कछु कहत है, केवल भक्ति प्रमान।
बालक जल शशि-बिम्ब को, चहत ग्रहण निज पान।।2।।

भावार्थ - इतने पर भी अर्थात् शब्द में ऐसी शक्ति होने पर भी हे भगवन्! हम जो कुछ कहते हैं वह अपनी कहने की शक्ति के कारण नहीं, किन्तु आपकी भक्ति के वशीभूत होकर कहते हैं और हमारा आपकी भक्ति के वश होकर आपका गुणगान करना ठीक ऐसा ही है, जैसे एक बालक जल में पड़ने वाले चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को अपने हाथों से पकड़ना चाहता है।

(पद्धड़ी)
जय पर-निमित्त व्यवहार त्याग,
पायो निज शुद्ध-स्वरूप भाग।
जय जगपालन बिन जगत देव,
जय दया भाव बिन शान्ति भेव।। 3।।

भावार्थ - हे भगवन्! पुण्य और पाप के पराश्रित व्यवहार का अन्त करके आपने अपनी आत्मा के समयसारस्वरूप शुद्ध हिस्से को प्राप्त किया है। जगत् का पालन किये बिना ही आप जगत् के सर्वोत्कृष्ट देव हैं और दया भाव के बिना ही आप शान्ति के आगार हैं, आप जयवन्त वर्तें।

पर सुख-दुख करण कुरीति टार,
पर सुख-दुखकारण शक्तिधार।
पुनि-पुनि नव-नव नित जन्म रीत,
बिन सर्वलोक व्यापी पुनीत॥ 4 ॥

भावार्थ - हे भगवन्! भगवान होकर दूसरे को सुख और दुःख देने की कुरीति को आपने मिटाया है, दूसरे को सुख-दुःख देने की शक्ति को धारण करके पुनः पुनः नया-नया जन्म देने की रीति के बिना ही नीतिमय आपकी पवित्र रीति सारे लोक में फैल रही है।

जय लीला रास विलास नाश,
स्वाभाविक निजपद रमण वास,
शयनासन आदि क्रिया कलाप,
तज सुखी सदा शिवरूप आप॥ 5 ॥

भावार्थ - हे भगवन्! रास लीला की विलासिताओं का नाश करके आप अपने स्वभाव के आनन्दमय स्थल में ही रमण करते हैं सोना और बैठना आदि क्रियाकलापों के अभाव में आप सदा ही अपने शिवस्वरूप में सुखी रहते हैं। आप जयवन्त वर्तें!

बिन कामदाह नहिं नार भोग,
निरद्वंद्व निजानन्द मगन योग,
वरमाल आदि शृङ्गार रूप,
बिन शुद्ध निरञ्जन पद अनूप॥ 6 ॥

भावार्थ - हे भगवन्! काम की पीड़ा और नारी के भोग के बिन ही आप अपने द्वन्द्व रहित आनन्दयोग में निमग्न रहते हैं, वरमाला और शृङ्गार के बिना ही आपका रूप शुद्ध निरञ्जन और अनुपम है।

जय धर्म भर्म वन हन कुठार,
परकाश पुञ्ज चिद्रूपसार।
उपकरण हरण दव सलिलधार,
निजशक्ति प्रभाव उदय अपार।। 7।।

भावार्थ - हे भगवन्! वस्तु स्वभावरूप धर्म के भ्रमरूपी वन को नष्ट करने के लिए आप कुल्हाड़े के समान हो। आप प्रकाश के पुंज और चैतन्यतत्त्व के सार हैं, आपकी जय हो। धर्म के साधनों का नाश करने वाली दावाग्नि के लिए आप सलिल की धारा के समान हैं। आपका शान्ति का प्रभाव प्रगट व पार रहित है।

नभ सीम नहीं अरु होत होउ,
नहीं काल अंत, लहो अंत सोउ।
पर तुम गुण रास अनंत भाग,
अक्षय विधि राजत अवधि त्याग।। 8।।

भावार्थ :- हे भगवन्! आकाश की सीमा नहीं है और हो तो हो; काल का अन्त नहीं है और उसका भी अन्त आ जाये, तो आओ, किन्तु आपके गुणों की राशि का अनन्तवाँ भाग अनन्त काल तक अक्षय शोभायमान रहता है।

आनंद जलधि धारा प्रवाह,
विज्ञानसुरी मुख द्रह अथाह।

निज शांति सुधारस परम खान,
समभाव बीज उत्पत्ति थान॥ 9॥

भावार्थ - हे भगवन्! आप केवल्य गंगा के अथाह द्रह है, जिसकी धारा प्रवाहित होकर आनन्दसागर में जा मिलती है। जो धारा शान्ति सुधारस से भरी हुई है और साम्यभाव के बीजों का उद्गम स्थल है।

निज आत्मलीन विकलप विनाश,
शुद्धोपयोग परिणति प्रकाश।
दृग ज्ञान असाधारण स्वभाव,
स्पर्श आदि परगुण अभाव॥10॥

भावार्थ - विकल्पों का नाश करके आप अपनी शुद्धात्मा में लीन हुए हैं और आपकी शुद्धोपयोग की परिणति प्रगट प्रकाशमान हुई है, आपको आत्मा के असाधारण स्वभाव अनन्त दर्शन और अनन्त ज्ञान अभिव्यक्त हुए हैं और स्पर्श, रसादिक परभावों की सत्ता का आपके स्वरूप में नितान्त अभाव है।

निजगुण पर्यय समुदाय स्वामि,
पायों अखण्ड पद परम धाम।
अव्यय अबाध पद स्वयं सिद्ध,
उपलब्धि रूप धर्मी प्रसिद्ध॥11॥

भावार्थ - हे भगवन्! आप अपने अनन्तगुण पर्यायों के स्वामी हुए हैं और आपने मुक्ति धाम का अखण्ड पद प्राप्त कर लिया है। आप अव्यय, अबाध और स्वयंसिद्ध पद को उपलब्ध करने वाले धर्मी के रूप में प्रसिद्ध हुए हैं।

एकाग्ररूप चिन्ता निरोध,
जो ध्यावैं पावैं स्वयं बोध।
गुणमात्र ‘सन्त’ अनुराग रूप,
यह भाव देहु तुम पद अनूप।। 12।।

भावार्थ - हे भगवन्! जो पुरुष आपके स्वरूप में चित्त को एकाग्र करके आपका ध्यान करते हैं, वह स्वयं ही सम्यक् बोधि को प्राप्त कर लेते हैं, संतलाल तो मात्र आपके गुणों का अनुरागी है, मैं भावना करता हूँ कि आप मुझे अपना अनुपम पद दीजिए।

(दोहा)
सिद्ध सुगुण सुमरण महा, मन्त्रराज है सार।
सर्व सिद्धि दातार है, सर्व विघन हर्तार।। 13।।

भावार्थ - सिद्धों के गुणों का स्मरण ही सर्वमन्त्रों में श्रेष्ठ महामन्त्र है, वह सर्वविघ्नों का हरने वाला और सर्वसिद्धि का देने वाला है।

(दोहा)
तीन लोक चूड़ामणि, सदा रहो जयवन्त।
विघ्न हरण मङ्गलकरण, तुम्हें नमें नित ‘संत’।। 14।।

भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! आप तीन लोक के चूड़ामणि अर्थात् तीन लोक की सर्वोत्तम शोभा हो, आप सदा जयवंत रहे। आप विघ्नों को हरनेवाले और मङ्गल उत्पन्न करनेवाले हैं, मैं सन्तलाल आपको नित्य नमन करता हूँ। ❖ ❖ ❖

सप्तम् जयमाल

(दोहा)
रत्नत्रय भूषित महा, पंच सुगुरु शिवकार।
सकल सुरेन्द्र नमें नमूँ, पाऊँ सो गुणसार।।

भावार्थ - सिद्ध भगवान रत्नत्रय से विभूषित हैं, महान हैं और पञ्च परमेष्ठियों में सर्वश्रेष्ठ एवं मङ्गलकारी हैं। उन्हें समस्त इन्द्र वन्दन करते हैं और मैं भी उनके गुणों के सार को प्राप्त करने के लिए उन्हें नमन करता हूँ।

(पद्धडी)
जय महामोह दल दलन सूर,
जय निर्विकल्प आनन्दपूर।
जय द्वैविध कर्म विमुक्त देव,
जय निजानन्द स्वाधीन एव।।1।।

भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! महामोहरूपी शत्रु की सेना का नाश करने के लिए आप महान योद्धा हैं और निर्विकल्प आनन्द से आप प्रपूरित हैं, आपकी जय हो। आप भावकर्म और द्रव्यकर्म से मुक्त हैं और अपने आत्मोत्पन्न स्वाधीन आनन्द के स्वामी हैं, आप जयवन्त वर्तें।

जय संशयादि भ्रमतम निवार,
जय स्वामिभक्ति द्युति थुति अपार।
जय युगपत सकल प्रत्यक्ष लक्ष,
जय निरावरण निर्मल अनक्ष।।2।।

भावार्थ - हे भगवन्! आपने संशय, विपर्यय, अनध्यवसाय रूप अज्ञान तिमिर का विध्वंस किया है और आप स्व-आत्माश्रित असीम, भक्ति, स्तुति एवं शान्ति के स्वामी हैं। आप लोकालोक को प्रत्यक्ष देखते हैं और आपका केवलज्ञान निरावरण निर्मल और अतीन्द्रिय है।

जय जय जय सुखसागर अगाध,
निरद्वन्द निरामय निर-उपाधि।
जय मन वच तन व्यापार नाश,
जयथिरसरूप निज पद प्रकाश।। 3।।

भावार्थ - हे भगवन्! आप सुख के अथाह सागर हैं एवं द्वैत रहित तथा सर्वव्याधि और उपाधिरहित हैं। आपने मन-वच-काय की क्रिया का नाश करके अपने प्रकाशमान स्वरूप में स्थिरता प्राप्त की है। हे भगवन्! आप बारम्बार जयवन्त वर्तें।

जय पर-निमित्त सुख-दुख निवार,
निरलेप निराश्रय निर्विकार।
निज में पर को पर में न आप,
परवेश न हो नित निर मिलाप।। 4।।

भावार्थ - हे भगवन्! पर के निमित्त से उत्पन्न सुख और दुःख का क्षय करके आप सर्व आवरण रहित अन्य के आश्रय रहित निर्विकार हुए हैं। आप में पर का और पर में आपका कभी प्रवेश नहीं होता और सर्वप्रकार के मिश्रण से रहित आप निरन्तर ही अत्यन्त शुद्ध विराजते हैं। आपकी जय हो!

तुम परम धरम आराध्य सार,
निज सम करि कारण दुर्निवार।
तुम पञ्च परम आचार युक्त,
नित भक्त वर्ग दातार मुत्त।।5।।

भावार्थ - हे भगवन्! आप ही परम धर्म और सर्वश्रेष्ठ आराध्य हैं एवं अपने समान बना लेने वाले अनिवार्य कारण हैं। आप दर्शनाचार, ज्ञानाचार, चारित्राचार, तपाचार और वीर्याचाररूप परम पञ्चाचार से युक्त हैं और भक्तों के वर्ग को मुक्ति का दान करते हैं।

एकादशाङ्ग सर्वाङ्ग पूर्व,
स्वैअनुभव पायो फल अपूर्व।
अन्तर-बाहिर परिग्रह नसाय,
परमारथ साधुपद लहाय॥6॥

भावार्थ - हे भगवन्! ग्यारह अङ्ग और चौदह पूर्व को उपलब्धि आपकी शुद्धात्मानुभूति का ही अपूर्व परिणाम था। आपने अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग परिग्रह का त्याग करके सच्चा साधुत्व प्राप्त किया।

हम पूजत नित उरभक्ति ठान,
पावें निश्चय शिवपद महान।
ज्यों शशि किरणावलि सियर पाय,
मणि चन्द्र कांति द्रवता लहाय।।7।।

भावार्थ - हे भगवन्! जैसे चन्द्रमा की किरणों की शीतलता पाकर चन्द्रकान्तमणि द्रवित हो जाती है, उसी प्रकार आपकी भक्ति से द्रवित हमारा हृदय आपकी पूजा करता है अतः यह निश्चित है कि हम मुक्ति के महान पद को प्राप्त करेंगे।

(घत्तानंद)
जय भव भयहारं, बन्धविडारं, सुखसारं शिव करतारं।
नित ‘संत’ सुध्यावत, पाप नसावत, पावत पद निज अविकारं॥8॥

भावार्थ - भव के भय का हरण करने वाले, बंध को विदीर्ण करने वाले, सुख के सार एवं शिव कर्त्ता हे सिद्ध भगवन्! आपकी जय हो। सन्तलाल निरन्तर आपका ध्यान करता है, पापों का नाश करता है, अतः वह निश्चित ही आपके पवित्र पद को प्राप्त करेगा।

तुम गुण अमल अपार, अनुभवतै भव भय नशै।
‘सन्त’ सदा चित्त धार, शान्ति करो भवतप हरो॥9॥

भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! आपके गुण अत्यन्त पवित्र और अपार हैं, उनका अनुभव करने से भव का भय पलायन कर जाता है। सन्तलाल ने सदा ही आपको अपनी हृदयवेदी में स्थापित किया है। आप मेरी भव की तपन मिटाइये और मुझे शान्ति प्रदान कीजिए।

अष्टम् जयमाल

(दोहा)
होनहार तुम गुण कथन, जीभ द्वार नहीं होय।
काष्ठ पावसैं अनल थल, नाप सके नहीं कोय॥1॥

भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! आप में जो गुण प्रगट हुए हैं, उनका वर्णन जीभ के द्वारा सम्भव नहीं है। जैसे कोई भी पुरुष लकड़ी के पाँव से अग्नि के स्थल का माप नहीं कर सकता।

(दोहा)
सूक्ष्म शुद्ध स्वरूप का, कहना है व्यवहार।
सो व्यवहारातीत है, यातें हम लाचार॥2॥

भावार्थ - हे भगवन्! आपका स्वरूप अत्यन्त शुद्ध और सूक्ष्म है और इसका वर्णन व्यवहार है एवं आपका वह शुद्ध सूक्ष्म स्वरूप व्यवहारनय के द्वारा गम्य नहीं है, इसलिए हम लाचार हैं।

(दोहा)
पै जो हम कछु कहत हैं, शान्ति हेत भगवन्त।
बार-बार थुति करन में, नहिं पुनरुक्त भगवन्त॥3॥

भावार्थ - फिर भी हे भगवन्! हम जो कुछ कहते हैं, वह सब अपनी शान्ति के लिए ही कहते हैं, क्योंकि बार-बार पूज्य पुरुषों की स्तुति करने में पुनरावृत्ति दोष नहीं आता।

(पद्धड़ी)
जय स्वयं शक्ति आधार योग,
जय स्वयं स्वस्थ आनन्द भोग।
जय स्वयं विकास आभास भास,
जय स्वयं सिद्ध निजपद निवास॥4॥

भावार्थ - हे भगवन्! अपनी शक्ति के आधार होने से स्वयं ही योग है, निरन्तर अपने आनन्द में स्थित होने से आप स्वयं ही भोग हैं। अपने विकसित कैवल्य से आप स्वयं ही प्रकाशित हैं और निरन्तर अपने स्वरूप में निवास करने से आप स्वयं सिद्ध हैं। हे भगवन्! आप जयवन्त वर्तें!

जय स्वयंबुद्ध संकल्प टार,
जय स्वयं शुद्ध रागादि जार।
जय स्वयं स्वगुण आचार धार,
जय स्वयं सुखी अक्षय अपार॥5॥

भावार्थ - हे भगवन्! सङ्कल्पों का विनाश कर देने से आप स्वयं ही बुद्ध हैं और रागादि का क्षय हो जाने से आप स्वयं ही शुद्ध हैं, आप स्वयं ही अपने स्वरूप के योग्य आचरण को धारण करते हैं एवं आप स्वयं ही अक्षय और अनन्त सुख के स्वामी हैं। आपकी जय हो!

जय स्वयं चतुष्टय राजमान,
जय स्वयं अनन्त सुगुण निधान।
जय स्वयं स्वस्थ सुस्थिर अयोग,
जय स्वयं स्वरूप मनोग योग॥ 6 ॥

भावार्थ - हे भगवन्! अनन्त चतुष्टय से आप स्वयं ही सुशोभित हैं, स्वयं अनन्त सुगुणों की निधि हैं, योग की चञ्चलता के अभाव में अत्यन्त निष्कम्प हो जाने से आप स्वयं ही स्वस्थ हैं और आप ही अत्यन्त मनोग्य योग स्वरूप हैं। हे भगवन् आप जयवन्त वर्तें!

जय स्वयं स्वच्छ निज ज्ञान पूर,
जय स्वयं वीर्य रिपु वज्र चूर।
जय महा मुनिन आराध्य जान,
जय निपुण मति तत्त्वज्ञमान॥ 7 ॥

भावार्थ - हे भगवन्! आप स्वयं ही अपने स्वच्छ ज्ञान से पूर्ण हैं, वज्र के समान कर्म वैरियों का चूर्ण कर देने से आप स्वयं ही वीर्य हैं। महा मुनियों के आप आराध्य हैं और चतुर तत्त्वज्ञ आपको अपनी श्रद्धा समर्पित करता है, आपकी जय हो!

जय सन्तनि मन आनन्दकार,
जय सज्जन चित्त बल्लभ अपार।

जय सुरगण गावत हर्ष पाय,
जय कवि यश कथन न करि अघाय॥8॥

भावार्थ - हे भगवन्! आप सन्तों के हृदय को आनन्द देते हैं और सज्जन अर्थात् सम्यग्दृष्टि पुरुषों को आप अत्यन्त प्रिय लगते हैं, देव वृन्द आपका गुणगान करके महा हर्षित होते हैं और कवि लोग आपका यशोगान करते हुए तृप्त नहीं होते। हे भगवन्! आपकी जय हो।

तुम महातीर्थ भवि तारण हेत,
तुम महाधर्म उद्धार देत।
तुम महामन्त्र विष विघ्न जार,
अघ रोग रसायन कहो सार॥9॥

भावार्थ - हे भगवन्! आप भव्यों के तिरने के लिए महातीर्थ और उनके उद्धार के लिए आप महाधर्म हैं, आप विघ्नरूपी विष को जलाने के लिए महामन्त्र हैं और पापरूपी रोग का नाश करने के लिए श्रेष्ठ रसायन हैं।

तुम महाशास्त्र का मूल ज्ञेय,
तुम महा तत्त्व हो उपादेय।
तिहुँ लोक महा मङ्गल सु रूप,
लोकत्रय सर्वोत्तम अनूप॥10॥

भावार्थ - हे भगवन्! आप सम्पूर्ण आगम के मात्र प्रतिपादक और आप ही उपादेय स्वरूप महातत्त्व हैं और तीन लोक में महामङ्गल स्वरूप सर्वोत्तम और अनुपम हैं।

तिहुँ लोक शरण अघ हर महान्,
भवि देत परम पद सुख निधान।

संसार महासागर अथाह,
नित जन्म मरण धारा प्रवाह॥11॥

सो काल अनन्त दियो बिताय,
तामें झकोर दुखरूप खाय।
मो दुखी देख उर दया आन,
इम पार करो कर ग्रहण पान॥12॥

भावार्थ - हे भगवन्! पापों का नाश करने वाले तीन लोक में आप ही एकमात्र शरण्य हैं और भव्य जीवों को मुक्ति के श्रेष्ठ पद के सुखों के निधान देने वाले हैं। यह संसाररूपी महासागर बहुत गहरा है और इसमें निरन्तर जन्म-मरण की धाराएँ बहती हैं।

इस संसार महासागर में मैंने दुःख के झकोरे खा-खाकर अनन्त काल बिता दिया। हे भगवन्! मुझे दुःखी देखकर दया कीजिए और मुझे हाथ पकड़कर इस महासागर से पार कीजिए।

तुम ही हो इस पुरुषार्थ जोग,
अरु है अशक्त करि विषय रोग।
सुर नर पशु दास कहे अनन्त,
इनमें से भी इक जान ‘सन्त’॥13॥

भावार्थ - हे भगवन्! मुझे संसार महा सागर से पार लगाने के लिए एकमात्र आप ही समर्थ हैं, अन्य तो विषयों की व्याधि से स्वयं ही अशक्त हैं। देव, मनुष्य और पशु आपके अनन्त दास हैं, सन्तलाल को भी आप उनमें से एक जानिये।

(घत्ता-कवित्त)
जय विघन जलधि जल हनन पवन,
बल सकल पाप मल जारन हो।

जय मोह उपल हन वज्र असल दुख,
अनिल ताप जल कारन हो।।14।।
ज्यूँ पंगु चढ़े गिर, गूंग भरे सुर,
अभुज सिन्धु तर कष्ट भरै।
त्यों तुम थुति काम महा लज ठाम,
सु अन्त ‘सन्त’ परणाम करै।।15।।

भावार्थ - हे भगवन्! विघ्नों के सागर को पार करने के लिए आप बलवान पवन के समान हैं और सम्पूर्ण पाप-मल का नाश करने वाले हैं। मोहरूपी पाषाण का चूर्ण करने के लिए आप असली वज्र और दुःखों की अग्नि के ताप को नष्ट करने के लिए जल के समान हैं।

जैसे पंगु पर्वत पर चढ़ने की चेष्टा करे, गूँगा गीत गाये और हाथ के बिना कोई पुरुष सागर तिरे, तो ये सब कष्ट ही पाते हैं। इसी तरह महानिर्लज्ज होकर आपकी स्तुति करने को उद्धत हुआ में सन्तलाल अन्त में आपको अगणित वन्दन करता हूँ।

(दोहा)
तीन लोक चूड़ामणि, सदा रहो जयवन्त।
विघ्न हरण मङ्गलकरन, तुम्हें नमें नित ‘सन्त’।।16।।

भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! आप तीन लोक के चूड़ामणि अर्थात् तीन लोक की सर्वोत्तम शोभा हैं, आप सदा जयवन्त रहें। आप विघ्नों को हरने वाले और मङ्गल उत्पन्न करने वाले हैं, मैं सन्तलाल आपको नित्य नमन करता हूँ।

।। समाप्त ।।