सिद्धचक्र विधान की जयमाल के अर्थ
प्रथम जयमाल
(दोहा)
जग आरत भारत महा, गारत करि जय पाय।
विजय आरती तिन कहूँ, पुरुषारथ गुणगाय।।
इस पहली जयमाल में अध्यात्म मर्मज्ञ कविवर श्री संतलालजी ने आत्मा को अज्ञान की दुखमय निम्नतम दशा से परमानन्दमय सिद्धावस्था तक पहुँचने की विधि का युद्ध के रूपक द्वारा सजीव चित्रण किया है।
अर्थ - सारा संसार अज्ञान से उत्पन्न कष्टों के महाभारत से दुःखी है। भगवान सिद्ध ने उसे नष्ट करके अपने पराक्रम से उस पर विजय प्राप्त की। संसाररूपी महाभारत महादुःखमय है। भगवान सिद्ध ने उसका अन्त करके उस पर विजय प्राप्त की इसलिए मैं भगवान सिद्ध के पराक्रम पुरुषार्थ का गुणगान करता हुआ उनकी विजय की आरती (स्तोत्र) कहता हूँ अर्थात् उनके गुणों का कीर्तन करता हुआ उनकी विजय की आरती (स्तुति) को कहता हूँ।
(पद्धड़ी)
जय करण कृपाण सु प्रथम बार,
मिथ्यात्व सुभट कीनो प्रहार।
दृढ़ कोट विपर्यय मति उलंघि,
पायो समकित थल थिर अभंग।।1।।
भावार्थ - हे सिद्ध भगवान! आपने पहली ही बार अधःकरण, अपूर्णकरण, अनिवृत्तिकरणरूपी कृपाण (तलवार) से मिथ्यात्व रूपी महान योद्धा (महाभारत का), पर प्रहार करके उसे समाप्त कर दिया। अतः हे भगवान आपकी जय हो! इसके साथ ही विपर्यय मति अर्थात् मिथ्याज्ञानरूपी सुदृढ़ कोट का उल्लंघन करके सम्यक्त्व रूपी स्थिर एवं सुखद स्थान को प्राप्त किया। जो कभी भंग नहीं होता। यहाँ सर्वप्रथम में मिथ्यात्वरूपी योद्धा पर प्रहार किया।
निज पर विवेक अंतर पुनीत,
आतम रुचि वरती राजनीत।
जग विभव विभाव असार एह,
स्वातम सुखरस विपरीत देह॥2॥
भावार्थ - अपने और पर के विवेकरूप सम्यग्ज्ञान के द्वारा पवित्र आत्मा की अन्तररुचि जगाकर राजनीति अर्थात् श्रेष्ठ नीति को प्रसारित किया, वैराग्य को जगाने के लिए आपने यह चिन्तन किया कि संसार का वैभव एवं आत्मा की राग-द्वेषरूप परिणति नितान्त असार है और यह शरीर आत्मा के सुख से रीता होने के कारण विपरीत स्वभाव वाला है।
तिन नाशन लीनो दृढ़ संभार,
शुद्धोपयोग चित्त चरण-सार।
निर्ग्रन्थ कठिन मारग अनूप,
हिंसादिक टारण सुलभ रूप॥ 3 ॥
भावार्थ - हे भगवन्! आपने जगत के वैभव विभाव एवं देह का अभाव करने के लिए चारित्र के लिए सारभूत शुद्धोपयोग को धारण किया। तीर्थंकरों का अनुपम निर्ग्रन्थ मार्ग कठिन तो कहा जाता है, किन्तु हिंसादिक विकारों का तो वह बड़ी सरलता से यूँ ही क्षय कर देता है।
द्वयबीस परीसह सहन वीर,
बहिरंतर संयम धरण धीर।
द्वादश भावन, दशभेद धर्म,
विधि नाशन बारह तप सु पर्म॥ 4॥
भावार्थ - हे भगवन्! आपने नग्न दिगम्बर दीक्षा धारण करके बड़ी वीरता से बाईस परीषहों को सहन किया और शुद्धोपयोग से उत्पन्न धैर्य के द्वारा बाह्य और अभ्यन्तर (निश्चय और व्यवहार) संयम को धारण किया और भावकर्म एवं द्रव्यकर्म का नाश करने के लिए बाहर भावनाओं का चिन्तन तथा दस प्रकार के धर्म और बारह प्रकार के तप को अङ्गीकार किया।
शुभ दयाहेत धरि समिति सार,
मन शुद्ध करण त्रय गुप्ति धार।
एकाकी निर्भय निःसहाय,
विचरो प्रमत्त नाशन उपाय॥ 5॥
भावार्थ - हे भगवन् आपने दया के लिए शुभ समिति को धारण किया और मन के शुद्ध करने के लिए तीन गुप्ति - शुद्धात्मा का सेवन करने के लिए मन वचन काय (गुप्ति) का पालन पश्चात् प्रमत दशा का नाश करने के लिए आपने किसी के साथ के बिना अकेले निर्भय विचरण किया। मुनि महाधीर व वीर एकाकी विचरण करते हैं। यहाँ तक तो प्रमत्त दशा भी अकेले मुक्ति की बढ़ते चरण है।
लखि मोहशत्रु परचंड जोर,
तिस हनन शुकल दल ध्यान जोर।
आनन्द वीर रस हिये छाय,
क्षायक श्रेणी आरंभ थाय॥ 6॥
भावार्थ - जब आपने देखा कि मोह शत्रु का बल बहुत प्रचण्ड है तो आपने उसका नाश करने के लिए शुक्लध्यान की महाबलवती सेना को सक्रिय किया। तब वीर रस से उत्पन्न आनन्द से हृदय भर गया और क्षपक श्रेणी में आरुढ़ हुआ।
बारम गुणथानक ताहि नाश,
तेरम पायों निजपद प्रकाश।
नव केवललब्धि विराजमान,
दैदीप्यमान सोहे सुभान॥ 7॥
भावार्थ - बारहवें गुणस्थान में आपने मोह का सर्वनाश कर दिया और तेरहवें गुणस्थान में अपनी आत्मा के अनन्त वैभव सम्पन्न पद अर्थात् साम्राज्य को प्राप्त किया, तब आप दैदीप्यमान सूर्य की तरह नौ केवल लब्धि, अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख, क्षायिक दान, क्षायिक लाभ, क्षायिक भोग, क्षायिक उपभोग, क्षायिक वीर्य और क्षायिक सम्यक्त्व से सुशोभित हुए।
तिस मोह दुष्ट आज्ञा एकांत,
थी कुमति स्वरूप अनेक भांति।
जिनवाणी करि ताको विहंड,
करि स्याद्वाद आज्ञा प्रचंड।। 8।।
भावार्थ - एकान्तवाद के महादोष से ग्रस्त उस दुष्ट मोह की आज्ञा से अनेक प्रकार की कुमति अर्थात् विविध मत मतान्तररूप मिथ्याज्ञान का प्रवर्तन हो रहा था। आपने अपनी दिव्य वाणी के द्वारा एकान्त के उन विविध रूपों का नाश करके पवित्र स्याद्वाद की प्रचण्ड आज्ञा का प्रवर्तन किया।
वरतायो जग में सुमति रूप,
भविजन पायो आनंद अनूप।
थे मोह नृपति उपकरण शेष,
चारों अघातिया विधि विशेष॥ 9॥
भावार्थ - तब संसार में सुमति (अनेकान्त स्वरूप सम्यग्ज्ञान) का प्रवर्तन हुआ और भव्य जीवों ने अपनी शुद्धात्मा के आश्रय से अनुपम आनन्द प्राप्त किया। इसके बाद हे भगवन्! चार अघातिया कर्मों के रूप में मोह राजा के जो उपकरण (सामान) शेष थे। (शेष दशवाँ छन्द में)
है नृपति सनातन रीति एह,
अरि विमुख न राखे नाम तेह।
यो तिन नाशन उद्यम सुठानि,
आरंभ्यो परम शुकल सु ध्यान॥10॥
भावार्थ - उनका नाश करने के लिए आपने परम शुक्ल ध्यान का उपक्रम शुरू किया क्योंकि राजाओं की सदा से ही यह रीति रही है कि अपने विमुख जो शत्रु होता है उसका नाम निशान भी नहीं रखते।
तिस बलकरि तिनकी थिति विनाश,
पायो निर्भय सुख निधि निवास।
यह अक्षय जोत लई अबाधि,
पुनि अंश न व्यापो शत्रु व्याध॥11॥
भावार्थ - शुक्लध्यान के बल से उन अघातिया कर्मों की स्थिति का नाश करके आपने अनन्त सुखों का निधान, निर्भय निवास (अनन्त सुख सम्पन्न अपनी सत्ता में विश्राम) प्राप्त किया और सर्व बाधा रहित अक्षय अखण्ड ज्योति (अक्षय आनन्द मय केवलज्ञान) आपने उपलब्ध की, इसके पश्चात् अनन्त काल तक शत्रु की थोड़ी भी बाधा का अनुभव नहीं हुआ।
शाश्वत स्वाश्रित सुख श्रेय स्वामि,
है शांति संत तुम कर प्रणाम।
अन्तिम पुरुषारथ फल विशाल,
तुम विलसौ सुखसौ अमित काल॥12॥
भावार्थ - हे भगवन्! आप अपनी आत्माश्रित सुख लक्ष्मी के शाश्वत् स्वामी बन गये। मैं संतलाल इसी शाश्वत शान्ति के लिए आपको प्रणाम करता हूँ। हे भगवन् उस अन्तिम पुरुषार्थ का ही यह महा फल है कि आप अनंतकाल तक सुख में विलास करते रहेंगे।
(घत्ता)
परसमय विदूरित पूरित निज सुख समयसार चेतनरूपा।
नाना प्रकार पर का विकार सब टार लसै सब गुणभूपा॥13॥
ते निरावर्ण निर्देह निरूपम सिद्धचक्र परसिद्ध जजूँ।
सुर मुनि नित ध्यावै आनंद पावैं, मैं पूजत भव भार तजूँ।।
भावार्थ - भगवान सिद्ध परसमय प्रवृत्ति अर्थात् मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, मिध्याचारित्र से रहित है। अपने सुख से परिपूर्ण है और चैतन्यस्वरूप समयसार हैं, पर स्वभावरूप विविध प्रकार के विकार का नाश करके अपने सर्वगुणों के सम्राट के रूप में सुशोभित होते हैं, वे भावकर्म, द्रव्यकर्म, नोकर्म के सर्व आवरण रहित हैं। अशरीरी है और उपमा रहित है। अतः मैं उन प्रसिद्ध सिद्धों के समूह की पूजा करता हूँ। देव और मुनिराज भी नित्य उनका ध्यान करते हैं और आनन्द प्राप्त करते हैं। मैं भी उन भगवान सिद्ध की पूजा करता हुआ भव के भार से मुक्त हो जाऊँ - ऐसी मेरी कामना है। ❖❖❖
द्वितीय जयमाल
(दोहा)
पञ्च परम परमात्मा, रहित कर्म के फन्द।
जग प्रपञ्च विरहित सदा, नमों सिद्ध सुख कन्द।।1।।
भावार्थ - सिद्ध भगवान पञ्च परमेष्ठियों में परम परमात्मा हैं। वे कर्म के बंधनों से रहित हैं, जगत् के विस्तार से सदा ही अलग रहते हैं। ऐसे सुख के निकेतन सिद्ध परमात्माओं को मैं नमन करता हूँ।
दुखकारन द्वेष विडारन हो,
वश डारन राग निवारन हो।
भवितारन पूरण कारण हो,
सब सिद्ध नमों सुखकारन हो।। 2 ।।
भावार्थ - हे सिद्ध परमात्मा! दुःख का कारण जो द्वेष है, उसका आपने नाश कर दिया है और सारे जगत को वश में करने वाले राग को आपने समाप्त कर दिया है। भव्य जीवों के लिए आप पूर्ण कारण हैं। ऐसे सुख के हेतु सिद्ध परमात्माओं को मैं नमस्कार करता हूँ।
समयामृत पूरित देव सही,
पर आकृत मूरति लेश नहीं।
विपरीत विभाव निवारन हो,
सब सिद्ध नमों सुखकारन हो।। 3 ।।
भावार्थ - हे भगवन्! आप आत्मा के अतीन्द्रिय आनन्द अमृत के पूर्ण रसास्वादी सच्चे देव हैं। आप भावकर्म, द्रव्यकर्म और नोकर्म के पराकारों से सर्वथा रहित हैं। दुःखदायी विभावों का आप नाश करने वाले हैं। अतः मैं सुख के हेतु सभी सिद्धों को प्रणाम करता हूँ।
अखिना, अभिना अछिना,
सुपरा, अभिदा अखिदा, अविनाशवरा।
यमजाम जरा दुःख जारन हो,
सब सिद्ध नमों सुखकारन हो।। 4।।
भावार्थ - आप खिन्नता रहित, भिन्नता रहित, क्षय रहित, भेद रहित, खेद रहित, अविनाशी और सर्वश्रेष्ठ हैं। आप संसार से संतप्त प्राणियों के मृत्यु, जन्म और जरा के दुःखों को जलाने वाले हैं, मैं सुख के हेतु आप सभी सिद्धों की वन्दना करता हूँ।
निर-आश्रित, स्वाश्रित वासित हो,
पर आश्रित खेद विनाशित हो।
विधि-धारन, हारन, पारन हो,
सब सिद्ध नमों सुखकारन हो।। 5।।
भावार्थ - हे भगवन्! आप निरावलम्बी हैं और सदा अपने ही आश्रित रहते हैं। पर के अवलम्बन से उत्पन्न खिन्नता का आपने नाश कर दिया है। कर्मों को धारण करने वाले अर्थात् कर्मों से घिरे हुए संसारी जीवों का आप पालन करने वाले हैं। अतः मैं सुख के हेतु सभी सिद्ध भगवन्तों को वन्दना करता हूँ अथवा मुक्ति की विधि को धारण करने वालों का आप पालन करने वाले हो।
अमुधा, अछुधा, अद्विधा अविधं,
अकुधा सुसुधा, सुबुधा सुसिधं।
विधि, कानन दहन हुताशन हो,
सब सिद्ध नमों सुख कारण हो।।6।।
भावार्थ - हे भगवन्! आप मोहरहित, क्षुधारहित, दुविधा रहित, विविधता रहित और विविध मिथ्या प्रवृत्तियों से रहित हैं एवं परम अमृतमय कैवल्यरूप सुबुद्धिमय एवं सम्यक् प्रकार गुणमय हैं और कर्मरूपी वन को जलाने के लिए दावानल हैं, अतः मैं सुख के हेतु प्रणाम करता हूँ।
शरनं, चरनं, वरनं, करनं,
धरनं, चरनं, मरनं, हरनं।
तरनं भव वारिधि तारन हो,
सब सिद्ध नमों सुखकारन हो ।।7।।
भावार्थ - हे भगवन्! आपके चरणों की शरण कल्याण करने वाली है और आपके चारित्र का धारण मृत्यु का नाश करने वाला है। आप संसार सागर के तरण-तारण हैं। अतः मैं सुख के हेतु सर्व सिद्धों को नमस्कार करता हूँ।
भववास त्रास विनाशन हो,
दुखरास विनास हुतासन हो।
निज दासन त्रास निवारन हो,
सब सिद्ध नमों सुख कारन हो।।8।।
भावार्थ - हे भगवन्! संसार के निवास से उत्पन्न दुःख का आप नाश करने वाले हो और दुःखों की राशि को नष्ट करने के लिए आप अग्नितुल्य हैं और अपने भक्त (आपके मुक्ति पद पर चलने वाले) के कष्टों का आप निवारण करने वाले हैं। अतः हे सुख के हेतु सिद्ध भगवन् मैं आपके चरणों में शीश झुकाता हूँ।
तुम ध्यावत शाश्वत व्याधि दहै,
तुम पूजत ही पद पूज लहै।
शरणागत ‘संत’ उभारन हो,
सब सिद्ध नमों सुखकारन हो।। 9।।
भावार्थ - हे भगवन्! आपका ध्यान (आपके समान अपनी आत्मा का ध्यान) करने से सदा के लिए भव व्याधि का अंत हो जाता है और आपकी पूजा करने से भी परम पूज्य पद की प्राप्ति होती है। शरण में आये हुए सन्तलाल अथवा शरण में आये हुए ज्ञानियों का आप उद्धार करने वाले हैं, अतः मेरे सुख के हेतु हे सिद्ध भगवन्! मैं आपको वन्दन करता हूँ।
(दोहा)
सिद्धवर्ग गुण अगम है, शेष न पावै पार।
हम किंह विधि वरणन करें, भक्तिभाव उर धार।। 10।।
भावार्थ - सिद्ध भगवान के गुणों का वर्णन असम्भव है, हजार जिह्वाओं द्वारा भी उनके गुणों का पार पाना संभव नहीं है; हम उनके गुणों का वर्णन कैसे करें? केवल भक्ति के वश होकर ही उनके गुणों के वर्णन का प्रयास कर रहे हैं।
तृतीय जयमाल
(दोहा)
पञ्च परमपद ईश है, पञ्चम गति जगदीश।
जगत प्रपञ्च रहित बसे, नमूँ सिद्ध जग ईश।।
परम ब्रह्म परमातमा, परम ज्योति शिवथान।
परमातम पद पाइयो, नमों सिद्ध भगवान।।1।।
भावार्थ - सिद्ध भगवान पञ्च परमेष्ठियों में सर्व महान हैं। पञ्चम गति अर्थात् मुक्ति के स्वामी हैं सदा ही जगत् के प्रपञ्च से रहित रहते हैं। जगत् में सर्वोत्तम उन सिद्ध भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ। भगवान सिद्ध परम ब्रह्म हैं, परमात्मा हैं, परम ज्योति हैं और शिव अर्थात् मुक्ति में निवास करते हैं। उन्होंने परमात्मा का पद प्राप्त किया है। अतः मैं सभी सिद्ध भगवन्तों को प्रणाम करता हूँ।
(कामिनी मोहन)
जन्ममरण कष्ट को टारि अमरा भये,
जरादि रोग-व्याधि परिहार अजरा भये।
जय द्विविधि कर्ममल जार अमला भये,
जय दुविधिटार संसार अचला भये।। 2 ।।
भावार्थ :- हे सिद्ध भगवन्! आप जन्म-मरण के कष्ट का अन्त करके अमर हो गये, बुढ़ापा, रोग और व्याधियों का परिहार करके जरा रहित हो गये, भावकर्म और द्रव्यकर्मरूप दो प्रकार के कर्म विकार का नाश करके निर्मल हो गये और भाव एवं द्रव्य दो प्रकार के संसार का अन्त करके अचल हो गये, हे भगवन्! आप जयवन्त वर्ते।
जय जगतवास तज जगतस्वामी भये,
जय बिनाश नाम थिर परमनामी भये।
जय कुबुद्धिरूप तजि सुबुद्धिरूपा भये,
जय निषधदोष तज सुगुण भूपा भये।। 3 ।।
भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! आप जगत के निवास को छोड़कर भी जगत के स्वामी बने और नाम का विनाश करके सदा के लिए आप परमनामी हो गये, अपने स्वरूप के अज्ञानरूप कुबुद्धि का नाश करके आप कैवल्य की सुबुद्धिरूप हुए हो।
कर्मरिपु नाशकर परम जय पाइये,
लोकत्रयपूरि तुम सुजस घन छाइये।
इन्द्र नागेन्द्र धर शीश तुम पद जजैं,
महा वैरागरसपाग मुनिगण भजैं।। 4 ।।
भावार्थ - हे भगवन्! कर्म वैरी का नाश करके आपने परम विजय प्राप्त की है (जिसकी कभी पराजय नहीं होगी) और तीनों लोक में ही आपके सुयश के बादल छा रहे हैं। इन्द्र और नागेन्द्र आपके चरणों में शीश धरकर आपकी पूजा करते हैं और महान वैराग्य के रस में डूबकर मुनिवृन्द आप ही को भजते हैं।
विघनवन दहन को अघन घन पौन हो,
सघन गुणरास के वास को भौन हो।
शिवतिय वशकरन मोहिनी मन्त्र हो,
काल क्षयकार बेताल के यन्त्र हो।। 5 ।।
भावार्थ - हे भगवन्! विघ्नों के वन का नाश करने के लिए आप दावानल हैं। पापरूपी बादलों के लिए आप प्रचण्ड पवन के समान हैं, अनन्त गुणों की सघन राशि के आप भवन है, शिवनारी को वश में करने के लिए आप वशीकरण मन्त्र के समान हैं और काल (मृत्यु) का क्षय करने के लिए आप बेताल के यंत्र के समान हैं।
कोटिथित क्लेश को मेटि शिवकर रहो,
उपल की नकल हो अचल इकथल रहो।
स्वप्न में हूँ न निज अर्थ को पावहिं,
जे महा खल न तुम ध्यानधरि ध्यावहीं।। 6 ।।
भावार्थ - हे भगवन्! भव के क्लेश की दीर्घ स्थिति को समाप्त करके आप निरन्तर मङ्गलस्वरूप रहते हैं और एक ही स्थान पर इस तरह अचल रहते हैं, मानों पाषाण की प्रतिमा हो। हे भगवन्! जो महादुष्ट प्राणी आपको अपने ध्यान में धारण नहीं करते हैं, वे स्वप्न में भी अपने मनोरथ को प्राप्त नहीं होते हैं।
आपके जाप बिन पाप सब भेटं ही,
पाप की ताप कों पाप कब मेटंही।
संत निज दास की आस पूरी करो,
जगत से काढ़ निज चरण में ले घरो।।7।।
भावार्थ - आपके जाप के बिना समस्त पापों से भेंट होती है और पाप के परिताप को पाप कैसे मिटा सकता है? हे भगवन्! संतलाल आपका दास है, उसकी आशा पूरी करिये और उसे संसार से निकाल कर अपने चरणों में धारिये।
(धत्ता)
जय अमल अनूपं, शुद्धस्वरूपं,
निखिल निरूपं धर्मधरा।
जय विघन नशायक, मंगलदायक,
तिहुँ जगनायक परमपरा।। 8 ।।
भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! आप अमल हैं, अनुपम हैं, शुद्ध हैं और निखिल विश्व में धर्म को धारण करने वाले एकमात्ररूप हैं। आप विघ्नों को नाश करने वाले हैं, मङ्गल देने वाले हैं और तीन लोक के सर्वश्रेष्ठ स्वामी हैं। हे भगवन् आप जयवंत वर्ते!
चतुर्थ जयमाल
(दोहा)
तीर्थङ्कर त्रिभुवन धनी, जा पद करत प्रणाम।
हम किह मुख वर्णन करें, तिन महिमा अभिराम।। 1।।
भावार्थ - तीन लोक के स्वामी तीर्थङ्कर भगवान, भगवान सिद्ध के जिस पद को (भगवान सिद्ध जैसे अपने स्वरूप को) प्रणाम करते हैं अर्थात् निरन्तर अनुभव करते हैं, उन भगवान सिद्ध की मधुर महिमा का हम किस मुख से वर्णन करें।
(चौपाई)
जय भवि-कुमुदन मोदन चंदा,
जय दिनन्द त्रिभवुन अरविंदा।
भव-तप हरण-शरण रस कूपा,
मद ज्वर जरन हरण घनरूपा।। 2।।
भावार्थ - हे भगवन्! भव्य जीवरूपी कुमुदों को खिलाने के लिए आप चन्द्रमा के समान हैं और तीन लोक के प्राणीरूपी कमलों को खिलाने में आप सूर्य के समान हैं। आप जयवन्त वर्तें। भव ताप को नष्ट करने के लिए आपकी शरण शीतल रसकूप तुल्य है और मान के ज्वर की जलन को हरने के लिए आप मेघ स्वरूप हो।
अकथित महिमा अमित अथाई,
निर उपमेय सरसता नांई।
भावलिङ्ग बिन कर्म खिपाई,
द्रव्यलिङ्ग बिन शिव पद पाई।। 3 ।।
नय विभाग बिन वस्तु प्रमाणा,
दयाभाव बिन निज कल्याणा।
पंगु सुमेरु चूलिका परसै,
गुंग गान आरम्भे स्वर सैं॥4॥
यों अजोग कारज नहीं होई,
तुम गुणकथन कठिन है सोई,
सर्व जैन शासन जिनमांहि,
भाग अनंत धरै तुम नाहिं।। 5 ।।
भावार्थ - आपकी महिमा अमिट, अथाह और अकथ्य है। जगत् के किसी भी पदार्थ से उसकी समानता नहीं हो सकती, इसलिए वह अनुपमेय है। हे भगवन्! जैसे कोई भावलिङ्ग धारण किये बिना कर्म का क्षय करना चाहता हो, द्रव्यलिङ्ग के बिना मोक्ष प्राप्त करना चाहता हो, नय विभाग के बिना वस्तु स्वरूप को जानने का प्रयत्न करता हो, दयाभाव के बिना, कल्याण की इच्छा रखता हो, पंगु सुमेरु की चोटी के स्पर्श का उद्यम करता हो और गूँगा मधुर स्वर से गाने का आरम्भ करता हो, तो जैसे ये असम्भव कार्य नहीं हो सकते। उसी प्रकार आपके गुणों की महिमा का कथन भी असम्भव है। सारे ही जैन शासन में जो आपकी महिमा गायी गई है। वह आपके स्वरूप की महिमा का अनन्तवाँ भाग भी नहीं है।
गोखुर में नहिं सिंधु समावे,
वायस लोक अन्त नहीं पावै।
तातें केवलभक्ति भाव तुम,
पावन करो अपावन उर हम।। 6 ।।
भावार्थ - हे भगवन्! गाय के खुर जितने गर्त में समुद्र नहीं समाता है और कौआ कभी भी लोक के अंत को नहीं पाता है, इसी तरह आपके गुणगान में असमर्थ होने पर भी मैं केवल आपकी भक्ति के वश होकर ही आपके गुण गाता हूँ, हमारे हृदय अपवित्र हैं, हे भगवन्! उन्हें पवित्र कीजिए।
जे तुम यश निज मुख उच्चारैं,
तै तिहुँ लोक सुजस विस्तारै।
तुम गुणगान मात्र कर प्रानी,
पावैं सुगुण महा सुखदानी।। 7 ।।
भावार्थ - हे भगवन्! जो जीव अपने मुँह से आपका सुयश गाते हैं, उनका यश तीनों लोक में फैल जाता है। जगत् का जीव मात्र आपका गुणगान करके ही महा सुखदायी सुगुणों को प्राप्त कर लेता है।
जिन चित्त ध्यान सलिल तुम धारा,
ते मुनि तीरथ है निरधारा।
तुम गुण हंस तुम्हीं सरवासी,
वचन जाल में लेत न फाँसी।। 8 ।।
भावार्थ - हे भगवन्! जिन मुनियों ने अपने ध्यानरूपी जल में आपकी प्रतिष्ठा की है, निश्चितरूप में वे मुनि ही सच्चे तीर्थ हैं। आप ही गुणरूपी मोतियों को चुगने वाले हंस हैं और आप ही शुद्धात्मतत्त्व के मानसरोवर में क्रीड़ा करते हैं, अतः आपको वचनों के जाल में नहीं बाँधा जा सकता अर्थात् आपकी महिमा को वचनों से नहीं कहा जा सकता।
जगत बन्धु गुण सिन्धु दयानिधि,
बीजभूत कल्याण सर्वसिधि।
अक्षय शिव-स्वरूप श्रियस्वामी,
पूरण निजानन्द विश्रामी।। 9।।
भावार्थ - हे भगवन्! आप जगत के बन्धु, गुण समुद्र और दया के निधान हैं। आप कल्याण के मूल बीज और सर्वसिद्धिमय हैं। आप अक्षय, शिवस्वरूप और मुक्तिलक्ष्मी के स्वामी हैं और निरन्तर अपने पूर्णानन्द में ही विश्राम करते हैं।
शरणागत सर्वस्व सुहितकर,
जन्म-मरण दुःख आधि-व्याधि हर।
‘संत’ भक्ति तुम हो अनुरागी,
निश्चै अजर अमर पद भागी।। 10।।
भावार्थ - हे भगवन्! आप शरण में आये हुए का परम हित करने वाले सर्वस्व हैं। जन्म एवं मरण के दुःख तथा आधि-व्याधि को हरने वाले हैं क्योंकि संतलाल भी आपकी भक्ति का अनुरागी हुआ है, इसलिए निश्चित ही अजर-अमर पद अर्थात् मुक्ति को प्राप्त करेगा।
(घत्तानंद)
जय जय सुखसागर, सुजस उजागर, गुण गण आगर तारण हो।
जय संत उधारण, विपति विडारण, सुख विस्तारण कारण हो।।
तुम गुण गान परम फलदान, सो मंत्र प्रमान विधान करूँ।
जहरी कर्मनि वैरी की कहरी, असहैरी भव की व्याधि हरूँ।।11।।
भावार्थ - सुख के सागर, लोक व्यापी यश के धनी, गुण समूह के सदन और भव्य जीवों को तारने वाले हैं, सिद्ध भगवान आपकी जय हो। आप सन्तों का उद्धार करने वाले विपत्तियों का नाश करने वाले और सुख की प्राप्ति के एकमात्र कारण हैं। आप जयवन्त वर्तें। आपकी महिमा के गीत परम फल अर्थात् मुक्ति देने वाले हैं। इसलिए मैं मन्त्रों के द्वारा यह विधान करता हूँ और मैं जुल्म करने वाले कर्मों की, जहरीली बेड़ियों को तोड़कर भव की व्याधि का हरण करूँगा।
पंचम जयमाल
(दोहा)
शिव गुण सरघा धार उर, भक्तिभाव है सार।
केवल निज आनन्द करि, करूँ सुजस उच्चार।।
भावार्थ - श्रेष्ठ भक्तिभावपूर्वक हृदय में भगवान सिद्ध के गुणों की श्रद्धा धारण करके, मात्र अपने आनन्द के लिए मैं सिद्ध भगवान का यशोगान करता हूँ।
(पद्धड़ी)
जय मदन कदन मन करण नाश,
जय शांतिरूप निज सुख विलास।
जय कपट सुभट पट करन सूर,
जय लोभ क्षोभ मद दंभ चूर।।1।।
भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! आप काम के निवास मन का नाश करने वाले हैं। शान्तिस्वरूप अपने स्वभाव के सुख का निरन्तर भोग करने वाले हैं। आप कपटरूपी योद्धा को पराजित करने वाले महाशूरवीर और लोभ, क्षोभ, मद और दम्भ को चूर-चूर करने वाले हैं। आपकी जय हो!
पर-परिणतिसों अत्यन्त भिन्न,
निज परिणतिसों अति ही अभिन्न।
अत्यन्त विमल सब ही विशेष,
मल लेश शोध राखो न शेष।। 2।।
भावार्थ - हे भगवन्! आप मोह-राग-द्वेष आदि परभावों से अत्यन्त भिन्न और ज्ञान और आनन्द अपनी परिणति से अत्यन्त अभिन्न हैं। आपके समस्त ही गुणों की पर्यायें निर्मल हो गई हैं और विकार को ढूँढ़-ढूँढ़कर उसका एक अंश भी आपने शेष नहीं रखा है।
मणिदीप सार निर्विघन ज्योत,
स्वाभाविक नित्य उद्योत होत।
त्रैलोक्य शिखर राजत अखण्ड-
सम्पूरण द्युति प्रगटी प्रचण्ड।। 3।।
भावार्थ - हे भगवन्! मणिदीप की तरह आपकी ज्ञान-ज्योति निर्विघ्न अर्थात् अविचल है और किसी सहारे के बिना स्वाभाविक ही नित्य उसका प्रकाश हो रहा है। आप तीन लोक के शिखर पर अचल विराजते हैं और आपका सम्पूर्ण स्वरूप प्रचण्डता से प्रकाशमान हो रहा है।
मुनि मन-मन्दिर को अन्धकार,
तिस ही प्रकाशसौं नशत सार।
सो सुलभ रूप पावै निजार्थ,
जिस कारण भव-भव भ्रमैं व्यर्थ।। 4।।
भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! मुनियों के मन मन्दिर का अन्धकार (रागादि विकार), आपके उस स्वरूप के प्रकाश से ही नष्ट होता है। जगत् के अज्ञानी प्राणियों ने अत्यन्त सुलभ अपने उस अर्थ अर्थात् शुद्ध चैतन्यस्वरूप को प्राप्त नहीं किया इसलिए भव-भव में व्यर्थ भ्रमण कर रहे हैं।
जो कल्प-काल में होत सिद्ध,
तुम छिन घ्यावत लहिये प्रसिद्ध।
भवि पतितन को उद्धार हेत,
हस्तावलंब तुम नाम देत।।5।।
भावार्थ - अनेक कल्पकाल बीत जाने पर भी सिद्धदशा को प्राप्त नहीं होते। वे एक क्षण में ही आपका ध्यान करके मुक्ति को प्राप्त कर लेते हैं। हे भगवन्! संसार में पड़े हुए भव्य जीवों के उद्धार के लिए आपका नाम हस्तावलम्बन के समान है।
तुम गुण सुमिरण सागर अथाह,
गणधर सरीख नहीं पार पाह।
जो भवदधि पार अभव्य रास,
पावे न वृथा उद्यम प्रयास।। 6।।
भावार्थ - हे भगवन्! जैसे अभव्य जीव का भवसागर को पार करने का प्रयत्न वृथा होता है, उसी प्रकार आपके गुणों का सागर अथाह है, गणधर सरीखे भी उसका पार नहीं पाते हैं।
जिन-मुख द्रहसों निकसी अभंग,
अति वेगरूप सिद्धान्त गंग।
नय-सप्त-भंग, कल्लोल मान,
तिहुँ लोक यही धारा प्रमान।। 7।।
भावार्थ - हे भगवन्! आपके भी मुखरूपी दह से जो वेगवती सिद्धान्तरूपी गंगा निर्बाध निकली, उसी गंगा की पवित्रधारा सप्त भङ्ग की कल्लोल करती हुई तीन लोक में बह रही है।
सो द्वादशाङ्ग वाणी विशाल,
ता सुनत पढ़त आनंद रसाल।
यातें जग में तीरथ सुधाम,
कहिलायो है सत्यार्थ नाम।। 8।।
भावार्थ - वही विशाल द्वादशाङ्ग वाणी है, जिसे सुनने और पढ़ने में महान आनन्द होता है, इसलिए जगत् में आपकी दिव्यवाणी तीर्थधाम के नाम से प्रसिद्ध हुई और उसका यह नाम अत्यन्त सार्थक है।
सो तुम ही सों है शोभनीक,
नातर जल सम जु बहै सु ठीक।
निज पर आतमहित आत्मभूत,
जब से है जब उतपत्ति सूत।। 9।।
भावार्थ - वह दिव्यवाणी का तीर्थ आपसे ही सुशोभित हो रहा है, अन्यथा आपके बिना तो वह सामान्य जल के समान है और वह तीर्थ स्व-पर का कल्याण करता हुआ अनादि से ही विद्यमान है।
ज्यों महाशीत ही हिम प्रवाह,
है मेटन समरथ अगनि दाह।
त्यों आप महा मङ्गलस्वरूप,
पर विघन विनाशन सहज रूप।। 10 ।।
भावार्थ - हे भगवन्! जैसे हिम (बर्फ) का महा शीतल प्रवाह ही अग्नि की दाह को मिटाने में समर्थ होता है। उसी प्रकार दूसरों के विघ्नों का सहज ही विनाश करने के लिए आप महान मङ्गल स्वरूप हो।
है ‘सन्त’ दीन तुम भक्ति लीन,
सो निश्चय पावै पद प्रवीण।
तातें मन वच तन भाव धार,
तुम सिद्धनकूं मम नमस्कार।। 11 ।।
भावार्थ - हे भगवन्! निर्बल संतलाल आपकी भक्ति में लीन हुआ है, इसलिए वह निश्चित ही मुक्ति को प्राप्त करेगा अतः मन, वचन, काय से भावपूर्वक मैं आप सभी सिद्धों को नमन करता हूँ।
(दोहा)
जो तुम घ्यावें भावसों, ते पावें निज भाव।
अगनि पाक संयोग करि, शुद्ध सुवर्ण उपाव।। 12 ।।
भावार्थ - हे भगवन्! जो भावपूर्वक आपका ध्यान करते हैं, वे पुरुष अपने स्वभाव को प्राप्त करते हैं जैसे अग्नि का पाक दिया जाने पर सोना शुद्ध हो जाता है। ❖ ❖ ❖
षष्ठम जयमाल
(दोहा)
थावर शब्द विषय धरै त्रस थावर पर्याय।
यो न होय तो तुम सुगुण, हम किह विधि वर्णाय।। 1।।
भावार्थ - स्थावर अर्थात् अचल शब्द (भाषा वर्गणा) चल (शब्दरूप) और अचल (भाषा वर्गणारूप) दो प्रकार की पर्याय को धारण करता है। यदि शब्द में ऐसी शक्ति न हो तो हे भगवन्! हम आपके गुणों का वर्णन कैसे कर सकते हैं।
तिस पर जो कछु कहत है, केवल भक्ति प्रमान।
बालक जल शशि-बिम्ब को, चहत ग्रहण निज पान।।2।।
भावार्थ - इतने पर भी अर्थात् शब्द में ऐसी शक्ति होने पर भी हे भगवन्! हम जो कुछ कहते हैं वह अपनी कहने की शक्ति के कारण नहीं, किन्तु आपकी भक्ति के वशीभूत होकर कहते हैं और हमारा आपकी भक्ति के वश होकर आपका गुणगान करना ठीक ऐसा ही है, जैसे एक बालक जल में पड़ने वाले चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को अपने हाथों से पकड़ना चाहता है।
(पद्धड़ी)
जय पर-निमित्त व्यवहार त्याग,
पायो निज शुद्ध-स्वरूप भाग।
जय जगपालन बिन जगत देव,
जय दया भाव बिन शान्ति भेव।। 3।।
भावार्थ - हे भगवन्! पुण्य और पाप के पराश्रित व्यवहार का अन्त करके आपने अपनी आत्मा के समयसारस्वरूप शुद्ध हिस्से को प्राप्त किया है। जगत् का पालन किये बिना ही आप जगत् के सर्वोत्कृष्ट देव हैं और दया भाव के बिना ही आप शान्ति के आगार हैं, आप जयवन्त वर्तें।
पर सुख-दुख करण कुरीति टार,
पर सुख-दुखकारण शक्तिधार।
पुनि-पुनि नव-नव नित जन्म रीत,
बिन सर्वलोक व्यापी पुनीत॥ 4 ॥
भावार्थ - हे भगवन्! भगवान होकर दूसरे को सुख और दुःख देने की कुरीति को आपने मिटाया है, दूसरे को सुख-दुःख देने की शक्ति को धारण करके पुनः पुनः नया-नया जन्म देने की रीति के बिना ही नीतिमय आपकी पवित्र रीति सारे लोक में फैल रही है।
जय लीला रास विलास नाश,
स्वाभाविक निजपद रमण वास,
शयनासन आदि क्रिया कलाप,
तज सुखी सदा शिवरूप आप॥ 5 ॥
भावार्थ - हे भगवन्! रास लीला की विलासिताओं का नाश करके आप अपने स्वभाव के आनन्दमय स्थल में ही रमण करते हैं सोना और बैठना आदि क्रियाकलापों के अभाव में आप सदा ही अपने शिवस्वरूप में सुखी रहते हैं। आप जयवन्त वर्तें!
बिन कामदाह नहिं नार भोग,
निरद्वंद्व निजानन्द मगन योग,
वरमाल आदि शृङ्गार रूप,
बिन शुद्ध निरञ्जन पद अनूप॥ 6 ॥
भावार्थ - हे भगवन्! काम की पीड़ा और नारी के भोग के बिन ही आप अपने द्वन्द्व रहित आनन्दयोग में निमग्न रहते हैं, वरमाला और शृङ्गार के बिना ही आपका रूप शुद्ध निरञ्जन और अनुपम है।
जय धर्म भर्म वन हन कुठार,
परकाश पुञ्ज चिद्रूपसार।
उपकरण हरण दव सलिलधार,
निजशक्ति प्रभाव उदय अपार।। 7।।
भावार्थ - हे भगवन्! वस्तु स्वभावरूप धर्म के भ्रमरूपी वन को नष्ट करने के लिए आप कुल्हाड़े के समान हो। आप प्रकाश के पुंज और चैतन्यतत्त्व के सार हैं, आपकी जय हो। धर्म के साधनों का नाश करने वाली दावाग्नि के लिए आप सलिल की धारा के समान हैं। आपका शान्ति का प्रभाव प्रगट व पार रहित है।
नभ सीम नहीं अरु होत होउ,
नहीं काल अंत, लहो अंत सोउ।
पर तुम गुण रास अनंत भाग,
अक्षय विधि राजत अवधि त्याग।। 8।।
भावार्थ :- हे भगवन्! आकाश की सीमा नहीं है और हो तो हो; काल का अन्त नहीं है और उसका भी अन्त आ जाये, तो आओ, किन्तु आपके गुणों की राशि का अनन्तवाँ भाग अनन्त काल तक अक्षय शोभायमान रहता है।
आनंद जलधि धारा प्रवाह,
विज्ञानसुरी मुख द्रह अथाह।
निज शांति सुधारस परम खान,
समभाव बीज उत्पत्ति थान॥ 9॥
भावार्थ - हे भगवन्! आप केवल्य गंगा के अथाह द्रह है, जिसकी धारा प्रवाहित होकर आनन्दसागर में जा मिलती है। जो धारा शान्ति सुधारस से भरी हुई है और साम्यभाव के बीजों का उद्गम स्थल है।
निज आत्मलीन विकलप विनाश,
शुद्धोपयोग परिणति प्रकाश।
दृग ज्ञान असाधारण स्वभाव,
स्पर्श आदि परगुण अभाव॥10॥
भावार्थ - विकल्पों का नाश करके आप अपनी शुद्धात्मा में लीन हुए हैं और आपकी शुद्धोपयोग की परिणति प्रगट प्रकाशमान हुई है, आपको आत्मा के असाधारण स्वभाव अनन्त दर्शन और अनन्त ज्ञान अभिव्यक्त हुए हैं और स्पर्श, रसादिक परभावों की सत्ता का आपके स्वरूप में नितान्त अभाव है।
निजगुण पर्यय समुदाय स्वामि,
पायों अखण्ड पद परम धाम।
अव्यय अबाध पद स्वयं सिद्ध,
उपलब्धि रूप धर्मी प्रसिद्ध॥11॥
भावार्थ - हे भगवन्! आप अपने अनन्तगुण पर्यायों के स्वामी हुए हैं और आपने मुक्ति धाम का अखण्ड पद प्राप्त कर लिया है। आप अव्यय, अबाध और स्वयंसिद्ध पद को उपलब्ध करने वाले धर्मी के रूप में प्रसिद्ध हुए हैं।
एकाग्ररूप चिन्ता निरोध,
जो ध्यावैं पावैं स्वयं बोध।
गुणमात्र ‘सन्त’ अनुराग रूप,
यह भाव देहु तुम पद अनूप।। 12।।
भावार्थ - हे भगवन्! जो पुरुष आपके स्वरूप में चित्त को एकाग्र करके आपका ध्यान करते हैं, वह स्वयं ही सम्यक् बोधि को प्राप्त कर लेते हैं, संतलाल तो मात्र आपके गुणों का अनुरागी है, मैं भावना करता हूँ कि आप मुझे अपना अनुपम पद दीजिए।
(दोहा)
सिद्ध सुगुण सुमरण महा, मन्त्रराज है सार।
सर्व सिद्धि दातार है, सर्व विघन हर्तार।। 13।।
भावार्थ - सिद्धों के गुणों का स्मरण ही सर्वमन्त्रों में श्रेष्ठ महामन्त्र है, वह सर्वविघ्नों का हरने वाला और सर्वसिद्धि का देने वाला है।
(दोहा)
तीन लोक चूड़ामणि, सदा रहो जयवन्त।
विघ्न हरण मङ्गलकरण, तुम्हें नमें नित ‘संत’।। 14।।
भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! आप तीन लोक के चूड़ामणि अर्थात् तीन लोक की सर्वोत्तम शोभा हो, आप सदा जयवंत रहे। आप विघ्नों को हरनेवाले और मङ्गल उत्पन्न करनेवाले हैं, मैं सन्तलाल आपको नित्य नमन करता हूँ। ❖ ❖ ❖
सप्तम् जयमाल
(दोहा)
रत्नत्रय भूषित महा, पंच सुगुरु शिवकार।
सकल सुरेन्द्र नमें नमूँ, पाऊँ सो गुणसार।।
भावार्थ - सिद्ध भगवान रत्नत्रय से विभूषित हैं, महान हैं और पञ्च परमेष्ठियों में सर्वश्रेष्ठ एवं मङ्गलकारी हैं। उन्हें समस्त इन्द्र वन्दन करते हैं और मैं भी उनके गुणों के सार को प्राप्त करने के लिए उन्हें नमन करता हूँ।
(पद्धडी)
जय महामोह दल दलन सूर,
जय निर्विकल्प आनन्दपूर।
जय द्वैविध कर्म विमुक्त देव,
जय निजानन्द स्वाधीन एव।।1।।
भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! महामोहरूपी शत्रु की सेना का नाश करने के लिए आप महान योद्धा हैं और निर्विकल्प आनन्द से आप प्रपूरित हैं, आपकी जय हो। आप भावकर्म और द्रव्यकर्म से मुक्त हैं और अपने आत्मोत्पन्न स्वाधीन आनन्द के स्वामी हैं, आप जयवन्त वर्तें।
जय संशयादि भ्रमतम निवार,
जय स्वामिभक्ति द्युति थुति अपार।
जय युगपत सकल प्रत्यक्ष लक्ष,
जय निरावरण निर्मल अनक्ष।।2।।
भावार्थ - हे भगवन्! आपने संशय, विपर्यय, अनध्यवसाय रूप अज्ञान तिमिर का विध्वंस किया है और आप स्व-आत्माश्रित असीम, भक्ति, स्तुति एवं शान्ति के स्वामी हैं। आप लोकालोक को प्रत्यक्ष देखते हैं और आपका केवलज्ञान निरावरण निर्मल और अतीन्द्रिय है।
जय जय जय सुखसागर अगाध,
निरद्वन्द निरामय निर-उपाधि।
जय मन वच तन व्यापार नाश,
जयथिरसरूप निज पद प्रकाश।। 3।।
भावार्थ - हे भगवन्! आप सुख के अथाह सागर हैं एवं द्वैत रहित तथा सर्वव्याधि और उपाधिरहित हैं। आपने मन-वच-काय की क्रिया का नाश करके अपने प्रकाशमान स्वरूप में स्थिरता प्राप्त की है। हे भगवन्! आप बारम्बार जयवन्त वर्तें।
जय पर-निमित्त सुख-दुख निवार,
निरलेप निराश्रय निर्विकार।
निज में पर को पर में न आप,
परवेश न हो नित निर मिलाप।। 4।।
भावार्थ - हे भगवन्! पर के निमित्त से उत्पन्न सुख और दुःख का क्षय करके आप सर्व आवरण रहित अन्य के आश्रय रहित निर्विकार हुए हैं। आप में पर का और पर में आपका कभी प्रवेश नहीं होता और सर्वप्रकार के मिश्रण से रहित आप निरन्तर ही अत्यन्त शुद्ध विराजते हैं। आपकी जय हो!
तुम परम धरम आराध्य सार,
निज सम करि कारण दुर्निवार।
तुम पञ्च परम आचार युक्त,
नित भक्त वर्ग दातार मुत्त।।5।।
भावार्थ - हे भगवन्! आप ही परम धर्म और सर्वश्रेष्ठ आराध्य हैं एवं अपने समान बना लेने वाले अनिवार्य कारण हैं। आप दर्शनाचार, ज्ञानाचार, चारित्राचार, तपाचार और वीर्याचाररूप परम पञ्चाचार से युक्त हैं और भक्तों के वर्ग को मुक्ति का दान करते हैं।
एकादशाङ्ग सर्वाङ्ग पूर्व,
स्वैअनुभव पायो फल अपूर्व।
अन्तर-बाहिर परिग्रह नसाय,
परमारथ साधुपद लहाय॥6॥
भावार्थ - हे भगवन्! ग्यारह अङ्ग और चौदह पूर्व को उपलब्धि आपकी शुद्धात्मानुभूति का ही अपूर्व परिणाम था। आपने अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग परिग्रह का त्याग करके सच्चा साधुत्व प्राप्त किया।
हम पूजत नित उरभक्ति ठान,
पावें निश्चय शिवपद महान।
ज्यों शशि किरणावलि सियर पाय,
मणि चन्द्र कांति द्रवता लहाय।।7।।
भावार्थ - हे भगवन्! जैसे चन्द्रमा की किरणों की शीतलता पाकर चन्द्रकान्तमणि द्रवित हो जाती है, उसी प्रकार आपकी भक्ति से द्रवित हमारा हृदय आपकी पूजा करता है अतः यह निश्चित है कि हम मुक्ति के महान पद को प्राप्त करेंगे।
(घत्तानंद)
जय भव भयहारं, बन्धविडारं, सुखसारं शिव करतारं।
नित ‘संत’ सुध्यावत, पाप नसावत, पावत पद निज अविकारं॥8॥
भावार्थ - भव के भय का हरण करने वाले, बंध को विदीर्ण करने वाले, सुख के सार एवं शिव कर्त्ता हे सिद्ध भगवन्! आपकी जय हो। सन्तलाल निरन्तर आपका ध्यान करता है, पापों का नाश करता है, अतः वह निश्चित ही आपके पवित्र पद को प्राप्त करेगा।
तुम गुण अमल अपार, अनुभवतै भव भय नशै।
‘सन्त’ सदा चित्त धार, शान्ति करो भवतप हरो॥9॥
भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! आपके गुण अत्यन्त पवित्र और अपार हैं, उनका अनुभव करने से भव का भय पलायन कर जाता है। सन्तलाल ने सदा ही आपको अपनी हृदयवेदी में स्थापित किया है। आप मेरी भव की तपन मिटाइये और मुझे शान्ति प्रदान कीजिए।
अष्टम् जयमाल
(दोहा)
होनहार तुम गुण कथन, जीभ द्वार नहीं होय।
काष्ठ पावसैं अनल थल, नाप सके नहीं कोय॥1॥
भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! आप में जो गुण प्रगट हुए हैं, उनका वर्णन जीभ के द्वारा सम्भव नहीं है। जैसे कोई भी पुरुष लकड़ी के पाँव से अग्नि के स्थल का माप नहीं कर सकता।
(दोहा)
सूक्ष्म शुद्ध स्वरूप का, कहना है व्यवहार।
सो व्यवहारातीत है, यातें हम लाचार॥2॥
भावार्थ - हे भगवन्! आपका स्वरूप अत्यन्त शुद्ध और सूक्ष्म है और इसका वर्णन व्यवहार है एवं आपका वह शुद्ध सूक्ष्म स्वरूप व्यवहारनय के द्वारा गम्य नहीं है, इसलिए हम लाचार हैं।
(दोहा)
पै जो हम कछु कहत हैं, शान्ति हेत भगवन्त।
बार-बार थुति करन में, नहिं पुनरुक्त भगवन्त॥3॥
भावार्थ - फिर भी हे भगवन्! हम जो कुछ कहते हैं, वह सब अपनी शान्ति के लिए ही कहते हैं, क्योंकि बार-बार पूज्य पुरुषों की स्तुति करने में पुनरावृत्ति दोष नहीं आता।
(पद्धड़ी)
जय स्वयं शक्ति आधार योग,
जय स्वयं स्वस्थ आनन्द भोग।
जय स्वयं विकास आभास भास,
जय स्वयं सिद्ध निजपद निवास॥4॥
भावार्थ - हे भगवन्! अपनी शक्ति के आधार होने से स्वयं ही योग है, निरन्तर अपने आनन्द में स्थित होने से आप स्वयं ही भोग हैं। अपने विकसित कैवल्य से आप स्वयं ही प्रकाशित हैं और निरन्तर अपने स्वरूप में निवास करने से आप स्वयं सिद्ध हैं। हे भगवन्! आप जयवन्त वर्तें!
जय स्वयंबुद्ध संकल्प टार,
जय स्वयं शुद्ध रागादि जार।
जय स्वयं स्वगुण आचार धार,
जय स्वयं सुखी अक्षय अपार॥5॥
भावार्थ - हे भगवन्! सङ्कल्पों का विनाश कर देने से आप स्वयं ही बुद्ध हैं और रागादि का क्षय हो जाने से आप स्वयं ही शुद्ध हैं, आप स्वयं ही अपने स्वरूप के योग्य आचरण को धारण करते हैं एवं आप स्वयं ही अक्षय और अनन्त सुख के स्वामी हैं। आपकी जय हो!
जय स्वयं चतुष्टय राजमान,
जय स्वयं अनन्त सुगुण निधान।
जय स्वयं स्वस्थ सुस्थिर अयोग,
जय स्वयं स्वरूप मनोग योग॥ 6 ॥
भावार्थ - हे भगवन्! अनन्त चतुष्टय से आप स्वयं ही सुशोभित हैं, स्वयं अनन्त सुगुणों की निधि हैं, योग की चञ्चलता के अभाव में अत्यन्त निष्कम्प हो जाने से आप स्वयं ही स्वस्थ हैं और आप ही अत्यन्त मनोग्य योग स्वरूप हैं। हे भगवन् आप जयवन्त वर्तें!
जय स्वयं स्वच्छ निज ज्ञान पूर,
जय स्वयं वीर्य रिपु वज्र चूर।
जय महा मुनिन आराध्य जान,
जय निपुण मति तत्त्वज्ञमान॥ 7 ॥
भावार्थ - हे भगवन्! आप स्वयं ही अपने स्वच्छ ज्ञान से पूर्ण हैं, वज्र के समान कर्म वैरियों का चूर्ण कर देने से आप स्वयं ही वीर्य हैं। महा मुनियों के आप आराध्य हैं और चतुर तत्त्वज्ञ आपको अपनी श्रद्धा समर्पित करता है, आपकी जय हो!
जय सन्तनि मन आनन्दकार,
जय सज्जन चित्त बल्लभ अपार।
जय सुरगण गावत हर्ष पाय,
जय कवि यश कथन न करि अघाय॥8॥
भावार्थ - हे भगवन्! आप सन्तों के हृदय को आनन्द देते हैं और सज्जन अर्थात् सम्यग्दृष्टि पुरुषों को आप अत्यन्त प्रिय लगते हैं, देव वृन्द आपका गुणगान करके महा हर्षित होते हैं और कवि लोग आपका यशोगान करते हुए तृप्त नहीं होते। हे भगवन्! आपकी जय हो।
तुम महातीर्थ भवि तारण हेत,
तुम महाधर्म उद्धार देत।
तुम महामन्त्र विष विघ्न जार,
अघ रोग रसायन कहो सार॥9॥
भावार्थ - हे भगवन्! आप भव्यों के तिरने के लिए महातीर्थ और उनके उद्धार के लिए आप महाधर्म हैं, आप विघ्नरूपी विष को जलाने के लिए महामन्त्र हैं और पापरूपी रोग का नाश करने के लिए श्रेष्ठ रसायन हैं।
तुम महाशास्त्र का मूल ज्ञेय,
तुम महा तत्त्व हो उपादेय।
तिहुँ लोक महा मङ्गल सु रूप,
लोकत्रय सर्वोत्तम अनूप॥10॥
भावार्थ - हे भगवन्! आप सम्पूर्ण आगम के मात्र प्रतिपादक और आप ही उपादेय स्वरूप महातत्त्व हैं और तीन लोक में महामङ्गल स्वरूप सर्वोत्तम और अनुपम हैं।
तिहुँ लोक शरण अघ हर महान्,
भवि देत परम पद सुख निधान।
संसार महासागर अथाह,
नित जन्म मरण धारा प्रवाह॥11॥
सो काल अनन्त दियो बिताय,
तामें झकोर दुखरूप खाय।
मो दुखी देख उर दया आन,
इम पार करो कर ग्रहण पान॥12॥
भावार्थ - हे भगवन्! पापों का नाश करने वाले तीन लोक में आप ही एकमात्र शरण्य हैं और भव्य जीवों को मुक्ति के श्रेष्ठ पद के सुखों के निधान देने वाले हैं। यह संसाररूपी महासागर बहुत गहरा है और इसमें निरन्तर जन्म-मरण की धाराएँ बहती हैं।
इस संसार महासागर में मैंने दुःख के झकोरे खा-खाकर अनन्त काल बिता दिया। हे भगवन्! मुझे दुःखी देखकर दया कीजिए और मुझे हाथ पकड़कर इस महासागर से पार कीजिए।
तुम ही हो इस पुरुषार्थ जोग,
अरु है अशक्त करि विषय रोग।
सुर नर पशु दास कहे अनन्त,
इनमें से भी इक जान ‘सन्त’॥13॥
भावार्थ - हे भगवन्! मुझे संसार महा सागर से पार लगाने के लिए एकमात्र आप ही समर्थ हैं, अन्य तो विषयों की व्याधि से स्वयं ही अशक्त हैं। देव, मनुष्य और पशु आपके अनन्त दास हैं, सन्तलाल को भी आप उनमें से एक जानिये।
(घत्ता-कवित्त)
जय विघन जलधि जल हनन पवन,
बल सकल पाप मल जारन हो।
जय मोह उपल हन वज्र असल दुख,
अनिल ताप जल कारन हो।।14।।
ज्यूँ पंगु चढ़े गिर, गूंग भरे सुर,
अभुज सिन्धु तर कष्ट भरै।
त्यों तुम थुति काम महा लज ठाम,
सु अन्त ‘सन्त’ परणाम करै।।15।।
भावार्थ - हे भगवन्! विघ्नों के सागर को पार करने के लिए आप बलवान पवन के समान हैं और सम्पूर्ण पाप-मल का नाश करने वाले हैं। मोहरूपी पाषाण का चूर्ण करने के लिए आप असली वज्र और दुःखों की अग्नि के ताप को नष्ट करने के लिए जल के समान हैं।
जैसे पंगु पर्वत पर चढ़ने की चेष्टा करे, गूँगा गीत गाये और हाथ के बिना कोई पुरुष सागर तिरे, तो ये सब कष्ट ही पाते हैं। इसी तरह महानिर्लज्ज होकर आपकी स्तुति करने को उद्धत हुआ में सन्तलाल अन्त में आपको अगणित वन्दन करता हूँ।
(दोहा)
तीन लोक चूड़ामणि, सदा रहो जयवन्त।
विघ्न हरण मङ्गलकरन, तुम्हें नमें नित ‘सन्त’।।16।।
भावार्थ - हे सिद्ध भगवन्! आप तीन लोक के चूड़ामणि अर्थात् तीन लोक की सर्वोत्तम शोभा हैं, आप सदा जयवन्त रहें। आप विघ्नों को हरने वाले और मङ्गल उत्पन्न करने वाले हैं, मैं सन्तलाल आपको नित्य नमन करता हूँ।
।। समाप्त ।।