एक गद्दी, दो लफ़्ज़, तीन किताबें, चार लोग,
चंद तालियाँ, वाहवाही, ये होंगे कुछ।
पर जहान थोड़ी है।।
इन हाथों का थर-थर, इन घुटनों की चर-चर,
शब्दों का लंगड़ापन, कानों का बहरापन,
महज़ अड़चन हैं, इन सासों का थमना।
मेरा इम्तिहान थोड़ी है।।
इन साँसों को निशदिन मैं जिन पर लुटाता,
इन ग्रंथों की साँसें गर चलती रहें तो,
समझना कि मैं बस उधर ही कहीं हूँ,
उन शब्दों के फ़ासलों को भर रहा हूँ।।
बस, उन ग्रंथों को फिर उन पुराने पिटारों में,
लपेटकर कपड़ा कहीं दफ़न न करना।
न करना महफूज़ यूँ कि महसूस न हो फिर!
इन खुले पिटारों से लुटने दो दौलत
यह पिटारे हैं,
ग्रंथों का क़ब्रिस्तान थोड़ी है।।
AJ
रचनाकार: वंशित जैन (Vanshit Jain), कोटा
Instagram: @Jainism_times_108