गोम्मटेश्वर बाहुबली पूजन | Gommateshwar Bahubali Pujan

गोम्मटेश्वर बाहुबली पूजन

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गोम्मटेश्वर बाहुबली पूजन

जम्बूद्वीप सुभरत क्षेत्र में है सुन्दर कर्नाटक प्रांत ।
श्रवण बेलगुलपुरी मनोहर बहुजिन मंदिर शोभित शांत ॥
चन्द्रगिरी की भव्य पहाड़ी पर मंदिर है अति प्रचीन।
विंध्यागिरि पर गोम्मटेश्वर प्रतिमा आत्मध्यान में लीन ।
अखिल विश्व में नहीं दूसरी ऐसी कहीं श्रेष्ठ प्रतिमा।
दशों दिशा में गूंज रही है श्री बाहुबलि की महिमा ॥
पूज्य गोम्मटेश्वर दर्शन से हर्षित हृदय अनन्य हुआ।
भक्ति भाव से प्रभु पूजन का अवसर पा मैं धन्य हुआ॥
ॐ ह्रीं श्री गोम्मटेश्वर जिन अत्र अवतर अवतर संवौषट्
ॐ ह्रीं श्री गोम्मटेश्वर जिन अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं
ॐ ह्रीं श्री गोम्मटेश्वर जिन अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् गोम्मटेश्वर बाहुबली पूजन

मैं शुद्ध प्रासुक नीर की त्रय धार चरणों में करूँ।
यह जन्म मरण अभाव करके मोक्षलक्ष्मी को वरूँ॥
श्री गोम्मटेश्वर बाहुबलि के चरण का पूजन करूँ।
प्रभु अष्टकर्म विनाश हित शुद्धात्म का चिंतन करूँ॥१॥
ॐ ह्रीं श्री गोम्मटेश्वरजिनाय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं नि.

मैं सलिल शीतल मलय चंदन प्रभु चरण आगे धरूँ।
संसारताप अभाव करके मोहलक्ष्मी को वरूँ॥ ॥
श्री गोम्मटेश्वर बाहुबलि के चरण का पूजन करूँ।
प्रभु अष्टकर्म विनाश हित शुद्धात्म का चिंतन करूँ ॥२॥
ॐ ह्रीं श्री गोम्मटेश्वरजिनाय संसारताप विनाशनाय चंदनं नि.।

गोम्मटेश्वर बाहुबली पूजन

मैं श्वेत उज्जवल धवल तंदुल पुंज प्रभुपद मैं धरूँ।
अक्षय अनूप अखण्ड पद पा मोक्षलक्ष्मी को वरूँ ॥
श्री गोम्मटेश्वर बाहुबलि के चरण का पूजन करूँ।
प्रभु अष्टकर्म विनाश हित शुद्धात्म का चिंतन करूँ ॥३॥
ॐ ह्रीं श्री गोम्मटेश्वर जिनाय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं नि.।

शुभ भाव पुष्प मनोज्ञ अनुपम सुरभिमय अर्पण करूँ ।
यह कामरोग अभाव करके मोक्षलक्ष्मी को वरूँ ॥
श्री गोम्मटेश्वर बाहुबलि के चरण का पूजन करूँ।
प्रभु अष्टकर्म विनाश हित शुद्धात्म का चिंतन करूँ ॥५ ॥
ॐ ह्रीं श्री गोम्मटेश्वरजिनाय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं नि.।

गोम्मटेश्वर बाहुबली पूजन

शुचिमय सुरम्य स्वभावमय नैवेद्य उर अंतर धरूँ।
यह क्षुधाव्याधि अभाव करके मोक्षलक्ष्मी को वरूँ।
श्री गोम्मटेश्वर बाहुबलि के चरण का पूजन करूँ।
प्रभु अष्टकर्म विनाश हित शुद्धात्म का चिंतन करूँ॥५॥
ॐ ह्रीं श्री गोम्मटेश्वर जिनाय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं नि.।
मिथ्यात्व मोह अभावकर उर ज्ञान का दीपक धरूँ।
मैं भेदज्ञान अपूर्व पाकर मोक्षलक्ष्मी को वरूँ ॥
श्री गोम्मटेश्वर बाहुबलि के चरण का पूजन करूँ।
प्रभु अष्टकर्म विनाश हित शुद्धात्म का चिंतन करूँ ॥६॥
ॐ ह्रीं श्री गोम्मटेश्वर जिनाय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि.

गोम्मटेश्वर बाहुबली पूजन

निज ध्यान अग्नि समूह में वसु कर्म का ईंधन धरू।
में राग द्वेष अभाव करके मोक्षलक्ष्मी को वरूँ ॥
श्री गोम्मटेश्वर बाहुबलि के चरण का पूजन करूँ।
प्रभु अष्टकर्म विनाश हित शुद्धात्म का चिंतन करूँ ॥७ ॥

ॐ ह्रीं श्री गोम्मटेश्वर जिनाय अष्टकर्म विध्वंशनाय धूपं नि.।

मैं परम पावन सिद्ध पद की भावना प्रति फल करूँ।
मैं सहज शिवपद प्राप्त करके मोक्षलक्ष्मी को वरूँ॥
श्री गोम्मटेश्वर बाहुबलि के चरण का पूजन करूँ।
प्रभु अष्टकर्म विनाश हित शुद्धात्म का चिंतन करूँ ॥८॥

ॐ ह्रीं श्री गोम्मटेश्वर जिनाय मोक्षफलप्राप्ताय फलं नि.।

गोम्मटेश्वर बाहुबली पूजन

जल आदि अष्ट प्रकार निर्मित अर्घ्य चरणों में धरूँ।
शाश्वत अनर्घ्य अनंत पद पा मोक्षलक्ष्मी को वरू ॥
श्री गोम्मटेश्वर बाहुबलि के चरण का पूजन करूँ।
प्रभु अष्टकर्म विनाश हित शुद्धात्म का चिंतन करूँ ॥९॥

ॐ ह्रीं श्री गोम्मटेश्वर जिनाय अनर्घ्य पद प्राप्ताय अर्घ्य नि.

जयमाला

गोम्मटेश्वर नाथ को बारम्बार प्रणाम।
भक्ति भाव से मैं जपूं प्रभु को आठो याम ॥
हे गोम्मटेश्वर परमं देव मेरा वंदन स्वीकार करो ।
हे ऋषभदेव सुत बाहुबली मेरा अर्चन स्वीकार करो॥१॥

गोम्मटेश्वर बाहुबली पूजन

हे मात सुनंदा के नंदन मेरा प्रणाम स्वीकार करो ।
हे अनुज भरत चक्रेश्वर - मेरी पूजन स्वीकार करो ॥२
तुम राज संपदा को ठुकरा चल पड़े तपस्या करने को।
प्रभु आदिनाथ से दीक्षा ले चल पड़े कर्म वसु हरने को॥३॥
भीषण उपसर्गो पर जय पा प्रभु आत्म ध्यान में हुये लीन।
शुभअशुभ विभावों को क्षयकर पाया शाश्वत पद निजाधीन॥४॥
तुम राग द्वेष पर जय पाकर हो गये वीतरागी महान।
केवलज्ञानी बनकर तुमने पाया सर्वज्ञ स्वपद महान॥५॥
घातिया कर्म चारों हर कर अर्हतदेव भगवंत हुये ।
फिर क्षय करके अघातिया भी तुम मुक्ति कामिनी कंत हुये॥ ६ ॥

गोम्मटेश्वर बाहुबली पूजन

तीनों लोकों में गूंज उठी प्रभु विमल कीर्ति की जय गाथा ।
युग कोटि-कोटि बीते, चरणों में विश्व झुकाता है माथा ॥७॥
यह श्रवणबेलगुल क्षेत्र सातिशय चंद्र विंध्यगिरि मन भावन।
है त्याग तपस्या का प्रतीक विचरण करते निर्ग्रन्थ श्रमण ॥८॥
अंतिम श्रुत केवलि भद्रबाहु स्वामी की तपोभूमि पावन।
हो गये दिगंबर चन्द्रगुप्त सम्राट यहाँ तज सिंहासन ॥९॥
चामुंडराय की माता ने सपने में किये देव दर्शन।
तब नेमिचन्द्र आचार्य देव ने किया अपूर्व मार्ग दर्शन॥ १० ॥
गोम्मट चामुंडराय ने फिर गुरू आज्ञा का बहुमान किया।
भारत के श्रेष्ठ कलाकारों ने प्रतिमा का निर्माण किया॥११ ॥

गोम्मटेश्वर बाहुबली पूजन

श्री नेमिचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती ने बिम्ब प्रतिष्ठा की ।
तब लक्ष-लक्ष जनता ने आ चरणों में भव्य वंदना की॥१२॥
आश्चर्य चकित हो गये सभी जय जय मंगलध्वनि गूंज उठी।
सारी जगती प्रभु चरणों का पूजन वंदन कर झूम उठी ॥13॥
हो गई प्रतिष्ठा तो जल थल नभ में प्रभु जय जयकार हुआ।
मंगल वाद्यो की ध्वनि गूंजी मां का सपना साकार हुआ॥ १४॥
यह विंध्यगिरि के पर्वत की ही एक शिला से है निर्मित ।
ऊंची विशाल सत्तावन फिट दर्शनकर होता विश्व चकित॥१५॥
नासाग्र द्रष्टि निज ध्यान मयी कायोत्सर्ग मुद्रा महान।
पुलकित हो जाते भव्य जीव सुरगण भी गाते मधुर गान॥१६॥

गोम्मटेश्वर बाहुबली पूजन

हैं एक हजार वर्ष बीते प्रभु प्रतिमा का निर्माण हुए ।
मंगल अभिषेक महोत्सव के घर-घर में मंगल गान हुये ॥ १७ ॥
श्री बाहुबलि का प्रतिष्ठापना सहस्त्राब्दि उत्सव महान ।
संदेश दे रहा जगती को है वीतरागता ही प्रधान ॥१८॥
यह राग द्वेष अरु क्षोभ क्रोधादि कषाये नाशवान ।
जो इन्हें नष्ट कर देता है वह हो जाता मानव महान ॥१९॥
हे गोम्मटेश्वर महादेव मैं भी शिव पंथ पर आ जाऊं।
सम्यक्त्व शक्ति को पाकर मैं वैराग्य भावना ही भाऊँ॥२०॥
रत्नत्रय धारी जिन मुनि बन, मैं निज स्वरूप में रम जाऊं।
शुद्धात्म तत्त्व का आश्रय ले निजशाश्वत सिद्ध स्वपद पाऊँ ॥ २१ ॥

गोम्मटेश्वर बाहुबली पूजन

मैं शरण आपकी आया हूँ मेरा दुखमय संसार हरो।
चारों गतियों के संकट से है गोम्मटेश उद्धार करो ॥२२॥

ॐ ह्रीं श्रीगोम्मटेश्वर जिनाय पूर्णार्घ्य निर्वपामिति स्वाहा ।

गोम्मटेश्वर के चरण भाव सहित उर धार।
निज आतम का ध्यान धर हो जाऊँ भव पार॥

इत्याशीर्वादः पुष्पांजलि क्षिपामि्
जाप्यमंत्र - ॐ ह्रीं श्रीगोम्मटेश्वर बाहुबलिजिनाय नमः


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF):

स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/59470।