गावहु आज बधाई, बधाई, बधाई, बधाई ।
आनन्दित हो सब जन मिल कै, गावहु आज बधाई ॥ टेक ॥
अविहारी प्रभु का विहार, हो सबको ही सुखदायी।
अपने द्वार प्रभु पधारे, परम ऋद्धि पायी ॥ 1 ॥
प्रभु दर्शन तैं पातक नासें, ज्ञान कला पायी।
अपनी प्रभुता अपने में ही, प्रत्यक्ष दरशायी ॥ 2 ॥
तीन लोक की बाह्य विभूति, मोकों तुच्छ दिखायी ।
अक्षय निज चैतन्य विभूति, पाई सुखदायी ॥ ३॥
भाव-वंदना द्रव्य-वंदना, प्रभु चरणन माँही।
धन्य दशा प्रगटे कब प्रभु सी, परमानन्ददायी ॥ 4 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’