६. विद्युन्माली मेरु — चौंतीस तीर्थंकर पूजन + जयमाला
पश्चिम पुष्करार्ध द्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरु
सम्बन्धी चौंतीस तीर्थंकर पूजन
स्थापना
वीरछंद
पुष्करार्ध पश्चिम में विद्युन्मालीमेरु महान प्रसिद्ध ।
पूर्व और पश्चिम विदेह में सोलह सोलह जिन सुप्रसिद्ध ॥
इक ऐरावत उत्तर दक्षिण भरत एक सब मिल चौंतीस ।
सादर सविनय अष्ट द्रव्य ले, पूजन करूं झुकाऊं शीष ॥
वस्तुस्वरूप विचार करूं मैं, मन भी अब पावे विश्राम ।
निर्विकल्प रस पान करूं मैं, अनुभव है आगम में नाम ॥
आओ श्री जिनराज पधारो मम परिणति में लो अवतार ।शिवपुरपथ पर गमन करूँ मैं आत्मतत्त्व का ले आधार ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थविद्युन्मालीमेरुसम्बन्चतुस्त्रिंशत् तीर्थंकर जिनेन्द्राः अत्र अवतर अवतर संवौषट् (इत्याह्वाननम्)
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थविद्युन्मालीमेरु सम्बन्धी चतुस्त्रिंशत् तीर्थंकरजिनेन्द्राः अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः (इति स्थापनम्)
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थविद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी चतुस्त्रिंशत् तीर्थंकरजिनेन्द्राः अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (इति सन्निधिकरणम्)
राधिका
मैं निर्विकल्प अनुभव जल लेकर आऊँ ।
जो है अनादि का मोह-कलंक नशाऊँ ॥
जिनचरणों में यह निर्मल नीर चढ़ाया ।
चौंतीसों जिन की छवि ने मुझे लुभाया ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी चतुस्त्रिशत् तीर्थकर जिनेन्द्रेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
चैतन्यचन्द्र की शीतल अनुभव किरणें ।
आताप नशे आनन्द के झरते-झरने ॥
मलयागिरी चन्दन जिन-चरणों में लाया ।
चौंतीसों जिन की छवि ने मुझे लुभाया ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी चतुस्त्रिंशत् तीर्थंकर जिनेन्द्रेभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
अक्षत अवलम्बन लिया आज चेतन का ।
क्षत-विक्षत होकर मोह क्षीण आतम का ॥
धवलोज्ज्वल अक्षत प्रभु चरणों में लाया ।
चौंतीसों जिन की छवि ने मुझे लुभाया ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थविद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी चतुस्त्रिंशत् तीर्थंकर जिनेन्द्रेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।
यह जगत सदा ही मोह शत्रु से हारा ।
अनुभव के शर ने काम शत्रु को मारा ॥
अब जिन चरणों में भक्ति-सुमन ले आया ।
चौंतीसों जिन की छवि ने मुझे लुभाया ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थविद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी चतुस्त्रिंशत् तीर्थकर जिनेन्द्रेभ्यो कामबाणविनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
अनुभव रस पी मैं पूर्ण तृप्त हो जाऊँ ।
चिर ज्ञेयलुब्धता को परिपूर्ण नशाऊँ ॥
आनन्द अतीन्द्रिय रसमय भोग लगाया ।
चौंतीसों जिन की छवि ने मुझे लुभाया ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थविद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी चतुस्त्रिंशत् तीर्थंकर जिनेन्द्रेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
मैं निर्विकल्प अनुभव का दीप जलाऊँ ।
चैतन्य ज्योति से मोह-तिमिर विनशाऊँ ॥
कैवल्य किरण में आत्म सूर्य दिखलाया ।
चौंतीसों जिन की छवि ने मुझे लुभाया ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी चतुस्त्रिंशत् तीर्थंकर जिनेन्द्रेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
आत्मानुभूति का धूम्र व्योम में छाया ।
है द्रव्य-भाव-नोकर्म आज विनशाया ॥
शुभ भक्ति राग यावक में अशुभ जलाया ।
चौंतीसों जिन की छवि ने मुझे लुभाया ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी चतुस्त्रिंशत् तीर्थंकर जिनेन्द्रेभ्यो अष्टकर्मविनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
मैं निर्विकल्प अनुभव रसमय फल पाऊँ ।
शुभ अशुभकर्म के फल से दृष्टि हटाऊँ ॥
परमार्थ भक्तिमय अनुपम फल अब पाया ।
चौंतीसों जिनकी छवि ने मुझे लुभाया ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी चतुस्त्रिंशत् तीर्थंकर जिनेन्द्रेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
है गुण अनन्त का वैभव निज चेतन में ।
शुद्धात्म तत्त्व का अनुभव निज वेदन में ।
अब पद अनर्घ्य पाने को अर्घ्य चढ़ाया ।
चौंतीसों जिन की छवि ने मुझे लुभाया ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी चतुस्त्रिंशत् तीर्थंकर जिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
अर्ध्यावलि
वीरछंद
विद्युन्माली पंचमगिरि के सम्बन्धी जिनवर चौंतीस ।
एक शतक सत्तर में ये सब आ जाते है प्रभु जगदीश ॥
तन मन धन सब करूँ समर्पित निज परिणाम संवारूँ नाथ ।
अपनी जर्जर तरणी भवसागर से पार उतारूँ नाथ ॥
दोहा
वन्दूँ पूर्व के विदेह सोलह जिन तीर्थेश ।
पृथक् पृथक् अर्पित करूं अर्घ्य पूज्य परमेश ॥
चौपाई
कच्छा देश प्रसिद्ध मनोहर, नगरी क्षेम लोक में सुन्दर।
सर्व श्रेष्ठ जिनवर तीर्थंकर, भव्यों के सब दोष क्षयंकर ॥ १ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्य कच्छादेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
देश सुकच्छा शोभा शाली, क्षेमा नगरी महिमा वाली।
तीर्थेश दिव्यध्वनि पायी, शुद्धातम की महिमा आयी ॥ २ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्य महाकच्छादेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
देश महाकच्छा मन भावन, नगर अरिष्टा जिनवर पावन ।
तेरह विधि चारित्र धरूँ मैं, अनुभव रस के कलश भरूँ मैं ॥ ३ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्य सुकच्छादेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
देश कच्छकावती सुहाना, नगर अरिष्टपुरी सुख नाना।
तीर्थंकर की महिमा न्यारी, निज स्वरूप ही शिव सुखकारी ॥ ४ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्य महाकच्छकावती देशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
आवर्त्ता है देश मनोहर, खडगा नगर श्रेष्ठ तीर्थंकर ।
पंच महाव्रत सम्यक् पालूँ, निज स्वरूप ही देखूँ भालूँ ॥ ५ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्य आवर्त्तादेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
देश लांगलावर्त्ता जाउं, मंजूषा तीर्थकर ध्याऊँ।
परम अहिंसा धर्म दया मय, षट्कायक रक्षा हो निश्चय ॥ ६ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्य लांगलावत्तदेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
देश पुष्पकला महा मनोहर, औषध नगरी जिन तीर्थंकर ।
सत्यधर्म ही अति महिमामय, हितमितप्रिय वचनामृत सुखमय ॥ ७ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्य पुष्पकलादेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
वत्सा देश सुसीमा नगरी, जिनवर कथनी उत्तम सगरी ।
पूर्ण अचौर्य सुव्रत स्वीकारूँ, पुण्य-पाप सारे निरवारूं ॥ ८ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्य सुसीमादेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
देश पुष्पकला वती सुसुन्दर, पुण्डरीकिणी नगर मनोहर ।
तीर्थंकर के चरण पखारूँ, निज स्वरूप की ओर निहारूँ ॥ ९ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्य पुष्पकलादेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
देश सुवत्सा नगर कुन्डला, तीर्थंकर ध्वनि महा मंगला ।
महाशील व्रत सुखदायी है, ब्रह्मचर्य ही शिवदायी है ॥ १० ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालोमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्य सुवत्सादेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
देश महावत्सा मन भावन, अपराजिता जिनेश्वर पावन ।
अपरिगृह व्रत पूर्ण अनिच्छुक, महामोक्ष सुख का मैं इच्छुक ॥ ११ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्य महावत्सादेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
देश वत्सकावती मनोहर, प्रभंकरा नगरी तीर्थंकर ।
पूर्ण देश हों पंचमहाव्रत, पालन कर पाऊँ सुख शाश्वत ॥ १२ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्य वत्सकावती देशस्थतीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
रम्या देश बड़ा गरिमामय, अंकावती नगर जिन छवि मय ।
पंचसमिति प्रभु धारण कर लूं षटकायक रक्षा उर धर लूँ ॥ १३ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्य रम्या देशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
देश सुरम्या जिन तीर्थंकर, पद्मावती नगर में शिव कर ।
पालूँ ईर्या समिति जाग्रत, निज स्वभाव में हो जाऊँ रत ॥ १४ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्य सुरम्यादेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
रमणीया है देश निराला, नगर शुभा है महिमा वाला ।
तीर्थंकर सर्वज्ञ जिनेश्वर, श्री अरंहत महा परमेश्वर ॥ १५ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्य रमणीयादेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
देश मंगलवती महाना, रत्नसंचया नगर सुहाना ।
तीर्थंकर जिन प्रभु को ध्याऊँ, भाषा समिति मौन हो जाऊं ॥ १६ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पूर्वविदेहस्य मंगलावतीदेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
छंद चौपई
भाव सहित वन्दूं जिनदेव, मैं भी सिद्ध बनूं स्वयमेव ।
अब पश्चिम विदेह जिनराज, अर्घ्य चढ़ाऊं शिव सुख काज ॥
सोलह क्षेत्र महान सुजान, सोलह तीर्थंकर भगवान ।
रोम-रोम पुलकित हो जाय, जब जिनवर के दर्शन पाय ॥
जिन मंदिर में श्री जिनराज, तनमंदिर में चेतन राज ।
एक शतक सत्तर जिन ईश, एक संग हो चुके महीश ॥
पुष्पांजलिं क्षिपेत्
चौपई
पद्मादेश पूर्ण सक्षम है, अश्वपुरी नगरी अनुपम है ।
तीर्थंकर जिनचरण निहारूँ, समिति एषणा सम्यक् धारूँ ॥ १७ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पश्चिमविदेहस्य पद्मा देशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
देश सुपद्मां तीर्थंकर है, सिंहपुरी नगरी जिनवर है।
लहूँ समिति आदान निक्षेपण, पर विभाव सब नाशं तत्क्षण ॥ १८ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पश्चिमविदेहस्य सुपद्मादेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
देश महापद्मा अब जाऊँ, महापुरी तीर्थंकर ध्याऊँ ।
प्रतिष्ठापना समिति धार लूँ, अब तो हर सब भव विकार लूँ ॥ १९ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पश्चिमविदेहस्य महापदमादेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
देश पद्मकावती सुहाना, विजयपुरी है नगर महाना।
तीर्थंकर के चरण पखारूँ, पंच समिति धर दोष निवारूँ ॥ २० ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पश्चिमविदेहस्य पद्मकावतीदेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
शंखा देश जिनेश्वर राजे, अरजा नगरी मध्य विराजे ।
तीन गुप्ति पालूँ हे स्वामी, ज्ञान सिन्धु हे अन्तर्यामी ॥ २१ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पश्चिमविदेहस्य शंखा देशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
नलिना देश में तीर्थंकर हैं, विरजा नगरी के भीतर हैं।
मनोगुप्ति यह मनवश करलूँ, मनोजनित दोषों को हरलूँ ॥ २२ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पश्चिमविदेहस्य नलिनीदेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
कुमुदा देश अशोका नगरी, तीर्थंकर की महिमा सगरी ।
वचन गुप्ति की महिमा न्यारी, महामौन व्रत है दुखहारी ॥ २३ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पश्चिमविदेहस्य कुमदा देशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सरित देश श्री तीर्थंकर प्रभु, नगर वीतशोका में जिन विभु ।
काय गुप्ति मैं पालूँ पूरी, नहीं भावना रहे अधूरी ॥ २४ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पश्चिमविदेहस्य सरित देशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
वप्रा देश नगर विजया है, तीर्थंकर उपदेश दया है।
तीन गुप्ति मैं पालू पूरी, नहीं भावना रहे अधूरी ॥ २५ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पश्चिमविदेहस्य वप्रा देशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
देश सुवप्रा तीर्थंकर प्रभु, नगर वैजयंती महान विभु।
तीनों गुप्ति समुज्ज्वल पालूँ, सकल पाप कर्म धो डालूँ ॥ २६ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पश्चिमविदेहस्य सुवप्रादेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
देश महावप्रा महिमामय, नगर जयंती है गरिमामय।
वसु प्रवचन मातृका ध्यानमय, प्रभु भविष्य में रहूँ ध्यानमय ॥ २७ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पश्चिमविदेहस्य महावप्रादेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
देश व्रप्रकावती जिनेश्वर, अपराजिता नगर परमेश्वर।
पंच समिति त्रय गुप्ति जानलो, वसु प्रवचनमातृका मान लो ॥ २८ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पश्चिमविदेहस्य वप्रकावतीदेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
गंधादेश तीर्थंकर है, चक्रपुरी में परमेश्वर है।
दर्शन-ज्ञानमयी मैं चेतन, सदापूर्ण आपूर्ण ज्ञानघन ॥ २९ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पश्चिमविदेहस्य गंधा देशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
देश सुगंधा नगर खड्ग पुरी, तीर्थंकर जिन छवि शिवपुरी।
आत्मज्ञान आवश्यक पहिला, यही मुक्ति का साधन उजला ॥ ३० ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पश्चिमविदेहस्य सुगंधादेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
देश गंधिला सुषमा शाली, नगर अयोध्या जिनवर लाली।
चार कषायें सर्व विनाशू अपना शुद्ध स्वरूप प्रकाशं ॥ ३१ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पश्चिमविदेहस्य गंधिला देशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
गंध मालिनी देश निराला, नगर अबध्या जन धनवाला।
यहाँ महान तीर्थंकर हैं, सुर नर वंदित अभ्यंकर हैं ॥ ३२ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी पश्चिमविदेहस्य गंधमालिनीदेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
वीर छन्द
पुष्करार्ध विद्युन्माली का दक्षिण भरत महान प्रसिद्ध ।
नगर अयोध्या तीर्थकर प्रभु जिनकी गरिमा विश्व प्रसिद्ध ॥
मंगलमयी जिनागम की महिमा का लाभ उठाऊँगा।
स्व-पर भेद-विज्ञान जगा प्रभु निज स्वभाव में आऊँगा ॥ ३३ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी दक्षिणभरतदेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
विद्युन्माली उत्तर ऐरावत में नगर अयोध्या जान।
तीर्थंकर की महिमा जानूँ शुद्धातम से कर पहिचान ॥
सम्यग्दर्शन - ज्ञान - चरणमय मोक्षमार्ग पर करूँ प्रयाण ।
द्रव्य - भाव - नोकर्म नाशकर हे प्रभु पाऊँ पद निर्वाण ॥ ३४ ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्करार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी उत्तर ऐरावतदेशस्थ तीर्थंकरजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
महाअर्घ्य
वीरछंद
महा-पुण्य से पाया है श्री देव-शास्त्र-गुरु का संयोग ।
स्वाध्याय के द्वारा जानूँ जड़-चेतन का पूर्ण वियोग ॥
सात तत्त्व का सम्यक् निर्णय दर्शनमोह मन्द करता ।
निर्विकल्प अनुभूति भाव से चेतन कर्मबन्ध हरता ॥
गुणअनन्त का अक्षय वैभव बहती अनुभव रस की धार ।
नय प्रमाण का पक्ष न जिसमें झरता है आनन्द अपार ॥
पुष्करार्ध के पश्चिम में है विद्युन्माली गिरि शोभित ।
अर्घ्य समर्पित चौंतीस जिन को सुर नर मुनि सब हैं मोहित ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्कारार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी चतुस्त्रिंशत् तीर्थंकरजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
दोहा
जिनशासन का मर्म जो, द्वादशांग का सार ।
अनुभव रस का पान कर, होऊँ भवदधि पार ॥
दर्श-ज्ञान-चारित्रमय, परिणमता जो आर्य ।
कहते निज संचेतना अमृतचन्द्राचार्य ॥
वीरछंद
मैं अनादि से मोहित हो, उन्मत्त हुआ हूँ अप्रतिबुद्ध ।
भव-भोगों से जो विरक्त, श्री गुरु समझाकर करें प्रबुद्ध ॥
जैसे कोई पुरुष हस्तगत, स्वर्ण निधि को भूल गया ।
अपने परमेश्वर को भूला, पुण्य-उदय में फूल गया ॥
अपने को जानूँ पहचानूँ और उसी में लूं विश्राम ।
अपने में अपना अनुभव कर, होता सम्यक् आतमराम ॥
चैतन्य मात्र ज्योतिमय हूँ, अपने अनुभव से जान रहा ।
भेद रूप क्रम-अक्रम भाव से, भिन्न एक पहचान रहा ॥
नवतत्त्वों से भिन्न शुद्ध टंकोत्कीर्ण मैं ज्ञायक भाव ।
मैं सामान्य विशेष रूप, उपयोगमयी चिन्मात्र स्वभाव ॥
गन्ध-वर्ण-रस स्पर्श निमित्तक होते संवेदन परिणाम ।
वर्णादिकमय नहिं परिणमता अतः अरूपी आतमराम ॥
यद्यपि मुझसे भिन्न सभी परद्रव्य स्वयं में शोभित हैं ।
किन्तु एक परमाणु मात्र में कभी न चेतन मोहित है ॥
अतः मोह उत्पन्न न होगा, भावक-ज्ञेय रूप पर से ।
मोह समूल विनष्ट हुआ है, ज्ञान-ज्योतिमय निज रस से ॥
ॐ ह्रीं श्री पश्चिमपुष्कारार्धद्वीपस्थ विद्युन्मालीमेरुसम्बन्धी चतुस्त्रिंशत् तीर्थंकरजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
१. यह जयमाला समयसार गाथा ३८ की आत्मख्याती टीका का भावानुवाद है।
चान्द्रायण
एक शतक सत्तर जिनेश को ध्याइये ।
उनकी गौरव गाथा सुन हरषाइये ॥
जिन पूजन आनन्दमयी शिवदाय है।
आत्मतत्त्व का दर्शन ही सुखदाय है ॥
मोह शत्रु का नाश करूँ निज भाव से ।
पाऊँ निजपद राज विशुद्ध स्वभाव से ॥
पुष्पांजलिं क्षिपेत्
समुच्चय अर्घ्य
दोहा
अजितनाथ के काल में तीर्थंकर जिनराज ।
एक शतक सत्तर हुए, हर्षित सकल समाज ॥
हरिगीतिका
निज आत्मा का ज्ञान अरु निज तत्त्व का श्रद्धान कर ।
निज आत्मा में लीन होकर मुक्ति पथ पाया प्रवर ॥
कैवल्य किरणों से प्रकाशित आत्म रवि है चमकता ।
लोक और अलोक का वैभव समूचा झलकता ॥
अनन्त दृग अरु ज्ञान से षट् द्रव्य-गुण-पर्याय का ।
सामान्य और विशेष अवभासन समस्त पदार्थ का ॥
नित सुख अतीन्द्रिय भोगते, हे योग बिन योगीश तुम ।
निज बल अनन्तानन्त से, हे गणधरों के ईश तुम ॥
हे मुक्तिपथ नायक महा ज्ञायक समूची सृष्टि के ।
हे कर्म भूभृत के विदारक तुम्हीं हो वर दृष्टि के ॥
यह अर्घ्य है अर्पित प्रभो ! अन् अर्घ्य पद की कामना ।
भी नहिं रहे अब वृत्ति में, तुम सम बनूँ निष्कामना ॥
एक शत सत्तर जिनेश्वर की करूँ में वन्दना ।
पूज्य-पूजक की रहे नहिं भेद की भी वासना ॥
ॐ ह्रीं श्री ढाईद्वीपस्थपञ्चविदेहभरतैरावतसम्बन्धी एकशतकसत्तरतीर्थंकर जिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
महाजयमाला
दोहा
धन्य दिवस मंगल घड़ी धन्य हुए परिणाम ।
चिदानन्द चैतन्य में, पाऊँ पूर्ण विराम ॥
इक शत सत्तर देव की, पूजन करके आज ।
जन्म सफल मेरा हुआ पाऊँ निजपद राज ॥
वीरछंद
हे जिनेन्द्र ! उर सिंहासन पर तेरे चरण विराजे आज ।
जन्म-जन्म के पाप नशे, चित् चरण-कमल में राजे नाथ ॥
सम्यक्त्व सुमन है खिला आज, तेरे दर्शन की किरणों से ।
चैतन्य वाटिका में बहार आई तेरे शुभ वचनों से ॥
अब भेद-ज्ञान का दीप जला निज को निज पर को पर जानूँ ।
चैतन्य ज्योति की आभा में चेतन का वैभव पहचानूँ ॥
कब वेश दिगम्बर धारणकर में पंच महाव्रत पालूँगा ।
निर्ग्रन्थों के पथ पर चलकर रत्नत्रय निधियाँ पा लूंगा ॥
चढ़ शुक्ल ध्यान की श्रेणी पर कब चार घातियां नष्ट करूँ ।
कैवल्य-किरण से ज्योतित हो चहुँगति का भ्रमण विनष्ट करूं ॥
फिर योग निरोध सहज होगा चैतन्य सदन मैं पूर्ण विलास ।
हो कर्म अघाति नष्ट सभी शिव नगरी में हो पूर्ण निवास ॥
आज जिनेश्वर की पूजन से चेतन में चित् ललचाया ।
पंचेन्द्रिय वैभव तृष्णा तज निज वैभव मन में भाया ॥
तेरे चरणों में वन्दन कर बस यही भावना हो साकार ।
सहज शुद्ध चैतन्य राज का परिणति में प्रगटे आधार ॥
ॐ ह्रीं श्री ढाईद्वीपस्थपञ्चविदेह भरतैरावस्थितएकशतसत्तर तीर्थंकरजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
वीरछंद
ढाई द्वीप में एक साथ जो हुए तीर्थंकर भगवान ।
एक शतक सत्तर जिनेन्द्र की पूजा कर पाऊँ निज भान ॥
श्री जिनेन्द्र की पूजन का है यह पुनीत उद्देश्य विशेष ।
बोधिलाभ हो सुगति गमन हो निजगुण संपति मिले जिनेश ॥
पुष्पांजलिं क्षिपेत्
शांति पाठ
चान्द्रायण
परम शांति के सागर तीर्थंकर प्रभो ।
पूर्ण भक्ति से पूजा है तुमको विभो ॥
अखिल विश्व में पूर्ण शान्ति हो हे जिनेश ।
ईति भीति भय भ्रान्ति सर्व क्षय हो महेश ॥
जिनशासन से सुरभित प्रभु यह लोक हो ।
ज्ञान सुरभि से सुरभित निज चिल्लोक हो ॥
इसीलिए जिनपूजन की मैंने प्रभो ।
परम शान्ति हो परम शान्ति हो हे विभो ॥
पुष्पांजलिं क्षिपेत्
नौ बार णमोकार मंत्र के माध्यम से पञ्चपरमेष्ठी का स्मरण करें ।
क्षमापना
दोहा
भूलचूक जो भी हुई कीजे क्षमा प्रदान ।
तीर्थंकर जिनदेव प्रभु महिमामयी महान ॥
आत्म ध्यान में रत रहूँ पाऊँ सम्यक् ज्ञान ।
आप कृपा से हे प्रभो करूँ आत्मकल्याण ॥
अनुष्टुप
मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतमो गणी ।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो, जैन धर्मोऽस्तु मंगलम् ॥
सर्व मंगल माङ्गल्यं, सर्व कल्याण कारकम् ।
प्रधानं सर्वधर्माणां, जैनं जयतु शासनम् ॥