एक ज्ञायक भाव | Ek gyayak bhav

एक ज्ञायक भाव

(सवैया, लय: अरिहंत सिद्ध सुरि उपाध्याय)

उत्थानिका (पद्यानुकरण):
उठता है प्रश्न यह कि ऐसा ‘शुद्धातम’ कौन,
जिसे इस महा ग्रंथ समयसार में गाया है।
जिसे दिखलाने का प्रण आचार्य कुन्दकुन्द,
करते हैं; बताते हैं कि कैसा शुद्धातम है।।

मूल गाथा:
नहीं अप्रमत्त प्रमत्त नहीं, जो एक ज्ञायक भाव है।
इस रीति से शुद्ध कहाय अरु, जो ज्ञात वो तो वो ही है।।

टीका (पद्यानुकरण):
स्वयं से सिद्ध हूँ मैं, त्रिकाली ज्ञायक ध्रुव,
नित्य उद्योत ज्योति, प्रकाशमान स्पष्ट हूँ।
रे कर्म तूने भले अनादि से बांधा मुझे है,
एकरूप होने पर भी, क्षीरनीर-सा भिन्न हूँ।।

दुरंत कषायों की विचित्रता से वशीभूत,
पुण्य-पाप के जनेता शुभ-अशुभ भाव जो।
उन सभी के स्वभाव से न्यारा मैं शुद्धातम,
अपरिणामी मैं बस एक ज्ञायक भाव हूँ ।।

अप्रमत्त तो नहीं हूँ, प्रमत्त भी नहीं हूँ मैं,
सर्व परद्रव्य भावों से अत्यंत भिन्न हूँ।
इसी रीति से मैं ‘शुद्ध’, निरपेक्ष सहज रूप,
ज्ञेयकारों से मैं रहता अप्रभावी ध्रुव हूँ।।

जैसे दाह्याकार से अग्नि दहन कहलाती है,
फिर भी अग्नि दाह्यकृत अशुद्धता से शून्य है।
वैसे ज्ञेयाकार से प्रसिद्ध होती ज्ञायकता है,
‘भाव’ वह ज्ञेयकृत अशुद्धता से शून्य है।।

जैसे दीपक प्रकाशे घट-पट संग निज को भी,
इसीलिए वह ही अपना कर्ता और कर्म है।
अपने को प्रकाशे या अन्य को प्रकाशे फिर भी,
दोनों ही अवस्था में वह दीपक प्रसिद्ध है।।

वैसे ही जो ‘ज्ञात’ हुआ ज्ञेयाकार दशा में और;
‘ज्ञात’ हुआ वही जो स्वरूप के प्रकाश में।
स्वयं के जानने से वही कर्ता, वही कर्म,
अन्य कुछ हूँ नहीं, ‘ज्ञात’ ज्ञायक भाव मैं।
अन्य कुछ हूँ नहीं, ‘ज्ञात’ ज्ञायक भाव मैं ।।

आचार्य कुन्दकुन्द द्वारा रचित ग्रंथाधिराज समयसार की गाथा ६ की आचार्य अमृतचन्द्र स्वामी द्वारा रचित आत्मख्याति टीका के शब्दों को पद्य में पिरोने का एक प्रयास।

सोहम शाह, अहमदाबाद

रचनाकार: सोहम शाह (Soham Shah), अहमदाबाद
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