द्वादशानुप्रेक्षा (सवैया) | Dwadashanupreksha (Savaiya)
जग है अनित्य तामैं सरन न वस्तु कोय,
तातें दुःख रासि भववास कौं निहारिए।
एक चित सदा भिन्न पर द्रव्यनितैं,
अशुचि शरीर मैं न आपा बुद्धि धारिए ॥
रागादिक भाव करै कर्म को बढ़ावें तातें,
संवर स्वरूप होय कर्म बन्ध डारिए ।
तीन लोक माँहि जिन धर्म एक दुर्लभ है,
तातें जिनधर्म कौं न छिनहू विसारिए ॥
स्रोत — बृहद् आध्यात्मिक पाठ संग्रह, पृष्ठ ३५९ · अनुभाग “विभिन्न कवियों द्वारा विरचित बारह भावनाएँ” (मूल में रचनाकार का नाम नहीं दिया गया)