दुर्लभ जिनधर्म सौभाग्य से मिल गया,
मुक्ति का प्राप्त होना सहज ही अहो ।। टेक ।।
देव-गुरु-धर्म की दृढ़ प्रतीति करो,
तत्त्व निर्णय में नित चित लगाओ अहो।
भेद-विज्ञान कर भाओ शुद्धात्म की,
भावना स्वानुभूति सहज ही अहो।। 1।।
दीखे साक्षात् प्रभुता सु आनन्दमय,
श्रद्धा अरु ज्ञान तत्क्षण हो सम्यक् अहो।
आत्म लीनता की ही रहती लगन,
होवे जग से उदासी सहज ही अहो।। 2।।
दोष रागादि क्षण-क्षण ही घटते चले,
कर्म बन्धन भी प्रतिक्षण विघटते चले।
सहज ही होवे आनन्दमय मुनिदशा,
चलते-फिरते से भगवंत के सम अहो।। 3।।
काल पंचम है घबराना किंचित् नहीं,
होवें लौकान्तिक सुर भी समाधि जु हो।
तहँ तें चय नर हो आराधना पूर्णकर,
शीघ्र मुक्ति हो जावे सहज ही अहो।। 4।।
छोड़ छल, मत फँसों जग प्रपंचों में अब,
चूक जाना न अवसर यह स्वर्णिम अहो।
सीख गुरु की सुनो, अपनी गरिमा लखो,
तृप्ति निज में ही पाओगे शाश्वत अहो।। 5।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह