रोगों की खान, दुःख के हैं कारण।
इन्द्रिय के भोग, नहीं है मनोग॥टेक॥
लगते हैं मीठे, किन्तु है विषमय।
किंपाक फल सम, इन्द्रिय के भोग॥1॥
आतम से न्यारे, रहते सदा ही।
कैसे हो सुख के कारण ये भोग॥2॥
आश्रय से इनके होते विकल्प ही।
प्रत्यक्ष आकुलतामय ही हैं भोग॥3॥
प्राप्ति कठिन है भोग पराधीन।
वियोग में, शोकमय हैं भोग॥4॥
पाप के बीज हैं, विपाक दुःखमय।
तृष्णा के कारण, जानो ये भोग॥5॥
इनमें ही फंस कर होती है दुर्गति।
संसार वृद्धि के हेतु भोग॥6॥
भोगों को हमने नहीं भोगा अब तक।
इसमें हमारा हुआ उल्टा भोग॥7॥
हड्डी चबाते हुए श्वान के सम।
अविचारित रम्य लगें मात्र भोग॥8॥
अरे! जोंक सम देव भी हैं तड़फते।
भोगों में आसक्त करते हैं शोक॥9॥
वॉसों की छाया के सम क्लेश कारक।
छोड़ो रे छोड़ो अभी इन्द्रिय भोग॥10॥
सौभाग्य से जैन शासन है पाया।
करो अब अतीन्द्रिय आनंद का भोग॥11॥
पियो ज्ञान अमृत सदा ही निरन्तर।
मिटे जिससे संसारमय इच्छा रोग॥12॥
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
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