दुख का मूल कारण | Dukh ka Mool Kaaran

तर्ज : कर्त्ता जगत् का मानता जो …

हमको जगत् में घूमते, क्यों सुख न किंचित् मिल सका॥टेक॥

सुख स्वरूपी निजात्मा पर, दृष्टि नाहिं कर सका।
सुख ढूँढता था बाह्य में, बस इसलिए नहीं मिल सका॥1॥

जो द्रव्य जितने जगत् के हैं, निज गुणों से पूर्ण हैं।
लेना न देना उनको पर से, स्व कार्य में संलग्न हैं॥2॥

नहिं पर है निज को इष्टानिष्ट, मात्र वे सब ज्ञेय है।
अच्छे-बुरे की बुद्धि उनमें, दुःख दायक हेय है॥3॥

ये मान्यता छोड़ी न अब तक, ये हमारी भूल है।
ये ही बाधक सच्चे सुख में, ये ही दुःख का मूल है॥4॥

इस मान्यता को बिना बदले, कार्य सब निष्फल रहे।
बहुत व्रत-तप-शील पाले, तो भी जग में रुल रहे॥5॥

बस शीघ्र ही हे भव्य आत्मन् ! उल्टी बुद्धि छोड़ दे।
तत्त्वार्थ का श्रद्धान कर, बस निज से नाता जोड़ ले॥6॥

ये ही सुख का मूल है, चारित्र इसका वृक्ष है।
मोक्ष उसका फल है सुन्दर, सहज सुख से पूर्ण है॥7॥

अतः सुख की प्राप्ति हेतु, सम्यक् दरश धारण करो।
इस कार्य को अति शीघ्र कर लो, देर मत इसमें करो॥8॥


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह

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