दृष्टान्ते स्फुटायते मतिः | Drishtante Sphutayate Matih

दृष्टान्ते स्फुटायते मतिः

-प्रो. (डॉ.) वीरसागर जैन

'दृष्टान्ते स्फुटायते मतिः’¹ यह उक्ति मैंने आचार्य श्री विद्यानन्दजी मुनिराज के श्रीमुख से शताधिक बार सुनी है। यह एक बड़ी ही महत्त्वपूर्ण उक्ति है।

इस उक्ति का हिन्दी-सरलार्थ यह है कि दृष्टान्त का प्रयोग करने पर कोई भी विषय सहज ही सबकी बुद्धि में स्पष्ट हो जाता है।

अनेक बार हमें ऐसा अनुभव होता है कि कोई विषय बहुत प्रयत्न करने पर भी हमारी समझ में नहीं आ रहा होता, किन्तु अचानक ही किसी समीचीन दृष्टान्त का प्रयोग होने पर वह विषय एकदम ‘हस्तामलकवत्’ स्पष्ट हो जाता है, उसमें तनिक भी कोई शंका नहीं रह जाती। बस, इसे ही कहते हैं-‘दृष्टान्ते स्फुटायते मतिः’।

प्रतिपाद्य विषय को रोचक, सुस्पष्ट एवं सुग्राह्य बनाने के लिए दृष्टान्त की महती उपयोगिता सभी मनीषियों ने एक स्वर से स्वीकार की है। यद्यपि न्याय-ग्रन्थों में दृष्टान्त को अनुमान का अंग मानने का सख्त निषेध किया गया है² तथापि वहाँ भी बालव्युत्पत्ति के लिए दृष्टान्त-प्रयोग का महत्त्व असाधारण रूप से स्वीकार किया गया है।³

तत्त्वज्ञान हेतु दृष्टान्त की इसी महती भूमिका का अनुभव करते हुए कुन्दकुन्दादि सभी पूर्वाचार्यों ने दृष्टान्तों के सुन्दर-सुन्दर प्रयोग किये हैं। ये प्रयोग सामान्य से सामान्य व्यक्ति को भी कठिन से कठिन सिद्धान्त को सुगमता से हृदयंगम करा देते हैं।

पूज्य आचार्य श्री विद्यानन्दजी मुनिराज भी दृष्टान्तों के बड़े प्रेमी हैं। जैनदर्शन के गूढ़ विषयों को सुगमतापूर्वक समझाने के लिए उनके पास बड़े ही रोचक एवं सटीक दृष्टान्तों का भण्डार है। आचार्यश्री के दृष्टान्त कभी भी हल्के स्तर के नहीं होते। बहुत ही संक्षेप में बहुत ही अच्छे दृष्टान्त द्वारा अपनी बात कहने की कला आचार्यश्री की अपनी अनूठी ही है।

मैं आज यहाँ आचार्यश्री के प्रिय दृष्टान्तों में से कुछ दृष्टान्तों को सिद्धान्त-सहित स्व-पर-हिताय लिख रहा हूँ-

1. इस लड्डू में एक बूँद विष है-
आचार्य कुन्दकुन्द रचित ‘समयसार’ की 201वीं गाथा में कहा गया है कि जिसे परमाणु मात्र भी राग है, वह चाहे सर्वागमधर हो, फिर भी सम्यग्दृष्टि नहीं हो सकता है। यथा-
“परमाणुमित्तयं पि हु रागादीणं तु विज्जदे जस्स।
ण वि सो जाणदि अप्पाणयं तु सव्वागमधरो वि॥ 201॥”

अर्थात् जिस जीव के परमाणु मात्र-लेशमात्र भी रागादिक विद्यमान है वह जीव भले ही सर्वागम का धारी (समस्त आगमों को पढ़ा हुआ) हो तथापि आत्मा को नहीं जानता।

इसे इस दृष्टान्त से अच्छी तरह समझा जा सकता है- एक व्यक्ति ने हमें बहुत पौष्टिक और स्वादिष्ट लड्डू खाने के लिए दिया। उसने उसका खूब वर्णन भी किया- इसमें बादाम भी डाले हैं, पिस्ता भी और मगज भी, इसमें अत्यन्त शुद्ध घी भी बहुत मात्रा में डाला है; इत्यादि-इत्यादि। किन्तु जैसे ही हम लालायित होकर उस लड्डू को खाने को तैयार हुए, उसने धीरे से कहा कि इसमें एक बूँद विष भी मिलाया है।

  1. आचार्य वादीभसिंह, क्षत्रचूड़ामणि, 1/86
  2. ‘एतद्वयमेवानुमानाङ्गं नोदाहरणम्।’-आचार्य माणिक्यनन्दि, परीक्षामुखसूत्र ३/३३
  3. परीक्षामुखसूत्र ३/४२, न्यायदीपिका ३/३८ आप बताइए- क्या वह लड्डू आपसे खाया जा सकेगा? नहीं, कदापि नहीं।
    जिस प्रकार एक बूँद भी विष हो तो पिस्ता-बादाम-घी आदि पौष्टिक वस्तुओं से युक्त होने पर भी वह लड्डू अभक्ष्य है, त्याज्य है; उसी प्रकार जिसकी श्रद्धा में परमाणु मात्र भी विपरीतता हो, मिथ्यात्वसहित राग हो, वह सर्व आगम का पाठी होते हुए भी सम्यग्दृष्टि नहीं हो सकता।

2. छोटा-सा रत्न और बड़ा भारी मिट्टी का ढेला-
आचार्य कुन्दकुन्द समयसार में कहते हैं-
“णाणगुणेण विहीणा एदं तु पदं बहु वि ण लहंते।
तं गिण्ह णियदमेदं जदि इच्छसि कम्मपरिमोक्खं॥ 205॥”
अर्थात् ज्ञानगुण से रहित बहुत से लोग इस ज्ञानस्वरूप पद को प्राप्त नहीं कर पाते, इसीलिए हे भव्य! यदि तू कर्मों से सर्वथा मुक्ति चाहता हो तो इस ज्ञान को ग्रहण कर।
इसके लिए दृष्टान्त इसप्रकार है- एक बार समुद्र के किनारे पड़े एक बड़े भारी मिट्टी के ढेले और एक छोटे से रत्न में प्रतियोगिता ठन गई कि चलो देखें, इस समुद्र की गहराई को हम में से कौन नापता है। यद्यपिनरले रागद्वेष-जनक प्रतियोगिता से बहुत बचना चाहा, पर मिट्टी के ढेले को अपनी विशालता का दुरभिमान था।
जब वे दोनों समुद्र की गहराई नापने के लिए जल में प्रविष्ट हुये तो मिट्टी का विशाल ढेला तो दो मीटर भी नीचे नहीं उतर सका, पिघल गया, किन्तु वह छोटा-सा रत्न सीधा समुद्र-तल में पहुँच गया।
जिस प्रकार मिट्टी का ढेला बड़ा भारी होकर भी समुद्र-स्वभाव को नहीं नाप सकता और रत्न छोटा होते हुए भी समुद्र-तल में जा पहुँचता है, उसी प्रकार बाह्यक्रियाकाण्ड अधिक हो तो भी उससे आत्मस्वभाव की प्राप्ति नहीं की जा सकती और सहजज्ञान अल्प हो तो भी उससे आत्मस्वभाव की प्राप्ति हो जाती है।

3. पतले से तार में अनेक वाद्य-यंत्रों की ध्वनियाँ-
‘पंचास्तिकायसंग्रह’ की 7वीं गाथा में कहा है कि सभी द्रव्य परस्पर एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं, एक-दूसरे को अपने में अवकाश देते हैं, परस्पर सदा मिल भी जाते हैं, परन्तु कभी भी अपने निज स्वभाव को नहीं छोड़ते हैं। यथा-
“अण्णोण्णं पविसंता दिंता ओगासमण्णमण्णस्स।
मेलंता वि य णिच्चं सगसब्भावं ण विजहंति॥”
इसका दृष्टान्त इसप्रकार है-
समझ लो कि एक संगीत का कार्यक्रम चल रहा है। उसमें कोई गायक एक भजन गा रहा है और अनेक संगीतकार अपने-अपने वाद्ययन्त्रों को बजाते हुए उसे मंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं। वहाँ माइक से लाउडस्पीकर तक एक पतला-सा बिजली का तार है। बीसों वाद्ययन्त्रों की ध्वनियाँ इस एक पतले-से तार में प्रवेश कर रही हैं, एक-दूसरे में मिल भी रही हैं; परन्तु ध्यान से देखिए- कोई भी ध्वनि वास्तव में अपना निज स्वभाव नहीं छोड़ रही है। श्रोता स्पष्ट समझ रहे हैं कि यह हारमोनियम है, यह बांसुरी है, यह ढोलक है, यह गिटार है, यह पायल है, इत्यादि।
जिस प्रकार अनेक वाद्ययन्त्रों की ध्वनियाँ एक तार में प्रवेश करती हैं, एक-दूसरे को अवकाश देती हैं और परस्पर मिलती भी हैं, परन्तु फिर भी अपना-अपना निज स्वभाव नहीं छोड़ती हैं; उसी प्रकार ये सभी द्रव्य परस्पर एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं, एक-दूसरे को अवकाश देते हैं और परस्पर मिलते भी हैं, परन्तु फिर भी अपना-अपना निज स्वभाव कभी नहीं छोड़ते हैं।

4. पापड़ कैसा है-
शास्त्रों में पाँच इन्द्रिय के विषयों को अलग-अलग अनेक दृष्टान्त देकर समझाया गया है, परन्तु उन पाँचों को पापड़ के एक ही दृष्टान्त से भी भलीभाँति समझा जा सकता है। यथा-

समझ लीजिए कि हम एक पापड़ खा रहे हैं। वह स्पर्शनेन्द्रिय की दृष्टि से कुरकुरा-सा या खुरदरा-सा है, रसनेन्द्रिय की दृष्टि से स्वादिष्ट है, घ्राणेन्द्रिय की दृष्टि से खुशबूदार है, चक्षु इन्द्रिय की दृष्टि से पीला-पीला है और कर्णेन्द्रिय की दृष्टि से उसमें चटर-पटर की भी आवाज आ रही है।

इस प्रकार पापड़ के एक ही दृष्टान्त से भी पाँचों इन्द्रियों के विषय-ज्ञान को आसानी से समझा-समझाया जा सकता है।

5. रेडियो सुनना कब सम्भव है-
जैनदर्शन के अनुसार प्रत्येक कार्य के होने में पंच समवाय का होना जरूरी है। यथा- स्वभाव, काललब्धि, भवितव्यता, निमित्त और पुरुषार्थ।

इसे हम इस दृष्टान्त से अच्छी तरह समझ सकते हैं- मान लीजिए हम रेडियो सुनना चाहते हैं, परन्तु हमारे पास रेडियो ही नहीं है तो कैसे सुनेंगे? यदि रेडियो है भी, पर बिजली नहीं आ रही है तो कैसे सुनेंगे? रेडियो भी है और बिजली भी आ रही है, परन्तु अभी रेडियो स्टेशन ही नहीं खुला है तो हम कैसे सुनेंगे?

रेडियो भी है, बिजली भी आ रही है, रेडियो स्टेशन भी खुल गया है, पर हमने सही सुई नहीं मिलाई है, स्टेशन ठीक से नहीं लगाया है तो भी कैसे सुन सकेंगे? यदि रेडियो भी है, बिजली भी आ रही है, रेडियो स्टेशन भी खुला है, हमने सुई भी ठीक से मिलाई है, पर हमारे कान ही ठीक नहीं हैं, हम बहरे हैं तो कैसे सुनेंगे?

इस प्रकार, जैसे रेडियो सुनना तभी सम्भव होता है जब उक्त सभी बातें एक साथ मिल जाएँ, एक भी कम हो तो रेडियो नहीं सुना जा सकता; उसी प्रकार कोई भी कार्य तभी सम्भव है जब निमित्त, भवितव्यता, काललब्धि, पुरुषार्थ और स्वभाव- ये पाँचों समवाय मिल जाएँ।

6. रोटी तभी फूलती है-
आत्मशुद्धि-हेतु बहिरंग और अंतरंग- दोनों प्रकार के तप आवश्यक हैं। मात्र बहिरंग या अंतरंग तप ही पर्याप्त नहीं है। उदाहरणार्थ- रोटी तभी फूलती है जब वह बहिरंग-अंतरंग दोनों ओर से ताप प्राप्त करे, मात्र बहिरंग या मात्र अंतरंग ताप से वह नहीं फूल सकती। अंतरंग ताप के बिना मात्र बहिरंग ताप से वह जल जाती है और बहिरंग ताप के बिना अंतरंग ताप उसे प्राप्त ही नहीं हो सकता। इसी प्रकार बहिरंग तप के बिना अंतरंग तप हो नहीं सकता और अंतरंग तप के बिना बहिरंग तप मात्र कायक्लेश बनकर रह जाता है।

7. णमोकार मन्त्र के जाप से असंख्य कर्मों की निर्जरा कैसे होती है-
शास्त्रों में कहा गया है कि णमोकार मन्त्र के जाप से हमारे असंख्य कर्मों की निर्जरा होती है। लोग पूछते रहते हैं कि ऐसा कैसे होता है और प्रायः हम सभी उत्तर देते रहते हैं कि शास्त्रों में ऐसा ही लिखा है, परन्तु आचार्यश्री इस बात को निम्नलिखित उदाहरण द्वारा आसानी से सब के गले उतार देते हैं-

जिस प्रकार एक वृक्ष पर एक हजार कौए बैठे हों और कोई बालक उन पर एक छोटासा पत्थर फेंके तो उससे वे एक हजार कौए एक साथ उड़ जाते हैं; उसी प्रकार णमोकार मन्त्र के जाप से असंख्य कर्मों की निर्जरा हो जाती है।

अथवा, जिस प्रकार सैंकड़ों सज्जनों की सभा में कोई अशिष्ट व्यक्ति गालियाँ सुनाने लग जाए तो सभी सज्जन वहाँ से उठकर चले जाते हैं, उसी प्रकार णमोकार मन्त्र के जाप से असंख्य कर्म भाग जाते हैं, उनकी निर्जरा हो जाती है।

8. क्या तुम बिना ब्रेक की गाड़ी में बैठना पसन्द करोगे?
मान लो, एक बहुत सुन्दर कार है, बहुत मँहगी है, उसमें ए.सी., टीवी. आदि अनेक सुविधाएँ भी हैं, उसकी सीट भी बहुत अच्छी हैं, परन्तु उसमें ब्रेक नहीं है। बताओ, क्या तुम इस बिना ब्रेक की गाड़ी में यात्रा करना पसन्द करोगे?

उत्तर स्पष्ट है कि नहीं, कदापि नहीं। इसी प्रकार संयम्मरहित जीवन भी कितना ही सुन्दर और प्रभावशाली हो, परन्तु एक दिन भी जीने योग्य नहीं होता। थोड़ा-सा ही सही, पर जीवन में संयम अवश्य होना चाहिए। संयम-रहित जीवन बिना ब्रेक की गाड़ी के समान बड़ा खतरनाक होता है।

9. जगह होती तो और लड्डू खा जाता-
एक सेठ था। उसके यहाँ शादी पड़ी तो हलवाई को मिठाई आदि पकवान बनाने के लिए बुलाया। हलवाई ने सोचा कि सेठजी के यहाँ इस शादी में बहुत-से लोग आयेंगे तो बाद में कुछ खाने को मिले या न मिले इसलिए वह एक लड्डू बनाकर थाली में रखता और दूसरा अपने मुँह में रखता। इस प्रकार वह लड्डू पर लड्डू अपने पेट में डाल रहा था। जब पेट खूब भर गया तो धड़ाम से गिर गया। वैद्य को बुलाया गया कि कहीं कुछ अशुभ न हो जाए। वैद्य आया, बोला- घबराने की कोई बात नहीं। उसने एक सरसों के दाने के बराबर गोली बना दी और उस हलवाई से कहा कि इसे निगल जाओ, ठीक हो जाओगे। इस पर वह हँसने लगा। वैद्य बोला- 'क्यों हँस रहे हो?" वह बोला- 'यदि सरसों के दाने के बराबर मेरे पेट में जगह होती तो मैं एक लड्डू और खा जाता।

देखो, मरे जा रहा है फिर भी लड्डू खाने की इच्छा हो रही है। अज्ञानी का असंयम ऐसा ही होता है। संयमी मनुष्य प्रथम तो संसार करता नहीं और यदि करे भी तो उतना ही करता है जो नरक न ले जाए।

10. उंगली का टेढ़ापन कहाँ चला गया?
आचार्य सिद्धसेन सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में नवरत्नों में गिने जाते थे। वे गूढ़-गम्भीर विषय को भी सरलतापूर्वक समझा देने में बड़े दक्ष थे। एक बार की बात- उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य का विषय चल रहा था। उन्होंने उसे अपनी अंगुली के माध्यम से इस प्रकार समझाया- “बताओ, यह अंगुली कैसी है?"
“टेढ़ी।”
फिर उसे सीधी करके पूछा- “अब कैसी है?"
“सीधी।”
“टेढ़ापन कहाँ गया?”
“अंगुली में ही।”
“सीधापन कहाँ से आया?”
“अंगुली में से ही।”
“ठीक है। देखो, अंगुली में टेढ़ेपन का व्यय हुआ, सीधेपन का उत्पाद हुआ और अंगुली अंगुली ही रही। टेढ़ापन और सीधापन कहीं बाहर से आया-गया नहीं है, अंगुली की ही पर्याय या अवस्था है। इसी प्रकार जगत् की प्रत्येक वस्तु में प्रतिसमय उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य होता रहता है। मूल वस्तु कोई भी कभी न पैदा होती है, न ही नष्ट । उत्पाद-व्यय मात्र उसकी अवस्थाओं में होता है।”

11. आत्मदर्शन तो निर्विकल्प दशा में ही होगा-
एक पानी के बड़े बर्तन में चाँदी का सिक्का गिर गया। बहुत देखने की कोशिश की, पर नहीं दिखा। आखिरकार थोड़ी देर शान्ति से बैठ गये। अब पानी भी शान्त हो चुका था, अतः अब उसमें वह चाँदी का सिक्का स्पष्ट दिखाई दे रहा था। ठीक इसी प्रकार हम आत्मा के दर्शन तो करना चाहते हैं, पर जब तक हमारे मन में दुनिया भर के संकल्प-विकल्प बने रहेंगे तब तक आत्मा के दर्शन कैसे हो सकते हैं? आत्मा के दर्शन तो तभी हो पाएँगे जब सर्व संकल्प-विकल्पों को छोड़कर शान्त निर्विकल्प होंगे।

12. हम दर्पण देखते हैं या अपना चेहरा ?
प्रायः हम सभी दर्पण देखते हैं, परन्तु दर्पण के लिए दर्पण नहीं देखते हैं, अपने चेहरे के लिए दर्पण देखते हैं। जो व्यक्ति केवल दर्पण के लिए दर्पण देखते हैं, उन्हें दर्पण में दिखते हुए भी अपना चेहरा नहीं दिखता।

ध्यान रखें, दर्पण के बिना भी हमें अपना चेहरा नहीं दिखेगा और दर्पण को कैसे भी देख लेने भर से भी अपना चेहरा नहीं दिखेगा। हमें दर्पण देखना होगा और फिर उस समय दर्पण को गौण करके उसमें प्रतिबिम्बित अपने चेहरे को ध्यानपूर्वक देखना होगा, तभी हमें अपना चेहरा दिखेगा और तभी दर्पण देखना भी सफल सार्थक कहा जाएगा।

इसी प्रकार हमें निजात्मा के दर्शन हेतु परमात्मा के दर्शन करने ही होंगे, बिना परमात्मा के दर्शन किए निजात्मा के दर्शन नहीं होंगे। परन्तु परमात्मा के दर्शन कैसे भी कर लेने भर से भी निजात्मा के दर्शन नहीं होंगे, हमें उसमें ध्यानपूर्वक निजात्मा के दर्शन करने का प्रयास करना होगा, तभी निजात्मा के दर्शन होंगे और तभी परमात्मा के दर्शन भी सफल सार्थक कहे जा सकेंगे।

13. धर्मध्यान की क्या उपयोगिता है-
एक बार किसी ने प्रश्न किया- "कर्म का उदय टाला नहीं जा सकता, भगवान् या देवी-देवता भी उसे बदल नहीं सकते, फिर पूजा-पाठ-दया-दान-स्वाध्यायादि रूप धर्मध्यान करने की क्या उपयोगिता है?”

उत्तर- जिस प्रकार दाल में मिर्च तेज डल गई हो तो उसे निकाला तो नहीं जा सकता, किन्तु उसमें थोड़ा मीठा डालकर उसे खाया जा सके-ऐसा बनाया जा सकता है। उसी प्रकार कर्म के उदय को तो टाला नहीं जा सकता, परन्तु धर्मध्यान के द्वारा उसे शान्तिपूर्वक सहा जा सकता है।

14. भावों से धर्म होता है, क्रिया से नहीं-
तीन स्त्रियाँ थीं- 1. रानी, 2. पिसनहारी, और 3. श्राविका। एक दिन उन तीनों ने ही भोजन नहीं किया, तीनों भूखी रहीं। कारण- 1. रानी को भूख नहीं लगी थी क्योंकि कल का गरिष्ठ भोजन ही नहीं पचा था; 2. पिसनहारी को आज कोई काम नहीं मिल पाया अतः उसके पास भोजन ही नहीं था; 3. श्राविका ने अपने आप स्वेच्छापूर्वक ‘उपवास’ किया था।

बाहर से देखा जाए तो तीनों स्त्रियों ने समान रूप से भोजन के बिना दिन बिताया है, किन्तु रानी और पिसनहारी की यह क्रिया धर्म नहीं है और श्राविका की यही क्रिया धर्म है। क्योंकि धर्म भावों के द्वारा होताहै, मात्र बाह्य क्रिया से नहीं। जब कभी बाह्य क्रिया से धर्म बताया जाए तब भी हमें उस बाह्य क्रिया के पीछे जो आत्मा का विशुद्ध भाव होता है, उसे ही धर्म समझना चाहिए।

15. भय और अभय के स्थान-
शास्त्रों में कहा गया है कि यह अज्ञानी जीव जिन चीजों पर विश्वास करता है वे तो वास्तव में भय के स्थान (कारण) हैं और जिनसे डरता है वे अभय के स्थान (कारण) हैं। यथा-
“मूढात्मा यत्र विश्वस्तः ततो नान्यद् भयास्पदम्।
यतो भीतस्ततो नान्यदभयस्थानमात्मनः॥”
-आचार्य पूज्यपाद, समाधितंत्र, 29

अर्थ- मूढ़ जीव जहाँ विश्वास करता है उससे अधिक भयास्पद और कुछ नहीं है। तथा जिससे डरता है उससे अधिक अभय का स्थान अन्य कुछ नहीं है।

यह बात पं. दौलतराम कृत ‘छहढाला’ में भी कही गयी है-
“रागादि प्रगट ये दुःख दैन, तिन ही को सेवत गिनत चैन।”
“आतम हित हेतु विराग ज्ञान, ते लखें आपको कष्टदान ।”
-छहढाला 2/5-6

यह बात बड़ी अटपटी लगती है, आसानी से समझ में नहीं आती; किन्तु पूज्य आचार्यश्री इसे उदाहरण द्वारा इस तरह सरलता से समझाते हैं-

एक हिरण था। एक दिन वह अपने सुन्दर सींगों को देखकर बहुत खुश हो रहा था और साथ ही अपने कुरूप पैरों को देखकर बहुत दुःखी भी हो रहा था। तभी वहाँ एक शिकारी आ गया। हिरण दौड़कर भागने लगा। शिकारी भी उसके पीछे-पीछे भागने लगा। आगे चलकर एक झाड़ी में हिरण के सींग उलझ गये। हिरण को रुकना पड़ा। किन्तु वहीं पास में एक साधु पुरुष थे, उन्होंने दया करके हिरण के सींगों को झाड़ी में से सुलझा दिया। इतने में ही शिकारी भी आ पहुँचा और हिरण को माँगने लगा। किन्तु उन साधु पुरुष ने उसे ऐसा सदुपदेश दिया कि उसका (शिकारी का) हृदय-परिवर्तन हो गया। उसने आजीवन शिकार का त्याग कर दिया। इसके बाद महात्माजी ने उस हिरण को समझाया- देखो, जिन सींगों को देखकर तुम खुश हो रहे थे, वे तुम्हारी मृत्यु का कारण बन रहे थे और जिन पैरों को देखकर तुम दुखी हो रहे थे वे ही तुम्हें बचाने के काम आये। समझे?

ठीक यही दशा हमारी है। हम परिग्रह एवं विषय-भोग सामग्री को सुख का साधन समझते हैं, जबकि उससे बड़ा दुःख का कारण और कोई नहीं है तथा संयम-तप-त्याग को दुःख व कष्ट का साधन समझते हैं, जबकि उससे बड़ा सुख का कारण और कोई नहीं है।

16. जीव की आकुलता व्यर्थ है, भ्रमरोग है

यह जीव परपदार्थों को देख-देखकर सदा आकुलता करता रहता है कि अरे, यह क्या हो रहा है, यह क्या हो गया, यह तो ऐसा हो जाएगा, वैसा हो जाएगा, ऐसा नहीं होना चाहिए, ऐसा होना चाहिए, क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ, इत्यादि और अनादि काल से ऐसी ही अनन्त आकुलता में अनन्त जन्म-मरण करता फिरता आया है।

किन्तु वास्तव में देखा जाए तो इस जीव की सारी आकुलता व्यर्थ है, क्योंकि जगत् में कुछ भी ऐसा बुरा नहीं घटित हो रहा है जो कि सचमुच आकुलता का कारण हो। जगत् में तो सभी अनादिनिधन वस्तुएँ भिन्न्न भिन्न अपनी-अपनी मर्यादा सहित परिणमित हो रही हैं, कोई भी वस्तु अपनी मर्यादा का अतिक्रमण नहीं कर रही है। यह जीव अपने अज्ञान से, भ्रम से व्यर्थ ही आकुलता कर रहा है। इसका यह भ्रमरोग कैसा है- इसे हम इस उदाहरण से भली-भाँति समझ सकते हैं-

एक बुढ़िया थी, उसे उसके बेटेबहू एक दिन ज़बरदस्ती सिनेमा दिखाने ले गये। उसने पहले कभी भी सिनेमा नहीं देखा था। सिनेमा देखते समय एक दृश्य ऐसा आया जिसमें बहुत वर्षा हो रही थी। उसे देखकर बुढ़िय बहुत अधिक घबरा गई, चिल्लाने लगी कि अरे मैं तो छत पर बडीपापड़ सुखाकर आई हूँ, मेरे बिस्तर भी रखे हैं, सब खराब हो जाएँगे और वह वहाँ से निकल कर जल्दीजल्दी भागती हुई घर जाने लगी। रास्ते में सड़क पार करते समय उसका एक्सीडेंट हो गया और वह मर गई। यही हाल हमारा है, हम भी अपने भ्रमरोग से महा दुःखी हैं।