द्रव्य-गुण-पर्याय : एक संक्षिप्त विवेचन
-प्रो. वीरसागर जैन
1. द्रव्य की परिभाषा, संख्या, उसके प्रकार एवं पर्यायवाची शब्द
गुण-पर्यायों के समूह को द्रव्य कहते हैं।¹ वे अनन्त हैं, जिन्हें 2 प्रकार के भी कहा जा सकता है- जीव और अजीव, तथा 6 प्रकार के भी कहा जा सकता है- जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। जिसमें चेतना (ज्ञान-दर्शन) पाई जाए उसे जीव कहते हैं। जो स्पर्श-रस-गन्ध-वर्ण वाला हो उसे पुद्गल कहते हैं। जो जीव-पुद्गलों के गमन में निमित्त होता है उसे धर्मद्रव्य कहते हैं। जो जीव-पुद्गलों के ठहरने/रुकने में निमित्त होता है उसे अधर्म द्रव्य कहते हैं। जो सभी द्रव्यों को अवगाहन में निमित्त होता है उसे आकाश द्रव्य कहते हैं। जो सभी द्रव्यों के परिवर्तन में निमित्त होता है उसे काल द्रव्य कहते हैं। द्रव्य, वस्तु, चीज, अर्थ, अस्ति, सत्, सत्ता, सामान्य, अन्वय, विधि, ज्ञेय, प्रमेय आदि अनेक शब्द ‘द्रव्य’ के पर्यायवाची हैं।
2. गुण की परिभाषा, संख्या, उसके प्रकार एवं पर्यायवाची शब्द
जो द्रव्य के सभी भागों और सभी अवस्थाओं में पाया जाए उसे गुण कहते हैं।² वे भी अनन्त हैं, जो 2 प्रकार के होते हैं- सामान्य गुण और विशेष गुण। जो सभी द्रव्यों में पाये जाएँ वे सामान्य गुण हैं, जैसे- अस्तित्व, वस्तुत्व आदि। तथा जो एक ही प्रकार के द्रव्यों में पाये जाएँ वे विशेष गुण हैं, जैसे- ज्ञान, दर्शन, स्पर्श, रस आदि। गुण, शक्ति, विशेषता, लक्षण, स्वभाव, प्रकृति, शील, आकृति, धर्म, अंग आदि अनेक शब्द ‘गुण’ के पर्यायवाची हैं।³
3. पर्याय की परिभाषा, संख्या, उसके प्रकार एवं पर्यायवाची शब्द
द्रव्य एवं गुणों के परिणमन को पर्याय कहते हैं।⁴ वे भी अनन्त हैं, जो 2 प्रकार की होती हैं- द्रव्यपर्याय (व्यंजनपर्याय) और गुणपर्याय (अर्थपर्याय)। अवस्था, दशा, हालत, पर्यय, पर्याय, भाव, परिणाम, परिणमन, परिवर्तन, विशेष, आदि अनेक शब्द ‘पर्याय’ के पर्यायवाची हैं।⁵
4. शुद्धता-अशुद्धता की अपेक्षा पर्याय के प्रकार
शुद्धता-अशुद्धता की अपेक्षा पर्याय दो प्रकार की होती है- स्वभाव पर्याय और विभाव पर्याय।
5. किन द्रव्यों और किन गुणों में कभी कोई विभाव पर्याय नहीं होती
धर्म, अधर्म, आकाश और काल - इन 4 द्रव्यों में कभी कोई विभाव पर्याय नहीं होती। अस्तित्व, वस्तुत्व आदि प्रायः सभी सामान्य गुणों की भी कभी कोई विभाव पर्याय नहीं होती।
- गुणपर्ययवद् द्रव्यं । -तत्त्वार्थसूत्र, 5/38
- द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः। -तत्त्वार्थसूत्र, 5/41
- तद्भावः परिणामः । -तत्त्वार्थसूत्र, 5/23
- पंचाध्यायी, 1/48
- पंचाध्यायी 1/60
6. सभी द्रव्यों की स्वभाव-विभाव पर्यायें
द्रव्यपर्याय गुणपर्याय
स्वभाव विभाव स्वभाव विभाव
जीवद्रव्य- सिद्ध मनुष्य-तिर्यंचादि केवलज्ञान मतिज्ञान/रागादि
पुद्गलद्रव्य- अणु स्कंध स्पर्श नारंगी रंग
धर्मद्रव्य- लोकप्रमाणाकार - गतिहेतुत्व -
अधर्मद्रव्य- लोकप्रमाणाकार - स्थितिहेतुत्व -
आकाशद्रव्य- अनन्त आकाश - अवगाहनहेतुत्व -
कालद्रव्य- एकप्रदेशी - वर्तनाहेतुत्व -
7. द्रव्य-गुण-पर्याय को जानने से लाभ
द्रव्य-गुण-पर्याय को जानने से हमें आत्मा और परमात्मा की सच्ची पहचान होती है तथा उससे सर्व मोह नष्ट होकर सच्ची सुख-शान्ति प्राप्त होती है।⁶
8. द्रव्यों की सामान्य विशेषताएँ
सभी द्रव्य अनादि काल से हैं और अनन्त काल तक रहेंगे। कभी किसी मूल-द्रव्य का उत्पाद या विनाश नहीं होता। उत्पाद-विनाश तो मात्र उनकी अवस्थाओं (पर्यायों) में होता है। अतएव वे द्रव्य-अपेक्षा नित्य और पर्याय-अपेक्षा अनित्य भी माने गये हैं। सभी द्रव्य परस्पर मिलते हैं, एक-दूसरे में प्रविष्ट भी होते हैं, परन्तु कोई भी द्रव्य कभी भी अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता है।⁷ जैसे- जीव सदा जीव ही रहता है और पुद्गल सदा पुद्गल ही। सभी द्रव्य स्वतंत्र हैं, परन्तु परस्पर निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध भी रखते हैं।
9. सभी द्रव्यों में एक आत्मद्रव्य ही ‘सार’ है
सभी द्रव्यों में जीवद्रव्य, जीवद्रव्यों में भी अपना जीवद्रव्य (आत्मद्रव्य) ही ‘सार’ है, क्योंकि वही वास्तव में ध्येय है, उसी के आश्रय से जीव को सच्ची सुख-शान्ति प्राप्त होती है। इसीलिए आचार्यों ने जीव का कथन सर्वप्रथम किया है और उसे ‘सर्वोत्तम’ एवं ‘परमतत्त्व’ आदि संज्ञाओं से भी विभूषित किया है।⁸
10. द्रव्य-गुण-पर्याय का जीवन में प्रयोग
द्रव्य-गुण-पर्याय एक अत्यन्त प्रयोजनभूत विषय है। हमें अपने व्यावहारिक जीवन में निरन्तर इसका प्रयोग करना चाहिए, हरेक वस्तु या घटना पर लगाकर देखना चाहिए। इससे संयोग दृष्टि या पराधीन दृष्टि छूटकर स्वभावदृष्टि या स्वाधीन दृष्टि का विकास होता है, स्व-पर-भेदविज्ञान होता है। आज तक जितने भी जीव सुखी हुये हैं, वे सब भेदविज्ञान से ही हुये हैं।⁹
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जो जाणदि अरिहंतं दव्वत्तगुणत्तपज्जयत्तेहिं ।
सो जाणदि अप्पाणं मोहो खलु जादि तस्स लयं ।। -प्रवचनसार, गाथा 80 -
अण्णोण्णं पविसंता दिंता ओगासमण्णमण्णस्स ।
मेलंता वि य णिच्चं सगसब्भावं ण विजहंति । -पंचास्तिकाय, गाथा 7 -
उत्तम गुणाण धाम सव्वदव्वाण उत्तमं दव्वं ।
तच्चाण परमतच्चं जीवं जाणेह णिच्छयदो।। -कार्तिकेयानुप्रेक्षा, गाथा 204 -
भेदविज्ञानतः सिद्धाः सिद्धाः ये किल केचन ।
अस्यैवाभावतो बद्धाः बद्धाः ये किल केचन ।। -समयसार-कलश, 131