दान की योजना - Donation Plan

दान की योजना (Donation Plan)
बा. ब्र. सुमत प्रकाश जी, खनियाधाना

१- बच्चों में दान का संस्कार पड़े इस प्रकार उन्हीं के हाथ से प्रति अष्टमी-चतुर्दशी को घर से ही द्रव्य तैयार करके भेजें, दान राशि का भुगतान उन्हीं के हाथों से करें।

२- हो सके तो सारे पारिवारिक सदस्यों को दान करने का यथा योग्य अधिकार देवें| अपनी आय का १ से १० % तक का हिस्सा निकाल कर सारे सदस्यों में दान अधिकार का विभाजन करें| जैसे सबसे छोटा बच्चा हो तो उसे भी प्रति दिन १ रुपया दान देने - करुणा पर खर्च करने का अधिकार हो।

३- बिना दान भोजन न करें | अब आहार दान कैसे करें ? इसका विचार करें यथायोग्य पात्रों को आहार दान के साथ प्रतिदिन भावना के स्तर पर, बुजुर्गों को आदर से भोजन कराके, छोटो प्यार/बात्सल्य से भोजन करावें, दीन दुखियों, असहाय लोगों को आग्रह पूर्वक भोजन करावें | यह सब भावी भगवान हैं अतः सबही की यथायोग्य आदर-विनय करें।

४- दान देने के लिये किसी को भय न हों, चोरी छिपे ना करना पड़े, भावुकता में गलत स्थान पर व्यय न हो इसलिये प्रतिदिन इसकी समीक्षा होनी चाहिये जिससे बच्चे दान देने में परिपक्व होते हैं, उन्हें दान की महिमा एवं गरिमा बनी रहती है।

५- मंदिर में सर्वत्र देखने की आदत डालें, कहीं कोई कमी तो नहीं है | जिनवाणी को सुव्यवस्थित विराजना, दोचा सहित वर्तन मेली अन्गोछी न हों, फटी-टूटी चटाई न हों, समवशरण में प्रत्येक वस्तु (पानी भरने के वर्तन पीतल आदि के हों) उत्तम से उत्तम होना चाहिये | परदेश जाने पर मंदिर की याद आना चाहिये वहाँ के लिये ग्रन्थ, चटाई, घड़ी, पूजा के वर्तन, छत्र, चमर, भामंडल बदलने हेतु लाते रहना चाहिये | अनावश्यक बिजली-पानी का व्यय न हो | मंदिर में जाले न लग पावें, चूहे आदि कीड़े उत्पन्न न हो, सफाई-पुताई स्वयं समाज के साथ करें।

६- शादी व्याह वर्षगाठ अथवा अन्य कोई प्रसन्नता के अवसर पर दान की रसीद बनाकर भेट करना चाहिये और अपनी भावना लिखना चाहिये कि हमारी आपके प्रति भावना है कि आपका दान भावना से मंगल हो |

७- दान लिखाकर तत्काल देना चाहिये या उतना निकाल कर अलग रख देना चाहिये |

८- परिवार एवं समाज में भले कृत्यों-दानों की अनुमोदना करें |

९- वसीयत में आने वाली पीढ़ी को दान हेतु प्रोत्साहन लिख कर जावें |

८- मंदिर के संकल्प से लायी गयी वस्तु का सेवन स्वयं कदापि न करना चाहिये |

९- धन न हो तो समय का दान करना चाहिये | मंदिर में स्वच्छता, जिनवाणी की वैयावृत्ति, विद्युत बोर्ड, बल्ब लिखापडी, सामग्री की सुव्यवस्था करना, वर्तन से स्टिकर हटाना | पूजा की धोती अच्छे से शल रहित सुखाना, प्रति सप्ताह उबले पानी-पावडर में धुलाना | आदि कार्य मंदिर निर्देश से जानने |

१०- परिवार एवं समाज में भले कृत्यों-दानों की अनुमोदना करें |

११- वसीयत में आने वाली पीढ़ी को दान हेतु प्रोत्साहन लिख कर जावें |

दान देने से पूर्व कर्तव्य

र.क.श्रा.पृ-२८५ के अनुसार - “धन संपदा बहुत हो तो प्रथम तो जिनका आपने अन्याय से धन लिया हो उनके पास जाकर क्षमा मांगकर उनका धन लोटा देना | यदि आपके पास धन बहुत हो तो धन के उपार्जन करने का त्याग करना | तीव्र राग के बढ़ाने वाले इन्द्रियों के विषयों की लालसा छोड़कर सम्बररूप होना फिर जोशेष धन रहे उसमें से अपने मित्र, हितचिन्तक, पुत्री, बहन, भुआ, बंधुओं में जो निर्धन, रोगी, दुखी हों उनको तथा अनाथ विधवा हों उनको यथा योग्य देकर संतोषित करना | अपने आश्रित सेवकादि व जो समीप में रहने वाले हों उनको यथायोग्य संतुष्ट करके, फिर पुत्र को - स्त्री को उनका हिस्सा अलग दे देना | पश्चात जो धन बचे उसे जिन्मंदिर बनबाने में, जिनबिम्ब की प्रतिष्ठा कराने में तथा जितेंद्र के धर्म का आधार जिन्सिद्धान्तों को लिखवाने में / छपवाने में कृपणता छोड़कर उदार मन से परके उपकार करने की बुद्धि से धन लगाना; उसके समान कोई प्रभावना नहीं हैं।”

कौनसा दान सबसे बड़ा ?

जहां जो योग्य एवं आवश्यक हो | दान उत्तम लक्ष्य, आदर्श, साधन, सिर, भाव सब कुछ उत्तम से उत्तम होना चाहिये |

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दान : क्या था और क्या हो गया? वर्तमान-परिस्थितियों में ‘दान’ की समीक्षा :–
-प्रो. सुदीप कुमार जैन
Source Website Link- प्रोफ़ेसर सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली

यहाँ तक अतिसंक्षेप में ‘दान’ के विषय में पारम्परिक विवेचन के बाद अब वर्तमान-परिस्थितियों में ‘दान’ की दशा के विषय में संक्षेप में समीक्षापूर्वक विवेचन अपेक्षित समझता हूँ।
वर्तमान-परिस्थितियों में ‘दान’ जैसी पवित्र-विधि की सर्वाधिक-विरूप वाली हालत बोलियों के कारण हुई है। इनमें पवित्र-अनुष्ठानों के उत्तरदायित्व के लिये योग्य-दातारों के चयन का आधार उऩका चरित्र या गुणवैभव न होकर उन पदों की ‘नीलामी’ जैसी प्रक्रिया को बना दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप नैतिक-अनैतिक किसी भी प्रकार से अर्जित धन को भरी भीड़ में लौकिक मानबढ़ाई के लिये देेेकर किसी भी प्रकार के आचरण व कुल-शीलवाले लोग मंचासीन होकर लौकिक वैभव से निर्धन, किन्तु सदाचार के धनी कुलीन जनों को मानो तिरस्कृत करते हुये धर्मानुष्ठानों की शोभा बनते हैं। इसे देखकर कवि ‘जयवल्लभ सूरि’ की यह गाथा हठात् स्मरण हो आती है, जिसमें आज के युग में धन की प्रधानता पर व्यंग्य करते हुये कहा गया है कि–
“जाई रूवं विज्जा,
तिण्णिवि गच्छंतु कंदरे विवरे।
अत्थं चिय परिवड्ढदु,
जेण गुणा पायडा होंति।।”
अर्थात् उच्च-जाति, श्रेष्ठ-रूप और उत्कृष्ट-विद्यावान् होना-- ये सभी योग्यतायें तो किसी गुफा या गड्ढे में चली जायें। मात्र धन ही बढ़े, जिसके होने मात्र से (इस कलयुग में) सारे गुण प्रकट हो जाते हैं।
संभवतः इसीकारण से संस्कृत के नीतिकार को लिखना पड़ा कि " सर्वे गुणा काञ्चनमाश्रयन्ति" अर्थात् आजकल तो सभी गुण धन के गुलाम हैं(जिसके पास धन है, उसके पास सब कुछ है) --ऐसा माना जाने लगा है।
मेरे कहने का यह ऐकान्तिक-अभिप्राय कदापि नहीं है कि बोलियाँ लेनेवाले सभी लोग सदाचार-विहीन ही होते हैं। मैं स्पष्टरूप से यह मानता हूँ कि कई कुलीन व सदाचारी लोग भी बोलियाँ लगाकर मात्र इसीलिये दान देने हैं कि उस पवित्र-अनुष्ठान में सम्मिलित होने का सुअवसर वे खोना नहीं चाहते हैं। आजकल बोलियों का सिस्टम हो जाने से वे भी विवश होकर इस प्रक्रिया के अंग बनते हैं। किन्तु यह भी सत्य है कि इस सिस्टम के कारण समाज में होनेवाले धर्मानुष्ठानों में पदों का निर्णय गुणों के आधार पर न होकर धन-देने की सामर्थ्य के आधार पर होने लगा है।
तीन लोक के नाथ जिनेन्द्रदेव के पवित्र-अनुष्ठानों ं में विधियाँ सम्पन्न करने के लिये आवश्यकता जहाँ गुणों को अंगीकार करने की होनी चाहिये, वहाँ उन गुणों की पूरी तरह से उपेक्षा करना असहनीय है। ज्ञातव्य है कि तीर्थंकर परमात्मा के दीक्षा-कल्याणक के पावन-प्रसंग पर जब देवों एवं मनुष्यों में पहले पालकी उठाने का विवाद-प्रसंग हुआ, कहा जाता है, तब निर्णय यही दिया गया था कि “जो भगवान् के साथ दीक्षा लेकर वैराग्य के पथ पर चलने को तैयार हो, वही पहले पालकी को उठायेगा।” तब संयम के सुपात्र मनुष्यों को ही पहले पालकी उठाने का सुअवसर मिलता है। और अपार-सम्पदा के धनी देवगण सर्वप्रथम पालकी उठाने के उस सौभाग्य से वंचित रह जाते हैं।
क्या यह प्रसंग हमें यह नहीं सिखाता कि धर्मानुष्ठानों में संयम, शील व सदाचार आदि गुणों की प्रधानता होती है, न कि धन के बल पर मानकषाय के पोषण के साथ उच्चपदों को खरीदने की। मैंने एक जगह पंचकल्याणक-प्रतिष्ठा-महोत्सव में इन्द्र आदि पदों के लिये पात्रता के रूप में धन के स्थान पर संयम व सदाचार की प्रमुखता पायी। उस में इन्द्रों के पदों के लिये वर्ष भर के तीनों दसलक्षणपर्व, तीनों अष्टाह्निकापर्व, तीनों सोलहकारणपर्व के साथ-साथ अष्टमी और चतुर्दशी तिथियों में यथायोग्य संयमपूर्वक रहने व धर्मध्यान करने का संकल्प लेने की अनिवार्यता भी की गयी थी। फिर उनकी जितनी सामर्थ्य थी, और जितनी धनराशि उन्होंने स्वेच्छापूर्वक दान की, उसे आयोजकों ने सहर्ष बिना किसी भेदभाव के स्वीकार किया गया। इसतरह आर्थिक-मानदण्ड न बनाकर सदाचार को मानदण्ड बनाया गया-- यह बात मुझे बहुत अपील की।
इसीप्रकार एक जगह जिनबिम्ब को वेदी में विराजमान कराने के निमित्त यह कहा गया कि “जो भी श्रीजी का वर्ष भर में कम से कम 300 दिन प्रक्षाल-पूजन शुद्धविधि से करने का संकल्प ले, वह जिनबिम्ब विराजमान करने आगे आये”।
जिनवाणी को भी विराजमान करने के लिये इसीप्रकार कहा गया कि “जो सज्जन प्रतिदिन जिनवाणी के स्वाध्याय का नियम लें, उनके ही हाथों से जिनवाणी विराजमान करायी जायेगी।”
शुभ-संकल्प लेने वालों की ओर से अन्तःप्रेरणा से सहर्ष दी जानेवाली कम धनराशि को भी अत्यन्त बहुमान-पूर्वक स्वीकार किये जाने का उदात्त-व्यवहार मुझे उनके प्रति आदरभाव से भर गया।
आज कहा जाता है कि “यदि ऐसा ही होने लगे, तो फिर धर्मानुष्ठानों में होने वाले खर्च के लिये धन कहाँ से आयेगा?” यह इमोशनल-ब्लैकमेलिंग के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। अभी इस वीतराग-शासन का पुण्य इतना क्षीण नहीं हुआ है कि इस भयादोहन से डरकर हमें ‘नीलामी’ जैसी प्रक्रिया अपनाने को विवश होना पड़े। उतना आलीशान टेंट नहीं लगेगा, तो कुछ कम लग जायेगा। छप्पन-भोग नहीं परोसे जाकर सात्त्विक-शुद्ध भोजन कराया जायेगा। दिखावे कम होंगे, पर धर्मविधि कम नहीं होती; बल्कि सच्चे धर्मानुरागियों की प्रधानता होने से अधिक समर्पित व शुद्ध-विधि होगी।
लेकिन तब ‘धर्म का धंधा’ करनेवाले ऐसे धनार्थी- (सभी नहीं) प्रतिष्ठाचार्यों, विधानाचार्यों, गृहस्थाचार्यों का क्या होता? असल में तो धन की प्रधानता का यह खटराग इन्हीं की देन है। ये बोलियाँ लगवाकर पैसा इकट्ठा करवाते हैं , फिर निर्लज्जतापूर्वक उस निर्माल्य-द्रव्य में से अपना मोटा हिस्सा माँगते हैं। ये ही वे लोग हैं, जो समाज के लोगों को यह कहकर हमारे मुनिधर्म को लांछित करते हैं कि “फलां मुनिराज/आचार्य को निमंत्रित कर लें, उनसे कोई तर्क-वितर्क मत करना। वे जो भी कहें, चुपचाप स्वीकार करते जाना। वे तुम्हें अपने चेलों से इतना पैसा दिलवा देंगे कि तुम्हारा सारे कार्यक्रम का खर्च तो निकल ही आयेगा, तुम्हें आगे के लिये भी मोटा-पैसा बच जायेगा।” और साथ ही उन महाराज जी से अपनी सैटिंग की विशेषता बताते हुये निर्लज्जतापूर्वक यह कहने में नहीं चूकते कि “इतनी तो मेरी फीस रहेगी और इतना मेरा कमीशन पूरी कमाई में रहेगा। यदि मंजूर है, तो बात करो; वर्ना मुझे निमंत्रित करनेवाले बहुत हैं।”
उनकी धृष्टता यहीं नहीं रुकती है, वे अत्यन्त निर्लज्जता पूर्वक कहते हैं कि “हम तो धर्म की खरी-कमाई खाते हैं। जो पाप की कमाई खाते होंगे, वे डरें।” अर्थात् उनकी भाषा में ‘निर्माल्य-द्रव्य’ का सेवन करना ‘धर्म की कमाई’ है!!!
ऐसे बेधड़क-पापियों को तो समझाने की चेष्टा भी ‘अंधे के आगे रोना’ या ‘भैंस के आगे बीन बजाना’-- जैसी उक्तियों को चरितार्थ करता है।
इस श्रेणी के दानदातारों की एक बड़ी बुराई यह भी है कि कुछ लोग तो मंच पर बैठकर बोलियाँ ले लेते हैं, मालायें पहिनकर सम्मानित भी हो जाते हैं; परन्तु बाद में बोली गयी धनराशि देने में आनाकानी करते हैं। यदि माँगनेवाले थककर शर्म के मारे चुप होकर बैठ जायें, तो उन्हें वह धनराशि हजम करने में कोई गिल्टी का अनुभव नहीं होता है।
जिनवाणी की आज्ञा है कि “दान के लिये संकल्पित-द्रव्य को जितने क्षण भी अपने पास रखा जाये, तत्काल या अतिशीघ्र वहाँ सादर न पहुँचाया जाये, जहाँ के निमित्त बोला या संकल्पित किया गया था, तो प्रतिक्षण पाप का बंध है। और यदि कदाचित् इस बीच आयुकर्म पूर्ण हो जाये, तो क्या होगा? कभी सोचा है?महीनों बाद दान की धनराशि देनेवाले क्या उस धनराशि को ब्याजसहित देते हैं? क्योंकि जिससे उन्हें पैसा लेना होता है, उससे तो समयसीमा के बाद वे ब्याज पर भी ब्याज लेने में नहीं चूकते हैं। (मेरा अभिप्राय यहाँ ब्याज के लेनदेन का समर्थन करना नहीं है, बल्कि हमें यह शिक्षा देना है कि दान के धन को एक क्षण के लिये भी देने में बिलम्ब नहीं किया जाना चाहिये।)
आज तो दान देकर लौकिक मानबढ़ाई आदि की आकांक्षायें तो प्रायः रहतीं ही हैं, साथ ही प्रतिस्पर्धा (कंपटीशन) की भावना से भी दान दिया जाने लगा है। यदि किन्हीं जो आपस में विरोधभाव रखने वाले एक ही पद के लिये बोलियाँ लगा रहे हैं, तो फिर उस पद की गरिमा एवं धर्मभाव को देखे बिना मात्र एकदूसरे को नीचा दिखाने की दृष्टि से भी बोलियाँ बढ़तीं हैं। कई चतुर बोली-विशेषज्ञ तो चुनकर आपस में विरोधभाव रखनेवालों को सभा में बुलवाते हैं, तथा उनके आपसी द्वेष का लाभ उठाकर अधिक धनराशि बोलियों में जुटा देते हैं। चूँकि मनुष्यगति में मानकषाय की प्रधानता है, अतः दान की ओट में मानकषाय का यह खेल खुलकर खेला जाता है।
कहते हुये बहुत दुःख हो रहा है, क्योंकि मैं यह कहकर अपने ही साधर्मी-भाईयों की समीक्षा कर रहा हूँ, परन्तु कई ऐसे भी लोग हैं, जो बोली हुई दानराशि को कई बार माँगने पर भी नहीं देते हैं या आधा-अधूरा देते हैं। और ऐसा करने में उन्हें किंचित् मात्र भी ग्लानि नहीं होती है। न ही उनकी अकड़ तनिक भी कम होती है।
कई लोग तो बोलियाँ लेते समय तो मानकषाय के कारण बढ़-चढ़कर बोलियाँ ले लेते हैं, किन्तु बाद में प्रतिष्ठाचार्य को दोष देते हैं कि " तुमने बातों में मुझे फँसाकर इतनी ऊँची-बोली लगवा दी।” पहले तो माँगने पर दान का संकल्प लिया, अपने मन से स्वतः नहीं दिया; और फिर उसके बदले मानकषाय की पूर्ति करके उसकी पवित्रता खंडित की। और रही सही कसर इस खेदखिन्नता के भाव ने पूरी कर दी और हर्ष-भाव को नष्ट करके दान का दानत्व ही नष्ट कर दिया।
आजकल ‘दान’ के लिये विवेक का प्रयोग निरन्तर घटता जा रहा है। न तो पात्रता का विचार किया जाता है और न ही विधि की मर्यादा का ध्यान रखा जाता है। मुझे अच्छी तरह याद है कि एक महानुभाव मुझसे बड़े गर्व से बोले कि “मैंने आज होली होने के कारण अपने घर की बनी गुझियाँ महाराज जी को ले जाकर आहारदान में दीं। महाराज जी ने भी बड़े स्वाद से आहार में लीं।” मैं आश्चर्यचकित था कि वे गुझियाँ बाजार की मैदा से बनीं थीं, अतः मर्यादा का तो सवाल ही नहीं था।और उन्हें कई किलोमीटर दूर से कार चलाकर वे स्वयं लाये थे, इसलिये एक ही पंक्ति के चार घरों की बात भी नहीं रही। कार चलाने में वस्त्रशुद्धि का तो प्रश्न ही नहीं रह सकता है। इतनी अशुद्धि के बाद भी वे गर्व से इस बात का बखान कर रहे थे। इसे क्या कहा जाये?
ऐसी एक-दो नहीं, आजकल देखने जायें, तो अनेकों ऐसी घटनायें प्रतिदिन घटित हो रहीं हैं। न दातारों को विवेक है, न लेने वालों की गृद्धता में कमी या कोई समझदारी की अपेक्षा दिखती है। तब विधि और पात्रता की तो बात करना ही व्यर्थ है।
अपनी आगम-परम्परा की रक्षा के लिये, श्रामण्य की रक्षा के लिये, तीर्थों की रक्षा के लिये, साधर्मी-वात्सल्य बढ़ाने के लिये और वीतराग-शासन की प्रभावना के लिये विवेक पूर्वक अपने द्वारा विधिपूर्वक कमायी गयी धनराशि को दानस्वरूप देने का प्ररूपण तो अनेकों स्थलों पर मिल जाता है; किन्तु आज तो 90% दानराशि टेंटवालों, कैटरर्स और प्रिंटिंग-प्रेस (बैनर, फोल्डर, हैंडबिल, निमंत्रणपत्र, पत्रिकाओं आदि के प्रकाशन में) आदि के बिलों के भुगतान में चली जाता है। बची हुई राशि में पंडितों व प्रबंधकों का जन्मसिद्ध-अधिकार जैसा होता है। जिनमंदिर-निर्माण आदि के कार्यों में भी बहुत तरह की परिस्थितियों को देखना पड़ता है। अन्य विलासितापूर्ण भवनों के औचित्य का विचार किये बिना कोई प्रतिक्रिया देना उचित नहीं होगा।
इनके अतिरिक्त आजकल संसारी मोहीजनों के कंपटीशन में जन्मदिवस-समारोह, वैडिंग-एनवर्सरी से बेहतर दीक्षा-दिवस-समारोह , चातुर्मास-स्थापना-समारोह, चातुर्मास-विर्सजन-समारोह, नगर-प्रवेश-समारोह, विहार-महोत्सव, पिच्छी-परिवर्तन-समारोह आदि बहुत से प्रसंग गढ़े जा रहे हैं, जिनके निमित्त से भोली-भाली जनता की धर्मभावना को कैश किया जाता है। लोग दान की भावना से धनराशि देते हैं, किन्तु उन्हें यह पता ही नहीं है कि जिनवाणी के अनुसार इन कार्यों को न तो धर्मकार्य माना गया है और न ही इनके आयोजनों के नाम पर लड्डू-कचौड़ी खाना, पिकनिक-पार्टी मनाना आदि भोगविलास के आयोजन किसी भी रूप में जैनधर्मसम्मत नहीं माना गया है। और इनके आयोजनों के निमित्त धनराशि देना ‘दान’ के अन्तर्गत नहीं आता है।
इसीप्रकार ‘अपरिग्रह-महाव्रत’ के धनी मुनिपद-धारकों के मठों, तीर्थों के नाम पर विलासितापूर्ण-भवनों के निर्माण के लिये धनराशि दान करना जैनधर्म में मुनिधर्म के स्वरूप व परम्परा को बिगाड़ने में योगदान करना है। परन्तु लोग मुनिभक्ति के नाम पर अंधश्रद्धालु होकर पैसा लुटा रहे हैं। जो मुनिराज पहले “गात्र-मात्र-परिग्रह वाले” कहलाते थे, आज वे परिग्रह के मामले में गृहस्थों को पीछे छोड़ते दिख रहे हैं। और वह भी धर्म व दान के नाम पर गृहस्थों से लिये गये पैसे के बल पर!!! और अज्ञानी-गृहस्थ भी ‘दान’ के स्वरूप, विधि, पात्र आदि से अनजान रहकर भोलेपन में ‘दान’ के नाम पर ठगे जा रहे हैं। वे इस नीति-वचन को शायद नहीं जानते हैं कि
“पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्धनम्”
अर्थात् साँप को दूध पिलाने से वह दूध मात्र उस साँप के विष को ही बढ़ाता है, अमृत नहीं बनाता।
इसीप्रकार मिथ्यादृष्टि एवं धर्मविरुद्ध आचरण करनेवालों को दान देने से उनके पापभाव ही बढ़ते हैं, सदाचार नहीं बढ़ता है। --दान देते समय यह ध्यान रखना चाहिये। उन्हें दान देकर आप वैसे ही अपराधी बनते हैं, जैसे कोई व्यक्ति ‘देशद्रोही’ या ‘आतंकवादी’ की मदद करके अपराधी माना जाता है और दंड का पात्र होता है।
तब लोग कहते हैं कि “आप तो कम्युनिस्टों की तरह हर बात में मीनमेख ही निकालते रहते हो। आप ही बताइये कि हम अपना द्रव्य किसे व कैसे दान करें? या ‘दान’ का भाव ही त्याग दें? हर व्यक्ति तो मुनिराज को आहारदान देने जैसी विधि से दान की प्रक्रिया नहीं कर सकता है। अपने पुण्योपार्जित-द्रव्य में से यदि लोग दानराशि के रूप में सदुपयोग करना चाहते हैं, तो इसमें क्या बुराई है। ज्यादा जटिल-प्रक्रिया के बिना ही आज की परिस्थितियों के अनुसार सरल और व्यावहारिक दान-विधि बताइये। अन्यथा इन अति-तार्किक-प्ररूपणों से लोग दान से ही विमुख हो जायेंगे।”
यह बात व्यावहारिक है। क्योंकि यह सही है कि आज की नयी पीढ़ी के लोगों को ‘दान’ के विषय में विशेष जानकारी नहीं है। अतः उन्हें भले ही सीखने की दृष्टि से सैद्धान्तिक-प्रतिपादन किया जाये; किन्तु इसको सीखने समझने का समय जिसके पास नहीं है, उसे संक्षेप में सीधे सरल शब्दों में मार्गदर्शन किया जाये कि “यहाँ, इसतरह दान देकर आप अपने पुण्योपार्जित-द्रव्य को सार्थक कर सकते हो।”
ऐसे कुपात्रों या अपात्रों में अपनी धन-संपत्ति को देने में न तो पात्रता रहती है, न विधि की शुद्धि रहती है और न ही दातृत्व निर्दोष रहता है। ऊपर से आज के जनजीवन की व्यस्तता भरी दिनचर्या? किसी के पास दान के लिये इतना सोच-विचार करने का समय ही कहाँ है? या तो जैसे, जो भी मिलें, जितना मन करे, उसे उतना देकर छुट्टी पायें। या फिर अपने व बीबी-बच्चों पर उसे खर्च करें। कम से कम व्यर्थ के विवाद से तो बचेंगें। — इन आधुनिक-समस्याओं के समाधान के लिये मन वास्तव में एक बार विचलित हो गया। समझ ही नहीं आ रहा था कि आज के लोगों की बातों पर ध्यान दूँ, या फिर जिनवाणी में जो दान का स्वरूप एवं विधि कही गयी है, उस पर दृढ रहूँ ?

बहुत ऊहापोह करने के बाद यह समाधान मिला कि लोगों के मन में जो दान के भाव हो रहे हैं, उन्हें सही जानकारी न होने के नाम पर दबाना या निषेध करना तो कदापि उचित नहीं है। हाँ , यह अवश्य है कि वर्तमान-परिस्थितियों की समीक्षा करके भद्र-परिणामी जनों को सही दिशानिर्देश दान के निमित्त दिये जायें। अतः वर्तमान-परिस्थितियों के अनुरूप दान के समीचीन-प्रयोग के लिये कुछ सुझाव यहाँ दिये जा रहे हैं :----

1. दान के निमित्त धनराशि देने से पहले यह विवेकपूर्वक निर्णय अवश्य करें, कि आप किस निमित्त धनराशि दान देने चाहते हैं? वह उद्देश्य यहाँ धनराशि देने से पूर्ण होगा या नहीं? मात्र मंच के सम्मान एवं भीड़ की तालियों के आकर्षण में दान मत दीजिये।
2. धनराशि दान में देने के बाद तत्काल उसे सही माध्यम से सही व ईमानदार-हाथों में पहुँचाने की सुनिश्चितता करें। उधार करके दान नहीं दिया जाता है कि “दे देंगे” , यह अत्यन्त घातक प्रवृत्ति है। दानराशि देने में बिलम्ब कदापि नहीं करना चाहिये।
3. दानराशि जिस प्रयोजन से दान में दान गयी है, वह उसी प्रयोजन की पूर्ति में लगायी जाये-- इसकी सावधानी अवश्य रखी जाये। आजकल लोग किसी निमित्त धनराशि दान में लेते हैं और उसका उपयोग वे अपनी मर्जी से किसी और की काम में कर देते हैं। कई बेधड़क-पापी तो उसे ब्याज पर चढ़ाकर कमाई का जरिया बना लेते हैं, तो कई निजी विषय-भोग के लिये उसका प्रयोग कर लेते हैं। लग्ज़री कारों में ए.सी. की ठंडी हवा खाते हुये निजी कामों से घूमते या सैर-सपाटे करते बहुत से धर्मात्माओं (पदवीधारकों) को मैंने स्वयं देखा है। विद्यार्थियों को धार्मिक-शिक्षा देने आदि पुनीत-कार्यों के नाम पर लिये गये पैसों से ऐसा करनेवाले बहुत से तथाकथित-प्रतिष्ठितजन आज भी आसानी से देखे जा सकते हैं।
4. उपेक्षावृत्ति/जान छुड़ाने/पीछा छुड़ाने/ मन से पाप का बोझ कम करने की तसल्ली / समाज में अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करने— इत्यादि कारणों से कदापि दान नहीं देना चाहिये। ऐसा करने से धन भी जायेगा, दान के निमित्त से होने वाला पुण्य भी नहीं मिलेगा; उल्टा पापबंध होगा। स्पष्टवादी होकर जब तक पूरी संतुष्टि नहीं हो, तब तक साफ मना कर देना चाहिये। दान का अपना संकल्प रखिये, व सुपात्र को विधिपूर्वक अवश्य दान करिये। जैसी बेटी ब्याहना हो, तो जिस किसी के साथ कैसे भी नहीं ब्याह देते हैं। पूरी तरह से परीक्षण करके तब विधिपूर्वक ही उसका विवाह करते हैं। इसीप्रकार पूरी जिम्मेवारी दान के निमित्त भी रखी जानी अनिवार्य है।
5. दान देते समय पुण्य की भी आकांक्षा नहीं करनी चाहिये। वह स्वतः होता है। किंतु होता तभी है, जब आकांक्षा नहीं होती है। आकांक्षा करते ही विषय-भोग की वासना रूप परिणामों से पापबंध ही होता है। अतः अपने परिणामों का निरीक्षण प्रतिसमय रहना चाहिये।
6. अपने हित की भावना मात्र ‘परिग्रह से बचने’ रूप हित की होनी चाहिये। न कि अन्य किसी लौकिक स्वार्थसिद्धि रूप हित की। अन्य किसी भी प्रकार की चाह एकमात्र पापबंध की ही निमित्त होगी।
7. अपने हित के रूप में एक बात गंभीरता से विचारनी चाहिये कि हमारी आगामी पीढ़ी में धर्म के संस्कार कैसे सुरक्षित रहें, ताकि हम भोग-सामग्री देनेरूप दायित्व के साथ-साथ लोकोत्तर-हित के लिये उनमें धार्मिक-शिक्षा दी जानी अनिवार्य है। आज हम लौकिक शिक्षा की उपलब्धियों के लिये लालायित हैं और इसके लिये अपनी सामर्थ्य से भी अधिक खर्च करने तत्पर रहते हैं। चाहे हमें इसके लिए कर्ज़ ही क्यों न करना पड़े। किंतु जब बात धार्मिक-शिक्षा व आध्यात्मिक-तत्त्वज्ञान के प्रशिक्षण की आती है, तो हम उदासीन हो जाते हैं???
यह तो सौभाग्य की बात है कि धार्मिक-शिक्षा देने वाले कुछ उच्चस्तरीय-केन्द्र भी आज उपलब्ध हैं, जिनमें लौकिक शिक्षा की भी समुचित व्यवस्था मिल रही है और वह भी आदर्श-मानकों के अनुरूप। ऊपर से इनमें फीस भी नाममात्र ही ली जा रही है। परन्तु खेद है कि हमारे कर्णधार इसका महत्त्व गहराई से नहीं समझ पा रहे हैं। हम मंदिरों के बनवाने में दान दे रहे हैं, शास्त्र छपवाने के लिये दान दे रहे हैं, तीर्थक्षेत्रों के जीर्णोद्धार के लिये दान दे रहे हैं, जिनबिम्ब-प्रतिष्ठा के लिये दान दे रहे हैं–इत्यादि अनेकों प्रशस्त-प्रसंगों पर दान दे रहे हैं।

( मैं यहाँ दान के नाम पर पिच्छी-परिवर्तन की बोली, केशलोंच की बोली, शास्त्र-भेंट करने की बोली, मुनिपद-धारकों की रात्रि में दीपों से स्त्रियों द्वारा आरती करवाने की बोली, चातुर्मास के मंगलकलश-स्थापन की बोली, पाद-प्रक्षालन की बोली, नववर्ष पर खेलकूद व दावत के आयोजन के लिये दान देना, सांस्कृतिक-कार्यक्रमों के नाम पर लड़कियों के डांस देखने बैठे ब्रह्मचर्य-महाव्रतियों के कहने पर इन जैन-संस्कृति-विनाशक कार्यों के लिये दान देना --इत्यादि स्पष्टरूप से धर्म-विरुद्ध व नये गढ़े गये कार्यों की बात ही नहीं कर रहा हूँ। क्योंकि यहाँ मैं मात्र जिनशासनोक्त- कार्यों की ही बात कर रहा हूँ। चूँकि यहाँ कहे गये ये कार्य जब जिनशासनोक्त हैं ही नहीं, तो उनकी चर्चा में समय क्यों बर्बाद किया जाये–? यदि किसी को मेरे कथन में तनिक-सी भी शंका हो, तो इन कार्यों के लिये दान देने का एक भी आगम-प्रमाण मुझे दिखाये। मैं पूरी दृढ़ता से कहता हूँ कि इस कोष्ठक में कहे गये कोई भी कार्य न तो आयोजन के विषय हैं और न ही जिनागम में इन के नाम पर दान माँगने का विधान किसी भी आचार्य ने किया है।)

पिछले मुख्य-अनुच्छेद में कथित जिनागमोक्त-कार्यों के लिये दान दिये जाने के विषय में मेरा यह प्रश्न है कि इन मंदिरों, जिनबिम्ब, धर्मायतनों, शास्त्रों का होगा क्या, जब नई पीढ़ी में धर्म के संस्कार ही नहीं होंगे? तब कौन तो इन मंदिरों की देखभाल करेगा, कौन इन जिनबिम्बों का प्रक्षाल-पूजन करेगा, कौन इन शास्त्रों को पढकर इन्हें जीवन में चरितार्थ करेगा? कौन सच्चे मुनिराजों को आहारदान आदि की निर्दोष-विधि करेगा?-- अतः इन सबके लिये दान देने से अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इन सब कार्यों में जितना समाज के धर्मानुरागियों का धन लग रहा है, उसे सबसे बड़ी प्राथमिकता के आधार पर नयी पीढ़ी में धर्म के संस्कार देने, उसमें नयी शैली से धर्म की रुचि जगाने, व उसे लौकिक शिक्षा के साथ साथ अनिवार्यरूप से धार्मिक-शिक्षा व आध्यात्मिक-तत्त्वज्ञान देने में लगाया जाये।
इसके लिये ऐसे केन्द्रों को हरसंभव सहयोग किया जाये, जहाँ हमारे नौनिहालों को धार्मिक-शिक्षा व आध्यात्मिक-तत्त्वज्ञान पूरी लगन व निष्ठा के साथ सिखाया जाता है। यदि हम अपनी अगली पीढ़ी में ये संस्कार देने में असफल रहते हैं, तो हमारे बाकी सारे शास्त्रोक्त-कार्य भी निरर्थक ही सिद्ध होंगे।
और ये कार्य मात्र लड़कों तक सीमित नहीं रखे जायें, अपितु आदिब्रह्मा तीर्थंकर ऋषभदेव से प्रेरणा लें, जिन्होंने अपनी पुत्रियों — ब्राह्मी और सुन्दरी को स्वयं सुशिक्षित किया था। जी हाँ, मैं यही कहना चाहता हूँ कि हमारी पिछली पीढ़ियों तक धार्मिक-शिक्षा को मात्र लड़कों तक ही सीमित रखा गया था, किन्तु आज सौभाग्य से कुछ केन्द्र ऐसे भी खुले हैं, जहाँ हमारी बच्चियों को बहुत ही आदर्श-मानक-वातावरण में लौकिक-शिक्षा के साथ साथ धार्मिक-शिक्षा व आध्यात्मिक-तत्त्वज्ञान भी आधुनिक मानकों के अनुरूप सिखाया जा रहा है। और उनमें पढ़नेवाली बच्चियाँ आदर्श-मानकों के नये कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। ध्यान रहे, किसी भी बालक की पहली गुरु उसकी 'माँ ’ ही होती है। अतः मातृशक्ति बालिकाओं को उभयविध-शिक्षण-प्रशिक्षण से उन्नत बनाने वाले हमारे ये केन्द्र निश्चय ही सर्वोपरि प्रोत्साहन एवं सहयोग के लिये सुपात्र हैं। जो हैं, उनका पोषण किया जाये, तथा ऐसे कई और केन्द्र खोलने के लिये समाज के दानवीर एवं कर्णधार गंभीरता से सोचें, विचारें व त्वरित-एक्शन लेकर कार्यवाही करें।
व्यर्थ के दिखावों में हलवाइयों, टेंटवालों, प्रिंटिंग-प्रेसवालों, निर्माल्य-भोजी पंडितों के पेट भरने के स्थान पर दानराशि की सच्ची उपयोगिता वाले ऐसे केन्द्रों में समर्पित होकर तन-मन-धन के साथ-साथ वचन एवं लेखन से भी सहयोग करें।
पूरे विश्व में दिगम्बर जैनसमाज के कर्णधारों को इस मामले में ‘अल्पविवेकी’ कहा जाता है, क्योंकि उनका धन ‘दान’ के नाम पर ‘अनुत्पादक-कार्यों’ में खर्च होता है। आज मैं समाज के कर्णधारों से, समाजसेवियों से, उदारमना सज्जनों से तो तन-मन-धन से इस दिशा में हरसंभव सहयोग की अपील करता ही हूँ, साथ ही समाज के वक्तृत्व-क्षमता के धनी वाग्मी-मनीषियों से तथा अपनी लेखनी से जनमानस में क्रान्ति करने में समर्थ लेखकों से आह्वान करता हूँ कि वे इस दानवीर जैनसमाज के प्रत्येक सदस्य को नयी पीढ़ी में धार्मिक-शिक्षा व आध्यात्मिक-तत्त्वज्ञान के शिक्षण-केन्द्रों के संपोषण तथा नये केन्द्रों के समुन्नयन के लिये अपने धन का सदुपयोग करने की अमोघ-प्रेरणा देने के लिये कमर कस लें।
मेरे मित्र कवियो! अपनी सारस्वत-लेखनी की धार को पैना करो, और समाज को दान का यही स्वरूप और दिशा समझाने के लिये कटिबद्ध हो जाओ। यशस्वी-लेखको! सोशल-मीडिया व्यर्थ की चुटकुलेबाजियों से बहुत बदनाम हो चुका है। अपनी युगधारा-परिवर्तन में सक्षम लेखनी से ऐसा सृजन करो, कि दिगम्बर जैनसमाज का दान सार्थक-दिशा में आकर जिनवाणी के उस कथन को सार्थक कर दे कि पंचमकाल के अंत तक जैनधर्म जीवित रहेगा और इसके साधक इसे स्फूर्त बनाये रखेंगे। नयी पीढ़ी में तत्त्वज्ञान का शंखनाद फूँकने के लिये नयी पीढ़ी को धार्मिक-शिक्षा व आध्यात्मिक-तत्त्वज्ञान देने वाली समस्थाओं के लिये दान की दिशा मोड़ने में सक्षम-प्रयास सब मिल कर करो।