जीवन पथ दर्शन - ब्र. श्री रवीन्द्र जी 'आत्मन्' | Jeevan Path Darshan


16. पारिवारिक सौन्दर्य :arrow_up:

1. ‘मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान में एक। पाले पोषे सकल अंग, तुलसी सहित विवेक।।’ प्रमुख को परिवार के सभी सदस्यों की एक परिचय तालिका बना लेना चाहिए, जिसमें सभी सदस्यों के नाम, आयु, योग्यता, अभिरुचि, क्षमता, प्रकृति आदि की सूक्ष्म जानकारी रहना चाहिए।
2. आय की स्पष्ट जानकारी सभी सदस्यों को रहना चाहिए, जिससे किसी को अनावश्यक अपेक्षा न हो पाये।
3. यथासम्भव सभी के साथ समानता का व्यवहार किया जाये।
4. गृह एवं अन्य निर्माण भी दूरदर्शिता पूर्वक इसप्रकार किए जायें, जिससे बँटवारा उचित रीति से हो सके। विवादों का प्रसंग न बने।
5. बड़ों का आदर एवं छोटों से स्नेह का ध्यान रखा जाये।
6. अनुचित माँगों का निषेध दृढ़ता से हो, परन्तु उचित अपेक्षाओं की उपेक्षा न हो।
7. कार्य विभाजन विवेक पूर्वक हो, उसका पालन सावधानी पूर्वक हो । प्रत्येक सदस्य अपने से अधिक दूसरों का ध्यान रखें।
8. आर्थिक एवं वैचारिक उदारता वर्ते ।
9. परस्पर विश्वास रखें और विश्वासघात कदापि न करें।
10. किसी प्रकार की हानि होने या विपत्ति आने पर सहनशील रहें। व्यक्ति विशेष (आरोपी) को भोगने के लिए अकेला न छोड़ें। धैर्य एवं सहयोग दें। युक्ति पूर्वक समस्या का समाधान करें।
11. दोषों के लिए उचित अवसर देखकर कोमलता पूर्वक सन्तुलित भाषा में ही कहें । तिरस्कार करते हुए कदापि न कहें।
12. गुणों की प्रशंसा एवं प्रोत्साहन अवश्य करें।
13. छोटों से भी सभ्य एवं शुद्ध भाषा में विनय सहित बोलने की प्रवृत्ति विकसित करें।
14. किसी कार्य में छोटों की भी सलाह लेवें। अपने को ही सर्वोपरि न समझते रहें।
15. छोटे कार्यों को स्वयं करने की पहल करें, जिससे दूसरों को उस कार्य के करने में हीनता न लगे।
16. उन्नति एवं विश्राम आदि का सबको उचित अवसर दें।
17. तात्त्विक वातावरण बनायें। स्वाध्याय, प्रतिक्रमण, क्षमा, विनय, सेवा, पाठ, चिंतन की प्रयोगात्मक शिक्षा दें। त्याग का आदर्श दें।
1 Like

17. संयुक्त परिवार के लाभ :arrow_up:

1. बड़ों के अनुशासन में प्रमाद नहीं हो पाता । दिनचर्या व्यवस्थित बनी रहती है।
2. शील एवं मर्यादाओं की सुरक्षा रहती है। पहले तो बन्धन-सा लगता है, परन्तु बाद में समझ आने पर, सहज सुरक्षा कवच जैसा लगने लगता है।
3. अनेक प्रंसगों पर सुशिक्षा एवं संस्कार मिलते हैं, जो भविष्य में हमारी समस्याओं के समाधान में सहायक होते हैं।
4. लज्जा एवं संकोच से दुष्प्रवृत्तियाँ या दुर्व्यसनों से सहज ही बचे रहते हैं।
5. बड़ों की विनय, सेवा आदि के संस्कार रहने से अभिमान आदि नहीं आ पाते।
6. माता-पिता, भाई-भावजादि के बीच में सन्तान का पालन पोषण भलीप्रकार से हो जाता है। स्वयं के अनुभव न होने के कारण, होने वाले टेंशन से मुक्त रहते हैं।
7. पारिवारिक संगठन होने से समाज में प्रतिष्ठा रहती है।
8. सामाजिक व्यवहार निभाने में सुविधा रहती है।
9. आपत्ति के समय असहायपना नहीं लगता।
10. व्यवहार से देखें तो सुख बँटता रहने से बढ़ता है और दु:ख घटता रहता है।
11. धर्म साधन एवं समाधि में सरलता होती है।
12. परन्तु ये सब तभी सम्भव है, जब हृदय में विवेक और उदारता हो। वाणी में मधुरता हो । सहनशीलता हो। आक्षेप कटाक्षादि न हों। सहयोग की वात्सल्यपूर्ण भावना हो। समस्या का समाधान शान्तिपूर्वक निकाला जाये। त्याग और समर्पण के भाव रहें । पक्षपात और मिथ्या स्वार्थ न हों।
2 Likes

18. विनय :arrow_up:

1. विनय, सही समझपूर्वक, उपकृत हृदय से, सहज वर्तनेवाला भाव है। विनय में भय और प्रदर्शन के लिए अवकाश नहीं है।
2. विनय उत्कृष्ट शिष्टाचार है।
3. विनय की प्रकृति पहिचान कर, अनुकूल प्रवर्तन (विचार, वचन एवं चेष्टा) करें।
4. मर्यादा एवं यश के प्रतिकूल कार्य न करना, विनय का पहला चरण है। अज्ञान,अभिमान और प्रमाद को छोड़कर विवेक एवं यत्नाचार पूर्वक उचित समय पर खड़े हों। सामने नीचे बायीं ओर बैठे-चलें । योग्य अभिवादन पूर्वक संतुलित चर्चा करें। ध्यान पूर्वक पूरी बात सुने एवं समझकर उचित प्रक्रिया करें।
5. चर्चा के प्रसंगों में स्वयं आगे-आगे और बीच-बीच में न बोलें। किसी बात या कार्य को छिपाने का प्रयास न करें।
6. बोलने की अपेक्षा सुनने में अधिक उत्साहित रहें। मात्र स्वार्थसिद्धि के लिए अतिरिक्त विनय का प्रदर्शन कदापि न करें।
7. मन में प्रमोदभाव, गुण एवं उपकार चिंतन पूर्वक ही यथायोग्य बाह्य विनय सम्भव है।
1 Like

(19) संगति :arrow_up:

1. गति का अर्थ ज्ञान भी है। संगति के अनुसार प्रायः गुण दोष, बिना चाहे भी प्रवृत्ति में आ जाते हैं। अत: कुसंग के त्याग और सत्संग में रहने की प्रेरणा की जाती है।
2. मिथ्या श्रद्धान की प्रबलता वाले; चमत्कारादि में उलझे हुए; मिथ्या मंत्र तंत्रों में फंसे हुए; ज्ञान या क्रियादि एकान्त के पक्षपाती; तीव्र कषायों से युक्त; विषयों में आसक्त; जुआ, नशा, आदि व्यसनों में लीन; (भक्ष्य-अभक्ष्य, न्याय-अन्याय, धर्म-कुधर्म, योग्य-अयोग्य आदि के विवेक से रहित); रूढ़ियों में ग्रस्त; आचरण से भ्रष्ट; शील से रहित; रसनादि इन्द्रियों के लोलुपी; विश्वासघाती (मित्र, गुरु, धर्म, देश आदि के प्रति द्रोह करने वाले हिंसक, क्रूर परिणामी); अपयश आदि के भय रहित; निर्लज्ज, कलह प्रिय, पापों में ग्लानि रहित, कायर, स्वाभिमान से रहित; आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक, धर्म-अधर्म की सत्ता को निषेधने वाले; धर्म-धर्मात्माओं की निंदा करने वाले अथवा दूसरों की निंदा करने वाले; अपनी मिथ्या प्रशंसा करने वाले तीव्रमानी; दूसरों के दुःख अपमान हानि आदि में हर्ष मानने वाले; दूसरों की उन्नति, वैभव, ज्ञान, पद, प्रतिष्ठा आदि से ईर्ष्या करने वाले; प्रमादी, स्वार्थी, संयम नियम में अत्यंत शिथिल - ऐसे जीवों की संगति नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसी संगति में स्वयं के दोषों का पोषण एवं गुणों की हानि होती है।
3. संगति योग्य : सम्यक् श्रद्धानी; विवेकवान, दयायुक्त, पापभीरु; यश की कामना से रहित, परन्तु अपयश के कारणों से विरक्त; सत्यवादी, शीलवान, संतोषी, ईमानदार, निष्पक्ष, न्यायवान; विषयों में अनासक्त या संतोषी, शांत स्वभावी, विनयवान, गंभीर, तीव्र क्रोधादि रहित; क्षमावान; ईर्ष्या, परनिन्दा एवं आत्म प्रशंसा से रहित; देव-गुरु-धर्म-शास्त्रादि के प्रति भक्तिवान; परोपकारी; किसी का अहित चिंतन भी न करने वाले; कोमलता पूर्वक हित-मित-प्रिय वचन बोलने वाले; लोकनिंद्य कार्यों से दूर रहने वाले; कष्टसहिष्णु, ज्ञानाभ्यासी, श्रेष्ठ आचरण वाले; अपने संयम नियम के प्रति दृढ़; गुणग्राही; दूसरों के गुणों एवं अच्छे कार्यों के प्रशंसक एवं अच्छे कार्यों में निस्पृहता पूर्वक सहयोग करने वाले - ऐसे जीव संगति योग्य हैं। ऐसे जीवों की संगति में हमारे दोष निकलते हैं और गुणों का विकास होता है।
4. संगति केवल संग रहने का नाम नहीं। जैसे-दूसरे जलते हुए दीपक का स्पर्श पाकर, दीपक स्वयं अपनी तैलयुक्त बत्ती से प्रकाशमय हो जाता है, वैसे ही ज्ञानी जीवों की संगति में पात्र जीव अपने विवेक, गुणग्राहकता, विनय एवं पुरुषार्थ से स्वयं के गुणों का विकास कर लेते हैं।

समझें -

सत्संगति
कुसंगति
1. कल्पवृक्ष समान है। विषवृक्ष समान है।
2. चंदन समान है। अंगारे समान है।
3. उत्तम वस्त्र जैसी है। जीर्ण वस्त्र जैसी है (यत्न करने पर भी फटने वाला)
4. निरन्तर सुखप्रद है। निरन्तर क्लेशकारी है।
5. उत्तरोत्तर वृद्धिंगत है। पतन का कारण, अन्त में कलह पूर्वक टूटने वाली है।
2 Likes

20. स्वच्छता निर्देश :arrow_up:

1. स्वच्छता के नाम पर कषाय न करें। फिनाइलादि हिंसक सामग्री का प्रयोग न करें। अनावश्यक पानी, साबुन आदि खर्च न करें। स्वाध्यायादि को गौण न करें।
2. प्रात: उठकर बिस्तर वैसे ही न छोड़े, उठाकर व्यवस्थित रखें। चादर, कवर आदि जो गंदे हों तो धोने के लिए निकालें। झाडू व्यवस्थित यत्नाचार पूर्वक लगावें। अलमारी, तख्त, चौकी, खिड़की, दरवाजे को कपड़े से साफ करें।
3. समय-समय पर दीवालें, छत, उपकरणादि भी साफ करते रहें । झाडू, सूप आदि भी व्यवस्थित रखें।
4. सामान यथास्थान व्यवस्थित ही रखें, चाहें जहाँ नहीं छोड़े, ना विखरायें।
5. स्नान के बाद बाल्टी, तसला, लोटा, साबुन, डिब्बा, ब्रुशादि भी पोंछ कर रखें। बर्तन समय पर माँजें । वस्त्रों, उपकरणों एवं पुस्तकों से गंदे हाथ न लगायें। अनावश्यक निशान न लगायें, चाहे जैसे मोड़े नहीं, कवर चढ़ावें, झाड़ते पोंछते एवं धूप दिखाते रहें।
7. खाद्य सामग्री को भी समय-समय पर धूप दिखाकर शोधन करते रहें।
8. बर्तन जूठे न छोड़े, चाहे कहीं थूकें नहीं, गंदे हाथ धोकर कपड़े से पोछे। जूते आदि भी व्यवस्थित ही उतारें।
9. बरसात में छतों, नाली आदि की सफाई पहले से ही कर दें। अनावश्यक सामग्री खुले स्थान से हटा दें, जिससे जीवों की उत्पत्ति अनावश्यक रूप से न हो सके।
10. मानसिक स्वच्छता- सत्-असत् विवेक, सत्संगति, सद्विचार, स्वाध्याय, तात्त्विक-वस्तुनिष्ठ चिंतन, सात्त्विक आहार-विहार, कर्तव्य पालन, परोपकार, भक्ति, संयम, सेवा और दोष होने पर प्रायश्चित्तादि से मन स्वच्छ, स्वस्थ एवं प्रसन्न रहता है।
11. आत्म साधना से मन स्थिर होता है और सच्ची प्रसन्नता मिलती है।
3 Likes

21. दान निर्देश :arrow_up:

  1. दान में न्यायोपार्जित धन एवं उपयोगी सामग्री बहुमान पूर्वक दें।
  2. विवेक पूर्वक उपयोगिता एवं पात्रादि का निर्णय करके देखें।
  3. धनादि देने के साथ-साथ आत्मीयता से उचित सलाह अवश्य देवें।
  4. दान हेतु धन तो दें ही, स्वयं विनम्र होकर, आहारादि क्रियाओं में सहभागी भी होवें।
  5. बच्चों को भी दान एवं दया के सम्यक् संस्कार दें । पात्र दान और सेवा कार्य उन्हें देखने भी दें और उन्हें सहभागी भी बनायें। स्वयं करने के लिए निर्देश एवं प्रोत्साहन दें। उनके नाम से अलग-अलग प्रसंगों पर अलग-अलग रसीद बनवायें। बड़ों के नाम से भी दान करें और रसीद उन्हें अवश्य दिखायें, जिससे संतोष हो कि घर में उनका भी सम्मान है।
  6. स्वयं के व्यक्तिगत फण्ड भी बनायें, जिससे गुप्त दान भी किये जा सकें।
  7. त्यागीजनों को श्रद्धा, भक्ति एवं यथायोग्य आदर सहित आवास, शिक्षा, धार्मिक ज्ञानाभ्यास, प्रासुक चिकित्सा एवं अन्य व्यवस्थाओं में उदारता एवं निष्पृहता पूर्वक सहयोग करें; जिससे वे जीवन में भी निश्चिंत एवं स्वस्थ रहकर, स्वयं आराधना कर सकें और समाज को भी उनका लाभ मिल सके।
  8. दान के नाम पर अनावश्यक प्रदर्शन कदापि न करें। महँगे कपड़े या शीघ्र खराब हो जाने वाली घड़ी, टार्च, टेप आदि; हल्की गुणवत्ता की मेवा; बिना मौसम के फल; हल्की पेंसिलें, मंहगी डायरियाँ, बैग आदि न दें।
  9. अभिमान पूर्वक प्रदर्शन न करें। स्वागत, सत्कार, माल्यार्पण न करायें, दृढ़ता पूर्वक इनका निषेध करें।
  10. बार-बार न कहलवायें । स्वयं धन्यवाद दें एवं आभार मानें तथा कहें कि भविष्य में भी इसीप्रकार अवसर देते रहें।
  11. ध्यान रखें - भावुकता या अभिमान के कारण आप पात्र दान से वंचित हो जायेंगे; कार्य तो होंगे ही।
  12. समाजोन्नति, साधर्मीजनों का व्यक्तिगत सहयोग एवं लोकोपकारी कार्य भी विवेक एवं उदारता पूर्वक करें ।
  13. कमजोर वर्ग के लिए निर्दोष शिक्षा, चिकित्सा एवं आजीविका योजनाबद्ध ढंग से करें एवं करायें।
  14. दान देने पर भी, यदि सदुपयोग होता न देखें तो भी निंदा न करें, पछतावा न करें। योग्यता का विचार करते हुए, माध्यस्थ भाव से विरक्त हो जावें।
  15. कान के कच्चे न बनें, परस्थिति समझे। शंका होने पर अधिकृत जानकारी करके, निर्णय करें। हो सकता है कि किन्हीं कारणों, सरकारी उलझनों या अनुभव न होने से अधिक धन लग गया हो। किसी के सीधेपन से या अनजाने कोई भूल हो गई हो। अन्यथा आरोप न करें।
  16. शिकायतें न करते हुए सुझाव एवं सहयोग करने की प्रवृत्ति बनायें।
  17. अच्छे कार्यकर्ताओं का अपवाद करके, न उन्हें हतोत्साहित करें, न स्वयं तीव्र पाप कर्मों का बंध करें ।
  18. किसी विशेष दान का हठ न करते हुए, जहाँ जो आवश्यक दिखे, वह करें। जैसे - मंदिर, मूर्ति, वेदी पहले से हो तो पाठशाला, पुस्तकालय, वाचनालय, साधर्मी निवास में उपकरणादि दें। बड़ी-बड़ी रचनाओं एवं योजनाओं को मुख्य न करके, छोटी-छोटी सादगीपूर्ण उपयोगी योजनाओं को मुख्य करें।
  19. दान के प्रभाव का सदुपयोग प्रदर्शन एवं अनावश्यक स्टेशनरी एवं अन्य खर्ची को रोकने में करें।
  20. भवन निर्माण में सादगी के निर्देश दें। साज सज्जा पर अधिक खर्च एवं प्रोत्साहन न करें। साधर्मी एवं दीन दुखियों के उपकार हेतु शिविर, धार्मिक, नैतिक एवं चिकित्सा शिविरों एवं संस्थानों में वात्सल्य भोज दें एवं अन्य प्रकार सहयोग दें।
  21. विशेष धनी दातार एक मीटिंग करके धर्म प्रभावना एवं समाजोत्थान की प्रतिष्ठापूर्ण राष्ट्रव्यापी योजनायें बनायें।
  22. दान के नाम वाले पाटिया पहले तो लगायें ही नहीं और यदि लगायें तो गुरुजनों के नाम को उर्ध्व रखें। भाषा अत्यंत संक्षिप्त एवं विनयपूर्ण रहे।
  23. छोटी-छोटी राशियों की नाम-सूचि से भरे पाटिया, धर्मायतनों में अत्यंत अशोभनीय लगते हैं। दातारों को नाम का लोभ संवरण कर, स्वयं निषेध करना ही योग्य है। पाटियों पर तो स्तुतियाँ, पाठ, सूक्तियाँ लिखवाना ही श्रेयस्कर है।

22. ईमानदारी :arrow_up:

1. संतोष, सादगी, मितव्ययता, स्वावलम्बन और कष्ट सहिष्णुता पूर्वक ही व्यक्ति ईमानदार रह सकता है।
2. आवश्यकता एवं श्रम के अनुसार ही धन, वस्तु आदि ग्रहण करें। अनावश्यक होने पर कुछ भी न लें। बिना मूल्य मिलने पर भी ललचावें नहीं।
3. किसी से अधिक वस्तु या धनादि लेने का प्रयत्न न करें। सामूहिक कार्य का भी समस्त श्रेय, स्वयं ही लेने की आदत न डालें। व्यवहार में भी व्यक्तिगत कार्य भी, सहयोग से ही सम्पन्न होते हैं; अत: दूसरों के सहयोग एवं अंश को न नकारें, न कम करें।
4. किसी को न कम तौलें, न कम नापें, न कम समझें । सह अस्तित्व की भावना उर्ध्व रखें।
5. लोभवश अनुचित मिलावट न करें। अहं प्रदर्शन से बचें। सम्मान की अतिरिक्त चाह, ईर्ष्या, विषयों की आसक्ति भी व्यक्ति को बेईमान बना देती है। नशा, जुआ, कुशीलादि व्यसनों एवं प्रमाद से दूर रहें।
6. वस्त्र, खान-पान, घर और फर्नीचरादि सादा होने से विलासिता की सामग्री न होने से, अपना कार्य स्वयं करने से - हीनता नहीं, गौरव का अनुभव करें।
7. कर्तव्य, अनुशासन, नियम, वचन एवं समयबद्धता का पालन करने में उपहास या मिथ्या आलोचना एवं कष्टों की परवाह न करें।
8. अच्छी संगति करें एवं अच्छा साहित्य पढ़ें।
9. स्वार्थी और मिथ्या प्रशंसकों से सावधान रहें।
10. परमार्थ से स्व को स्व और पर को पर समझकर, पर से विरक्त हो, स्व में संतुष्ट रहने का पुरुषार्थ करें।
11. ज्ञेयों को मात्र ज्ञेय ही समझें, उनमें इष्ट-अनिष्ट की कल्पना करते हुए राग-द्वेष न करें।
2 Likes

23. स्वास्थ्य :arrow_up:

  1. प्रात: शीघ्र उठे । इष्ट स्मरण, तत्त्वविचारादि के पश्चात् दिन भर के विशेष कार्य के सम्बन्ध में भी विचार कर लें। रात्रि में देर तक न जागें।
  2. विश्राम, व्यायाम, प्राणायाम का भी ध्यान रखें।
  3. तपश्चरण, जप, संयमादि, अपने पाप कर्मों की निर्जरा हेतु एवं परिणामों की विशुद्धि हेतु अवश्य करें।
  4. तले हुए व्यंजन, मिठाई, नमकीन आदि न खायें।
  5. रिफाइन्ड तेल, शक्कर, बिना मौसम के फल, इन्जेक्शन या घोल आदि से पके फल न खायें। इन्जेक्शन से निकाला दूध न पियें।
  6. उपवास और लंघन के पहले तथा बाद में ठोस एवं पूर्ण आहार न करें।
  7. रोग-अवस्था में भोजन का आग्रह न करें, आवश्यक होने पर पेय-आदि चिकित्सक की सलाह से लें।
  8. संतुलित भोजन के भी सुपाचन हेतु पर्याप्त शारीरिक श्रम आवश्यक है। संतोषी एवं सादा जीवन का सूत्र अपनाते हुए विचारों की निर्मलता, प्रसन्नता एवं निश्चिंतता का विशेष ध्यान रखें।
  9. विषयों में आसक्त न हों।

  10. धर्म के नाम पर भी अविवेक पूर्वक ऊँची-नीची क्रियाएँ एवं नियम न करें। प्रयोजन पर दृष्टि रखते हुए, योग्य चर्या पालें, जिससे स्वयं या अन्य को आकुलता न हो और परिणाम निर्मल रहें।
  11. चिकित्सक के उचित परामर्श पर ध्यान देते हुए, उसे सहयोग करें; अन्यथा अयोग्य व्यवस्थाओं में फंसकर समस्त नियमादि टूटेगें।
  12. चलने-बैठने-लेटने एवं काम करने के सही तरीके अपनायें। कपड़े आदि भी ऋतु आदि के अनुकूल उचित तरीके से पहनें।
  13. शरीर पर अति भारारोपण किसी तरह न करें। न अधिक भोजन, न अधिक काम और न प्रमादी और विलासी बनाएं।
  14. सभी के प्रति सद्भावना एवं सद्-व्यवहार रखें।
  15. समस्या को उलझायें नहीं । विवेक एवं त्याग पूर्वक समाधान निकालें ।
  16. मानसिक घुटन (टेंशन), ईर्ष्या, तृष्णा, क्रोध, मान, भय, प्रमादादि दुर्भाव स्वास्थ्य के अंतरंग शत्रु हैं, इन्हें समझ पूर्वक अवश्य छोड़ें।
  17. अन्य निर्देशिकाओं का पालन करें।
  18. रोग की प्रथम अवस्था में ही योग्य चिकित्सक के अनुसार पथ्य-कुपथ्य, निर्दोष औषधि एवं चर्या का ध्यान रखें।
1 Like

24. भोजन निर्देश :arrow_up:

  1. स्वास्थ्यकारक, सात्त्विक भोजन बनाना सीखें। समझे - कब, कितना, कैसा भोजन किसे एवं कैसे करना चाहिए।
  2. बाजारों में बिकने वाली अशुद्ध, हानिकारक, मंहगी खाद्य सामग्री से दूर रहें।
  3. अभक्ष्य पदार्थों को त्यागें।
  4. भोजन से चिकित्सा को समझें। भोजन के औषधीय गुणों का यथार्थ ज्ञान करके उनका प्रयोग करें, जिससे रोग उत्पन्न ही न हों।
  5. मिथ्यानुकरण करते हुए अपनी भोजन-संस्कृति को विकृत ना करें।
  6. भोजन के समय प्रसन्नता एवं निश्चिंतता रखें । विचारें - यह भोजन संयम का निमित्त बने और कब अनाहारी दशा होवे।
  7. बिना हाथ धोये किसीप्रकार की भोजन सामग्री न खावें।
  8. भोजन धीरे-धीरे चबाते हुए करें। पानी भी घुट-घुट पियें।
  9. भोजन के समय दुश्चिंतन, विकथा, शोरगुल, तीव्र कर्कश स्वर में बोलना वर्जित रहे।
  10. भोजन टी.वी. या कम्प्यूटर पर बैठे-बैठे न करें । उस समय मोबाइल बंद रखें। भोजन में उतावलापन न करें।
  11. खड़े-खड़े, जूते पहने, जूठे हाथों से उठाते हुए, प्रदर्शन पूर्वक भोजन न करें।
  12. भोजन हाथ-पैर धोकर, वस्त्र शुद्धि पूर्वक करें । तदुपरांत वज्रासन से बैठकर कायोत्सर्ग करें। धीरे-धीरे चलें । बायीं करवट थोड़ी देर लेटें । न सोयें, न दौड़े, न बैठकर निरंतर कार्य करते रहें। शरीर का उचित हलन-चलन पाचन के लिए आवश्यक है। थोड़ी देर बाद आवश्यकतानुसार हरड़, लौंग, इलायची, सौंफ आदि चूसते हुए पानी पी लें। पेट साफ रखने का निरंतर प्रयत्न रखें।
  13. अल्पाहारी बने, आसक्त होकर गरिष्ठ, तामसिक भोजन तो करें ही नहीं, योग्य भोजन भी अधिक और जल्दी न करें।
  14. चिकित्सक के परामर्श बिना एक ही पदार्थ दूध, फल, सब्जी आदि अत्यधिक मात्रा में सेवन न करें। भोजन में सभी विटामिन एवं खनिजादि पोषक तत्त्वों का समावेश एवं संतुलन रखें।
  15. देशी बीज के खाद्यान्न एवं सब्जियाँ खरीदने का प्रयत्न करें, जिनमें जहरीले, कीटनाशक एवं वृद्धिकारक रसायनों का प्रयोग न हो।
  16. चावल, दालें आदि भी बिना पॉलिश की खरीदें।
  17. समस्त सामग्री - खाद्यान्न, मसाले, सब्जियाँ आदि धोकर ही उपयोग करें।
  18. एल्यूमीनियम के कुकर, बर्तन आदि का प्रयोग रसोई में न करें । लोहे की एक कढ़ाई का प्रयोग रसोई में नित्य ही करें।
  19. भोजन में एक साथ अनेक पदार्थ न खावें । तली हुई वस्तुएँ मात्र स्वाद के लिए अधिक न खावें।
  20. बेसन, मेंदा एवं मिठाईयों से बचें।
  21. मौसम के अच्छे फल उचित मात्रा में ( अधिक नहीं) लेवें। भलीप्रकार से दो या तीन बार धोकर ही लें।
  22. रासायनिक घोल के पके केला, आम तथा बहुत बड़े फलों से बचें।
  23. चाय, काफी की जगह आयुर्वेदिक पेय आवश्यकतानुसार पियें।
  24. प्रात: खाली पेट दूध-आदि भारी नाश्ता न करें।
  25. दलिया, खिचड़ी, सब्जी के साथ घी मिलाकर खाते रहें ।
  26. चना, उड़द, मसूर, सेम आदि का प्रयोग भी आवश्यकता अनुसार करें।
  27. आटा थोड़ा मोटा रखें।
  28. दूध का प्रयोग भी अधिक नहीं, परन्तु पर्याप्त मात्रा में करें । छाछ भी आवश्यकतानुसार लें।
  29. शक्कर के स्थान पर बिना केमिकल का गुड़, खांड़, मीठे फलादि का उपयोग करें।
  30. भोजन, पानी नियम पूर्वक पियें, अनर्गल नहीं।
  31. शारीरिक श्रम भी पर्याप्त करें। स्वावलम्बी चर्या रखें। मशीन एवं सेवकों के सर्वथा आधीन होकर आलसी न बनें।
  32. किसी कार्य को अहसान या अभिमान की भावना से रहित होकर कर्तव्य एवं सौभाग्य समझते हुए करें। इससे प्रशंसनीय भी होंगे और प्रसन्नता भी रहेगी, तब स्वास्थ्य स्वयं ठीक रहेगा।
  33. समय-समय पर यथाशक्ति उपवास, एकाशन, ऊनोदर आदि भी करें।

25. आश्रम, विद्यालय निर्देश :arrow_up:

  1. समस्त चयन अत्यन्त विवेक पूर्वक ही करें।
  2. नियमावली का पालन सम्यक् प्रकार से करायें । समय-समय पर निरीक्षण आवश्यक है कि किसी नियम में शिथिलता तो नहीं हो रही।
  3. प्रत्येक अधिकारी, कर्मचारी एवं सदस्य का संवैधानिक रूप से प्रामाणिक परिचय एवं उसकी सम्पत्ति और सामान की सूची रजिस्टर में रखें।
  4. समस्त गतिविधियों पर सूक्ष्मता से नजर रखें।
  5. समय-समय पर मीटिंग आवश्यक है।
  6. विशिष्ट समागम अवश्य करवायें । शिविर एवं गोष्ठियाँ करायें।
  7. अधिष्ठाता एवं अध्यापक विद्यार्थियों से पुत्र-पुत्रीवत् व्यवहार करें । उनके सर्वांगीण विकास एवं श्रेष्ठ संस्कारों के लिए तुच्छ स्वार्थ, प्रमादादि को त्यागें । पाठ्य पुस्तकों का मनोयोग पूर्वक अध्ययन करायें।
  8. नियमों का पालन करने के लिये संकल्पित करें।
  9. व्यसन, नकल, ईर्ष्या आदि का त्याग करायें।
  10. स्वच्छता, मितव्ययता, विनम्रता, सरलता, सौहार्द आदि मानवीय गुणों के प्रति निष्ठावान बनायें।
  11. साधक एवं विद्यार्थी गुरुजनों का यथायोग्य सम्मान एवं सेवा करें। अनुशासन पालें। अधिक से अधिक लाभ लेते हुए अपनी योग्यता बढ़ावें ।
  12. पंक्तिबद्ध व्यवस्थित बैठने, धीरे चलने, खड़े-खड़े बातें न करने की आदत डालें।
  13. कार्य के पश्चात् सामान ढंग (उचित तरीके) से यथास्थान रखे जाने के बाद ही अध्यापक या व्यवस्थापक वहाँ से जावें। अतिआवश्यक होने पर अतिशीघ्र व्यवस्थित करें और करायें । व्यवस्था मात्र बच्चों पर कभी न छोड़े।
  14. गंदी एवं हल्की आदतों को छोड़ने का संकल्प पूर्वक उग्र पुरुषार्थ करें । टोकने पर हल्केपन से न लें और न टालें।

26. छात्रावास, अधीक्षक निर्देश :arrow_up:

  1. छात्रों को पुत्रवत् समझते हुए, अंतरंग वात्सल्य पूर्ण व्यवहार करें।
  2. उचित निर्देश एवं नियमावली, अभिप्राय एवं प्रयोग समझाते हुए कहें और उनको विचारने का अवसर दें।
  3. नियमावली के बिन्दुओं पर अपने-अपने विचार अभिव्यक्त करने का अवसर प्रदान करने के लिए सभा करायें। जिससे नियमावली एवं उसकी उपयोगिता भलीप्रकार भासित हो जाये।
  4. समझ पूर्वक ही स्थाई अनुशासन संभव है। अत: ध्यान रखें कि छात्र भयभीत न हो पायें।
  5. भय का वातावरण न बने इसके लिए अनावश्यक अत्यधिक न डाँटे, जोर से न बोलें। कोई बात जल्दी में न कहे अथवा जल्दी-जल्दी अनेक निर्देश न दें । शारीरिक प्रताड़ना तो करें ही नहीं, कहने के बाद पूछ ले कि भलीप्रकार समझ में आया या नहीं।
  6. दण्ड व्यवस्था ऐसी बनायें जिससे मानसिक विकास हो, भूल का एहसास हो अर्थात् दण्ड के रूप में अतिरिक्त अध्ययन, सफाई, पाठ जपादि करायें। धीठता करने पर सभी से सम्पर्क विच्छेद (अल्प समय के लिए) कर दें।
  7. चित्रकला, लेखन, पठनादि करायें।
  8. गलती एवं सही के नंबर (- एवं +) देते हुए कार्ड बनायें । पश्चात् मासिक, द्विमासिक दण्ड व्यवस्था करें।
  9. पाक्षिक एवं मासिक कोर्स तैयार करें। उसे निर्धारित समय में पूरा कर, उसी के आधार से प्रश्न मंच एवं अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम करायें। ज्ञान एवं अभिव्यक्ति विकास के कार्यक्रम भी करायें।
  10. भोजन एवं चर्या स्वास्थ्य के नियमों के अनुकूल रखें। किसी प्रसंग में असंतोष न बढ़ने दें।
  11. किसी की शिकायत पर सीधे ही विश्वास न करें। पूर्ण जानकारी लेकर, दोनों पक्षों को सुनकर योग्य निर्णय लें। समस्या को सुनने एवं सुलझाने की सहज प्रक्रिया अपनायें।
  12. परस्पर में विश्वास एवं वात्सल्य पूर्ण वातावरण बनायें, जिससे कोई दोष होने पर छात्र निशंकता से कह सके।
  13. छात्र की परेशानी मुद्रा से समझ में आने पर भी उसे सुलझाने की पहल स्वयं करें। उपेक्षा कदापि न करें।
  14. सर्व विषयों सम्बन्धी सत्साहित्य पढ़ने की प्रेरणा, व्यवस्था एवं अवसर दें।
  15. शारीरिक एवं मानसिक दोनों विकास का ध्यान रखें।
  16. दोनों पक्ष (जैसे - दया की प्रेरणा एवं निरर्थक और अनुचित दया का निषेध) समझायें, जिससे छात्र भावुक न बनें अपितु विवेकी बनें।
  17. कष्ट सहिष्णु बनने का अभ्यास करायें, जैसे - कभी एकान्त सेवन, कभी समूह में ही रहना, सोना, कभी देर से भोजन, कभी अव्यवस्थित भोजन, कभी अतिरिक्त कार्य, कभी खेल, कभी विश्राम आदि भी करायें।
  18. तात्कालिक सूझबूझ विकास के लिए प्रयत्न करें।
  19. दुर्घटनाओं से बचने के उपायों पर लेखन एवं भाषण करायें।

27. ट्रस्ट, समिति, संस्थान निर्देश :arrow_up:

  1. मोहवश अयोग्य परिवारी एवं रिश्तेदारों को सदस्य न बनाया जाये।
  2. स्वाध्याय से जुड़े सक्रिय, विवेकी एवं गम्भीर कर्तव्यनिष्ठ साधर्मीजनों को निष्पक्ष रूप से प्रमुखता दें।
  3. सदस्यों के स्थान अधिक समय रिक्त न रखें।
  4. मीटिगें नियमानुसार समय-समय पर अवश्य होती रहें।
  5. आध्यात्मिक संगोष्ठी, तत्त्वज्ञान प्रसार की प्रमुखता रहे।
  6. कुरूढ़ि एवं व्यसनमुक्ति अभियान, नैतिक शिक्षा, चिकित्सा, योग-प्राणायाम आदि शिविर भी अवश्य लगायें ।
  7. शिकायत की प्रवृत्ति छोड़कर, सहयोगात्मक एवं रचनात्मक विचार एवं वृत्ति बनाएँ।
  8. वचन एवं व्यवस्था की प्रामाणिकता रखें।
  9. जो राशि जिस कार्य हेतु आए, उसे यथासम्भव उसी कार्य में लगायें। परिवर्तन की स्थिति में दातार की स्वीकृति अवश्य लें। कार्य हो जाने पर भी दातार को सूचित करें ।
  10. योग्य व्यक्तियों को तैयार करते जायें । भिन्न कार्यों हेतु प्रभारी एवं समितियां बनाकर, प्रशासन का विकेन्द्रीकरण करते जायें। पहले से जुड़े सक्रिय तत्त्वरुचि वाले लोगों को रिक्त स्थान की पूर्ति करते समय प्राथमिकता दें।
  11. धन के लोभ से नये लोगों का शीघ्रता से अति विश्वास न करें। पद योग्य व्यक्ति का निर्णय, विवेक पूर्वक वर्तन के बाद ही करें।

28. व्यापार निर्देश :arrow_up:

  1. लेन-देन में अत्यन्त सावधानी वर्ते । उधार देने से भी बचते रहें। वचन का निर्वाह करें।

  2. वचन के पक्के रहें, परन्तु वचन निर्वाह का टेंशन न करें। कोई मिथ्या अनुबन्ध हो जाने पर, गुरुजनों की मध्यस्थता में सुलझायें।

  3. हिसाब (लेखा) साफ एवं स्पष्ट रखें, इसमें उपयोग सूक्ष्म रखें, विशेष रूप से देने के प्रसंग में स्वयं पहल करें।

  4. भावावेश में कोई अनुबन्ध या व्यापार न करें।

  5. अनावश्यक कर्ज न लें, कर्ज शीघ्र चुकाने की नियत एवं प्रयत्न रखें।

  6. आवश्यकता, सामर्थ्य एवं पूँजी से अधिक व्यापार कदापि न करें।

  7. निवृत्ति की भावना रखें एवं योजनाबद्ध ढंग से निवृत्ति की ओर बढ़े।

  8. व्यापार के (प्रतिदिन) घण्टे भी स्थूल रूप से निश्चित करें, विशेष परिस्थिति में छूट। शेष समय सत्संगति, तीर्थयात्रा आदि सत्कार्यों में लगायें।

  9. व्यापारादि के कारण चर्या को न बिगाड़े। नीति एवं सिद्धान्तों में शिथिलता न करें।

  10. धर्मध्यान, स्वास्थ्य, पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों का भी निष्ठापूर्वक निर्वाह करें।

  11. असीमित व्यापार न बढ़ाते जायें। आय का निश्चित अंश, दान एवं परोपकार के कार्यों में अवश्य खर्च करें।

  12. भावुकता पूर्वक अपनी आमदानी से अधिक खर्च न करें। मितव्ययी बने रहें।

  13. सहायता भी अपनी शक्ति देखकर ही करें। कहीं ऐसा न हो कि बाद में अपनी उलझनें बढ़ जायें एवं व्यवहार बिगड़ जाये। मिथ्या उदारता कभी-कभी कंजूसी से भी अधिक कष्टप्रद हो जाती है।

  14. लघुजनों को उदारता पूर्वक सहयोग करें। दूसरों को भी आजीविका प्रदान करें।

  15. अपने से कमजोर लोगों का ध्यान रखें, आवश्यकतानुसार एडवांस भी दे देवें, अपने कारण उन्हें हानि न हो पाये। उनका उदारता एवं युक्ति पूर्वक सहयोग करें।

  16. अन्याय एवं शोषण कदापि न करें।

  17. दूसरों से ईर्ष्या न करें। उनकी हानि कभी न सोचें ।

  18. ऐसा व्यापार प्रारंभ ही न करें जिसका सीधा सम्बन्ध (कच्चा माल आदि) कत्लखानों आदि से प्राप्त होता हो।

  19. ऐसा व्यापार न करें, जिससे अन्य बहुत से लोगों का व्यापार छिन जाये।

  20. नकली या मिलावट पूर्ण ऐसी सामग्री न बेचें जिससे दूसरों को हानि हो।

  21. लोभवश अनैतिक या अनिश्चितता पूर्ण (अत्यधिक उतार चढ़ाव वाले) व्यापार न करें । सिनेमा, नशा, मेडिकल, जुआ, सट्टा, लॉटरी, शेयरादि के व्यापारों का त्याग ही कर दें।

  22. हिंसक एवं विलासिता की सामग्री न बेचें, दीपावली पर पटाखे आदि न बेचें। ईमानदारी, प्रामाणिकता एवं सौहार्दपूर्ण व्यवहार रखें।

  23. वैभव का मिथ्या प्रदर्शन न करें। प्रदर्शन पूर्ण आयोजनों से भी दूर रहें। आमदनी अधिक होने पर भी आवास, वेशभूषा, खान-पान में विवेक पूर्वक सादगी एवं संतोष रखें।

  24. राज्य के नियमों का पालन करें, टेक्स आदि भी उचित रीति से समय पर जमा करायें।

1 Like

29. सर्विस निर्देश :arrow_up:

1. ऐसी सर्विस न करें, जिसमें नैतिकता का हनन हो । कुशील, हिंसादि का पोषण हो। अपने सामान्य नियमों का भी पालन न हो पावे। मन खिन्न तथा बोझिल रहे। पराधीनता एवं दीनता लगे। सामर्थ्य से अधिक कार्यभार हो, जिससे स्वास्थ्य बिगड़े या पारिवारिक व्यवस्थाएं बिगड़ें।
2. स्वच्छ छवि की प्रतिष्ठा बनाए रखें। रिश्वत लेकर अनैतिक कार्य न करें।
3. समय का ध्यान रखें, विलम्ब से आने या मनमाने ढंग से चाहे जब चले जाने की आदत न बनायें।
4. अपने विषय की प्रमाणिक एवं पर्याप्त जानकारी रखें। उचित सलाह दें।
5. सौहार्दता पूर्ण व्यवहार रखें। कार्य न कर पाने पर भी संतोष जनक उत्तर अवश्य दें।
6. दायित्व एवं अनुशासन का दृढ़ता से पालन करते हुए भी मानवता का ध्यान रखें ।
7. उत्तेजित न होवें । सत्याग्रह भी अनुशासन पूर्वक करें।
8. निर्दयता पूर्वक कठोर दण्ड न दें।
9. लोभवश अतिरिक्त समय काम, यथासम्भव न करें।
10. अत्यावश्यक न होने पर, अतिरिक्त कार्य, अधीनस्थ कर्मचारियों से न करायें।
11. एक का काम पक्षपात वश दूसरे पर न डालें।
12. चापलूसी करने वालों से सावधान रहें।

30. अल्प बचत निर्देश :arrow_up:

1. घर में प्रत्येक सदस्य के मन में स्वयं के धन की लालसा होती है । अत: प्रत्येक सदस्य की एक एक गोलक रखें। उनके एक-एक खाते पोस्ट ऑफिस, बैंक, बीमा में भी चलायें जो उन्हीं की गोलक की राशि से भरें।
2. उसी संग्रहीत राशि में से, दान एवं खर्च के भी संस्कार दें। ऐसा न करें कि वे आय-व्यय के सम्बन्ध में कुछ सीखें ही नहीं। मात्र खर्च के सम्बन्ध में बड़े लोगों से माँगते ही न रहें।
3. समयानुसार उचित रीति से उन्हें गृहकार्यों एवं पाठशाला आदि सम्बन्धी कार्यों, घर की व्यवस्थाओं में भी लगाएँ , रद्दी, पुटठा, प्लास्टिक, काँच, लोहा, पुराने कपड़े, अनुपयोगी वस्तुओं का संग्रह एवं स्वयं के निर्देशन में विक्रय करावें। एक दो घण्टे उनसे व्यापारादि में सहयोग लें, पैकिंग, शिल्प कला आदि सिखायें, जिससे जीवन में वे कभी बेरोजगारी के शिकार न हों। स्वतंत्र आजीविका भी चाहे जब कर सकें। पढ़ाना, कम्प्यूटरादि, खाते उतारना आदि सिखायें।
4. बच्चों को भी आर्थिक रूप से स्वावलम्बी बनायें। छोटे काम करने में भी उनकी शर्म छुड़ायें।

धन का सदुपयोग

1. न्याय एवं श्रमपूर्वक सीमित कमाएँ।
2. आय-व्यय का हिसाब सूक्ष्मता से रखें।
3. व्यय के विषय लिखकर उपयोगितानुसार उनके लिए राशि निश्चित करें। जैसे - भोजन, घी, सब्जी, फल, अनाज, मसालें।
4. अनावश्यक मिष्ठान पकवानों से बचें।
5. कपड़ों, आवास, उपकरणों में सादगी रखें, परन्तु लोभवश हल्की क्वालिटी का सामान या खाद्य सामग्री नहीं लें।
6. विलासिता एवं प्रदर्शन से दूर रहें।
7. दान भी मान के वशीभूत होकर उपयोगी न होने पर नहीं दें। उपयोगी होने पर अच्छे लोगों को विवेक पूर्वक दें। बड़ी संस्थाओं और बड़े आयोजनों की अपेक्षा छोटी संस्थाओं और ज्ञान प्रधान छोटे आयोजनों को प्राथमिकता दें।
8. लोकोपकारी कार्य स्वयं करें एवं उनमें सहयोग करें।
2 Likes

31. विवाह निर्देश :arrow_up:

(सामाजिक आयोजन समझें)
1. उद्देश्य :- सामाजिक मर्यादायें, संस्कृति संरक्षण एवं संवर्धन, व्यवहार धर्म का योग्य रीति से परिपालन । समान धार्मिक विचारधारा एवं कुलपरम्परा, योग्य वय, स्वास्थ्य (शारीरिक एवं मानसिक) समझ, शील, विनय, सेवा भावना, सादगी, संतोष आदि गुणों को अवश्य देखें।
2. सम्बन्धों का चयन गुरुजन, लड़के एवं लड़की की रुचि आदि का ध्यान रखते हुए करें। दहेज आदि को मुख्य न करें।
3. चयन प्रक्रिया को प्रदर्शन न बनायें। अन्य लोगों से पूर्ण जानकारी लेने के बाद ही वार्ता प्रारम्भ करें। देखना-दिखाना यात्रा या आयोजनों में इस भाँति करें, जिससे निषेध रूप निर्णय होने पर, प्रतिष्ठा को ठेस न लगे। मितव्ययता एवं सादगी का पूर्ण ध्यान रखें। आडम्बर, विलासिता तथा मिथ्या शान से बचें।
4. उदारता, विवाहोपलक्ष्य में, लोकोपकारी, नैतिक एवं धार्मिक आयोजनों में दिखायें।
5. भोजन शुद्ध एवं स्वास्थ्य अनुकूल बनायें। वनस्पति घी, केमीकल रंग, जमीकंद, आचार, बाजारू खाद्य आदि से दूर रहें।
6. भोजन सम्मान पूर्ण विधि से स्वयं परोसें, गिद्ध भोजन पद्धति से दूर रहें।
7. मँहगे कार्ड आदि न छपवायें। मँहगी वाटिका, सजावट, बैण्ड आदि न करें।
8. अनावश्यक फोटो-वीडियो न बनवायें। किसीप्रकार का भारारोपण या खींचतान न करें।
9. संस्कृति के विरुद्ध रात्रि भोजन, रात्रि कार्यक्रम न करें।
10. दिन में, सीमित समय में, साधर्मी एवं सामाजिक प्रतिष्ठित वयोवृद्ध लोगों की उपस्थिति में, मर्यादा सहित योग्य सम्मान, दान, करुणा आदि का उदारता से निर्वाह करते हुए विधि सम्पन्न करें।
11. विवाह प्रक्रिया जैन विवाह विधि से सम्पन्न करें।
12. वर्षगाँठ या तो मनायें ही नहीं अथवा लोकोपकारी आयोजन करें।
4 Likes

32. शिशुपालन निर्देश :arrow_up:

1. शिशु गर्भ में आने पर ब्रह्मचर्य से रहें । सदैव प्रसन्न रहें। उत्तम विचार करें । सत्साहित्य पढ़ें। भक्ति, स्वाध्याय, सामायिकादि करें।
2. अधिक उपवासादि न करें।
3. लोह, कैल्शियम, विटामिनयुक्त पोषक आहार लें। लोहे की कढ़ाई में सब्जी आदि बनायें। चना, गुड़, मूंग, जौ, संतरा, आँवला, नारियल, अनार, दूधादि का आवश्यकतानुसार प्रयोग करें।
4. गिलोय, चंदन, इलायची, सौंफ, मुलहठी आदि का प्रयोग करें।
5. आवश्यक सौम्य औषधियाँ वैद्य की सलाह अनुसार लें।
6. गरिष्ठ, वासी, बाजारू भोजन, रिफाइन्ड तेल, चाय, तीक्ष्ण औषधियों से बचें।
7. उचित रीति से गृहकार्य श्रम (चक्की चलाना आदि) व्यायाम एवं प्राणायामादि उचित ढंग से करें। लड़ाई, अश्लील हँसी-मजाक, शील विरुद्ध ड्रेस-श्रृंगार आदि करें तो नहीं, देखें भी नहीं।
8. भगवन्तों, संतो एवं महापुरुषों की सौम्य प्रभावक तेजमय मुद्रा को निहारें एवं विचारें ।
9. वस्त्र ढीले पहनें, संयत चाल से चलें।
10. भक्ति, दान, सेवा, परोपकार आदि के कार्य अवश्य करें।
11. मन में भयभीत न रहें, कुढ़े नहीं।
12. शिशु को योग्य वात्सल्य तो दें, परन्तु अनियमित चर्या या दुष्प्रवृत्तियों से बचायें।
13. बच्चों को हीन आचरण वाले लोगों से दूर रखे। प्रारम्भ से ही अच्छी-अच्छी बातें एवं चेष्टाएँ सिखायें।
14. आलस्यवश उसे अकेला न छोड़ें।
15. अभक्ष्य, गरिष्ठ या अयोग्य खान-पान एवं फैशनेविल ड्रेस/प्रसाधनों से बचायें। पौष्टिक आहारादि नियमित समय पर, चिकित्सक की सलाह से दें।
16. शिक्षाप्रद चित्र खिलौने, पुस्तकें दिखायें । धार्मिक, नैतिक, दैनिक उपयोगी अच्छे शब्दों का परिचय करायें।
17. अनुचित ताड़नादि द्वारा भयभीत न करें।
18. अश्लील हास्य या चेष्टायें कदापि न करें।
19. बच्चा समझता नहीं, ऐसा न समझें, उसे उसकी भाषा में ज्ञान करायें।
20. गुनगुनाने के बहाने, अच्छे गीत एवं अच्छी चेष्टाएं सिखायें।
21. मालिश स्नानादि में सावधानी रखें।
3 Likes

33. बाल एवं किशोर निर्देश :arrow_up:

1. बड़ों का यथायोग्य आदर करें, परन्तु भयभीत न रहें।
2. चाहे किसी से मित्रता न करें। जो अध्ययनशील, सुशील, गम्भीर, उत्साही, साहसी, अनुशासित, अच्छे विचार वाले हों, उन्हीं की संगति करें।
3. अश्लील या निम्नस्तरीय साहित्य न पढ़े। अखबारादि में भी अच्छे विषय ही अल्प समय में देखें। रुचि पूर्वक उनमें समय न खोयें। इसीप्रकार टी.वी., मोबाईल, कम्प्यूटर (फिल्मों) आदि में विवेक रखें।
4. अध्ययन, गृहकार्य (होमवर्क) आदि किसी भी कार्य में आलस्य कदापि न करें।
5. धार्मिक, नैतिक एवं स्वास्थ्यादि सम्बन्धी साहित्य अवश्य पढ़ें।
6. सर्वत्र नियम एवं अनुशासन का यथासंभव पालन करें।
7. जुआ, नशा, अश्लील हँसी, चेष्टाओं एवं फिजूलखर्चे से दूर रहें।
8. सभी के प्रति सहयोगात्मक शैली अपनायें, परन्तु अपनी चर्या की उपेक्षा करते हुए, भावुकता पूर्वक नहीं।
9. सादा एवं शील युक्त वस्त्र पहनें। अपने घर की आय एवं मर्यादाओं का ध्यान रखें।
10. उधार लेने की प्रवृत्ति न बनायें ।
11. किसी की अनुचित नकल या किसी से ईर्ष्या न करें।
12. भोजन समय पर, प्रसन्नता पूर्वक, सात्विक एवं पौष्टिक करें।
13. अत्यंत मँहगी विलासिता की सामग्री का उपयोग कदापि न करें।
14. स्वच्छता की आदत बनायें। शरीर, स्थान, वस्त्र, कॉपी, पुस्तकें अथवा कोई भी सामग्री गंदी न रखें। चाहे जहाँ न रखें।
15. स्नान, मालिश, प्राणायाम, व्यायाम आदि नियम पूर्वक, उचित ढंग से करें।
16. अयोग्य विचार ही न करें, तब वचन और चेष्टायें स्वयं प्रशंसनीय होगी।
17. विनय एवं सेवा भावना रखें।
18. आत्म प्रशंसा एवं पराई निंदा न करें और न उत्साह पूर्वक सुनें।
19. छिपाकर कार्य करने की प्रवृत्ति न बनायें।
20. अपनी परिस्थिति, योग्यता और क्षमता के अनुसार ही निर्णय लें । हवाई किले न बनाते रहें।
21. किसी कार्य को छोटा न समझें । बड़ी-बड़ी योजना बनाते हुए छोटे कार्य को न निषेधे ।
22. सहनशील बनें। क्रोध की प्रवृति न बनायें। अल्प एवं मिष्ठभाषी बनें।
23. सदाचार, शील निर्देशिका, सामाजिक व्यवहारादि को समझें, पालें एवं उनका प्रसार करें।
24. विनम्रता एवं निष्पृहता पूर्वक सहयोग दें और श्रेय देते हुए दूसरों से युक्ति पूर्वक सहयोग लें।
25. याद रखें - धन, समय, बुद्धि आदि का दुरुपयोग पतन का द्वार खोलता है।
26. अपने साथ किसी भी प्रकार का अनैतिक व्यवहार होने पर घर आकर गुरुजन या अभिभावकों को शीघ्र ही अवगत करावें जिससे उसकी पुनरावृत्ति न हो पावे।
27. बड़ी से बड़ी गलती हो जाने पर भी, गुरुजनों से छिपाकर टेंशन (तनावग्रस्त) न करें, न घर छोड़कर कहीं भागें और आत्मघात की तो सोचें ही नहीं। धैर्य पूर्वक समस्या का समाधान करें।
2 Likes

34. युवा निर्देश :arrow_up:

1. जीवन का स्वर्णिम समय, उत्साह पूर्वक आराधना एवं प्रभावना करने का अवसर युवावस्था है।
2. जोश में होश न खोयें। किसी प्रसंग में गुरुजनों की उपेक्षा न करें। गुरुजनों से कुछ न छिपायें।
3. दूसरों को गिराकर स्वयं ऊपर उठने का प्रयत्न कदापि न करें।
4. ईर्ष्या, उत्तेजना, तृष्णा, विषयासक्ति से बचें, प्रदर्शनादि की भावना से दूर रहें।
5. अत्यधिक संकोची प्रवृत्ति न बनायें।
6. छोटे काम करने में हीनता न समझें।
7. योग्यता एवं क्षमता हो तो नेतृत्व दें, अन्यथा अनुशासन में रहकर कार्य करें।
8. व्यसनों, विकथा, मिथ्या प्रशंसकों एवं स्वार्थीवृत्ति वाले लोगों से दूर रहें।
9. प्रत्येक क्षेत्र में नियम अवश्य बनायें और उनका विवेक पूर्वक पालन करें।
10. क्षण-क्षण में निर्णय न बदलें । अप्रामाणिक सिद्ध न हों।
11. निरंतर अध्ययनशील रहें। उपयोगी सामान्य जानकारी हर क्षेत्र में रखें और अपने विषय की अधिकृत जानकारी रखें।
12. समय, शक्ति, धन और सभी साधनों एवं सुविधाओं का सदुपयोग करें।
13. भावुकता छोड़कर, विचार एवं योग्य सलाह पूर्वक निर्णय करके ही कोई कार्य करने की आदत बनायें।
14. अल्प एवं योग्य वचन उचित समय पर बोलें।
15. योग्य के साथ व्यवहार कुशल, सेवाभावी, विनम्र, संतोषी एवं सरल भी बनें।
16. अनैतिकता से धन न कमायें। तृष्णा से दूर रहें।
17. दूसरों को आजीविका मिले, ऐसी लोकोपकारमय आजीविका चुनें।
18. आमदानी का अंश एवं अपना समय अच्छे कार्यों में अवश्य लगायें।
19. गुरुजनों की अवहेलना कदापि न करें। उनसे स्वयं को श्रेष्ठ समझने की भूल न करें। उनके अनुभवों का लाभ उठायें।
20. न प्रमादी बनें, न अत्यधिक श्रम करें। स्वास्थ्य का ध्यान रखें।
21. सम्यक् अभिप्राय, व्यवस्थित चर्या, सूक्ष्म उपयोग रखते हुए प्रशंसनीय बनें।
22. आत्म निरीक्षण करते हुए आध्यात्मिक उन्नति का भी पुरुषार्थ करें।
23. सहजता एवं सहनशीलता कभी न छोड़े।
24. अच्छे कार्यों की अनुमोदना एवं दूसरों के सद्गुणों की प्रशंसा अवश्य करें।
25. धार्मिक एवं अन्य विषयों की श्रेष्ठ पुस्तकें अवश्य पढ़े और पढ़ायें।
26. नैतिकता एवं धार्मिकता का प्रसार करें और करायें।
3 Likes

35. बच्चों को छोटी उम्र में बाहर भेज देने के दुष्परिणाम :arrow_up:

1. बच्चे पारिवारिक वात्सल्य एवं संस्कारों से वंचित रह जाते हैं।
2. भलीप्रकार से पोषण न हो पाने से जीवन पर्यन्त के लिए स्वास्थ्य कमजोर हो जाता है।
3. शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाने से रोग का आक्रमण जल्दी-जल्दी होने की सम्भावना रहती है।
4. माता-पिता केवल आवश्यकता पूर्ति के साधन रह जाते हैं। बच्चों का सहयोग मिलना नगण्य हो जाता है।
5. कुसंगति में नशा, जुआ, कुशील, स्वार्थ, महत्वाकांक्षा आदि दुर्गुणों की सम्भावना रहती है।
6. आधुनिक सुविधाओं और निश्चित व्यवस्था में रहने के अभ्यस्त हो जाने से पारिवारिक वातावरण रहन-सहन के प्रति उपेक्षा हो जाती है।
7. प्रेम विवाहों की सम्भावना कई गुनी बढ़ जाती है।
8. संयुक्त परिवार टूटते हैं।
2 Likes