ध्येय | Dhyeya

तर्ज : ज्ञान ही सुख है, राग ही…

एक ही श्रेय है, एक ही ध्येय है।

एक शुद्धात्मा ही उपादेय है ।। टेक ।।

पर का आश्रय करे ये महा-भूल है,
उससे उठता विकल्पों का जंजाल है।
जाल खुद ही बुने स्वयं उसमें फँसे,
फिर तू मूरख रहे कैसे खुशहाल है।।
पर में इष्ट-अनिष्ट विचारे मगर,
ये तो समरूप से ज्ञान का ज्ञेय है।। 1।।

होती पर्याय क्रमबद्ध कहता रहे,
फिर भी ‘ऐसा हुआ क्यों’ ये सोचा करे।
योग्यता तत्समय की है कारण नियत,
फिर कहाँ है विकल्पों का अवसर अरे ।।
छोड़ दे चिन्ता, भज ले तू निज भाव को,
भ्रात समता ही तेरा परम पेय है।। 2।।

गुण अगुरुलघु रहें, हानि-वृद्धि नहीं,
तेरा वैभव सदा एक सा ही रहे ।
फिर भी अनुभव करे हीनता वृद्धि का,
मूढ़ कैसे विकल्पों का सागर तरे ।।
सिंधु में लहरें केवल सतह पर दिखे,
उर में रत्नों की खान अपरिमेय है।। 3।।

भव्य ! सौभाग्य से तुझको अवसर मिला,
रूप निज देखने को सुदर्पण मिला।
जिन-गुरु-शास्त्र का है समागम मिला,
है कमल कैसा रवि से भी जो ना खिला ।।
चिच्चमत्कार शाश्वत निजानन्दमय,
सिद्ध पद साधना का परम ध्येय है।। 4।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह